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अंग 688

अंग
688
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गावै गावणहारु सबदि सुहावणो ॥
सालाहि साचे मंनि सतिगुरु पुंन दान दइआ मते ॥
पिर संगि भावै सहजि नावै बेणी त संगमु सत सते ॥
आराधि एकंकारु साचा नित देइ चड़ै सवाइआ ॥
गति संगि मीता संतसंगति करि नदरि मेलि मिलाइआ ॥3॥
कहणु कहै सभु कोइ केवडु आखीऐ ॥
हउ मूरखु नीचु अजाणु समझा साखीऐ ॥
सचु गुर की साखी अंम्रित भाखी तितु मनु मानिआ मेरा ॥
कूचु करहि आवहि बिखु लादे सबदि सचै गुरु मेरा ॥
आखणि तोटि न भगति भंडारी भरिपुरि रहिआ सोई ॥
नानक साचु कहै बेनंती मनु मांजै सचु सोई ॥4॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के गाने-योग्य प्रभू (के गुण) गाता है उसका जीवन सुंदर बन जाता है। सतिगुरू को (जीवन-दाता) मान के सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करके मनुष्य की मति दूसरों की सेवा करने वाली सब पर दया करने वाली बन जाती है। (सिफत सालाह की बरकति से मनुष्य) पति-प्रभू की संगति में रह के उसको प्यारा लगने लग जाता है आत्मिक अडोलता में (मानो आत्मिक) स्नान करता है; यही उसके लिए स्वच्छ से स्वच्छ त्रिवेणी संगम (का स्नान) है। (हे भाई !) उस सदा स्थिर रहने वाले एक अकालपुरुख को सिमर।जो सदा (सब जीवों को दातें) देता है और (जिसकी दी हुई दातें दिनो दिन) बढ़ती ही जाती हैं। मित्र-प्रभू की संगति में।गुरू-संत की संगति में आत्मिक अवस्था ऊँची हो जाती है।प्रभू मेहर की नजर करके अपनी संगति में मिला लेता है। 3। हरेक जीव (परमात्मा के बारे में) कथन करता है (और कहता है कि परमात्मा बहुत बड़ा है।पर) कोई नहीं बता सकता कि वह कितना बड़ा है। (मैं इतने लायक नहीं कि परमात्मा का स्वरूप बयान कर सकूँ) मैं (तो) मूर्ख हूँ।जीव स्वभाव का हूँ।अंजान हूँ।मैं तो गुरू के उपदेश से ही (कुछ) समझ सकता हूँ (अर्थात।मैं तो उतना कुछ ही मुश्किल से समझ सकता हूँ जितना गुरू अपने शबद से समझाए)। मेरा मन तो उस गुरू-शबद में ही पतीज गया है जो सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करता है और जो आत्मिक जीवन देने वाला है। जो जीव (माया-मोह के) जहर से लदे हुए जगत में आते हैं (गुरू के शबद को विसार के और तीर्थ-स्नान आदि की टेक रख के।उसी जहर से लदे हुए ही जगत से) कूच कर जाते हैं। पर जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में जुड़ते हैं।उनको मेरा गुरू उस जहर के भार से बचा लेता है। (परमात्मा के गुण बेअंत हैं।गुण) बयान करने से खत्म नहीं होते।(परमात्मा की भक्ति के खजाने भरे पड़े हैं।जीवों को भक्ति की दाति बाँटने से) भक्ती के खजानों में कोई कमी नहीं आती।(पर भगती करने से प्रभू की सिफत सालाह करने से मनुष्य को ये यकीन हो जाता है कि) परमात्मा ही हर जगह व्यापक है। हे नानक ! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन करता है।जो प्रभू-दर पर अरदासें करता है (और इस तरह) अपने मन को विकारों की मैल से साफ कर लेता है उसे हर जगह वह सदा-स्थिर प्रभू ही दिखता है (तीर्थ-स्नानों से यह आत्मिक अवस्था प्राप्त नहीं होती)। 4। 1।
