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अंग 68

अंग
68
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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मनु तनु अरपी आपु गवाई चला सतिगुर भाए ॥
सद बलिहारी गुर अपुने विटहु जि हरि सेती चितु लाए ॥7॥
सो ब्राहमणु ब्रहमु जो बिंदे हरि सेती रंगि राता ॥
प्रभु निकटि वसै सभना घट अंतरि गुरमुखि विरलै जाता ॥
नानक नामु मिलै वडिआई गुर कै सबदि पछाता ॥8॥5॥22॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (मेरी यही अरदास है कि) मैं अपना मन अपना तन (गुरू के) हवाले कर दूँ। मैं (गुरू के आगे) अपना स्वै भाव गवा दूँ, और मैं गुरू के प्रेम में जीवन गुजारूँ। जो गुरू परमात्मा के साथ मेरा चित्त जोड़ देता है मैं अपने उस गुरू से सदा सदके जाता हूँ।7। (ऊूंची जाति का गुमान व्यर्थ है) वही ब्राहमण है, जो ब्रह्म (प्रभू) को पहचानता है। जो प्रभू के प्रेम में प्रभू के साथ रंगा रहता है। (जातियों का कोई भिन्न-भेद नहीं) प्रभू सभ शरीरों में सभी जीवों के नजदीक बसता है। पर यह बात कोई विरला ही समझता है, जो गुरू की शरण पड़े। हे नानक ! गुरू के शबद में जुड़ने से प्रभू के साथ जान पहिचान बनती है, प्रभू का नाम मिलता है और (लोक परलोक में) आदर मिलता है।8।5।22।
सिरीरागु महला 3 ॥
सहजै नो सभ लोचदी बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥
पड़ि पड़ि पंडित जोतकी थके भेखी भरमि भुलाइ ॥
गुर भेटे सहजु पाइआ आपणी किरपा करे रजाइ ॥1॥
भाई रे गुर बिनु सहजु न होइ ॥
सबदै ही ते सहजु ऊपजै हरि पाइआ सचु सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
सहजे गाविआ थाइ पवै बिनु सहजै कथनी बादि ॥
सहजे ही भगति ऊपजै सहजि पिआरि बैरागि ॥
सहजै ही ते सुख साति होइ बिनु सहजै जीवणु बादि ॥2॥
सहजि सालाही सदा सदा सहजि समाधि लगाइ ॥
सहजे ही गुण ऊचरै भगति करे लिव लाइ ॥
सबदे ही हरि मनि वसै रसना हरि रसु खाइ ॥3॥
सहजे कालु विडारिआ सच सरणाई पाइ ॥
सहजे हरि नामु मनि वसिआ सची कार कमाइ ॥
से वडभागी जिनी पाइआ सहजे रहे समाइ ॥4॥
माइआ विचि सहजु न ऊपजै माइआ दूजै भाइ ॥
मनमुख करम कमावणे हउमै जलै जलाइ ॥
जंमणु मरणु न चूकई फिरि फिरि आवै जाइ ॥5॥
त्रिहु गुणा विचि सहजु न पाईऐ त्रै गुण भरमि भुलाइ ॥
पड़ीऐ गुणीऐ किआ कथीऐ जा मुंढहु घुथा जाइ ॥
चउथे पद महि सहजु है गुरमुखि पलै पाइ ॥6॥
निरगुण नामु निधानु है सहजे सोझी होइ ॥
गुणवंती सालाहिआ सचे सची सोइ ॥
भुलिआ सहजि मिलाइसी सबदि मिलावा होइ ॥7॥
बिनु सहजै सभु अंधु है माइआ मोहु गुबारु ॥
सहजे ही सोझी पई सचै सबदि अपारि ॥
आपे बखसि मिलाइअनु पूरे गुर करतारि ॥8॥
सहजे अदिसटु पछाणीऐ निरभउ जोति निरंकारु ॥
सभना जीआ का इकु दाता जोती जोति मिलावणहारु ॥
पूरै सबदि सलाहीऐ जिस दा अंतु न पारावारु ॥9॥
गिआनीआ का धनु नामु है सहजि करहि वापारु ॥
अनदिनु लाहा हरि नामु लैनि अखुट भरे भंडार ॥
नानक तोटि न आवई दीए देवणहारि ॥10॥6॥23॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ सारी सृष्टि मन की शांति के लिए तरसती है। पर गुरू की शरण के बिना यह सहज अवस्था नहीं मिलती। पंडित और ज्योतिषी (शास्त्र आदि धार्मिक पुस्तकें) पड़ पड़ के थक गए (पर सहज अवस्था प्राप्त ना कर सके), छह भेषों के साधू भी भटक भटक के कुमार्ग पर ही पड़े रहे (वे भी सहज अवस्था ना पा सके)। जिन पर परमात्मा अपनी रजा मुताबिक कृपा करता है, वे गुरू को मिल के सहज अवस्था प्राप्त करते हैं।1। हे भाई ! गुरू की शरण के बिना (मनुष्य के अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। गुरू के शबद में जुड़ने से ही आत्मिक अडोलता (मन की शांति) पैदा होती है, और वह सदा स्थिर रहने वाला प्रभू मिलता है।1।रहाउ। परमात्मा के गुणों का कीर्तन करना भी तभी प्रवान होता है, जब आत्मिक अडोलता में टिक के किया जाए। आत्मिक अडोलता के बिनां धार्मिक बातें कहना व्यर्थ जाता है। आत्मिक अडोलता में टिकने पर ही (मनुष्य के अंदर परमात्मा की) भक्ति (का जज्बा) पैदा होता है। आत्मिक अडोलता से ही मनुष्य प्रभू के प्यार में टिकता है। (दुनिया से) वैराग में रहता है। आत्मिक अडोलता से आत्मिक आनंद व शान्ति पैदा होती है। आत्मिक अडोलत के बगैर (मनुष्य की सारी) जिंदगी व्यर्थ जाती है।