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अंग ६९ · सिरी राग

अंग
69
सिरी राग
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  1. सतिगुरि मिलिऐ फेरु न पवै जनम मरण दुखु जाइ ॥
  2. सतिगुरि सेविऐ मनु निरमला भए पवितु सरीर ॥

सतिगुरि मिलिऐ फेरु न पवै जनम मरण दुखु जाइ ॥

सिरीरागु महला 3 ॥
सतिगुरि मिलिऐ फेरु न पवै जनम मरण दुखु जाइ ॥
पूरै सबदि सभ सोझी होई हरि नामै रहै समाइ ॥1॥
मन मेरे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥
निरमलु नामु सद नवतनो आपि वसै मनि आइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जीउ राखहु अपुनी सरणाई जिउ राखहि तिउ रहणा ॥
गुर कै सबदि जीवतु मरै गुरमुखि भवजलु तरणा ॥2॥
वडै भागि नाउ पाईऐ गुरमति सबदि सुहाई ॥
आपे मनि वसिआ प्रभु करता सहजे रहिआ समाई ॥3॥
इकना मनमुखि सबदु न भावै बंधनि बंधि भवाइआ ॥
लख चउरासीह फिरि फिरि आवै बिरथा जनमु गवाइआ ॥4॥
भगता मनि आनंदु है सचै सबदि रंगि राते ॥
अनदिनु गुण गावहि सद निरमल सहजे नामि समाते ॥5॥
गुरमुखि अंम्रित बाणी बोलहि सभ आतम रामु पछाणी ॥
एको सेवनि एकु अराधहि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥6॥
सचा साहिबु सेवीऐ गुरमुखि वसै मनि आइ ॥
सदा रंगि राते सच सिउ अपुनी किरपा करे मिलाइ ॥7॥
आपे करे कराए आपे इकना सुतिआ देइ जगाइ ॥
आपे मेलि मिलाइदा नानक सबदि समाइ ॥8॥7॥24॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ यदि गुरू मिल जाए तो (चौरासी लाख योनियों वाला) फेरा नहीं पड़ता, जनम मरन में पड़ने वाला दुख दूर हो जाता है। पूरे (अभुल) गुरू के शबद में जुड़ने से (सही जीवन की) समझ आ जाती है। (गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) परमात्मा के नाम में लीन टिका रहता है।1। हे मेरे मन ! गुरू से चित्त जोड़। (गुरू की शरण पड़ने से) परमात्मा का पवित्र नाम सदा नए आनंद वाला लगता है, और परमात्मा स्वयं मन में आ बसता है।1।रहाउ। हे प्रभू जी ! आप (जीवों को) अपनी शरण में रखें। जिस आत्मिक अवस्था में आप (जीवों को) रखते हैं उसी में वह रहते हैं। गुरू के शबद में जुड़ के मनुष्य दुनिया में विचरते हुए ही विकारों से बचा रहता है। गुरू की शरण पड़ कर ही संसार समुंद्र से पार लांघ जाते हैं।2। (हे भाई !) परमात्मा का नाम बड़ी किस्मत से मिलता है। गुरू की मति पर चलने से, गुरू के शबद में जुड़ने से जिंदगी सुंदर बन जाती है। करतार प्रभू स्वयं ही मन में आ बसता है। (गुरू के शबद से मनुष्य) सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।3। कई ऐसे हैं जो अपने मन के पीछे चलते हैं, उन्हें गुरू का शबद प्यारा नहीं लगता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया के) बंधन में बंध के (जनम मरण के चक्कर में) भटकाया जाता है। वह चौरासी लाख जूनियों में मुड़ मुड़ पैदा होता है, और अपना (मानस) जनम व्यर्थ गवा लेता है।4। परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदों के मन में आनंद बना रहता है। वह सदा सिथर प्रभू की सिफत सलाह के शबद में प्रभू के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। वे सदैव हर वक्त परमात्मा के पवित्र गुण गाते रहते हैं। (जिसकी बरकति से वे) आत्मिक अडोलता में व प्रभू नाम में लीन रहते हैं।5। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सारी सृष्टि में परमात्मा को बसा हुआ पहचान के आत्मिक जीवन देने वाली प्रभू की सिफत सलाह की बाणी उच्चारित करते हैं। गुरू की शरण पड़ कर वह मनुष्य सदा एक परमात्मा का ही सिमरन करते हैं। परमात्मा की ही आराधना करते हैं। और उस परमात्मा की ही कथा वार्ता करते हैं जिसके सारे गुण बखान नहीं हो सकते।6। (हे भाई !) सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभू को सिमरना चाहिए। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर सिमरते हैं उनके मन में प्रभू आ बसता है। (वह भाग्यशाली मनुष्य) सदैव प्रभू के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। सदा स्थिर प्रभू के साथ जुड़े रहते हैं। प्रभू अपनी कृपा करके उनको अपने साथ मिला लेता है।7। (पर ये सारी खोज परमात्मा के अपने ही हाथ में है) प्रभू स्वयं ही (सभ जीवों का प्रेरक हो के सब कुछ) करता है। स्वयं ही (जीवों से) कराता है। माया की नींद में सोये हुए कई जीवों को भी प्रभू खुद ही जगा देता है। हे नानक ! गुरू के शबद में जोड़ के प्रभू स्वयं ही (उनको) अपने चरणों में मिला लेता है।8।7।24।