धनासरी महला 1 ॥
जीवा तेरै नाइ मनि आनंदु है जीउ ॥
साचो साचा नाउ गुण गोविंदु है जीउ ॥
गुर गिआनु अपारा सिरजणहारा जिनि सिरजी तिनि गोई ॥
परवाणा आइआ हुकमि पठाइआ फेरि न सकै कोई ॥
आपे करि वेखै सिरि सिरि लेखै आपे सुरति बुझाई ॥
नानक साहिबु अगम अगोचरु जीवा सची नाई ॥1॥
तुम सरि अवरु न कोइ आइआ जाइसी जीउ ॥
हुकमी होइ निबेड़ु भरमु चुकाइसी जीउ ॥
गुरु भरमु चुकाए अकथु कहाए सच महि साचु समाणा ॥
आपि उपाए आपि समाए हुकमी हुकमु पछाणा ॥
सची वडिआई गुर ते पाई तू मनि अंति सखाई ॥
नानक साहिबु अवरु न दूजा नामि तेरै वडिआई ॥2॥
तू सचा सिरजणहारु अलख सिरंदिआ जीउ ॥
एकु साहिबु दुइ राह वाद वधंदिआ जीउ ॥
दुइ राह चलाए हुकमि सबाए जनमि मुआ संसारा ॥
नाम बिना नाही को बेली बिखु लादी सिरि भारा ॥
हुकमी आइआ हुकमु न बूझै हुकमि सवारणहारा ॥
नानक साहिबु सबदि सिञापै साचा सिरजणहारा ॥3॥
भगत सोहहि दरवारि सबदि सुहाइआ जीउ ॥
बोलहि अंम्रित बाणि रसन रसाइआ जीउ ॥
रसन रसाए नामि तिसाए गुर कै सबदि विकाणे ॥
पारसि परसिऐ पारसु होए जा तेरै मनि भाणे ॥
अमरा पदु पाइआ आपु गवाइआ विरला गिआन वीचारी ॥
नानक भगत सोहनि दरि साचै साचे के वापारी ॥4॥
भूख पिआसो आथि किउ दरि जाइसा जीउ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 ॥ हे प्रभू जी ! आपके नाम में (जुड़ के) मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है।मेरे मन में खुशी पैदा होती है। हे भाई ! परमात्मा का नाम सदा स्थिर रहने वाला है।प्रभू गुणों (का खजाना) है और धरती के जीवों के दिलोंकी जानने वाला है। गुरू का बख्शा हुआ ज्ञान बताता है कि सृजनहार प्रभू बेअंत है।जिसने ये सृष्टि पैदा की है।वही इसका नाश करता है। जब उसके हुकम में भेजा हुआ आमंत्रण आता है तो कोई भी जीव (उसके बुलावे को) रोक नहीं सकता। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करके आप ही संभाल करता है।आप ही हरेक जीव के सिर पर (उसके किए कर्मों के अनुसार) लेख लिखता है।खुद ही (जीव को सही जीवन-राह की) सूझ बख्शता है। मालिक-प्रभू अपहुँच है।जीवों की ज्ञानेन्द्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती।हे नानक ! (उसके दर पर अरदास कर।और कह, हे प्रभू !) आपकी सदा कायम रहने वाली सिफत सालाह करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है (मुझे अपनी सिफत सालाह बख्श)। 1। हे प्रभू जी ! आपके बराबर का और कोई नहीं।(और जो भी जगत में) आया है।(वह यहाँ से आखिर) चला जाएगा (आप ही सदा कायम रहने वाला है)। जिस मनुष्य की भटकना (गुरू) दूर करता है।प्रभू के हुकम अनुसार उसके जनम-मरण के चक्कर का खात्मा हो जाता है। गुरू जिसकी भटकना दूर करता है।उससे उस परमात्मा की सिफत सालाह करवाता है जिसके गुण बयान से परे हैं। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में रहता है।