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अंग 701

अंग
701
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जैतसरी महला 5 घरु 4 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥
तजी सिआनप चिंत विसारी अहं छोडिओ है तिआग्यि ॥1॥ रहाउ ॥
जउ देखउ तउ सगल मोहि मोहीअउ तउ सरनि परिओ गुर भागि ॥
करि किरपा टहल हरि लाइओ तउ जमि छोडी मोरी लागि ॥1॥
तरिओ सागरु पावक को जउ संत भेटे वड भागि ॥
जन नानक सरब सुख पाए मोरो हरि चरनी चितु लागि ॥2॥1॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 घरु 4 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! अब मैंने गुरू की आज्ञा में (चल के) आनंद प्राप्त कर लिया है। मैंने अपनी चतुराई छोड़ दी है।मैंने चिंता भुला दी है।मैंने अहंकार (अपने अंदर से) परे फेंक दिया है। 1।रहाउ। हे भाई ! जब मैं देखता हूँ (कि) सारी दुनिया मोह में फंसी हुई है।तब मैं भाग के गुरू की शरण जा पड़ा। (गुरू ने) कृपा करके मुझे परमात्मा की सेवा-भक्ति में जोड़ दिया।तब यमराज ने मेरा पीछा छोड़ दिया। 1। जब सौभाग्य से मुझे गुरू मिल जाए।मैंने (विकारों की) आग का समुंद्र तैर कर पार कर लिया है। हे दास नानक ! (कह) अब मैंने सारे सुख प्राप्त कर लिए हैं।मेरा मन प्रभू के चरनों में जुड़ा रहता है। 2। 1। 5।
जैतसरी महला 5 ॥
मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥
द्रिड़ि॑ओ गिआनु मंत्रु हरि नामा प्रभ जीउ मइआ करा ॥1॥ रहाउ ॥
काल जाल अरु महा जंजाला छुटके जमहि डरा ॥
आइओ दुख हरण सरण करुणापति गहिओ चरण आसरा ॥1॥
नाव रूप भइओ साधसंगु भव निधि पारि परा ॥
अपिउ पीओ गतु थीओ भरमा कहु नानक अजरु जरा ॥2॥2॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे भाई ! (जब मैंने) गुरू (के चरणों) का ध्यान (अपने) मन में धरा। परमात्मा ने (मेरे पर) मेहर की।मैंने परमात्मा का नाम-मंत्र हृदय में टिका लिया।आत्मिक जीवन की सूझ दिल में पक्की कर ली। 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की सहायता से) मैं दुखों का नाश करने वाले प्रभू की शरण में आ पड़ा।तरस के मालिक हरी का मैंने आसरा ले लिया। आत्मिक मौत लाने वाले मेरे बंधन (जंजीरें) टूट गए।माया के बड़े जंजाल समाप्त हो गए।जमों का डर दूर हो गया। 1। हे भाई् ! गुरू की संगति ने मेरे वास्ते नाव का काम किया।(जिसकी सहायता से) मैं संसार-समुंद्र से पार लांघ गया हूँ। हे नानक ! (कह) मैंने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी लिया है।मेरे मन की भटकना दूर हो गई है।मैंने वह आत्मिक दर्जा प्राप्त कर लिया है जिसे बुढ़ापा नहीं आ सकता। 2। 2। 6।
जैतसरी महला 5 ॥
जा कउ भए गोविंद सहाई ॥
सूख सहज आनंद सगल सिउ वा कउ बिआधि न काई ॥1॥ रहाउ ॥
दीसहि सभ संगि रहहि अलेपा नह विआपै उन माई ॥
एकै रंगि तत के बेते सतिगुर ते बुधि पाई ॥1॥
दइआ मइआ किरपा ठाकुर की सेई संत सुभाई ॥
