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अंग 70

अंग
70
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
एहु जगु जलता देखि कै भजि पए सतिगुर सरणा ॥
सतिगुरि सचु दिड़ाइआ सदा सचि संजमि रहणा ॥
सतिगुर सचा है बोहिथा सबदे भवजलु तरणा ॥6॥
लख चउरासीह फिरदे रहे बिनु सतिगुर मुकति न होई ॥
पड़ि पड़ि पंडित मोनी थके दूजै भाइ पति खोई ॥
सतिगुरि सबदु सुणाइआ बिनु सचे अवरु न कोई ॥7॥
जो सचै लाए से सचि लगे नित सची कार करंनि ॥
तिना निज घरि वासा पाइआ सचै महलि रहंनि ॥
नानक भगत सुखीए सदा सचै नामि रचंनि ॥8॥17॥8॥25॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य इस जगत को (विकारों की तपश में) जलता देख के जल्दी से गुरू की शरण जा पड़े, गुरू ने उनके दिल में सदा स्थिर प्रभू का नाम पक्का टिका दिया, उनको सदा स्थिर प्रभू के नाम में (सुंदर) जीवन मर्यादा में रहने की जाच सिखा दी। (हे भाई !) गुरू सदा कायम रहने वाला जहाज है। गुरू के शबद में जुड़ के संसार समुंद्र से पार लांघ जाते हैं।6। (जो गुरू की शरण से वंचित रहे वह) चौरासी लाख योनियों के चक्कर में भटकते फिरते हैं। गुरू के बगैर (इस चक्कर में से) निजात नहीं मिलती। पंडित लोग (शास्त्र आदि धर्म पुस्तकों को) पढ़ पढ़ के थक गए (गुरू की शरण के बिना चौरासी के चक्कर से खलासी प्राप्त ना कर सके, उन्होंने बल्कि) प्रभू के बिना औरों के प्यार में अपनी इज्जत गवा ली। जिस मनुष्य को गुरू ने अपना शबद सुना दिया (उसे निश्चय हो गया कि) सदा स्थिर प्रभू के बिना और कोई (जीव का रक्षक) नही है।7। (पर जीवों के भी क्या बस?) जिन जीवों को सदा स्थिर प्रभू ने अपनी याद में जोड़ा, वही सदा स्थिर प्रभू के नाम में लगे हैं। वही सदा ये साथ निभने वाली कार करते हैं। उन लोगों ने (माया की भटकना से बच के) अंतरात्मा में ठिकाना प्राप्त कर लिया है। वह लोग सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की हजूरी में रहते हैं। हे नानक ! परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग सदा सुखी रहते हैं। वह सदा स्थिर प्रभू के नाम में सदा मस्त रहते हैं।8।17।8।25।
सिरीरागु महला 5 ॥
जा कउ मुसकलु अति बणै ढोई कोइ न देइ ॥
लागू होए दुसमना साक भि भजि खले ॥
सभो भजै आसरा चुकै सभु असराउ ॥
चिति आवै ओसु पारब्रहमु लगै न तती वाउ ॥1॥
साहिबु निताणिआ का ताणु ॥
आइ न जाई थिरु सदा गुर सबदी सचु जाणु ॥1॥ रहाउ ॥
जे को होवै दुबला नंग भुख की पीर ॥
दमड़ा पलै ना पवै ना को देवै धीर ॥
सुआरथु सुआउ न को करे ना किछु होवै काजु ॥
चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निहचलु होवै राजु ॥2॥
जा कउ चिंता बहुतु बहुतु देही विआपै रोगु ॥
ग्रिसति कुटंबि पलेटिआ कदे हरखु कदे सोगु ॥
गउणु करे चहु कुंट का घड़ी न बैसणु सोइ ॥
चिति आवै ओसु पारब्रहमु तनु मनु सीतलु होइ ॥3॥
कामि करोधि मोहि वसि कीआ किरपन लोभि पिआरु ॥
चारे किलविख उनि अघ कीए होआ असुर संघारु ॥
पोथी गीत कवित किछु कदे न करनि धरिआ ॥
चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निमख सिमरत तरिआ ॥4॥
सासत सिंम्रिति बेद चारि मुखागर बिचरे ॥
तपे तपीसर जोगीआ तीरथि गवनु करे ॥
खटु करमा ते दुगुणे पूजा करता नाइ ॥
रंगु न लगी पारब्रहम ता सरपर नरके जाइ ॥5॥
राज मिलक सिकदारीआ रस भोगण बिसथार ॥
बाग सुहावे सोहणे चलै हुकमु अफार ॥
रंग तमासे बहु बिधी चाइ लगि रहिआ ॥
चिति न आइओ पारब्रहमु ता सरप की जूनि गइआ ॥6॥
बहुतु धनाढि अचारवंतु सोभा निरमल रीति ॥
मात पिता सुत भाईआ साजन संगि परीति ॥
