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अंग 6

अंग
6
राग Jap
राग: Jap · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जपजी साहिब का हिस्सा। पूरी 38 पउड़ियों की commentary /japji/ पर है।
आखहि गोपी तै गोविंद ॥
आखहि ईसर आखहि सिध ॥
आखहि केते कीते बुध ॥
आखहि दानव आखहि देव ॥
आखहि सुरि नर मुनि जन सेव ॥
केते आखहि आखणि पाहि ॥
केते कहि कहि उठि उठि जाहि ॥
एते कीते होरि करेहि ॥
ता आखि न सकहि केई केइ ॥
जेवडु भावै तेवडु होइ ॥
नानक जाणै साचा सोइ ॥
जे को आखै बोलुविगाड़ु ॥
ता लिखीऐ सिरि गावारा गावारु ॥26॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गोपियां और कई कान्हें अकाल-पुरख का अंदाजा लगा रहे हैं। कई शिव और सिद्ध, अकाल-पुरख के पैदा किये हुए बेअंत बुद्ध, राक्षस और देवते, देव स्वभाव मनुष्य, मुनि जन तथा सेवक अकाल-पुरख का अंदाजा लगाते हैं। बेअंत जीव अकाल-पुरख का अंदाजा लगा रहे हैं, और बेअंत ही लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं। बेअंत जीव अंदाजा लगा लगा के इस जगत से चले जा रहे हैं। जगत में इतने (बेअंत) जीव पैदा किये हुए हैं (जो बयान कर रहे हैं), (पर, हे हरि!) अगर आप और भी (बेअंत जीव) पैदा कर दे तो भी कोई जीव आपका अंदाजा नहीं लगा सकता। हे नानक! परमात्मा जितना चाहता है उतना ही बड़ा हो जाता है (अपनी कुदरत बढ़ा लेता है)। वह सदा स्थिर रहने वाला हरि स्वयं ही जानता है (कि वह कितना बड़ा है)। अगर कोई बड़बोला मनुष्य ये बताने लगे (कि अकाल पुरख कितना बड़ा है) तो वह मनुष्यों में महा मूर्ख गिना जाता है।26।
सो दरु केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले ॥
वाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे ॥
केते राग परी सिउ कहीअनि केते गावणहारे ॥
गावहि तुहनो पउणु पाणी बैसंतरु गावै राजा धरमु दुआरे ॥
गावहि चितु गुपतु लिखि जाणहि लिखि लिखि धरमु वीचारे ॥
गावहि ईसरु बरमा देवी सोहनि सदा सवारे ॥
गावहि इंद इदासणि बैठे देवतिआ दरि नाले ॥
गावहि सिध समाधी अंदरि गावनि साध विचारे ॥
गावनि जती सती संतोखी गावहि वीर करारे ॥
गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले ॥
गावहि मोहणीआ मनु मोहनि सुरगा मछ पइआले ॥
गावनि रतन उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले ॥
गावहि जोध महाबल सूरा गावहि खाणी चारे ॥
गावहि खंड मंडल वरभंडा करि करि रखे धारे ॥
सेई तुधुनो गावहि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले ॥
होरि केते गावनि से मै चिति न आवनि नानकु किआ वीचारे ॥
सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई ॥
है भी होसी जाइ न जासी रचना जिनि रचाई ॥
रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी माइआ जिनि उपाई ॥
करि करि वेखै कीता आपणा जिव तिस दी वडिआई ॥
जो तिसु भावै सोई करसी हुकमु न करणा जाई ॥
सो पातिसाहु साहा पातिसाहिबु नानक रहणु रजाई ॥27॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: वह दर बड़ा ही आश्चर्य भरा है जहाँ बैठ के (हे निरंकार!) आप सारे जीवों की संभाल कर रहा है। (आपकी इस रची हुई कुदरत में) अनेकों और अनगिनत वाजे (संगीत-यंत्र) और राग हैं; बेअंत ही जीव उन बाजों को बजाने वाले हैं, रागनियों समेतबेअंत ही राग कहे जाते हैं, और अनेको ही जीव (इन रागों के) गाने वाले हैं (जो आपको गा रहे हैं)। (हे निरंकार!) पवन, पानी, अग्नि आपका गुण गान कर रहे हैं, धर्मराज आपके दर पे (खड़ा होकर) आपकी उस्तति कर रहा है। वह चित्रगुप्त भी जो (जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों के लेखे) लिखने जानते हैं और जिनके लिखे हुए को धर्मराज विचारता है, आपकी महानताओं का गुणगान कर रहे हैं। (हे अकाल पुरख!) देवियां, शिव व ब्रह्मा, जो आपके संवारे हुए हैं, आपको गा रहे हैं। कई इंद्र अपने तख्त पे बिराजमान देवतों समेत आपकी उस्तति कर रहे हैं। सिद्ध लोग समाधियां लगा के आपको गा रहे हैं, साधु जन चिंतन कर कर के आपको सालाह रहे हैं। जत-धारी, दान करने वाले और संतोषी पुरष आपका गुणगान कर रहे हैं और (बेअंत) महाबली योद्धे आपकी उस्तति कर रहे हैं। (हे अकाल-पुरख!) पण्डित और महाऋिषी जो (वेदों को) पढ़ते हैं, वेदों समेत आपको गा रहे हैं। सुंदर सि्त्रयां जो स्वर्ग, मात लोक व पाताल लोक में (अर्थात, हर जगह) मानव मन को मोह लेती हैं, भी आपको गा रही हैं। (हे निरंकार!) आपके पैदा किए हुए रतन अढ़सठ तीर्तों समेत आपको गा रहे हैं। महाबली योद्धे व शूरवीर भी आपकी उस्तति कर रहे हैं। चारों खानों के जीव-जन्तु आपको गा रहे हैं। सारी सृष्टि, सृष्टि के सारे खण्ड और चक्कर, जो तूने पैदा करके टिका रखे हैं, आपको गाते हैं। (हे अकाल-पुरख!) (असल में तो) वही आपके प्रेम में रंगे हुए रसिए भक्तजन आपको गाते हैं (भाव उनका गाना ही सफल है) जो आपको अच्छे लगते हैं। अनेकों और जीव आपको गा रहे हैं, जो मुझसे गिने भी नहीं जा सकते।