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693
धनासरी
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मेरी मेरी कैरउ करते दुरजोधन से भाई ॥
मेरी मेरी कैरउ करते दुरजोधन से भाई ॥
बारह जोजन छत्रु चलै था देही गिरझन खाई ॥2॥
सरब सोुइन की लंका होती रावन से अधिकाई ॥
कहा भइओ दरि बांधे हाथी खिन महि भई पराई ॥3॥
दुरबासा सिउ करत ठगउरी जादव ए फल पाए ॥
क्रिपा करी जन अपुने ऊपर नामदेउ हरि गुन गाए ॥4॥1॥
बारह जोजन छत्रु चलै था देही गिरझन खाई ॥2॥
सरब सोुइन की लंका होती रावन से अधिकाई ॥
कहा भइओ दरि बांधे हाथी खिन महि भई पराई ॥3॥
दुरबासा सिउ करत ठगउरी जादव ए फल पाए ॥
क्रिपा करी जन अपुने ऊपर नामदेउ हरि गुन गाए ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: जिन कौरवों के दुर्योधन जैसे (बली) भाई थे। वे भी (ये गुमान करते रहे कि) हमारी (बादशाही) हमारी (बादशाही)। (पांडव क्या लगते हैं इस धरती के।); (कुरूक्षेत्र के युद्ध के वक्त) अढ़तालिस कोस तक उनकी सेना का फैलाव था (पर किधर गई बादशाहियत और कहां गया छत्र। कुरूक्षेत्र के युद्ध में) गिद्धों ने उनकी लाशें खाई। 2। रावण जैसे बड़े बली राजे की लंका सारी सोने की थी। (उसके महलों के) दरवाजे पर हाथी-घोड़े खड़े होते थे। पर आखिर में क्या बना। एक पल में सब कुछ पराया हो गया। 3। (सो। अहंकार किसी भी चीज का हो बुरा होता है; अहंकार में आ के ही) यादवों ने दुर्वासा के साथ मसखरी की और फल ये मिला कि (सारी कुल ही समाप्त हो गई)। (पर शुक्र है) अपने दास नामदेव पर परमात्मा ने कृपा की है और नामदेव (मान त्याग के) परमात्मा के गुण गाता है। 4। 1।
दस बैरागनि मोहि बसि कीन॑ी पंचहु का मिट नावउ ॥
दस बैरागनि मोहि बसि कीन॑ी पंचहु का मिट नावउ ॥
सतरि दोइ भरे अंम्रित सरि बिखु कउ मारि कढावउ ॥1॥
पाछै बहुरि न आवनु पावउ ॥
अंम्रित बाणी घट ते उचरउ आतम कउ समझावउ ॥1॥ रहाउ ॥
बजर कुठारु मोहि है छीनां करि मिंनति लगि पावउ ॥
संतन के हम उलटे सेवक भगतन ते डरपावउ ॥2॥
इह संसार ते तब ही छूटउ जउ माइआ नह लपटावउ ॥
माइआ नामु गरभ जोनि का तिह तजि दरसनु पावउ ॥3॥
इतु करि भगति करहि जो जन तिन भउ सगल चुकाईऐ ॥
कहत नामदेउ बाहरि किआ भरमहु इह संजम हरि पाईऐ ॥4॥2॥
सतरि दोइ भरे अंम्रित सरि बिखु कउ मारि कढावउ ॥1॥
पाछै बहुरि न आवनु पावउ ॥
अंम्रित बाणी घट ते उचरउ आतम कउ समझावउ ॥1॥ रहाउ ॥
बजर कुठारु मोहि है छीनां करि मिंनति लगि पावउ ॥
संतन के हम उलटे सेवक भगतन ते डरपावउ ॥2॥
इह संसार ते तब ही छूटउ जउ माइआ नह लपटावउ ॥
माइआ नामु गरभ जोनि का तिह तजि दरसनु पावउ ॥3॥
इतु करि भगति करहि जो जन तिन भउ सगल चुकाईऐ ॥
कहत नामदेउ बाहरि किआ भरमहु इह संजम हरि पाईऐ ॥4॥2॥