सदा स्थिर प्रभू (उसके हृदय में) प्रगट हो जाता है। वह मनुष्य रजा के मालिक प्रभू का हुकम पहचान लेता है (और समझ लेता है कि) प्रभू खुद ही पैदा करता है और खुद ही (अपने में) लीन कर लेता है। हे प्रभू ! जिस मनुष्य ने आपकी सिफत सालाह (की दाति) गुरू से प्राप्त कर ली है।आप उसके मन में आ बसता है और अंत के समय भी उसका साथी बनता है। हे नानक ! मालिक प्रभू सदा कायम रहने वाला है।उस जैसा कोई और नहीं।(उसके दर पर अरदास कर और कह) हे प्रभू ! आपके नाम में जुड़ने से (लोक-परलोक में) आदर मिलता है। 2। हे अदृष्य रचनहार ! आप सदा स्थिर रहने वाला है और सब जीवों को पैदा करने वाला है। एक ही सृजनहार (सारे जगत का) मालिक है। उसने (पैदा होना और मरना) दो रास्ते चलाए हैं।(उसीकी रजा के अनुसार जगत में) झगड़े बढ़ते हैं। दोनों रास्ते प्रभू ने ही चलाए हैं।सारे जीव उसी के हुकम में हैं।(उसी के हुकम अनुसार) जगत पैदा होता व मरता रहता है। (जीव नाम को भुला के माया के मोह का) जहर-रूपी भार अपने सिर पर इकट्ठा किए जाता है।(और ये नहीं समझता कि) परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी साथी मित्र नहीं बन सकता। जीव (परमात्मा के) हुकम अनुसार (जगत में) आता है।(पर माया के मोह में फस के उस) हुकम को नहीं समझता।प्रभू आप ही जीवों को अपने हुकम अनुसार (सीधे रास्ते पर डाल के) सँवारने में समर्थ है। हे नानक ! गुरू के शबद में जुड़ने से ये पहचान हो जाती है कि जगत का मालिक सदा-स्थिर रहने वाला है और सबको पैदा करने वाला है। 3। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा की हजूरी में शोभते हैं।क्योंकि गुरू के शबद की बरकति से वह अपने जीवन को सुंदर बना लेते हैं। वह लोग आत्मिक जीवन देने वाली बाणी अपनी जीभ से उचारते रहते हैं।जीव को उस बाणी के साथ एकरस कर लेते हैं। भक्त जन प्रभू के नाम के साथ जीभ को रसित कर लेते हैं।नाम में जुड़ के (नाम के वास्ते उनकी) प्यास बढ़ती है।गुरू के शबद से वह प्रभू-नाम से कुर्बान होते हैं।(नाम की खातिर और सब शारीरिक सुख कुर्बान करते हैं)। हे प्रभू ! जब (भक्तजन) आपके मन को प्यारे लगते हैं।तो वह गुरू पारस से छू के स्वयं भी पारस बन जाते हैं (औरों को पवित्र जीवन देने के लायक बन जाते हैं)। जो लोग स्वैभाव दूर करते हैं उन्हें वह आत्मिक दर्जा मिल जाता है जहाँ आत्मिक मौत असर नहीं कर सकती।पर ऐसा कोई विरला ही गुरू के दिए ज्ञान की विचार करने वाला सख्श होता है। हे नानक ! परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे सदा-स्थिर प्रभू के दर पर शोभा पाते हैं।वह (अपने सारे जीवन में) सदा-स्थिर प्रभू के नाम का ही व्यापार करते हैं। 4। जब तक मैं माया के वास्ते भूखा प्यासा रहता हूँ।तब तक मैं किसी भी तरह प्रभू के दर पर पहुँच नहीं सकता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के गाने-योग्य प्रभू (के गुण) गाता है उसका जीवन सुंदर बन जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।