लसकर तरकसबंद बंद जीउ जीउ सगली कीत ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ जिस मनुष्य को (कोई) भारी विपदा आ पड़े (जिससे बचने के लिए) कोई मनुष्य उसको सहारा ना दे, वैरी उसके मारू बन जाएं, उसके साक संबंधी उससे दूर दौड़ जाएं, उसका हरेक किस्म का आसरा खत्म हो जाए, हरेक तरह का सहारा खत्म हो जाए। अगर उस (विपदा के मारे) मनुष्य के हृदय में परमात्मा याद आ जाए, तो उस का बाल भी बाँका नहीं होता।1। मालिक प्रभू कमजोरों का सहारा है, वह ना पैदा होता है ना मरता है, सदा ही कायम रहने वाला है। (हे भाई !) गुरू के शबद में जुड़ के उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के साथ गहरी सांझ बना।1।रहाउ। जो कोई मनुष्य (ऐसा) कमजोर हो जाए (कि) भूख-नंग का दुख (उसे हर समय खाता रहे), यदि उसके पल्ले पैसा ना हो, कोई मनुष्य उसे हौसला ना दे; कोई मनुष्य उसकी जरूरतें पूरी ना करे, उससे अपना कोई काम सिरे ना चढ़ सके (ऐसी दुर्दशा में होते हुए भी) यदि परमात्मा उसके चित्त में आ बसे, तो उसका अटॅल राज बन जाता है (भाव, उसकी आत्मिक अवस्था ऐसे बादशाहों वाली हो जाती है जिनका राज कभी नहीं डोले)।2। जिस मनुष्य को हर समय बहुत चिंता बनी रहे, जिसके शरीर को (कोई ना कोई) रोग ग्रसे रखे, जो गृहस्थ (के जंजाल) में परिवार (के जंजाल) में (सदा) फंसा रहे, जिसे कभी कोई खुशी है और कभी कोई ग़म घेरे रखता है। जो मनुष्य सारी धरती पर इस तरह भटकता फिरता है कि उसे घड़ी भर भी बैठना नसीब नहीं होता। पर, यदि परमात्मा उसके चित्त में आ बसे, तो उसका तन शांत हो जाता है उसका मन (संतोष से) शीतल हो जाता है।3। यदि किसी मनुष्य को काम ने क्रोध ने मोह ने अपने वश में किया हो, यदि उस कंजूस का प्यार (सदा) लोभ में हो, यदि उसने (उन विकारों के वश हो के) चारों ही घोर पाप अपराध किये हों, यदि वह इतना बुरा हो गया हैं कि उसे मार देना ही ठीक हो। यदि उसने कभी भी कोई धर्म पुस्तक कोई धर्म गीत कोई धार्मिक कविता सुनी ना हो, पर यदि परमात्मा उसके चित्त में आ बसे, तो वह आँख झपकने जितने समय के लिए ही प्रभू का सिमरन करके (इन सभी विकारों के समुंद्र से) पार लांघ जाता है।4। यदि कोई मनुष्य चारों वेद, सारे शास्त्र और सारी ही स्मृतियों को मुंह ज़बानी (उचार के) विचार सकता हैं। यदि वह तपस्वियों व जोगियों की तरह (हरेक) तीर्थ पर जाता हो, यदि वह (तीर्तों पर) स्नान करके (देवी देवताओं की) पूजा करता हैं और (जाने माने) छे (धार्मिक) कर्मों से दोगुने (धार्मिक कर्म नित्य) करता हो; पर यदि परमात्मा (के चरणों) का प्यार उसके अंदर नहीं है, तो वह जरूर ही नर्क में जाता है।5। यदि किसी मनुष्य को (मुल्कों के) राज मिल रहे हों, बेअंत जमीनों की मल्कियत मिली हो, यदि (उसकी हर जगह) सरदारियां बनी हुई हों, दुनिया के अनेकों पदार्थों के भोग भोगता हैं। यदि उसके पास सुंदर सुंदर बाग हों, यदि (इन सारे पदार्थों की मल्कियत के कारण उस) अहंकारी (हुए) का हुकम हर कोई मानता हो, यदि वह दुनिया के कई किस्म के रंग तमाशों के चाव उल्लास में व्यस्त रहता हैं। पर, यदि परमात्मा उसके चित्त में कभी ना आया हैं तो उस को सांप की जून में गया समझो।6। यदि कोई मनुष्य बहुत धनवान हो, अच्छी रहिणी बहिणी वाला हो, शोभा वाला हो और साफ-सुथरी जीवन मर्यादा वाला हो, यदि उसका अपने माँ-बाप भाईयों और सज्जन-मित्रों से प्रेम हे, यदि तर्कश बांधने वाले योद्धाओं के लश्कर उसे सलामें करते हों, सारी सृष्टि ही उसे ‘जी जी’ कहती हैं।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य इस जगत को (विकारों की तपश में) जलता देख के जल्दी से गुरू की शरण जा पड़े, गुरू ने उनके दिल में सदा स्थिर प्रभू का नाम पक्का टिका दिया, उनको सदा स्थिर प्रभू के नाम में (सुं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।