ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥
जिसु होइ क्रिपालु सोई बिधि बूझै ता की निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता बनिता सुत बंधप इसट मीत अरु भाई ॥ पूरब जनम के मिले संजोगी अंतहि को न सहाई ॥1॥
मुकति माल कनिक लाल हीरा मन रंजन की माइआ ॥
हा हा करत बिहानी अवधहि ता महि संतोखु न पाइआ ॥2॥
हसति रथ अस्व पवन तेज धणी भूमन चतुरांगा ॥
संगि न चालिओ इन महि कछूऐ ऊठि सिधाइओ नांगा ॥3॥
हरि के संत प्रिअ प्रीतम प्रभ के ता कै हरि हरि गाईऐ ॥
नानक ईहा सुखु आगै मुख ऊजल संगि संतन कै पाईऐ ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देहु संदेसरो कहीअउ प्रिअ कहीअउ ॥
बिसमु भई मै बहु बिधि सुनते कहहु सुहागनि सहीअउ ॥1॥ रहाउ ॥
को कहतो सभ बाहरि बाहरि को कहतो सभ महीअउ ॥
बरनु न दीसै चिहनु न लखीऐ सुहागनि साति बुझहीअउ ॥1॥
सरब निवासी घटि घटि वासी लेपु नही अलपहीअउ ॥
नानकु कहत सुनहु रे लोगा संत रसन को बसहीअउ ॥2॥1॥2॥
धीरउ सुनि धीरउ प्रभ कउ ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ प्रान मनु तनु सभु अरपउ नीरउ पेखि प्रभ कउ नीरउ ॥1॥
बेसुमार बेअंतु बड दाता मनहि गहीरउ पेखि प्रभ कउ ॥2॥
जो चाहउ सोई सोई पावउ आसा मनसा पूरउ जपि प्रभ कउ ॥3॥
गुर प्रसादि नानक मनि वसिआ दूखि न कबहू झूरउ बुझि प्रभ कउ ॥4॥2॥3॥
लोड़ीदड़ा साजनु मेरा ॥
घरि घरि मंगल गावहु नीके घटि घटि तिसहि बसेरा ॥1॥ रहाउ ॥
सूखि अराधनु दूखि अराधनु बिसरै न काहू बेरा ॥
नामु जपत कोटि सूर उजारा बिनसै भरमु अंधेरा ॥1॥
थानि थनंतरि सभनी जाई जो दीसै सो तेरा ॥
संतसंगि पावै जो नानक तिसु बहुरि न होई है फेरा ॥2॥3॥4॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैतसरी महला 5 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।