चात्रिक चितवत बरसत मेंह ॥
क्रिपा सिंधु करुणा प्रभ धारहु हरि प्रेम भगति को नेंह ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक सूख चकवी नही चाहत अनद पूरन पेखि देंह ॥
आन उपाव न जीवत मीना बिनु जल मरना तेंह ॥1॥
हम अनाथ नाथ हरि सरणी अपुनी क्रिपा करेंह ॥
चरण कमल नानकु आराधै तिसु बिनु आन न केंह ॥2॥6॥10॥
मनि तनि बसि रहे मेरे प्रान ॥
करि किरपा साधू संगि भेटे पूरन पुरख सुजान ॥1॥ रहाउ ॥
प्रेम ठगउरी जिन कउ पाई तिन रसु पीअउ भारी ॥
ता की कीमति कहणु न जाई कुदरति कवन हम॑ारी ॥1॥
लाइ लए लड़ि दास जन अपुने उधरे उधरनहारे ॥
प्रभु सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइओ नानक सरणि दुआरे ॥2॥7॥11॥
आए अनिक जनम भ्रमि सरणी ॥
उधरु देह अंध कूप ते लावहु अपुनी चरणी ॥1॥ रहाउ ॥
गिआनु धिआनु किछु करमु न जाना नाहिन निरमल करणी ॥
साधसंगति कै अंचलि लावहु बिखम नदी जाइ तरणी ॥1॥
सुख संपति माइआ रस मीठे इह नही मन महि धरणी ॥
हरि दरसन त्रिपति नानक दास पावत हरि नाम रंग आभरणी ॥2॥8॥12॥
हरि जन सिमरहु हिरदै राम ॥
हरि जन कउ अपदा निकटि न आवै पूरन दास के काम ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि बिघन बिनसहि हरि सेवा निहचलु गोविद धाम ॥
भगवंत भगत कउ भउ किछु नाही आदरु देवत जाम ॥1॥
तजि गोपाल आन जो करणी सोई सोई बिनसत खाम ॥
चरन कमल हिरदै गहु नानक सुख समूह बिसराम ॥2॥9॥13॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ ॥
जो जो करम कीओ लालच लगि तिह तिह आपु बंधाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
समझ न परी बिखै रस रचिओ जसु हरि को बिसराइओ ॥
संगि सुआमी सो जानिओ नाहिन बनु खोजन कउ धाइओ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! (मुझ) नानक के (माया वाले) बंधन छुड़वा के मुझे अपने नाम का सिमरन दे।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।