(भला) नानक (विचारा) क्या विचार कर सकता है? वह अकाल-पुरख सदा स्थिर है, वह सच्चा मालिक है, उसकी महानता भी सदा अटल है। जिस अकाल-पुरख ने यह सृष्टि पैदा की है, वह इस वक्त मौजूद है, सदैव रहेगा, ना वह जन्मा है ना ही मरेगा। जिस अकाल-पुरख ने कई रंगों, किस्मों, जिनसों की माया रच दी है, वह जैसे उसकी रज़ा है, (भाव, जितना बड़ा वह स्वयं है उतने बड़े जिगरे से जगत को रच के) अपने पैदा किये हुए की संभाल भी कर रहा है। जो कुछ अकाल-पुरख को भाता है, वह वही करता है। कोई भी जीव अकाल-पुरख को आगे से हुकम नहीं कर सकता (उसे ये नहीं कह सकता कि “आप एैसे कर, एैसे ना कर”)। अकाल-पुरख बादशाह है, बादशाहों का भी बादशाह है। हे नानक! (जीवों का) उसकी रजा में रहना (ही फबता है)।27।
मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली धिआन की करहि बिभूति ॥
खिंथा कालु कुआरी काइआ जुगति डंडा परतीति ॥
आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीतु ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥28॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (हे योगी!) अगर आप संतोष को अपनी मुंद्राएं बनाए, मेहनत को खप्पर और झोली, और अकाल-पुरख के ध्यान की राख (शरीर पर मले), मौत (का भय) आपकी गुदड़ी हो, शरीर को विकारों से बचा के रखना आपके लिये योग की रहित मर्यादा हैं और श्रद्धा को डंडा बनाए (तो अंदर से झूठ की दीवार टूट सकती है।) जो मनुष्य सारी सृष्टि को अपने सज्जन-मित्र समझता है (असल में) वही आई पंथ वाला है। अगर अपना मन जीत लिया जाए तो सारा जगत ही जीत लिया जाता है (भाव, तब जगत की माया परमात्मा से विछोड़ नहीं सकती)। (सो, झूठ की दीवार गिराने के लिए) केवल उस को (अकाल-पुरख) प्रणाम करो, जो (सब का) आरम्भ है, जो शुद्ध-स्वरूप है, जिसका कोई अंत नहीं (ढूँढ सकता), जो नाश रहित है और जो सदैव इकसार रहता है।28।भाव: योग मत के खिंथा, मुंद्रा, झोली आदि प्रभू से जीव की दूरी नहीं मिटा सकते। ज्यों ज्यों सदा स्थिर ईश्वर की याद में जुड़ते जाओगे, संतोष वाला जीवन बनता जाएगा और सारी ख़लकत में वह प्रभू ही व्याप्त दिखेगा।28।
भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद ॥
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद ॥
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (हे जोगी! यदि) अकाल-पुरख की सर्वव्यापकता का ज्ञान आपके लिए भण्डारा (चूरमा) हो, दया इस (ज्ञान रूप) भण्डारे को बाँटने वाली हो, हरेक जीव के अंदर जो (जिंदगी की) रौंअ चल रही है, (भण्डारा खाने के समय यदि आपके अंदर) यह नादी बज रही हो, आपका नाथ स्वयं अकाल-पुरख हो, जिसके वस में सारी सृष्टि है (तो झूठ की दीवार आपके अंदर से टूट के परमात्मा से आपकी दूरी खतम हैं सकती है। योग साधनों से प्राप्त हुई रिद्धियां व्यर्थ हैं, ये) रिद्धियां और सिद्धियां (तो) दूसरास्वाद हैं (ईश्वर की राह से परे ले जाते हैं)। अकाल-पुरख की ‘संजोग’ सत्ता व ‘विजोग’ सत्ता दोनों (मिल के इस संसार की) कार को चला रहे हैं (भाव, पिछले संयोगों सदके परिवार आदि के जीव यहाँ आ के एकत्र होते हैं। फिर रजा में बिछड़ के अपनी-अपनी बारी यहाँ से चले जाते हैं) और (सभ जीवों के किये कर्मों के) लेख अनुसार (दर्जा-ब-दर्जा सुख-दुख के) छांदे मिल रहे हैं (अगर ये यकीन बन जाए तो अंदर से झूठ की दीवार टूट जाती है।)

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ये नित्य की प्रार्थनाएँ हैं, अधिकांश पन्द्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी की शुरुआत में रची गयीं।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गोपियां और कई कान्हें अकाल-पुरख का अंदाजा लगा रहे हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।