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अंग 71

अंग
71
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
चिति न आइओ पारब्रहमु ता खड़ि रसातलि दीत ॥7॥
काइआ रोगु न छिद्रु किछु ना किछु काड़ा सोगु ॥
मिरतु न आवी चिति तिसु अहिनिसि भोगै भोगु ॥
सभ किछु कीतोनु आपणा जीइ न संक धरिआ ॥
चिति न आइओ पारब्रहमु जमकंकर वसि परिआ ॥8॥
किरपा करे जिसु पारब्रहमु होवै साधू संगु ॥
जिउ जिउ ओहु वधाईऐ तिउ तिउ हरि सिउ रंगु ॥
दुहा सिरिआ का खसमु आपि अवरु न दूजा थाउ ॥
सतिगुर तुठै पाइआ नानक सचा नाउ ॥9॥1॥26॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पर, यदि परमात्मा उसके चित्त में नहीं बसता तो वह (आखिर) ले जा के नर्क में ही डाला जाता है।7। यदि किसी मनुष्य के शरीर को कभी कोई रंग ना लगा हो, कोई किसी तरह की तकलीफ़ ना आई हो, किसी तरह की कोई चिंता फिक्र उसे ना हो। उसे कभी मौत (का फिक्र) याद ना आई हो, यदि वह दिन रात दुनिया के भोग भोगता रहता हो, यदि उसने दुनिया की हरेक चीज को अपना बना लिया हो, कभी उसके चित्त में (अपनी मल्कियत के बारे में) कोई शंका ना उठा हो। पर, यदि परमात्मा उसके चित्त में कभी नहीं आया तो वह अंत में यमराज के दूतों के वश पड़ता है।8। जिस (बड़े भाग्यशाली) मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है, उसे संत संग प्राप्त होता है (और यह एक कुदरती नियम है कि) ज्यों ज्यों वह (सत्संग में बैठना) बढ़ाता जाता है त्यों त्यों परमात्मा से प्यार (भी बढ़ता जाता है)। (पर, दुनिया के मोह और प्रभू चरणों का प्यार इन) दोनों तरफ का मालिक परमात्मा स्वयं है (किसी को माया के मोह में फसाए रखता है, और किसी को गुरू चरणों का प्यार बख्शता है। उस प्रभू के बिनां जीवों के लिए) कोई और दूसरा सहारा नहीं। हे नानक ! (जब प्रभू की मेहर हो तो वह गुरू मिलाता है, और) गुरू के प्रसन्न होने से सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम प्राप्त हो जाता है।9।1।26।
सिरीरागु महला 5 घरु 5 ॥
जानउ नही भावै कवन बाता ॥
मन खोजि मारगु ॥1॥ रहाउ ॥
धिआनी धिआनु लावहि ॥
गिआनी गिआनु कमावहि ॥
प्रभु किन ही जाता ॥1॥
भगउती रहत जुगता ॥
जोगी कहत मुकता ॥
तपसी तपहि राता ॥2॥
मोनी मोनिधारी ॥
सनिआसी ब्रहमचारी ॥
उदासी उदासि राता ॥3॥
भगति नवै परकारा ॥
पंडितु वेदु पुकारा ॥
गिरसती गिरसति धरमाता ॥4॥
इक सबदी बहु रूपि अवधूता ॥
कापड़ी कउते जागूता ॥
इकि तीरथि नाता ॥5॥
निरहार वरती आपरसा ॥
इकि लूकि न देवहि दरसा ॥
इकि मन ही गिआता ॥6॥
घाटि न किन ही कहाइआ ॥
सभ कहते है पाइआ ॥
जिसु मेले सो भगता ॥7॥
सगल उकति उपावा ॥ तिआगी सरनि पावा ॥
नानकु गुर चरणि पराता ॥8॥2॥27॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 घरु 5 ॥ मुझे समझ नहीं कि परमात्मा को कौन सी बात ठीक लगती है। हे मेरे मन ! आप (वह) रास्ता ढूँढ (जिस पे चलने से प्रभू प्रसन्न हैं जाए)।1।रहाउ। समाधियां लगाने वाले लोग समाधियां लगाते हैं। विद्वान लोग धर्म चर्चा करते हैं। पर परमात्मा को किसी विरले ने ही समझा है (भाव, इन तरीकों से परमात्मा नही मिलता)।1। वैश्नव भक्त (वर्त, तुलसी माला, तीर्थ स्नान आदि) संजमों में रहते हैं। जोगी कहते हैं कि हम मुक्त हो गए हैं। तप करने वाले साधू तप (करने) में ही मस्त रहते हैं।