हिन्दी अर्थ: (प्रभू के नाम का वैरागी बन के) मैंने अपनी दसों वैरागिन इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया है। (मेरे अंदर से अब) पाँच कामादिकों का खुरा-खोज ही मिट गया है (भाव। मेरे पर ये अपना जोर नहीं डाल सकते); मैंने अपने रग-रग को नाम-अमृत के सरोवर से भर लिया है और (माया के) जहर का पूर्ण तौर पर नाश कर दिया है। 1। अब मैं बार-बार जनम-मरन में नहीं आऊँगा। (क्योंकि) मैं चित्त जोड़ के प्रभू की सिफत सालाह की बाणी उचारता हूँ और अपनी आत्मा को (सही जीवन की) शिक्षा देता रहता हूँ। 1।रहाउ। अपने सतिगुरू के चरणों में लग के। गुरू के आगे अरजोई करके (काल के हाथों से) मैंने (उसका) भयानक कुहाड़ा छीन लिया है। (काल से डरने की जगह) मैं उल्टा भक्तजनों से डरता हूँ (भाव। अदब करता हूँ) और उनका ही सेवक बन गया हूँ। 2। इस संसार के बँधनों से मेरी तब ही खलासी हो सकती है अगर मैं माया के मोह में ना फंसा; माया (का मोह) ही जनम-मरन के चक्कर में पड़ने का मूल है। इसको त्याग के ही प्रभू का दीदार हो सकता है। 3। इस तरीके से जो मनुष्य प्रभू की भक्ति करते हैं; उनका हरेक किस्म का सहम दूर हो जाता है। नामदेव कहता है, (हे भाई ! भेखी वैरागी बन के) बाहर भटकने से कोई लाभ नहीं; (जो संयम हमने बताए हैं) इस संयमों से ही परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। 4। 2।
मारवाड़ि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला ॥
मारवाड़ि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला ॥
जिउ कुरंक निसि नादु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥1॥
तेरा नामु रूड़ो रूपु रूड़ो अति रंग रूड़ो मेरो रामईआ ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ धरणी कउ इंद्रु बालहा कुसम बासु जैसे भवरला ॥
जिउ कोकिल कउ अंबु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥2॥
चकवी कउ जैसे सूरु बालहा मान सरोवर हंसुला ॥
जिउ तरुणी कउ कंतु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥3॥
बारिक कउ जैसे खीरु बालहा चात्रिक मुख जैसे जलधरा ॥
मछुली कउ जैसे नीरु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥4॥
साधिक सिध सगल मुनि चाहहि बिरले काहू डीठुला ॥
सगल भवण तेरो नामु बालहा तिउ नामे मनि बीठुला ॥5॥3॥
जिउ कुरंक निसि नादु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥1॥
तेरा नामु रूड़ो रूपु रूड़ो अति रंग रूड़ो मेरो रामईआ ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ धरणी कउ इंद्रु बालहा कुसम बासु जैसे भवरला ॥
जिउ कोकिल कउ अंबु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥2॥
चकवी कउ जैसे सूरु बालहा मान सरोवर हंसुला ॥
जिउ तरुणी कउ कंतु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥3॥
बारिक कउ जैसे खीरु बालहा चात्रिक मुख जैसे जलधरा ॥
मछुली कउ जैसे नीरु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥4॥
साधिक सिध सगल मुनि चाहहि बिरले काहू डीठुला ॥
सगल भवण तेरो नामु बालहा तिउ नामे मनि बीठुला ॥5॥3॥
