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अंग 702

अंग
702
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अभै पदु दानु सिमरनु सुआमी को प्रभ नानक बंधन छोरि ॥2॥5॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! (मुझ) नानक के (माया वाले) बंधन छुड़वा के मुझे अपने नाम का सिमरन दे।मुझे (विकारों के मुकाबले में) निर्भैता वाली अवस्था दे। 2। 5। 9।
जैतसरी महला 5 ॥
चात्रिक चितवत बरसत मेंह ॥
क्रिपा सिंधु करुणा प्रभ धारहु हरि प्रेम भगति को नेंह ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक सूख चकवी नही चाहत अनद पूरन पेखि देंह ॥
आन उपाव न जीवत मीना बिनु जल मरना तेंह ॥1॥
हम अनाथ नाथ हरि सरणी अपुनी क्रिपा करेंह ॥
चरण कमल नानकु आराधै तिसु बिनु आन न केंह ॥2॥6॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ जैसे पपीहा (हर वक्त) बरसात का होना चितवता रहता है (वर्षा चाहता है)।वैसे ही। हे कृपा के समुंद्र ! हे प्रभू ! (मैं चितवता रहता हूँ कि मेरे पर) तरस करो।मुझे अपनी प्यार भरी भक्ति की लगन बख्शो। 1।रहाउ। हे भाई ! चकवी (अन्य) अनेकों सुख (भी) नहीं चाहती।सूरज को देख के उसके अंदर पूर्ण आनंद पैदा हो जाता है। (पानी के बिना) अन्य अनेकों उपाय करके भी मछली जीवित नहीं रह सकती।पानी के बिना उसकी मौत हो जाती है। 1। हे नाथ ! (आपके बिना) हम निआसरे थे।अपनी मेहर कर।और हमें अपनी शरण में रख। (आपका दास) नानक आपके सोहाने चरणों की आराधना करता रहे।सिमरन के बिना (नानक को) और कुछ अच्छा नहीं लगता। 2। 6। 10।
जैतसरी महला 5 ॥
मनि तनि बसि रहे मेरे प्रान ॥
करि किरपा साधू संगि भेटे पूरन पुरख सुजान ॥1॥ रहाउ ॥
प्रेम ठगउरी जिन कउ पाई तिन रसु पीअउ भारी ॥
ता की कीमति कहणु न जाई कुदरति कवन हम॑ारी ॥1॥
लाइ लए लड़ि दास जन अपुने उधरे उधरनहारे ॥
प्रभु सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइओ नानक सरणि दुआरे ॥2॥7॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे भाई ! मेरे प्राणों के आसरे प्रभू जी मेरे मन में मेरे हृदय में बस रहे हैं। वह सर्व गुण समपन्न।सर्व व्यापक।सबके दिलों की जानने वाले प्रभू जी (अपनी) मेहर कर कि मुझे गुरू की संगति में मिल जाए। 1।रहाउ। हे भाई ! जिन मनुष्यों को (गुरू से परमात्मा के) प्यार की ठॅगबूटी मिल गई है।उन्होंने नाम-रस अघा-अघा के पी लिया। उस (नाम-जल) की कीमति बताई नहीं जा सकती।मेरी क्या ताकत है।(कि मैं उस नाम-जल का मूल्य बता सकूँ) । 1। हे नानक ! प्रभू ने (सदा) अपने दास अपने सेवक अपने साथ लगा लगा के रखे हैं।(और।इस तरह) उस बचाने की स्मर्था वाले प्रभू ने (सेवकों को संसार के विचारों से सदा के लिए) बचाया है। प्रभू के दर पर आ के।प्रभू की शरण पड़ कर।सेवकों ने प्रभू को सदा-सदा सिमर के (हमेशा) आत्मिक आनंद लिया है। 2। 7। 11।
जैतसरी महला 5 ॥
आए अनिक जनम भ्रमि सरणी ॥
उधरु देह अंध कूप ते लावहु अपुनी चरणी ॥1॥ रहाउ ॥
गिआनु धिआनु किछु करमु न जाना नाहिन निरमल करणी ॥
साधसंगति कै अंचलि लावहु बिखम नदी जाइ तरणी ॥1॥
सुख संपति माइआ रस मीठे इह नही मन महि धरणी ॥