2। चुप साध के रखने वाले साधू चुप रहते हैं। संयासी (सन्यास में), ब्रह्मचारी (ब्रह्मचर्य में) और उदासी उदास भेष में मस्त रहते हैं।3। (कोई कहता है कि) भक्ति नौ किस्मों की है। पण्डित वेद ऊँचा ऊँचा पढ़ता है। गृहस्ती गृहस्त-धर्म में मस्त रहता है।4। अनेकों ऐसे हैं जो ‘अलख’ ‘अलख’ पुकारते हैं, कोई बहरूपीए हैं, कोई नांगे हैं। कोई खास किस्म का चोला आदि पहनने वाले हैं। कोई नाटक चेटक स्वांग आदि बना के लोगों को प्रसन्न करते हैं। कई ऐसे हैं जो रातें जाग के गुजारते हैं। एक ऐसे हैं जो (हरेक) तीर्थ पर स्नान करते हैं।5। अनेकों ऐसे हैं जो भूखे ही रहते हैं। कई ऐसे हैं जो दूसरों के साथ छूते नहीं हैं (ताकि किसी को छूत ना लग जाए)। अनेकों ऐसे हैं जो (गुफा आदि में) छुप के (रहते हैं और किसी को) दर्शन नहीं देते। कई ऐसे हैं जो अपने मन में ही ज्ञानवान बने हुए हैं।6। (इनमें से) किसी ने भी अपने आप को (किसी और से) कम नहीं कहलवाया। सभी यही कहते हैं कि हमने परमात्मा ढूंढ लिया है। पर (परमात्मा का) भक्त वही है जिसको (परमात्मा ने स्वयं अपने साथ) मिला लिया है।7। पर, मैंने तो ये सारी दलीलें और सारे ही उपाय छोड़ दिए हैं और प्रभू की ही शरण पड़ा हूँ। नानक तो गुरू के चरणों में आ गिरा है।8।2।27।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीरागु महला 1 घरु 3 ॥
जोगी अंदरि जोगीआ ॥
तूं भोगी अंदरि भोगीआ ॥
तेरा अंतु न पाइआ सुरगि मछि पइआलि जीउ ॥1॥
हउ वारी हउ वारणै कुरबाणु तेरे नाव नो ॥1॥ रहाउ ॥
तुधु संसारु उपाइआ ॥
सिरे सिरि धंधे लाइआ ॥
वेखहि कीता आपणा करि कुदरति पासा ढालि जीउ ॥2॥
परगटि पाहारै जापदा ॥
सभु नावै नो परतापदा ॥
सतिगुर बाझु न पाइओ सभ मोही माइआ जालि जीउ ॥3॥
सतिगुर कउ बलि जाईऐ ॥
जितु मिलिऐ परम गति पाईऐ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्री राग महला 1 घरु 3 ॥ (हे प्रभू !) जोगियों के अंदर (व्यापक हो के आप स्वयं ही) जोग कमा रहा है। माया के भोग भोगने वालों के अंदर भी आप ही पदार्थ भोग रहा है। स्वर्ग लोक में मातृ लोक में पाताल लोक में (बसते किसी भी जीव ने) आपके गुणों का अंत नहीं पाया।1। हे प्रभू ! मैं सदके हूँ आपके नाम से, वारे जाता हूँ आपके नाम पे, कुर्बान हूँ आपके नाम पर।1।रहाउ। (हे प्रभू!) तूने ही जगत पैदा किया है। हरेक जीव पर (उनके किये कर्मों के लेख लिख के जीवों को तूने ही माया के) धंधों में फंसाया हुआ है। आप कुदरति रच के (जगत चौपड़ की) जीव-नरदें फेंक के आप स्वयं ही अपने रचे जगत की संभाल कर रहा है।2। (हे भाई !) परमात्मा इस दिखाई देते जगत पसारे में (बसता) दिखाई दे रहा है। हरेक जीव उस प्रभू के नाम की लालसा रखता है। पर, गुरू की शरण के बगैर किसी को प्रभू का नाम नहीं मिला (क्योंकि) सारी सृष्टि माया के जाल में फंसी हुई है।3। (हे भाई !) गुरू से कुर्बान जाना चाहिए (क्योंकि) उस (गुरू) के मिलने से ही सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल की जा सकती है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर, यदि परमात्मा उसके चित्त में नहीं बसता तो वह (आखिर) ले जा के नर्क में ही डाला जाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।