2। (हे भाई!) आप आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक अडोलता में समाधि लगा के सदा परमात्मा की सिफत सलाह करते रहना। जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के गुण गाता है, प्रभू चरणों में सुरति जोड़ के भगती करता है, गुरू के शबद की बरकति से ही उसके मन में परमात्मा आ बसता है, उसकी जीभ परमात्मा के नाम का स्वाद चखती रहती है।3। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की शरण पड़ के आत्मिक अडोलता में टिक के जिन्होंने आत्मिक मौत को मार लिया। ये सदा साथ निभने वाली कार करने के कारण उनके अंदर परमात्मा का नाम आ बसता है। और, जिन्होंने परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया, वह लोग बड़े भाग्यशाली हो गए, वे सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं।4। माया (के मोह) में टिके रहने से आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। माया तो (प्रभू के बिना किसी) और प्यार में (फंसाती है)। ऐसे मानवीय कर्म करने से मनुष्य अहंकार में ही जलता है। (अपने आप को) जलाता है। उसका जनम मरन का चक्कर कभी खत्म नहीं होता, वह मुड़ मुड़ पैदा होता रहता है।5। माया (के मोह) में टिके रहने से आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। माया के तीन गुणों के कारण जीव भटकन में फंस कर गलत राह पे पड़ा रहता है। (इस हालात में) धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने का विचारने का व औरों को सुनाने का कोई लाभ नहीं होता। क्योंकि, जीव अपने मूल प्रभू से विछुड़ के (गलत जीवन राह पे) चलता है। (माया के तीन गुणों को लांघ के) चौथी आत्मिक अवस्था में पहुँचने से ही मन की शांति पैदा होती है और यह आत्मिक अवस्था गुरू की शरण पड़ के ही प्राप्त होती है।6। तीनों गुणों से निर्लिप परमात्मा का नाम (सभ पदार्थों का) खजाना है, आत्मिक अडोलता में पहुँचने पर ये समझ पड़ती है। गुणवान जीव ही उस प्रभू की सिफत सलाह करते हैं। (जो मनुष्य सिफत सलाह करता है वह) सदा स्थिर प्रभू का रूप हो जाता है, उसकी शोभा भी अटॅल हो जाती है। (वह परमात्मा इतना दयालु है कि वह शरण आए) गलत राह पर पड़े लोगों को भी आत्मिक अडोलता में जोड़ देता है। गुरू के शबद की बरकति से उस (वडभागी परमात्मा से) मिलाप हो जाता है।7। मन की शान्ति के बिनां सारा जगत (माया के मोह में) अंधा हुआ रहता है। (जगत पर) माया के मोह का घोर अंधकार छाया रहता है। सदा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह के शबद से जिस मनुष्य को आत्मिक अडोलता में जुड़ के (परमात्मा के गुणों की) सूझ पड़ जाती है, वह उस अपार प्रभू में (सुरति जोड़ के रखता है)। (ऐसे भाग्यशाली लोगों को) पूरे गुरू ने करतार ने स्वयं ही मेहर करके (अपने चरणों में) मिला लिया होता है।8। आत्मिक अडोलता में पहुँच कर उस परमात्मा के साथ सांझ बन जाती है, जो इन आँखों से नही दिखता, जिसको किसी का डर नही, जो केवल प्रकाश ही प्रकाश है, और जिसका कोई खास स्वरूप (बताया) नहीं (जा सकता)। वही परमात्मा सब जीवों को सारी दातें देने वाला है, और सभ की ज्योति (सुरति) को अपनी ज्योति में मिलाने के स्मर्थ है। (हे भाई!) पूरे गुरू के शबद से उस परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए, जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता, जिसके बड़प्पन का उरला व परला छोर नहीं मिल सकता।9। जो मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं, परमात्मा का नाम ही उनका (असल) धन बन जाता है। वे आत्मिक अडोलता में टिक के इस नाम धन का ही व्यापार करते हैं। वे हर वक्त (परमात्मा का नाम सिमर के) परमात्मा का नाम-लाभ ही कमाते हैं। नाम धन से भरे हुए उनके खजाने कभी खत्म नही होते। हे नानक ! ये खजाने दाता दातार ने स्वयं उन्हें दिये हुए हैं, इन खजानों में कभी भी तोट नहीं आती।10।6।23।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(मेरी यही अरदास है कि) मैं अपना मन अपना तन (गुरू के) हवाले कर दूँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।