ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जीउ क्रिपा करे ता नामु धिआईऐ जीउ ॥
सतिगुरु मिलै सुभाइ सहजि गुण गाईऐ जीउ ॥
गुण गाइ विगसै सदा अनदिनु जा आपि साचे भावए ॥
अहंकारु हउमै तजै माइआ सहजि नामि समावए ॥
आपि करता करे सोई आपि देइ त पाईऐ ॥
हरि जीउ क्रिपा करे ता नामु धिआईऐ जीउ ॥1॥
अंदरि साचा नेहु पूरे सतिगुरै जीउ ॥
हउ तिसु सेवी दिनु राति मै कदे न वीसरै जीउ ॥
कदे न विसारी अनदिनु सम॑ारी जा नामु लई ता जीवा ॥
स्रवणी सुणी त इहु मनु त्रिपतै गुरमुखि अंम्रितु पीवा ॥
नदरि करे ता सतिगुरु मेले अनदिनु बिबेक बुधि बिचरै ॥
अंदरि साचा नेहु पूरे सतिगुरै ॥2॥
सतसंगति मिलै वडभागि ता हरि रसु आवए जीउ ॥
अनदिनु रहै लिव लाइ त सहजि समावए जीउ ॥
सहजि समावै ता हरि मनि भावै सदा अतीतु बैरागी ॥
हलति पलति सोभा जग अंतरि राम नामि लिव लागी ॥
हरख सोग दुहा ते मुकता जो प्रभु करे सु भावए ॥
सतसंगति मिलै वडभागि ता हरि रसु आवए जीउ ॥3॥
दूजै भाइ दुखु होइ मनमुख जमि जोहिआ जीउ ॥
हाइ हाइ करे दिनु राति माइआ दुखि मोहिआ जीउ ॥
माइआ दुखि मोहिआ हउमै रोहिआ मेरी मेरी करत विहावए ॥
जो प्रभु देइ तिसु चेतै नाही अंति गइआ पछुतावए ॥
बिनु नावै को साथि न चालै पुत्र कलत्र माइआ धोहिआ ॥
दूजै भाइ दुखु होइ मनमुखि जमि जोहिआ जीउ ॥4॥
करि किरपा लेहु मिलाइ महलु हरि पाइआ जीउ ॥
सदा रहै कर जोड़ि प्रभु मनि भाइआ जीउ ॥
प्रभु मनि भावै ता हुकमि समावै हुकमु मंनि सुखु पाइआ ॥
अनदिनु जपत रहै दिनु राती सहजे नामु धिआइआ ॥
नामो नामु मिली वडिआई नानक नामु मनि भावए ॥
करि किरपा लेहु मिलाइ महलु हरि पावए जीउ ॥5॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “धनासरी छंत महला 4 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।