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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 691 · धनासरी

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अंग
691
धनासरी
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  1. सतिगुर दीन दइआल जिसु संगि हरि गावीऐ जीउ ॥
  2. रागु धनासरी बाणी भगत कबीर जी की

सतिगुर दीन दइआल जिसु संगि हरि गावीऐ जीउ ॥

धनासरी महला 5 छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर दीन दइआल जिसु संगि हरि गावीऐ जीउ ॥
अंम्रितु हरि का नामु साधसंगि रावीऐ जीउ ॥
भजु संगि साधू इकु अराधू जनम मरन दुख नासए ॥
धुरि करमु लिखिआ साचु सिखिआ कटी जम की फासए ॥
भै भरम नाठे छुटी गाठे जम पंथि मूलि न आवीऐ ॥
बिनवंति नानक धारि किरपा सदा हरि गुण गावीऐ ॥1॥
निधरिआ धर एकु नामु निरंजनो जीउ ॥
तू दाता दातारु सरब दुख भंजनो जीउ ॥
दुख हरत करता सुखह सुआमी सरणि साधू आइआ ॥
संसारु सागरु महा बिखड़ा पल एक माहि तराइआ ॥
पूरि रहिआ सरब थाई गुर गिआनु नेत्री अंजनो ॥
बिनवंति नानक सदा सिमरी सरब दुख भै भंजनो ॥2॥
आपि लीए लड़ि लाइ किरपा धारीआ जीउ ॥
मोहि निरगुणु नीचु अनाथु प्रभ अगम अपारीआ जीउ ॥
दइआल सदा क्रिपाल सुआमी नीच थापणहारिआ ॥
जीअ जंत सभि वसि तेरै सगल तेरी सारिआ ॥
आपि करता आपि भुगता आपि सगल बीचारीआ ॥
बिनवंत नानक गुण गाइ जीवा हरि जपु जपउ बनवारीआ ॥3॥
तेरा दरसु अपारु नामु अमोलई जीउ ॥
निति जपहि तेरे दास पुरख अतोलई जीउ ॥
संत रसन वूठा आपि तूठा हरि रसहि सेई मातिआ ॥
गुर चरन लागे महा भागे सदा अनदिनु जागिआ ॥
सद सदा सिंम्रतब्य सुआमी सासि सासि गुण बोलई ॥
बिनवंति नानक धूरि साधू नामु प्रभू अमोलई ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 छंत ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! वह गुरू दीनों पर दया करने वाला है जिसकी संगति में (रह कर) परमात्मा की सिफत सालाह की जा सकती है। गुरू की संगति में आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम सिमरा जा सकता है। हे भाई ! गुरू की संगति में जा। (वहाँ) एक प्रभू का सिमरन कर। (सिमरन की बरकति से) जनम-मरण के दुख दूर हो जाते हैं। (जिस मनुष्य के माथे पर) धुर-दरगाह से (सिमरन करने के लिए) बख्शिश (का लेख) लिखा होता है। वही सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की शिक्षा ग्रहण करता है। उसका आत्मिक मौत का फंदा काटा जाता है। हे भाई ! सिमरन की बरकति से सारे डर सारे भरम नाश हो जाते। (मन मे बँधी हुई) गाँठ खुल जाती है। (फिर वह) आत्मिक मौत सहेड़ने वाले रास्ते पर बिल्कुल नहीं चलता। नानक विनती करता है, हे प्रभू ! मेहर कर कि हम जीव सदा आपकी सिफत सालाह करते रहें। 1। हे प्रभू ! आप माया की कालिख से रहित हैं। आपका नाम ही निआसरों का आसरा है। आप सब जीवों को दातें देने वाले हैं। आप सबके दुख नाश करने वाले हैं। हे (सब जीवों के) दुख नाश करने वाले ! सबको पैदा करने वाले !।सारे सुखों के मालिक प्रभू ! जो मनुष्य गुरू की शरण आता है। उसको आप इस बड़े मुश्किल संसार-समुंद्र से एक छिन में पार लंघा देते हैं। हे प्रभू ! गुरू का दिया हुआ ज्ञान-अंजन जिस मनुष्य की आँखों में पड़ता है। उसको आप सब जगहों में दिखते हैं। नानक विनती करता है, हे सारे दुखों का नाश करने वाले ! (मेहर कर) मैं सदा आपका नाम सिमरता रहूँ। 2। जिन पर आप मेहर (की निगाह) करते हैं। उनको अपने लड़ लगा लेते हैं। हे अपहुँच ! हे बेअंत ! मैं गुणहीन, नीच और अनाथ (भी आपकी शरण आया हूँ। मेरे पर भी मेहर कर)। हे दया के घर ! हे कृपा के घर मालिक ! हे नीचों को ऊँचे बनाने वाले प्रभू ! सारे जीव आपके वश में हैं। सारे आपकी संभाल में हैं। आप स्वयं (सब जीवों को) पैदा करने वाले हैं। (सब में व्यापक हो के) आप खुद (सारे पदार्थ) भोगने वाले हैं। आप स्वयं सारे जीवों के लिए विचार करने वाले हैं। नानक (आपके दर पर) विनती करता है, हे प्रभू ! (मेहर कर) मैं आपके गुण गा के आत्मिक जीवन प्राप्त करता रहूँ। 3। हे प्रभू ! आप बेअंत हैं ! आपका नाम किसी (दुनियावी) कीमत से नहीं मिल सकता। हे ना तोले जा सकने वाले सर्व-व्यापक प्रभू ! आपके दास सदा आपका नाम जपते रहते हैं। हे प्रभू ! संतों पर आप प्रसन्न होते हैं। और उनकी जीभ पर आ बसते हैं। वे आपके नाम के रस में मस्त रहते हैं। जो मनुष्य गुरू के चरणों में आ लगते हैं। वे भाग्यशाली हो जाते हैं। वे सदा हर वक्त (सिमरन की बरकति से माया के हमलों से) सचेत रहते हैं। हे सिमरनयोग्य मालिक ! जो सदा ही हरेक सांस के साथ आपके गुण उचारता रहता है - नानक विनती करता है,हे प्रभू ! मुझे उस गुरू की चरण-धूड़ दे जो आपका अमूल्य नाम (सदा जपता है)। 4। 1।

