जन नानक सतिगुरु मेले आपे हरि आपे झगरु चुकावै ॥2॥3॥
जपि मन राम नामु निसतारा ॥
कोट कोटंतर के पाप सभि खोवै हरि भवजलु पारि उतारा ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ नगरि बसत हरि सुआमी हरि निरभउ निरवैरु निरंकारा ॥
हरि निकटि बसत कछु नदरि न आवै हरि लाधा गुर वीचारा ॥1॥
हरि आपे साहु सराफु रतनु हीरा हरि आपि कीआ पासारा ॥
नानक जिसु क्रिपा करे सु हरि नामु विहाझे सो साहु सचा वणजारा ॥2॥4॥
जपि मन हरि निरंजनु निरंकारा ॥
सदा सदा हरि धिआईऐ सुखदाता जा का अंतु न पारावारा ॥1॥ रहाउ ॥
अगनि कुंट महि उरध लिव लागा हरि राखै उदर मंझारा ॥
सो ऐसा हरि सेवहु मेरे मन हरि अंति छडावणहारा ॥1॥
जा कै हिरदै बसिआ मेरा हरि हरि तिसु जन कउ करहु नमसकारा ॥
हरि किरपा ते पाईऐ हरि जपु नानक नामु अधारा ॥2॥5॥
जपि मन हरि हरि नामु नित धिआइ ॥
जो इछहि सोई फलु पावहि फिरि दूखु न लागै आइ ॥1॥ रहाउ ॥
सो जपु सो तपु सा ब्रत पूजा जितु हरि सिउ प्रीति लगाइ ॥
बिनु हरि प्रीति होर प्रीति सभ झूठी इक खिन महि बिसरि सभ जाइ ॥1॥
तू बेअंतु सरब कल पूरा किछु कीमति कही न जाइ ॥
नानक सरणि तुम॑ारी हरि जीउ भावै तिवै छडाइ ॥2॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संत जना मिलि हरि जसु गाइओ ॥
कोटि जनम के दूख गवाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जो चाहत सोई मनि पाइओ ॥
करि किरपा हरि नामु दिवाइओ ॥1॥
सरब सूख हरि नामि वडाई ॥
गुर प्रसादि नानक मति पाई ॥2॥1॥7॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (भक्त जानता है कि) परमात्मा ने खुद ही (अपने आप से) पाँच तत्वों का जगत पसारा पसारा हुआ है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।