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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 695 · धनासरी

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अंग
695
धनासरी
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  1. धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन
  2. स्री सैणु ॥
  3. पीपा ॥
  4. धंना ॥

धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन

धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥
दुक्रितु सुक्रितु थारो करमु री ॥1॥ रहाउ ॥
संकरा मसतकि बसता सुरसरी इसनान रे ॥
कुल जन मधे मिल्यिो सारग पान रे ॥
करम करि कलंकु मफीटसि री ॥1॥
बिस्व का दीपकु स्वामी ता चे रे सुआरथी पंखी राइ गरुड़ ता चे बाधवा ॥
करम करि अरुण पिंगुला री ॥2॥
अनिक पातिक हरता त्रिभवण नाथु री तीरथि तीरथि भ्रमता लहै न पारु री ॥
करम करि कपालु मफीटसि री ॥3॥
अंम्रित ससीअ धेन लछिमी कलपतर सिखरि सुनागर नदी चे नाथं ॥
करम करि खारु मफीटसि री ॥4॥
दाधीले लंका गड़ु उपाड़ीले रावण बणु सलि बिसलि आणि तोखीले हरी ॥
करम करि कछउटी मफीटसि री ॥5॥
पूरबलो क्रित करमु न मिटै री घर गेहणि ता चे मोहि जापीअले राम चे नामं ॥
बदति त्रिलोचन राम जी ॥6॥1॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भूली हुई मूर्ख जिंदे ! आप परमात्मा को क्यों दोष देती हैं। पाप-पुंन आपका अपना किया हुआ कर्म है (जिसके कारण दुख-सुख सहना पड़ता है)। 1।रहाउ। (हे मेरी जिंदे !) (चंद्रमा)भले ही वह शिव जी के माथे पर बसता हैनित्य गंगा में स्नान करता है। और उसी की कुल में विष्णु जी ने (कृष्ण रूप धार के) जन्म लिया पर अपने किए कर्मों के कारण उसका दाग़ ना हट सका । 1। चाहे सारे जगत को प्रकाश देने वाला सूरज उसका स्वामी है। उस सूरज का वह सारथी है। और पक्षियों का राजा गरुड़ उसका रिश्तेदार है। (हे घर की गृहणी !) अपने कर्मों के कारण अरुण पिंगला ही रहा।2। चाहे (शिव जी) सारे जगत का नाथ (समझा जाता) है। (और जीवों के) अनेकों पाप नाश करने वाला है। पर वह हरेक तीर्थ पर भटकता फिरा। तो भी (उस खोपरी से) उसकी खलासी नहीं हो रही थी। (ब्रहम-हत्या के) किए कर्म के अनुसार (शिव जी के हाथों से) खोपरी नहीं उतर सकी थी। 3। (हे मेरी जिंदे !) चाहे वह सारी नदियों का नाथ है और उसमें से अमृत। चंद्रमा, कामधेनु, लक्ष्मी, कल्पतरु, सतमुँही घोड़ा, धनवंतरी वैद्य (आदि) नौ रत्न निकले थे। अपने किए (मंद कर्म) अनुसार (समुंद्र का) खारा पन नहीं हट सका। 4। चाहे उसने (श्री रामचंद्र जी के खातिर) लंका का किला जलाया। रावण का बाग़ उजाड़ दिया। सल दूर करने वाली बूटी ला के रामचंद्र जी को प्रसन्न ही किया। (हे घर गेहणि !) अपने किए कर्मों के अधीन (हनुमान के भाग्यों से) उसकी छोटी सी कच्छी ना हट सकी।5। हे मेरी जिंदे ! पिछला किया हुआ कोई भी कर्म (अवतार पूजा। तीर्थ स्नान आदि से) नहीं मिटता। इसीलिए मैं तो परमात्मा का ही नाम सिमरता हूँ। त्रिलोचन कहता है कि मैं तो ‘राम राम’ ही जपता हूँ (भाव। परमात्मा की ओट लेता हूँ और अपने किए कर्म करके आए दुख से प्रभू को दोष नहीं देता)। 6। 1।