रागु धनासरी बाणी भगत कबीर जी की

रागु धनासरी बाणी भगत कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सनक सनंद महेस समानां ॥ सेखनागि तेरो मरमु न जानां ॥1॥
संतसंगति रामु रिदै बसाई ॥1॥ रहाउ ॥
हनूमान सरि गरुड़ समानां ॥ सुरपति नरपति नही गुन जानां ॥2॥
चारि बेद अरु सिंम्रिति पुरानां ॥ कमलापति कवला नही जानां ॥3॥
कहि कबीर सो भरमै नाही ॥ पग लगि राम रहै सरनांही ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: रागु धनासरी बाणी भगत कबीर जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! (ब्रहमा के पुत्रों) सनक, सनंद और शिव जी जैसों ने आपका भेद नहीं पाया; (विष्णु के भक्त) शेशनाग ने आपके (दिल का) राज़ नहीं समझा। 1। मैं संतों की संगति में रह के परमात्मा को अपने हृदय में बसाता हूँ। 1।रहाउ। (श्री राम चंद्र जी के सेवक) हनूमान जैसों ने। (विष्णु के सेवक और पक्षियों के राजे) गरुड़ जैसों ने। देवाताओं के राजे इन्द्र ने। बड़े-बड़े राजाओं ने भी आपके गुणों का अंत नहीं पाया। 2। चार वेद। (अठारह) स्मृतियों। (अठारह) पुराणों- (इनके कर्ता ब्रहमा। मनू और ऋषियों) ने आपको नहीं समझा। विष्णु और लक्ष्मी ने भी आपका अंत नहीं पाया। 3। कबीर कहता है, (बाकी सारी सृष्टि के लोग प्रभू को छोड़ के और ही तरफ भटकते रहे) एक वह मनुष्य नहीं भटकता। जो (संतों की) चरणों में लग के परमात्मा की शरण में टिका रहता है। 4। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 691 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।