लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 701 · जैतसरी

इस पृष्ठ पर
अंग
701
जैतसरी
अंग बदलें या अंश चुनें · 5 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥
  2. मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥
  3. जा कउ भए गोविंद सहाई ॥
  4. गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥
  5. कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥

अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥

जैतसरी महला 5 घरु 4 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥
तजी सिआनप चिंत विसारी अहं छोडिओ है तिआग्यि ॥1॥ रहाउ ॥
जउ देखउ तउ सगल मोहि मोहीअउ तउ सरनि परिओ गुर भागि ॥
करि किरपा टहल हरि लाइओ तउ जमि छोडी मोरी लागि ॥1॥
तरिओ सागरु पावक को जउ संत भेटे वड भागि ॥
जन नानक सरब सुख पाए मोरो हरि चरनी चितु लागि ॥2॥1॥5॥

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 घरु 4 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! अब मैंने गुरू की आज्ञा में (चल के) आनंद प्राप्त कर लिया है। मैंने अपनी चतुराई छोड़ दी है। मैंने चिंता भुला दी है। मैंने अहंकार (अपने अंदर से) परे फेंक दिया है। 1।रहाउ। हे भाई ! जब मैं देखता हूँ (कि) सारी दुनिया मोह में फंसी हुई है। तब मैं भाग के गुरू की शरण जा पड़ा। (गुरू ने) कृपा करके मुझे परमात्मा की सेवा-भक्ति में जोड़ दिया। तब यमराज ने मेरा पीछा छोड़ दिया। 1। जब सौभाग्य से मुझे गुरू मिल जाए। मैंने (विकारों की) आग का समुंद्र तैर कर पार कर लिया है। हे दास नानक ! (कह) अब मैंने सारे सुख प्राप्त कर लिए हैं। मेरा मन प्रभू के चरनों में जुड़ा रहता है। 2। 1। 5।

मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥

जैतसरी महला 5 ॥
मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥
द्रिड़ि॑ओ गिआनु मंत्रु हरि नामा प्रभ जीउ मइआ करा ॥1॥ रहाउ ॥
काल जाल अरु महा जंजाला छुटके जमहि डरा ॥
आइओ दुख हरण सरण करुणापति गहिओ चरण आसरा ॥1॥
नाव रूप भइओ साधसंगु भव निधि पारि परा ॥
अपिउ पीओ गतु थीओ भरमा कहु नानक अजरु जरा ॥2॥2॥6॥

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे भाई ! (जब मैंने) गुरू (के चरणों) का ध्यान (अपने) मन में धरा। परमात्मा ने (मेरे पर) मेहर की। मैंने परमात्मा का नाम-मंत्र हृदय में टिका लिया। आत्मिक जीवन की सूझ दिल में पक्की कर ली। 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की सहायता से) मैं दुखों का नाश करने वाले प्रभू की शरण में आ पड़ा। तरस के मालिक हरी का मैंने आसरा ले लिया। आत्मिक मौत लाने वाले मेरे बंधन (जंजीरें) टूट गए। माया के बड़े जंजाल समाप्त हो गए। जमों का डर दूर हो गया। 1। हे भाई् ! गुरू की संगति ने मेरे वास्ते नाव का काम किया। (जिसकी सहायता से) मैं संसार-समुंद्र से पार लांघ गया हूँ। हे नानक ! (कह) मैंने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी लिया है। मेरे मन की भटकना दूर हो गई है। मैंने वह आत्मिक दर्जा प्राप्त कर लिया है जिसे बुढ़ापा नहीं आ सकता। 2। 2। 6।

जा कउ भए गोविंद सहाई ॥

जैतसरी महला 5 ॥
जा कउ भए गोविंद सहाई ॥
सूख सहज आनंद सगल सिउ वा कउ बिआधि न काई ॥1॥ रहाउ ॥
दीसहि सभ संगि रहहि अलेपा नह विआपै उन माई ॥
एकै रंगि तत के बेते सतिगुर ते बुधि पाई ॥1॥
दइआ मइआ किरपा ठाकुर की सेई संत सुभाई ॥
तिन कै संगि नानक निसतरीऐ जिन रसि रसि हरि गुन गाई ॥2॥3॥7॥

