ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥
तजी सिआनप चिंत विसारी अहं छोडिओ है तिआग्यि ॥1॥ रहाउ ॥
जउ देखउ तउ सगल मोहि मोहीअउ तउ सरनि परिओ गुर भागि ॥
करि किरपा टहल हरि लाइओ तउ जमि छोडी मोरी लागि ॥1॥
तरिओ सागरु पावक को जउ संत भेटे वड भागि ॥
जन नानक सरब सुख पाए मोरो हरि चरनी चितु लागि ॥2॥1॥5॥
मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥
द्रिड़ि॑ओ गिआनु मंत्रु हरि नामा प्रभ जीउ मइआ करा ॥1॥ रहाउ ॥
काल जाल अरु महा जंजाला छुटके जमहि डरा ॥
आइओ दुख हरण सरण करुणापति गहिओ चरण आसरा ॥1॥
नाव रूप भइओ साधसंगु भव निधि पारि परा ॥
अपिउ पीओ गतु थीओ भरमा कहु नानक अजरु जरा ॥2॥2॥6॥
जा कउ भए गोविंद सहाई ॥
सूख सहज आनंद सगल सिउ वा कउ बिआधि न काई ॥1॥ रहाउ ॥
दीसहि सभ संगि रहहि अलेपा नह विआपै उन माई ॥
एकै रंगि तत के बेते सतिगुर ते बुधि पाई ॥1॥
दइआ मइआ किरपा ठाकुर की सेई संत सुभाई ॥
तिन कै संगि नानक निसतरीऐ जिन रसि रसि हरि गुन गाई ॥2॥3॥7॥
गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥
अगिआन मोह मगन महा प्रानी अंधिआरे महि दीप ॥1॥ रहाउ ॥
सफल दरसनु तुमरा प्रभ प्रीतम चरन कमल आनूप ॥
अनिक बार करउ तिह बंदन मनहि चर्हावउ धूप ॥1॥
हारि परिओ तुम॑रै प्रभ दुआरै द्रिड़॑ु करि गही तुम॑ारी लूक ॥
काढि लेहु नानक अपुने कउ संसार पावक के कूप ॥2॥4॥8॥
कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥
चरन गहउ बकउ सुभ रसना दीजहि प्रान अकोरि ॥1॥ रहाउ ॥
मनु तनु निरमल करत किआरो हरि सिंचै सुधा संजोरि ॥
इआ रस महि मगनु होत किरपा ते महा बिखिआ ते तोरि ॥1॥
आइओ सरणि दीन दुख भंजन चितवउ तुम॑री ओरि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैतसरी महला 5 घरु 4 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।