अंग 8, सो दरु प्रारम्भ (deepened)

SGGS, Ang
8
सो दरु (रेहरास साहिब का प्रारम्भ)
राग: राग आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी · महला 1
पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट
यह शबद जपजी साहिब की पौड़ी 27 के रूप में भी आता है। मगर वहाँ यह सुबह की declamation है, यहाँ शाम की contemplation। एक ही पंक्तियाँ, एक ही गुरु, मगर दिन के दो वक़्तों में सुनो, बिल्कुल अलग रंग।
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॥ रागु आसा महला १ ॥ सो दरु केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले ॥ वाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे ॥ केते राग परी सिउ कहीअनि केते गावणहारे ॥ गावहि तुहनो पउणु पाणी बैसंतरु गावै राजा धरमु दुआरे ॥ गावहि चितु गुपतु लिखि जाणनि लिखि लिखि धरमु विचारे ॥ गावहि ईसरु ब्रहमा देवी सोहनि सदा सवारे ॥ गावहि इंद इदासणि बैठे देवतिआ दरि नाले ॥ गावहि सिध समाधी अंदरि गावनि साध विचारे ॥ गावनि जती सती संतोखी गावहि वीर करारे ॥ गावनि पंडित परणि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले ॥ गावहि मोहणीआ मनु मोहनि सुरगा मछ पइआले ॥ गावनि रतन उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले ॥ गावहि जोध महाबल सूरा गावहि खाणी चारे ॥ गावहि खंड मंडल वरभंडा करि करि रखे धारे ॥ सेई तुधुनो गावहि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले ॥ होरि केते गावनि से मै चितु न आवनि नानकु किआ विचारे ॥ सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई ॥ है भी होसी जाइ न जासी रचना जिनि रचाई ॥ रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी माइआ जिनि उपाई ॥ करि करि वेखै कीता आपणा जिव तिस दी वडिआई ॥ जो तिसु भावै सोई करसी हुकमु न करणा जाई ॥ सो पाति साहु साहा पाति साहिबु नानक रहणि रजाई ॥१॥

दिल्ली में रात के नौ बजे एक ख़ास quiet होती है। दिन की मीटिंगें ख़त्म हो चुकीं, बच्चे अपने कमरों में बैठ गए, फ़ोन की screen अंधेरे में जलती है। कोई एक आदमी बालकनी में चाय ले कर बैठा है, ऊपर देख रहा है, और मन में एक सवाल उठता है, “यह सब कितना बड़ा है? और जो इस सब को रखे हुए है, वो कहाँ बैठा है?”

गुरु नानक रेहरास साहिब का पहला शबद इसी सवाल से खोलते हैं। “सो दरु केहा सो घरु केहा” यानी वो दरवाज़ा कैसा है, वो घर कैसा है, जहाँ बैठ कर तू सारी सृष्टि को संभालता है?

यह सवाल कोई औपचारिक प्रार्थना नहीं। यह genuine wonder है। एक engineer जिस तरह बड़ी system को देख कर सोचता है, “इसका control room कहाँ होगा?” गुरु नानक वही पूछ रहे हैं। तू कहाँ बैठा है, और तेरा “घर” कैसा है?

फिर पूरा शबद उसी “घर” की कल्पना में डूब जाता है। “वाजे नाद अनेक असंखा।” वहाँ अनगिनत नाद बज रहे हैं। “केते वावणहारे।” कितने ही बजाने वाले। “केते राग, केते गावणहारे।” कितने राग, कितने गाने वाले।

और कौन-कौन गा रहा है उस दरवाज़े पर? हवा, पानी, अग्नि (पउणु, पाणी, बैसंतरु)। चित्रगुप्त (जो आदमी का record रखते हैं)। ब्रह्मा, ईश्वर, देवियाँ। इंद्र अपने सिंहासन पर। सिद्ध समाधि में। साधु अपने विचार में। जती, सती, संतोषी, वीर। पंडित जो वेद पढ़ते हैं। मोहिनी जो स्वर्ग में मन मोहती हैं। समुद्र-मंथन से निकले रतन। 68 तीर्थ। योद्धा। चार खाणियाँ (अंडज, जेरज, सेतज, उद्भिज, यानी सृष्टि के चार प्रकार)। खंड, मंडल, ब्रह्मांड।