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों के लिए परमात्मा मददगार बन जाता है (उनकी उम्र) आत्मिक अडोलता के सारे सुखों के आनंद से (बीतती है) उन्हें कोई रोग नहीं छूता। 1।रहाउ। हे भाई ! वे मनुष्य सबके साथ (व्यवहार करते) दिखते हैं। पर वे (माया से) निर्लिप रहते हैं। माया उन पर अपना जोर नहीं डाल सकती। वे एक परमात्मा के प्रेम में टिके रहते हैं। वे जीवन की अस्लियत जानने वाले बन जाते हैं, ये बुद्धि उन्होंने गुरू से प्राप्त कर ली होती है। 1। वही मनुष्य प्रेम-भरे हृदय वाले संत बन जाते हैं। जिन पर मालिक प्रभू की कृपा मेहर दया होती है हे नानक ! जो मनुष्य सदा प्रेम से परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उनकी संगति में रह के संसार-समुंद्र से पार लांघ जाना है। 2। 3। 7।

गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥

जैतसरी महला 5 ॥
गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥
अगिआन मोह मगन महा प्रानी अंधिआरे महि दीप ॥1॥ रहाउ ॥
सफल दरसनु तुमरा प्रभ प्रीतम चरन कमल आनूप ॥
अनिक बार करउ तिह बंदन मनहि चर्हावउ धूप ॥1॥
हारि परिओ तुम॑रै प्रभ दुआरै द्रिड़॑ु करि गही तुम॑ारी लूक ॥
काढि लेहु नानक अपुने कउ संसार पावक के कूप ॥2॥4॥8॥

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे गोबिंद ! आप हम जीवों की जिंदगी हैं। प्राण हैं। धन हैं। सुहज हैं। जीव आत्मिक जीवन की अज्ञानता के कारण। बहुत ज्सादा मोह में डूबे रहते हैं। इस अंधकार में आप (जीवों के लिए) दीपक हैं। 1।रहाउ। हे प्रीतम प्रभू ! आपका दर्शन जीवन मनोरथ पूरा करने वाला है। आपके सुंदर चरण बेमिसाल हैं। मैं (आपके) इन चरणों पर अनेकों बार नमस्कार करता हूँ। अपना मन ही (आपके चरणों के आगे) भेट करता हूँ। यही धूप अर्पित करता हूँ। 1। हे प्रभू ! (और आसरों से) थक के (निराश हो के) मैं आपके दर पर आ गिरा हूँ। मैंने आपकी ओट पक्की करके पकड़ ली है। हे प्रभू ! संसार आग के कूँएं में से अपने दास नानक को निकाल ले। 2। 4। 8।

कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

जैतसरी महला 5 ॥
कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥
चरन गहउ बकउ सुभ रसना दीजहि प्रान अकोरि ॥1॥ रहाउ ॥
मनु तनु निरमल करत किआरो हरि सिंचै सुधा संजोरि ॥
इआ रस महि मगनु होत किरपा ते महा बिखिआ ते तोरि ॥1॥
आइओ सरणि दीन दुख भंजन चितवउ तुम॑री ओरि ॥

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे भाई ! अगर कोई मनुष्य मुझे परमात्मा (के चरणों) से जोड़ दे। तो मैं उसके चरण पकड़ लूँ। मैं जीभ से (उसके धन्यवाद के) मीठे बोल बोलूँ। मेरे ये प्राण उसके आगे भेटा के तौर पर दिए जाएं। 1।रहाउ। हे भाई ! कोई विरला मनुष्य परमात्मा की कृपा से अपने मन को शरीर को। पवित्र क्यारा बनाता है। उसमें प्रभू का नाम-जल अच्छी तरह सींचता है। और। बड़ी (मोहनी) माया से (संबंध) तोड़ के इस (नाम-) रस में मस्त रहता है। 1। हे दीनों के दुख नाश करने वाले ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मैं आपका ही आसरा (अपने मन में) चितवता रहता हूँ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 701 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।