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अंग 700

अंग
700
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जैतसरी महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥
जिसु होइ क्रिपालु सोई बिधि बूझै ता की निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता बनिता सुत बंधप इसट मीत अरु भाई ॥ पूरब जनम के मिले संजोगी अंतहि को न सहाई ॥1॥
मुकति माल कनिक लाल हीरा मन रंजन की माइआ ॥
हा हा करत बिहानी अवधहि ता महि संतोखु न पाइआ ॥2॥
हसति रथ अस्व पवन तेज धणी भूमन चतुरांगा ॥
संगि न चालिओ इन महि कछूऐ ऊठि सिधाइओ नांगा ॥3॥
हरि के संत प्रिअ प्रीतम प्रभ के ता कै हरि हरि गाईऐ ॥
नानक ईहा सुखु आगै मुख ऊजल संगि संतन कै पाईऐ ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! कोई विरला मनुष्य जानता है (कि) यहाँ जगत में (असली) मित्र कौन है। जिस मनुष्य पर (परमात्मा) दयावान होता है।वही मनुष्य इस बात को समझता है।(फिर) उस मनुष्य की जीवन-जुगति पवित्र हो जाती है। 1।रहाउ। हे भाई ! माता-पिता।स्त्री।पुत्र।रिश्तेदार।प्यारे मित्र और भाई – ये सारे पहले जन्मों के संयोगों के कारण (यहाँ) आ मिले हैं।आखिरी वक्त पर इनमें से कोई भी साथी नहीं बनता। 1। हे भाई ! मोतियों की माला।सोना।लाल।हीरे।मन को खुश करने वाली माया- इनमें (लगने से) सारी उम्र ‘हाय हाय’ करते हुए गुजर जाती है।मन नहीं भरता। 2। हे भाई ! हाथी।रथ।हवा के वेग समान तेज दौड़ने वाले घोड़े (हों)।धनाढ हो।जमीन का मालिक हो।चारों किस्म की फौज का मालिक हो – इनमें से कोई (भी) चीज साथ नहीं जाती।(इनका मालिक मनुष्य यहाँ से) नंगा ही उठ के चल पड़ता है। 3। हे नानक ! परमात्मा के संत जन परमात्मा के प्यारे होते हैं।उनकी संगति में परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए। इस लोक में सुख मिलता है।परलोक में सुख-रू हो जाते हैं।(पर ये दाति) संत-जनों की संगति में ही मिलती है। 4। 1।
जैतसरी महला 5 घरु 3 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देहु संदेसरो कहीअउ प्रिअ कहीअउ ॥
बिसमु भई मै बहु बिधि सुनते कहहु सुहागनि सहीअउ ॥1॥ रहाउ ॥
को कहतो सभ बाहरि बाहरि को कहतो सभ महीअउ ॥
बरनु न दीसै चिहनु न लखीऐ सुहागनि साति बुझहीअउ ॥1॥
सरब निवासी घटि घटि वासी लेपु नही अलपहीअउ ॥
नानकु कहत सुनहु रे लोगा संत रसन को बसहीअउ ॥2॥1॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 घरु 3 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे सोहागवती सहेलियो ! (हे गुरू के सिखो !) मुझे प्यारे प्रभू का मीठा सा संदेशा दो।बताओ। मैं (उस प्यारे की बाबत) कई तरह (की बातें) सुन-सुन के हैरान हो रही हूँ। 1।रहाउ। कोई कहता है।वह सबसे बाहर ही बसता है।कोई कहता है।वह सबमें बसता है। उसका रंग नहीं दिखता।उसका कोई लक्षण नजर नहीं आता।हे सोहागनों ! आप मुझे सच्ची बात बताओ। 1। नानक कहता है, हे लोगो ! सुनो ! वह परमात्मा सभी में निवास रखने वाला है।हरेक के शरीर में बसने वाला है (फिर भी।उसको माया का) अल्प मात्र भी लेप नहीं। वह प्रभू संत जनों की जीभ पर बसता है (संतजन हर वक्त उसका नाम जपते हैं)। 2। 1। 2।
जैतसरी मः 5 ॥
धीरउ सुनि धीरउ प्रभ कउ ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ प्रान मनु तनु सभु अरपउ नीरउ पेखि प्रभ कउ नीरउ ॥1॥
बेसुमार बेअंतु बड दाता मनहि गहीरउ पेखि प्रभ कउ ॥2॥
जो चाहउ सोई सोई पावउ आसा मनसा पूरउ जपि प्रभ कउ ॥3॥
गुर प्रसादि नानक मनि वसिआ दूखि न कबहू झूरउ बुझि प्रभ कउ ॥4॥2॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी मः 5 ॥ हे भाई ! मैं प्रभू (की बातों) को सुन-सुन के (अपने मन में) सदा धीरज हासल करता रहता हूँ। 1। हे भाई ! प्रभू को हर वक्त (अपने) नजदीक देख-देख के मैं अपनी जिंद प्राण।अपना तन-मन सब कुछ उसकी भेट करता रहता हूँ। 1। हे भाई ! वह प्रभू बड़ा दाता है।बेअंत है।उसके गुणों का लेखा नहीं हो सकता।उस प्रभू को (हर जगह) देख के मैं उसको अपने मन में टिकाए रखता हूँ। 2। हे भाई ! मैं (जो जो चीज) चाहता हूँ।वही वही (प्रभू से) प्राप्त कर लेता हूँ।प्रभू (के नाम) को जप जप के मैं अपनी हरेक आस मुराद (उसके दर से) पुरी कर लेता हूँ। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू की कृपा से (वह प्रभू मेरे) मन में आ बसा है।अब मैं प्रभू (की उदारता) को समझ के किसी भी दुख में चिंतातुर नहीं होता। 4। 2। 3।
जैतसरी महला 5 ॥
लोड़ीदड़ा साजनु मेरा ॥
घरि घरि मंगल गावहु नीके घटि घटि तिसहि बसेरा ॥1॥ रहाउ ॥
सूखि अराधनु दूखि अराधनु बिसरै न काहू बेरा ॥
नामु जपत कोटि सूर उजारा बिनसै भरमु अंधेरा ॥1॥
थानि थनंतरि सभनी जाई जो दीसै सो तेरा ॥
संतसंगि पावै जो नानक तिसु बहुरि न होई है फेरा ॥2॥3॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 ॥ हे भाई ! मेरा सज्जन प्रभू ऐसा है जिसको हरेक जीव मिलना चाहता है। हे भाई ! हरेक ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा उसकी सिफत सालाह के सोहाने गीत गाया करो।हरेक शरीर में उस का ही निवास है। 1।रहाउ। हे भाई ! सुख में (भी उस परमात्मा का) सिमरन करना चाहिए।दुख में (उसका ही) सिमरन करना चाहिए।वह परमात्मा किसी भी समय हमें ना भूले। उस परमात्मा का नामजपते हुए (मनुष्य के मन में।मानो) करोड़ों सूरजों जितनी रौशनी हो जाती है (मन में से) माया वाली भटकना समाप्त हो जाती है।(आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी का) अंधकार दूर हो जाता है। 1। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) हरेक जगह में।सब जगहों में (आप बस रहा है) जो कुछ दिखाई दे रहा है।वह सब कुछ आपका ही स्वरूप है। साध-संगति में रह के जो मनुष्य आपको ढूँढ लेता है उसको दोबारा जनम-मरण का चक्कर नहीं पड़ता। 2। 3। 4।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैतसरी महला 5 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।