सतिगुरि सेविऐ मनु निरमला भए पवितु सरीर ॥

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सिरीरागु महला 3 ॥
सतिगुरि सेविऐ मनु निरमला भए पवितु सरीर ॥
मनि आनंदु सदा सुखु पाइआ भेटिआ गहिर गंभीरु ॥
सची संगति बैसणा सचि नामि मनु धीर ॥1॥
मन रे सतिगुरु सेवि निसंगु ॥
सतिगुरु सेविऐ हरि मनि वसै लगै न मैलु पतंगु ॥1॥ रहाउ ॥
सचै सबदि पति ऊपजै सचे सचा नाउ ॥
जिनी हउमै मारि पछाणिआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥
मनमुख सचु न जाणनी तिन ठउर न कतहू थाउ ॥2॥
सचु खाणा सचु पैनणा सचे ही विचि वासु ॥
सदा सचा सालाहणा सचै सबदि निवासु ॥
सभु आतम रामु पछाणिआ गुरमती निज घरि वासु ॥3॥
सचु वेखणु सचु बोलणा तनु मनु सचा होइ ॥
सची साखी उपदेसु सचु सचे सची सोइ ॥
जिंनी सचु विसारिआ से दुखीए चले रोइ ॥4॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ से कितु आए संसारि ॥
जम दरि बधे मारीअहि कूक न सुणै पूकार ॥
बिरथा जनमु गवाइआ मरि जंमहि वारो वार ॥5॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ यदि गुरू का पल्ला पकड़े रखें, तो मन पवित्र हो जाता है (भाव, ज्ञानेंद्रियां विकारों से हटी रहतीं हैं)। (जो मनुष्य गुरू के दर पे आ जाता है उस के) मन में आनंद पैदा होता है, वह सदा के लिए आत्मिक सुख भोगता है। उसको गहरा और बड़े जिगरे वाला परमात्मा मिल जाता है। सदा स्थिर प्रभू की संगति में टिके रहने से मन सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के नाम में टिकाव हासिल कर लेता है।1। हे मेरे मन ! शर्म छोड़ के गुरू की शरण पड़। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा मन में आ बसता है, और (मन को विकारों की) रक्ती भर भी मैल नहीं लगती।1।रहाउ। स्दा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह के शबद में जुड़ने से (लोक परलोक में) इज्जत मिलती है। सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का सदा स्थिर नाम मिल जाता है। मैं उन लोगों के सदके जाता हूँ जिन्होंने (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके परमात्मा के साथ गहरी सांझ बनायी है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के साथ जान पहिचान नहीं बना सकते (इस वास्ते आत्मिक शांति के वास्ते) उन्हें और कोई जगह नहीं मिलती।2। सदा स्थिर प्रभू का नाम जिन मनुष्यों की आत्मिक खुराक बन गया है, प्रभू का नाम ही जिन की पोशाक है (आदर सत्कार हासिल करने की तरीका है), जिन की सुरति सदा स्थिर प्रभू में जुड़ी रहती है, जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की सदा सिफति सलाह करते रहते हैं, सदा कायम रहने वाले परमात्मा के शबद में जिनका मन टिका रहता है, उन्होंने हर जगह सर्व-व्यापक परमात्मा को बसता पहिचान लिया है, गुरू की मति पे चल के उनकी सुरति अंतरात्मे टिकी रहती है।3। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को हर जगह देखता है। सदा स्थिर प्रभू ही जिसको हर जगह बोलता दिखता है। उसका शरीर (माया के हमलों से) अडोल रहता है उसका मन (विकारों के हमलों से) अडोल हो जाता है। सदा स्थिर प्रभू के सिमरन की ही वह शिक्षा व उपदेश ग्रहण करता है। सदा स्थिर प्रभू का रूप हो चुके उस (भाग्यशाली मनुष्य) की शोभा अटल हो जाती है। पर जिन मनुष्यों ने सदा स्थिर प्रभू को (यहां) भुलाए रखा, वह यहां भी दुखी रहे, और यहां से चले भी तो दुखी हो हो के।4। जिन लोगों ने सतिगुरू का पल्ला ना पकड़ा उनका संसार में आना व्यर्थ गया। उन्हें यम के दरवाजे पे बांध कर मारा कूटा जाता है, कोई उनकी चीख पुकार की ओर ध्यान नहीं देता। उन्होंने मानस जन्म व्यर्थ गवा दिया और फिर बार बार पैदा होते मरते रहते हैं।5।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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