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अंग 720

अंग
720
राग Baihaaree
राग: Baihaaree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि आपे पंच ततु बिसथारा विचि धातू पंच आपि पावै ॥
जन नानक सतिगुरु मेले आपे हरि आपे झगरु चुकावै ॥2॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (भक्त जानता है कि) परमात्मा ने खुद ही (अपने आप से) पाँच तत्वों का जगत पसारा पसारा हुआ है।खुद ही इन तत्वों में पाँचों विषौ भरे हुए हैं। हे नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा आप ही अपने सेवक को मिलाता है।और।आप ही (उसके अंदर से हरेक किस्म की) खींचतान खत्म करता है। 2। 3।
बैराड़ी महला 4 ॥
जपि मन राम नामु निसतारा ॥
कोट कोटंतर के पाप सभि खोवै हरि भवजलु पारि उतारा ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ नगरि बसत हरि सुआमी हरि निरभउ निरवैरु निरंकारा ॥
हरि निकटि बसत कछु नदरि न आवै हरि लाधा गुर वीचारा ॥1॥
हरि आपे साहु सराफु रतनु हीरा हरि आपि कीआ पासारा ॥
नानक जिसु क्रिपा करे सु हरि नामु विहाझे सो साहु सचा वणजारा ॥2॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बैराड़ी महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम जपा कर।(ये नाम संसार-समुंद्र से) पार उतारा कर देता है। (परमात्मा का नाम) अनेकों जूनियों के (किए) पाप नाश कर देता है।परमात्मा (सिमरन करने वाले जीव को) संसार-समुंद्र से पार लंघा देता है। 1।रहाउ। (हे भाई !) मालिक प्रभू (हमारे) शरीर-शहर में बसता है।(फिर भी) उसे कोई डर नहीं होता।उसे किसी का वैर नहीं।उसका कोई खास आकार नहीं। परमात्मा (सदा हमारे) नजदीक बसता है।(पर हमें) दिखता नहीं (हाँ।) गुरू की बख्शी हुई सूझ से वही हरी मिल जाता है। 1। (गुरू की बख्शी हुई दाति से ये समझ आ जाती है कि) परमात्मा स्वयं ही हीरा है।खुद ही रत्न है।खुद ही (इसका व्यापार करने वाला) शाहूकार है सर्राफ है।उसने खुद ही इस जगत का पसारा रचा हुआ है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपा करता है।वह मनुष्य उसके नाम का सौदा करता है।वह मनुष्य (नाम-रत्न का) शाहूकार बन जाता है।वह सदा के लिए (इस नाम-रत्न का) व्यापार करता रहता है। 2। 4।
बैराड़ी महला 4 ॥
जपि मन हरि निरंजनु निरंकारा ॥
सदा सदा हरि धिआईऐ सुखदाता जा का अंतु न पारावारा ॥1॥ रहाउ ॥
अगनि कुंट महि उरध लिव लागा हरि राखै उदर मंझारा ॥
सो ऐसा हरि सेवहु मेरे मन हरि अंति छडावणहारा ॥1॥
जा कै हिरदै बसिआ मेरा हरि हरि तिसु जन कउ करहु नमसकारा ॥
हरि किरपा ते पाईऐ हरि जपु नानक नामु अधारा ॥2॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: बैराड़ी महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! उस परमात्मा का नाम जपा कर।जो माया के प्रभाव से परे है।जिसका कोई खास स्वरूप नहीं बताया जा सकता। हे मन ! जिस (प्रभू के गुणों) का अंत नहीं पाया जा सकता।जिस (के स्वरूप की) हद-बंदी नहीं मिलती।उस सुख देने वाले को सदा ही सिमरना चाहिए। 1।रहाउ। हे मन ! जब जीव (माँ के पेट की) आग के कुंड में उल्टा लटका हुआ (उसके चरणों में) सुरति जोड़े रखता है (तब) परमात्मा (माँ के) पेट में उसकी रक्षा करता है। हे मेरे मन ! ऐसी समर्था वाले प्रभू की सदा सेवा-भक्ति किया कर।आखिरी वक्त भी वही प्रभू छुड़ा सकने वाला है। 1। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा सच्चा बसा रहता है।हे मेरे मन ! उस मनुष्य के आगे सदा सिर निवाया कर। हे नानक ! (कह, हे मन !) परमात्मा की कृपा से ही परमात्मा के नाम का जाप प्राप्त होता है (जिसको प्राप्त हो जाता है) नाम (उसकी जिंदगी का) आसरा बन जाता है। 2। 5।
बैराड़ी महला 4 ॥
जपि मन हरि हरि नामु नित धिआइ ॥
जो इछहि सोई फलु पावहि फिरि दूखु न लागै आइ ॥1॥ रहाउ ॥
सो जपु सो तपु सा ब्रत पूजा जितु हरि सिउ प्रीति लगाइ ॥
बिनु हरि प्रीति होर प्रीति सभ झूठी इक खिन महि बिसरि सभ जाइ ॥1॥
तू बेअंतु सरब कल पूरा किछु कीमति कही न जाइ ॥
नानक सरणि तुम॑ारी हरि जीउ भावै तिवै छडाइ ॥2॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बैराड़ी महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! सदा प्रभू का नाम जपा कर।प्रभू का ध्यान धरा कर। (उस प्रभू के दर से) जो कुछ माँगेगा।वही प्राप्त कर लेगा।कोई दुख भी आपको आ के नहीं लग सकेगा। 1।रहाउ। हे मन ! जिस सिमरन की बरकति से परमात्मा के साथ प्रीति बनी रहती है।वह सिमरन ही जप है।वह सिमरन ही तप है।वह सिमरन ही वर्त है।वह सिमरन ही पूजा है। प्रभू-चरणों के प्यार के बिना और (जप-तप आदि का) प्यार झूठा है।एक छिन में वह प्यार भूल जाता है। 1। हे नानक ! (कह) हे प्रभू जी ! आप बेअंत है।आप सारी ताकतों से भरपूर है।आपका मूल्य नहीं डाला जा सकता। मैं (नानक) आपकी शरण आया हूँ।जैसे आपको ठीक लगे।मुझे अपने चरणों की प्रीति के अलावा औरों की प्रीति से बचाए रखो। 2। 6।
रागु बैराड़ी महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संत जना मिलि हरि जसु गाइओ ॥
कोटि जनम के दूख गवाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जो चाहत सोई मनि पाइओ ॥
करि किरपा हरि नामु दिवाइओ ॥1॥
सरब सूख हरि नामि वडाई ॥
गुर प्रसादि नानक मति पाई ॥2॥1॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु बैराड़ी महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जिस भी मनुष्य ने गुरमुखों की संगति में मिल के परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए हैं। उसके अपने करोड़ों जन्मों के दुख दूर कर लिए है। 1।रहाउ। हे भाई ! सिफत सालाह करने वाले मनुष्य ने जो कुछ भी अपने मन में चाह की।उसको वहीं प्राप्त हो गई। (गुरू ने) कृपा करके उसको (प्रभू के दर से) प्रभू का नाम भी दिलवा दिया। हे भाई ! परमात्मा के नाम में (जुड़ने से) सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं।(लोक-परलोक में) इज्जत (भी मिल जाती है)। हे नानक ! (प्रभू के नाम में जुड़ने की यह) अकल गुरू की कृपा से ही मिलती है। 2। 1। 7।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (भक्त जानता है कि) परमात्मा ने खुद ही (अपने आप से) पाँच तत्वों का जगत पसारा पसारा हुआ है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।