स्री सैणु ॥

स्री सैणु ॥
धूप दीप घ्रित साजि आरती ॥
वारने जाउ कमला पती ॥1॥
मंगला हरि मंगला ॥ नित मंगलु राजा राम राइ को ॥1॥ रहाउ ॥
ऊतमु दीअरा निरमल बाती ॥
तुहंी निरंजनु कमला पाती ॥2॥
रामा भगति रामानंदु जानै ॥
पूरन परमानंदु बखानै ॥3॥
मदन मूरति भै तारि गोबिंदे ॥
सैनु भणै भजु परमानंदे ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्री सैणु ॥ धूप। दीप और घी (आदि) सामग्री इकट्ठी करके आपकी आरती करनी है हे माया के मालिक प्रभू ! मैं आपसे सदके जाता हूँ (आपसे सदके जाना ही) । 1। हे हरी ! (मेरे अंदर) आनंद-मंगल हो रहा है हे राजन ! हे राम ! आपकी मेहर से (मेरे अंदर) सदा (आपके नाम-सिमरन का) आनंद-मंगल हो रहा है। 1।रहाउ। सुंदर अच्छा दीपक और साफ-सुथरी बाती हे कमलापति ! आप निरंजन ही मेरे लिए (आरती करने के लिए) हैं। 2। वह प्रभू की भक्ति की बरकति से उसके मिलाप का आनंद वह लेता है जो मनुष्य सर्व-व्यापक परम आनंद स्वरूप प्रभू के गुण गाता है। 3। जो सुंदर स्वरूप वाला है। जो (संसार के) डरों से पार लंघाने वाला है और जो सृष्टि की सार लेने वाला है सैण कहता है, (हे मेरे मन !) उस परम-आनंद परमात्मा का सिमरन कर। 4। 2।

पीपा ॥

पीपा ॥
कायउ देवा काइअउ देवल काइअउ जंगम जाती ॥
काइअउ धूप दीप नईबेदा काइअउ पूजउ पाती ॥1॥
काइआ बहु खंड खोजते नव निधि पाई ॥
ना कछु आइबो ना कछु जाइबो राम की दुहाई ॥1॥ रहाउ ॥
जो ब्रहमंडे सोई पिंडे जो खोजै सो पावै ॥
पीपा प्रणवै परम ततु है सतिगुरु होइ लखावै ॥2॥3॥

हिन्दी अर्थ: पीपा ॥ (सो) काया (की खोज) ही मेरा देवता है (जिसकी मैंने आरती करनी है)।शरीर (की खोज) ही मेरा मंदिर है (जहॉ। मैं शरीर के अंदर बसते प्रभू की आरती करता हूँ)। काया (की खोज) ही (मेरे वास्ते मेरे अंदर बसते देवते के लिए) धूप-दीप और नैदेव है। काया की खोज (करके) ही मैं मानो। पत्र भेट रख के (अपने अंदर बसते ईष्ट देव की) पूजा कर रहा हूँ। 1। देश-देशांतरों को खोज के (आखिर अपने) शरीर के अंदर ही मैंने प्रभू के नाम रूप नौ-निधियां पा ली हैं। (अब मेरी काया में) परमात्मा (की याद) का ही तेज प्रताप है (उसकी बरकति से मेरे लिए) ना कुछ पैदा होता है ना कुछ मरता है (भाव। मेरा जनम-मरण मिट गया है)। 1।रहाउ। जो सृष्टि का रचनहार परमात्मा सारे ब्रहमण्ड में (व्यापक) है वही (मनुष्य के) शरीर में है। जो मनुष्य खोज करता है वह उसको ढूँढ लेता है। पीपा विनती करता है, अगर सतिगुरू मिल जाए तो (अंदर ही) दर्शन करा देता है। 2।3।

धंना ॥

धंना ॥
गोपाल तेरा आरता ॥
जो जन तुमरी भगति करंते तिन के काज सवारता ॥1॥ रहाउ ॥
दालि सीधा मागउ घीउ ॥
हमरा खुसी करै नित जीउ ॥
पन॑ीआ छादनु नीका ॥ अनाजु मगउ सत सी का ॥1॥
गऊ भैस मगउ लावेरी ॥
इक ताजनि तुरी चंगेरी ॥
घर की गीहनि चंगी ॥
जनु धंना लेवै मंगी ॥2॥4॥

हिन्दी अर्थ: धंना ॥ हे पृथ्वी को पालने वाले प्रभू ! मैं आपके दर का मंगता हूँ (मेरी जरूरतें पूरी कर); जो जो मनुष्य आपकी भक्ति करते हैं आप उनके काम सिरे चढ़ाते हैं।1। रहाउ। मैं (आपके दर से) दाल, आटा और घी माँगता हूँ, जो मेरी जिंद को नित्य सुखी रखे, जूती व बढ़िया कपड़ा भी माँगता हूँ, और सात जोताई वाला अन्न भी (आपी से) माँगता हूँ।1। हे गोपाल ! मैं गाय भैंस लावेरी भी माँगता हूँ, और एक बढ़िया अरबी घोड़ी भी चाहिए। घर की अच्छी स्त्री भी मैं आपका दास धंना आपसे माँग के लेता हूँ ।2।4।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत धन्ना जी; भगत त्रिलोचन जी; भगत पीपा जी; भगत सैन जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 695 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।