यह list है, मगर सूची नहीं। यह hierarchy का pattern है। नानक देवताओं से शुरू कर, indriya-powers से होते हुए, geographic-cosmic scales तक उतर रहे हैं। यानी सिर्फ़ “अच्छे” लोग नहीं गाते उसे। हर level पर existence है, और हर level अपने तरीक़े से उसकी “गायन” कर रहा है।

यह एक बड़ा idea है। पंजाब की भाषा में Western “panpsychism” का equivalent। हर atom, हर wave, हर sentient being, हर unconscious phenomenon, सब उस मूल scale की एक note है।

फिर एक turn आता है। “सेई तुधुनो गावहि जो तुधु भावनि।” मगर असली में तुझे वही गाते हैं, जो तुझे “भाते” (अच्छे लगते) हैं। यह paradox है। तू “सबको” बनाता है, मगर “सबको” तेरी पसंद नहीं। यह पंक्ति बिना preachiness के बहुत कुछ कह रही है: scale का होना और relationship का होना दो अलग चीज़ें हैं।

और फिर सबसे humble line: “होरि केते गावनि से मै चितु न आवनि नानकु किआ विचारे।” बहुत और गाने वाले हैं जिनको मैं याद भी नहीं कर सकता। नानक क्या contemplation कर सकता है? Nanak admit कर रहे हैं अपनी limit। यह bhajan-गीत का सबसे honest moment है, गाने वाले admit करते हैं कि वो ख़ुद नहीं जानते।

फिर शबद का closing चार पंक्तियों में आता है। “सोई सोई सदा सचु साहिबु, साचा साची नाई।” वो ही वो है, सदा सच साहिब, सच्चा है और उसका नाम सच है। “है भी होसी जाइ न जासी।” है, होगा, जाएगा नहीं। “जो तिसु भावै सोई करसी, हुकमु न करणा जाई।” जो उसको भाए वही करेगा, हुकम पर हुकम नहीं चलता।

अंतिम पंक्ति: “नानकु रहणि रजाई।” नानक उसकी “रज़ा” (will) में रहता है। पूरा शबद एक चढ़ाई थी, ऊँचाई की तरफ़, scale की तरफ़, contemplation की तरफ़। और final landing simple है, “मैं उसकी मर्ज़ी में जीता हूँ। बाक़ी सब detail है।”

दिल्ली में जब आदमी रात को सोने से पहले रेहरास पढ़ता है, यह शबद उसको दिन के “मैं-मैं” से निकाल कर एक wider perspective में रख देता है। दिन भर का बजट, target, deadline, सब अपनी जगह। मगर ज़रा रुक कर देख, यह सब कितना छोटा है उस “घर” के सामने, जहाँ हवा-पानी-अग्नि भी गाते हैं।

देखें: जपजी साहिब, पौड़ी 27 (same shabad, सुबह के context में) · मुंडक उपनिषद्, “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” (दो पंछी, एक तत्त्व) · गीता 11.18, “त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्” (अर्जुन का विश्व-रूप दर्शन)
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॥ आसा महला १ ॥ सुणि वडा आखै सभु कोइ ॥ केवडु वडा डीठा होइ ॥ कीमति पाइ न कहिआ जाइ ॥ कहणै वाले तेरे रहे समाइ ॥१॥ वडे मेरे साहिबा गहिर ग्मभीरा गुणी ग्हीरा ॥ कोइ न जाणै तेरा केता केवडु चीरा ॥१॥ रहाउ ॥

पहला शबद scale को paint करने वाला था। यह दूसरा शबद scale को acknowledge करने वाला है। फ़र्क़ subtle है मगर important।

“सुणि वडा आखै सभु कोइ।” सुन कर सब कहते हैं कि वो “वडा” (बड़ा) है। मगर “केवडु वडा डीठा होइ।” कितना बड़ा है, यह तो “देखने” पर ही पता चलेगा।

गुरु नानक एक sharp distinction कर रहे हैं। सुनी-सुनाई और देखी हुई बात अलग है। हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं, “ईश्वर बड़ा है।” मगर कितना बड़ा? यह पता तब चलेगा जब अनुभव से देखो।

“कीमति पाइ न कहिआ जाइ।” कीमत आँकी नहीं जा सकती, कहा भी नहीं जा सकता। “कहणै वाले तेरे रहे समाइ।” कहने वाले भी, अंत में, तुझ में ही समा गए।