हरि दरसन त्रिपति नानक दास पावत हरि नाम रंग आभरणी ॥2॥8॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे प्रभू ! हम जीव कई जन्मों से भटकते हुए अब आपकी शरण आए हैं। हमारे शरीर को (माया के मोह के) घोर अंधेरे भरे कूएं से बचा ले।अपने चरणों में जोड़े रख। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मुझे आत्मिक जीवन की समझ नहीं।मेरी सुरति आपके चरणों में जुड़ी नहीं रहती।मुझे कोई अच्छा काम करना नहीं आता।मेरा आचरण भी स्वच्छ नहीं। हे प्रभू ! मुझे साध-संगति के पल्ले से लगा दे।ता कि ये मुश्किल (संसार-) दरिया को तैरा जा सके। 1। हे नानक ! दुनिया के सुख।धन।माया के मीठे स्वाद- परमात्मा के दास इन पदार्थों को (अपने) मन में नहीं बसाते। परमात्मा के दर्शनों से वे संतोष हासिल करते हैं।परमात्मा के नाम का प्यार ही उन (के जीवन) का गहना है। 2। 8। 12।
जैतसरी महला 5 ॥
हरि जन सिमरहु हिरदै राम ॥
हरि जन कउ अपदा निकटि न आवै पूरन दास के काम ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि बिघन बिनसहि हरि सेवा निहचलु गोविद धाम ॥
भगवंत भगत कउ भउ किछु नाही आदरु देवत जाम ॥1॥
तजि गोपाल आन जो करणी सोई सोई बिनसत खाम ॥
चरन कमल हिरदै गहु नानक सुख समूह बिसराम ॥2॥9॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे परमात्मा के प्यारो ! अपने हृदय में परमात्मा का नाम सिमरा करो। कोई भी विपक्ति प्रभू के सेवकों के निकट नहीं आती।सेवकों के सारे काम सिरे चढ़ते रहते हैं। 1।रहाउ। हे संतजनो ! परमात्मा की भक्ति (की बरकति) से (जिंदगी की राह में से) करोड़ों मुश्किलें नाश हो जाती हैं।और। परमात्मा का सदा अटल रहने वाला घर (भी मिल जाता है) भगवान के भक्तों को कोई भी डर सता नहीं सकता।यमराज भी उनका आदर करता है। 1। हे नानक ! परमात्मा (का सिमरन) भुला के और जो भी काम किया जाता है वह नाशवंत है और कच्चा (खामियों भरा) है (इस वास्ते। हे नानक !) परमात्मा के सुंदर चरण (अपने) हृदय में बसाए रख।(ये हरी के चरण ही) सारे सुखों के घर हैं। 2। 9। 13।
जैतसरी महला 9
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ ॥
जो जो करम कीओ लालच लगि तिह तिह आपु बंधाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
समझ न परी बिखै रस रचिओ जसु हरि को बिसराइओ ॥
संगि सुआमी सो जानिओ नाहिन बनु खोजन कउ धाइओ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 9 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! (सही जीवन-राह) भूला हुआ मन माया (के मोह में) फंसा रहता है।(फिर। ये) लालच में फस के जो-जो काम करता है।उनसे अपने आप को (माया के मोह में और) फसा लेता है। 1।रहाउ। (हे भाई ! सही जीवन से राह से टूटे हुए मनुष्य को) आत्मि्क जीवन की समझ नहीं होती।विषियों के स्वाद में मस्त रहता है। परमात्मा की सिफत सालाह भुलाए रहता है।परमात्मा (तो इसके) अंग-संग (बसता है) उसके साथ गहरी सांझ नहीं डालता।जंगल में ढूँढने के लिए दौड़ पड़ता है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! (मुझ) नानक के (माया वाले) बंधन छुड़वा के मुझे अपने नाम का सिमरन दे।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।