काइआ रोगु न छिद्रु किछु ना किछु काड़ा सोगु ॥
मिरतु न आवी चिति तिसु अहिनिसि भोगै भोगु ॥
सभ किछु कीतोनु आपणा जीइ न संक धरिआ ॥
चिति न आइओ पारब्रहमु जमकंकर वसि परिआ ॥8॥
किरपा करे जिसु पारब्रहमु होवै साधू संगु ॥
जिउ जिउ ओहु वधाईऐ तिउ तिउ हरि सिउ रंगु ॥
दुहा सिरिआ का खसमु आपि अवरु न दूजा थाउ ॥
सतिगुर तुठै पाइआ नानक सचा नाउ ॥9॥1॥26॥
जानउ नही भावै कवन बाता ॥
मन खोजि मारगु ॥1॥ रहाउ ॥
धिआनी धिआनु लावहि ॥
गिआनी गिआनु कमावहि ॥
प्रभु किन ही जाता ॥1॥
भगउती रहत जुगता ॥
जोगी कहत मुकता ॥
तपसी तपहि राता ॥2॥
मोनी मोनिधारी ॥
सनिआसी ब्रहमचारी ॥
उदासी उदासि राता ॥3॥
भगति नवै परकारा ॥
पंडितु वेदु पुकारा ॥
गिरसती गिरसति धरमाता ॥4॥
इक सबदी बहु रूपि अवधूता ॥
कापड़ी कउते जागूता ॥
इकि तीरथि नाता ॥5॥
निरहार वरती आपरसा ॥
इकि लूकि न देवहि दरसा ॥
इकि मन ही गिआता ॥6॥
घाटि न किन ही कहाइआ ॥
सभ कहते है पाइआ ॥
जिसु मेले सो भगता ॥7॥
सगल उकति उपावा ॥ तिआगी सरनि पावा ॥
नानकु गुर चरणि पराता ॥8॥2॥27॥
सिरीरागु महला 1 घरु 3 ॥
जोगी अंदरि जोगीआ ॥
तूं भोगी अंदरि भोगीआ ॥
तेरा अंतु न पाइआ सुरगि मछि पइआलि जीउ ॥1॥
हउ वारी हउ वारणै कुरबाणु तेरे नाव नो ॥1॥ रहाउ ॥
तुधु संसारु उपाइआ ॥
सिरे सिरि धंधे लाइआ ॥
वेखहि कीता आपणा करि कुदरति पासा ढालि जीउ ॥2॥
परगटि पाहारै जापदा ॥
सभु नावै नो परतापदा ॥
सतिगुर बाझु न पाइओ सभ मोही माइआ जालि जीउ ॥3॥
सतिगुर कउ बलि जाईऐ ॥
जितु मिलिऐ परम गति पाईऐ ॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर, यदि परमात्मा उसके चित्त में नहीं बसता तो वह (आखिर) ले जा के नर्क में ही डाला जाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।