यह pyramidal structure है। पहले सुनने वाले हैं, फिर कहने वाले, फिर देखने वाले। और जो genuinely देख गए, वो “कहने” की position पर नहीं रहे, वो “तुझ में समा” गए। यानी जो असली में अनुभव करता है, वो describe करना छोड़ देता है।

मीराबाई का “मेरे तो गिरधर गोपाल” इसी experience का outcome है। मीराबाई जब “जान” गईं, तब उन्होंने उसकी “size” बताना बंद किया, और सिर्फ़ उसके साथ बैठ गईं।

“रहाउ” line में, “वडे मेरे साहिबा गहिर ग्मभीरा गुणी ग्हीरा।” मेरे बड़े साहिब, गहरे, गंभीर, गुणों के समुद्र। “कोइ न जाणै तेरा केता केवडु चीरा।” तेरा “चीरा” (विस्तार, length) कितना है, यह कोई नहीं जानता।

“चीरा” शब्द में पंजाबी अपना रंग दिखाती है। यह “चीर” यानी फाड़ने से नहीं, “स्ट्रेच” यानी विस्तार से जुड़ा है। नानक कह रहे हैं, तेरी extent मापी नहीं जा सकती।

दिल्ली के context में: हम सब “compare” करने में busy हैं। ये कितना बड़ा, वो कितना बड़ा। जो infinite है, उसको “मापने” का यह सारा practice ही meaningless है। बस “देखना” है। और “देखने” के बाद, चुप।

देखें: जपजी साहिब, पौड़ी 24 (same shabad, fuller context)
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आसा महला १ ॥ आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥ आखणि अउखा साचा नाउ ॥ साचे नाम की लागै भूख ॥ उतु भूखै खाइ चलीअहि दूख ॥१॥ सो किउ विसरै मेरी माइ ॥ साचा साहिबु साचै नाइ ॥१॥ रहाउ ॥

और तीसरा शबद, बहुत intimate। एक भक्त अपनी माँ से बात कर रहा है। “मेरी माइ।” यह family-relationship के अंदर theology कर रहा है।

“आखा जीवा, विसरै मरि जाउ।” जब उसका नाम कहता हूँ, जीता हूँ। जब भूल जाता हूँ, मर जाता हूँ। यह life-death का definition है।

गुरु नानक यहाँ “जीना” को redefine कर रहे हैं। पुरानी biology कहती है, “साँस लेना ही जीना है।” नानक कह रहे हैं, “नहीं। नाम बोलना जीना है। बाक़ी सब biological function है।”

दिल्ली में आप किसी एक से पूछो, “तू कब last सच में alive feel हुआ?” अगर वो honest है, तो वो बताएगा एक moment जब वो किसी experience में पूरी तरह present था, बिना मन के बक-बक के। नानक कह रहे हैं, उस presence का name “नाम” है।

“आखणि अउखा साचा नाउ।” सच्चा नाम कहना “औखा” (मुश्किल) है। यह बहुत honest admission है। यह कोई easy task नहीं। मन भटकता है, distraction आती है, थकान होती है।

मगर “साचे नाम की लागै भूख।” अगर एक बार सच्चे नाम की भूख लग गई, “उतु भूखै खाइ चलीअहि दूख।” तो वही भूख खा कर दुख चले जाते हैं।

यह बहुत precise spiritual psychology है। हम सब किसी न किसी की भूख रखते हैं, food, success, validation, security। नानक कह रहे हैं, अगर एक नई भूख जग जाए, “नाम” की, तब वो बाक़ी सारी भूखों को replace कर देती है। यह hunger का substitution है, suppression नहीं।

“सो किउ विसरै मेरी माइ।” तो वो कैसे भूले जाए, मेरी माँ? “साचा साहिबु, साचै नाइ।” वो सच्चा साहिब है, उसके नाम भी सच्चे हैं।

इस पंक्ति में बहुत intimacy है। एक बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा है, “इतनी अच्छी चीज़ कोई कैसे भूल सकता है?” यह existential confusion है, क्यों हम सब उसको भूल जाते हैं, जबकि वो ही सच है?

देखें: ईशावास्य उपनिषद्, “ईशावास्यमिदं सर्वम्” (वो सब में बसता है)