हिन्दी अर्थ: जैसे मारवाड़ (रेगिस्तानी देश) में पानी प्यारा लगता है। जैसे ऊँठ को बेल प्यारी लगती है। जैसे हिरन को रात के वक्त (घंडेहेड़े की) आवाज प्यारी लगती है। वैसे ही मेरे मन को राम अच्छा लगता है। 1। हे मेरे सुंदर राम ! आपका नाम सोहणा है। आपका रूप सोहणा है और आपका रंग बहुत ही सोहणा है। 1।रहाउ। जैसे धरती को वर्षा प्यारी लगती है। जैसे भौरे को फूल की सुगंधि प्यारी लगती है। जैसे कोयल को आम प्यारा लगता है। वैसे ही मेरे मन को राम अच्छा लगता है। 2। जैसे चकवी को सूरज प्यारा लगता है। जैसे हंस को मान सरोवर प्यारा लगता है। जैसे जवान स्त्री को (अपना) पति प्यारा लगता है। वैसे ही मेरे मन को सुंदर राम प्यारा लगता है। 3। जैसे बालक को दूध प्यारा लगता है। जैसे पपीहे के मुँह को बादल प्यारा लगता है। मछली को जैसे पानी प्यारा लगता है। वैसे ही मेरे मन को सुंदर राम अच्छा लगता है। 4। (योग) साधना करने वाले। (योग-साधना में सिद्ध) सिद्ध योगी और सारे मुनि वर (सुंदर राम के दर्शन करना) चाहते हैं। पर किसी विरले को दीदार होता है। (हे मेरे सुंदर राम ! जैसे) सारे भवनों (के जीवों) को आपका नाम प्यारा है। वैसे ही मुझ नामे (नामदेव) के मन को भी बीठल प्यारा है। 5। 3।
पहिल पुरीए पुंडरक वना ॥
पहिल पुरीए पुंडरक वना ॥
ता चे हंसा सगले जनां ॥
क्रिस्ना ते जानऊ हरि हरि नाचंती नाचना ॥1॥
पहिल पुरसाबिरा ॥
अथोन पुरसादमरा ॥
असगा अस उसगा ॥
हरि का बागरा नाचै पिंधी महि सागरा ॥1॥ रहाउ ॥
नाचंती गोपी जंना ॥
नईआ ते बैरे कंना ॥
तरकु न चा ॥
भ्रमीआ चा ॥
केसवा बचउनी अईए मईए एक आन जीउ ॥2॥
ता चे हंसा सगले जनां ॥
क्रिस्ना ते जानऊ हरि हरि नाचंती नाचना ॥1॥
पहिल पुरसाबिरा ॥
अथोन पुरसादमरा ॥
असगा अस उसगा ॥
हरि का बागरा नाचै पिंधी महि सागरा ॥1॥ रहाउ ॥
नाचंती गोपी जंना ॥
नईआ ते बैरे कंना ॥
तरकु न चा ॥
भ्रमीआ चा ॥
केसवा बचउनी अईए मईए एक आन जीउ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: पहले पहल (जो जगत बना वह। मानो) कमल फूलों का खेत है। सारे जीव-जंतु उस (कमल के फूलों के खेत) के हंस हैं। परमात्मा की ये रचना नाच कर रही है। ये प्रभू की माया (की प्रेरणा) से समझो। 1। पहले पुरुष (अकाल पुरख) प्रगट हुआ (“आपीनै् आपु साजिओ। आपीनै रचिओ नाउ”)। फिर अकाल-पुरख से माया (बनी) (“दुयी कुदरति साजीअै”)। इस माया का और उस अकाल-पुरख का (मेल हुआ) (“करि आसणु डिठो चाउ”)। (इस तरह ये संसार) परमात्मा का एक सुंदर सा बाग़ (बन गया है। जो) ऐसे नाच रहा है जैसे (कूएं की) टिंडों में पानी नाचता है (भाव। संसार के जीव माया में मोहित हो के दौड़-भाग कर रहे हैं। माया के हाथों में नाच रहे हैं)। 1।रहाउ। सि्त्रयां-मर्द सब नाच रहे हैं। (पर इन सबमें) परमात्मा के बिना और कोई नहीं। (हे भाई ! इस में) शक ना कर। (इस संबंध में) भ्रम दूर कर दे। हरेक स्त्री-मर्द में परमात्मा के बचन ही एक-रस हो रहे हैं (भाव। हरेक जीव में परमात्मा खुद ही बोल रहा है)। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत नामदेव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 693 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।