ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर दीन दइआल जिसु संगि हरि गावीऐ जीउ ॥
अंम्रितु हरि का नामु साधसंगि रावीऐ जीउ ॥
भजु संगि साधू इकु अराधू जनम मरन दुख नासए ॥
धुरि करमु लिखिआ साचु सिखिआ कटी जम की फासए ॥
भै भरम नाठे छुटी गाठे जम पंथि मूलि न आवीऐ ॥
बिनवंति नानक धारि किरपा सदा हरि गुण गावीऐ ॥1॥
निधरिआ धर एकु नामु निरंजनो जीउ ॥
तू दाता दातारु सरब दुख भंजनो जीउ ॥
दुख हरत करता सुखह सुआमी सरणि साधू आइआ ॥
संसारु सागरु महा बिखड़ा पल एक माहि तराइआ ॥
पूरि रहिआ सरब थाई गुर गिआनु नेत्री अंजनो ॥
बिनवंति नानक सदा सिमरी सरब दुख भै भंजनो ॥2॥
आपि लीए लड़ि लाइ किरपा धारीआ जीउ ॥
मोहि निरगुणु नीचु अनाथु प्रभ अगम अपारीआ जीउ ॥
दइआल सदा क्रिपाल सुआमी नीच थापणहारिआ ॥
जीअ जंत सभि वसि तेरै सगल तेरी सारिआ ॥
आपि करता आपि भुगता आपि सगल बीचारीआ ॥
बिनवंत नानक गुण गाइ जीवा हरि जपु जपउ बनवारीआ ॥3॥
तेरा दरसु अपारु नामु अमोलई जीउ ॥
निति जपहि तेरे दास पुरख अतोलई जीउ ॥
संत रसन वूठा आपि तूठा हरि रसहि सेई मातिआ ॥
गुर चरन लागे महा भागे सदा अनदिनु जागिआ ॥
सद सदा सिंम्रतब्य सुआमी सासि सासि गुण बोलई ॥
बिनवंति नानक धूरि साधू नामु प्रभू अमोलई ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सनक सनंद महेस समानां ॥ सेखनागि तेरो मरमु न जानां ॥1॥
संतसंगति रामु रिदै बसाई ॥1॥ रहाउ ॥
हनूमान सरि गरुड़ समानां ॥ सुरपति नरपति नही गुन जानां ॥2॥
चारि बेद अरु सिंम्रिति पुरानां ॥ कमलापति कवला नही जानां ॥3॥
कहि कबीर सो भरमै नाही ॥ पग लगि राम रहै सरनांही ॥4॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी महला 5 छंत ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।