तिन कै संगि नानक निसतरीऐ जिन रसि रसि हरि गुन गाई ॥2॥3॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों के लिए परमात्मा मददगार बन जाता है (उनकी उम्र) आत्मिक अडोलता के सारे सुखों के आनंद से (बीतती है) उन्हें कोई रोग नहीं छूता। 1।रहाउ। हे भाई ! वे मनुष्य सबके साथ (व्यवहार करते) दिखते हैं।पर वे (माया से) निर्लिप रहते हैं।माया उन पर अपना जोर नहीं डाल सकती। वे एक परमात्मा के प्रेम में टिके रहते हैं।वे जीवन की अस्लियत जानने वाले बन जाते हैं, ये बुद्धि उन्होंने गुरू से प्राप्त कर ली होती है। 1। वही मनुष्य प्रेम-भरे हृदय वाले संत बन जाते हैं।जिन पर मालिक प्रभू की कृपा मेहर दया होती है हे नानक ! जो मनुष्य सदा प्रेम से परमात्मा के गुण गाते रहते हैं।उनकी संगति में रह के संसार-समुंद्र से पार लांघ जाना है। 2। 3। 7।
जैतसरी महला 5 ॥
गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥
अगिआन मोह मगन महा प्रानी अंधिआरे महि दीप ॥1॥ रहाउ ॥
सफल दरसनु तुमरा प्रभ प्रीतम चरन कमल आनूप ॥
अनिक बार करउ तिह बंदन मनहि चर्हावउ धूप ॥1॥
हारि परिओ तुम॑रै प्रभ दुआरै द्रिड़॑ु करि गही तुम॑ारी लूक ॥
काढि लेहु नानक अपुने कउ संसार पावक के कूप ॥2॥4॥8॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे गोबिंद ! आप हम जीवों की जिंदगी है।प्रान है।धन है।सुहज है। जीव आत्मिक जीवन की अज्ञानता के कारण।बहुत ज्सादा मोह में डूबे रहते हैं।इस अंधकार में आप (जीवों के लिए) दीपक है। 1।रहाउ। हे प्रीतम प्रभू ! आपका दर्शन जीवन मनोरथ पूरा करने वाला है।आपके सुंदर चरण बेमिसाल हैं। मैं (आपके) इन चरणों पर अनेकों बार नमस्कार करता हूँ।अपना मन ही (आपके चरणों के आगे) भेट करता हूँ।यही धूप अर्पित करता हूँ। 1। हे प्रभू ! (और आसरों से) थक के (निराश हो के) मैं आपके दर पर आ गिरा हूँ।मैंने आपकी ओट पक्की करके पकड़ ली है। हे प्रभू ! संसार आग के कूँएं में से अपने दास नानक को निकाल ले। 2। 4। 8।
जैतसरी महला 5 ॥
कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥
चरन गहउ बकउ सुभ रसना दीजहि प्रान अकोरि ॥1॥ रहाउ ॥
मनु तनु निरमल करत किआरो हरि सिंचै सुधा संजोरि ॥
इआ रस महि मगनु होत किरपा ते महा बिखिआ ते तोरि ॥1॥
आइओ सरणि दीन दुख भंजन चितवउ तुम॑री ओरि ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे भाई ! अगर कोई मनुष्य मुझे परमात्मा (के चरणों) से जोड़ दे। तो मैं उसके चरण पकड़ लूँ।मैं जीभ से (उसके धन्यवाद के) मीठे बोल बोलूँ।मेरे ये प्राण उसके आगे भेटा के तौर पर दिए जाएं। 1।रहाउ। हे भाई ! कोई विरला मनुष्य परमात्मा की कृपा से अपने मन को शरीर को।पवित्र क्यारा बनाता है। उसमें प्रभू का नाम-जल अच्छी तरह सींचता है।और।बड़ी (मोहनी) माया से (संबंध) तोड़ के इस (नाम-) रस में मस्त रहता है। 1। हे दीनों के दुख नाश करने वाले ! मैं आपकी शरण आया हूँ।मैं आपका ही आसरा (अपने मन में) चितवता रहता हूँ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैतसरी महला 5 घरु 4 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।