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अंग 696

अंग
696
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जैतसरी महला 4 घरु 1 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै हीअरै रतनु नामु हरि बसिआ गुरि हाथु धरिओ मेरै माथा ॥
जनम जनम के किलबिख दुख उतरे गुरि नामु दीओ रिनु लाथा ॥1॥
मेरे मन भजु राम नामु सभि अरथा ॥
गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ बिनु नावै जीवनु बिरथा ॥ रहाउ ॥
बिनु गुर मूड़ भए है मनमुख ते मोह माइआ नित फाथा ॥
तिन साधू चरण न सेवे कबहू तिन सभु जनमु अकाथा ॥2॥
जिन साधू चरण साध पग सेवे तिन सफलिओ जनमु सनाथा ॥
मो कउ कीजै दासु दास दासन को हरि दइआ धारि जगंनाथा ॥3॥
हम अंधुले गिआनहीन अगिआनी किउ चालह मारगि पंथा ॥
हम अंधुले कउ गुर अंचलु दीजै जन नानक चलह मिलंथा ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 4 घरु 1 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई ! जब) गुरू ने मेरे सिर पर अपना हाथ रखा।तो मेरे हृदय में परमात्मा का रतन (जैसा कीमती) नाम आ बसा। (हे भाई ! जिस भी मनुष्य को) गुरू ने परमात्मा का नाम दिया।उसके अनेकों जन्मों के पाप-दुख दूर हो गए।(उसके सिर से पापों का) कर्जा उतर गया। 1। हे मेरे मन ! (सदा) परमात्मा का नाम सिमरा कर।(परमात्मा) सारे पदार्थ (देने वाला है)। (हे मन गुरू की शरण पड़ा रह) पूरे गुरू ने (ही) परमात्मा का नाम (हृदय में) पक्का किया है।और।नाम के बिना मानस जन्म व्यर्थ चला जाता है।रहाउ। हे भाई ! जो लोग अपने मन के पीछे चलते हैं वे गुरू (की शरण) के बिना मूर्ख हुए रहते हैं।वे सदा माया के मोह में फंसे रहते हैं। उन्होंने कभी भी गुरू का आसरा नहीं लिया।उनका सारा जीवन व्यर्थ चला जाता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के चरणों की ओट लेते हैं।वे खसम वाले हो जाते हैं।उनकी जिंदगी कामयाब हो जाती है। हे हरी ! हे जगत के नाथ ! मेरे पर मेहर कर।मुझे अपने दासों के दासों का दास बना ले। 3। हे गुरू ! हम माया में अंधे हो रहे हैं।हम आत्मिक जीवन की सूझ से वंचित हैं।हमें सही जीवन जुगति की सूझ नहीं।हम आपके बताए हुए जीवन राह पर नहीं चल सकते। हे दास नानक ! (कह) हे गुरू ! हम अंधों को अपना पल्ला पकड़ा।ता कि आपके पल्ले लग के हम आपके बताए हुए रास्ते पर चल सकें। 4। 1।
जैतसरी महला 4 ॥
हीरा लालु अमोलकु है भारी बिनु गाहक मीका काखा ॥
रतन गाहकु गुरु साधू देखिओ तब रतनु बिकानो लाखा ॥1॥
मेरै मनि गुपत हीरु हरि राखा ॥
दीन दइआलि मिलाइओ गुरु साधू गुरि मिलिऐ हीरु पराखा ॥ रहाउ ॥
मनमुख कोठी अगिआनु अंधेरा तिन घरि रतनु न लाखा ॥
ते ऊझड़ि भरमि मुए गावारी माइआ भुअंग बिखु चाखा ॥2॥
हरि हरि साध मेलहु जन नीके हरि साधू सरणि हम राखा ॥
हरि अंगीकारु करहु प्रभ सुआमी हम परे भागि तुम पाखा ॥3॥
जिहवा किआ गुण आखि वखाणह तुम वड अगम वड पुरखा ॥
जन नानक हरि किरपा धारी पाखाणु डुबत हरि राखा ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम बड़ा ही कीमती हीरा है।लाल है।पर गाहक कि बिना ये हीरा तिनके समान हुआ पड़ा है। जब इस रतन को गाहक गुरू मिल गया।तब ये रतन लाखों रुपयों में बिकने लगा। 1। हे भाई ! मेरे मन में परमात्मा ने अपना नाम-हीरा छुपा के रखा हुआ था। दीनों पर दया करने वाले उस हरी ने मुझे गुरू से मिलवा दिया।गुरू के मिलने से मैंने उस हीरे की परख कर ली (मैंने उस हीरे की कद्र समझ ली)।रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों के हृदय में आत्मिक जीवन की तरफ से बेसमझी (का) अंधकार छाया रहता है।(तभी तो) उन्होंने अपने हृदय-घर में टिके हुए नाम-रतन को कभी नहीं देखा। वे मनुष्य माया-सपनी (के मोह) का जहर खाते रहते हैं।(इसलिए) वे मूर्ख भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ कर आत्मिक मौत मरे रहते हैं। 2। हे हरी ! मुझे अच्छे संत-जन मिला।मुझे गुरू की शरण में रख। हे प्रभू ! हे मालिक ! मेरी मदद कर।मैं औरों को छोड़ के आपकी शरण आ पड़ा हूँ। 3। हे प्रभू ! आप बड़ा पुरख है।आप अपहुँच है।हम अपनी जीभ से आपके कौन-कोन से गुण कह के बता सकते हैं। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य पर प्रभू ने मेहर की।उस पत्थर को (संसार-समुंद्र में) डूबते हुए को उसने बचा लिया। 4। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैतसरी महला 4 घरु 1 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।