कोई ऐसो रे भेटै संतु मेरी लाहै सगल चिंत ठाकुर सिउ मेरा रंगु लावै ॥2॥ पड़े रे सगल बेद नह चूकै मन भेद इकु खिनु न धीरहि मेरे घर के पंचा ॥ कोई ऐसो रे भगतु जु माइआ ते रहतु इकु अंम्रित नामु मेरै रिदै सिंचा ॥3॥ जेते रे तीरथ नाए अहंबुधि मैलु लाए घर को ठाकुरु इकु तिलु न मानै ॥ कदि पावउ साधसंगु हरि हरि सदा आनंदु गिआन अंजनि मेरा मनु इसनानै ॥4॥ सगल अस्रम कीने मनूआ नह पतीने बिबेकहीन देही धोए ॥ कोई पाईऐ रे पुरखु बिधाता पारब्रहम कै रंगि राता मेरे मन की दुरमति मलु खोए ॥5॥ करम धरम जुगता निमख न हेतु करता गरबि गरबि पड़ै कही न लेखै ॥ जिसु भेटीऐ सफल मूरति करै सदा कीरति गुर परसादि कोऊ नेत्रहु पेखै ॥6॥ मनहठि जो कमावै तिलु न लेखै पावै बगुल जिउ धिआनु लावै माइआ रे धारी ॥ कोई ऐसो रे सुखह दाई प्रभ की कथा सुनाई तिसु भेटे गति होइ हमारी ॥7॥ सुप्रसंन गोपाल राइ काटै रे बंधन माइ गुर कै सबदि मेरा मनु राता ॥ सदा सदा आनंदु भेटिओ निरभै गोबिंदु सुख नानक लाधे हरि चरन पराता ॥8॥ सफल सफल भई सफल जात्रा ॥ आवण जाण रहे मिले साधा ॥1॥ रहाउ दूजा ॥1॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (अब मेरा जी करता है कि) मुझे कोई ऐसा संत मिल जाए।जो (मेरे अँदर से माया वाली) सारी सोच दूर कर दे।और।परमात्मा के साथ मेरा प्यार बना दे। 2। हे भाई ! सारे वेद पढ़ के देखे हैं।(इनके पढ़ने से परमात्मा से बरकरार) मन की दूरी समाप्त नहीं होती।(वेद आदि को पढ़ने से) ज्ञान-इन्द्रियां एक पल के लिए भी शांत नहीं होती। हे भाई ! कोई ऐसा भगत (मिल जाए) जो (स्वयं) माया से निर्लिप हो (वही भक्त) मेरे हृदय को आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल (अमृत) से सींच सकता है। 3। हे भाई ! जितने भी तीर्थ हैं अगर उन पर स्नान किया जाए।वह स्नान बल्कि मन में अहंकार की मैल चढ़ा देते हैं।(इन तीर्थ-स्नानों से) परमात्मा जरा सा भी प्रसन्न नहीं होता। (मेरी तो तमन्ना ये है कि) कभी मैं भी साध-संगति प्राप्त कर सकूँ।(साध-संगति की बरकति से मन में) सदा आत्मिक आनंद बना रहे।और।मेरा मन ज्ञान के अंजन से (अपने आप को) पवित्र कर ले। 4। हे भाई ! सारे ही आश्रमों के धर्म कमाने से भी मन नहीं पतीजता।विचार-हीन मनुष्य सिर्फ शरीर को ही साफ-सुथरा करते रहते हैं। हे भाई ! (मेरी ये लालसा है कि) परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा हुआ।परमात्मा का रूप कोई महापुरुष मिल जाए।तो वह मेरे मन की बुरी मति की मैल दूर कर दे। 5। हे भाई ! जो मनुष्य (तीर्थ-स्नान आदि मिथे हुए) धार्मिक कर्मों में ही व्यस्त रहता है।जरा से वक्त के लिए भी परमात्मा को प्यार नहीं करता।(वह इन किए कर्मों के आसरे) बार-बार अहंकार में टिका रहता है।(इन किए धार्मिक कर्मों में कोई भी कर्म उसके) किसी के काम नहीं आता। हे भाई ! जिस मनुष्य को वह गुरू मिल जाता है जो सारी मुरादें पूरी करने वाला है और जिसकी कृपा से मनुष्य सदा परमात्मा की सिफत सालाह करता है।उसकी कृपा से कोई भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा को अपनी आँखों से (हर जगह बसता) देख लेता है। 6। हे भाई ! जो मनुष्य मन के हठ से (तप आदि मेहनत) करता है।(परमात्मा उसकी इस मेहनत को) जरा सा भी परवान नहीं करता (क्योंकि) हे भाई ! वह मनुष्य तो बगुले की तरह ही समाधि लगा रहा होता है; अपने मन में वह माया का मोह ही टिकाए रखता है। हे भाई ! अगर कोई ऐसा आत्मिक-आनंद का दाता मिल जाए।जो हमें परमात्मा के सिफत सालाह की बातें सुनाए।तो उसको मिल के हमारी आत्मिक अवस्था ऊँची हो सकती है। 7। हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू-पातशाह दयालु होता है।(गुरू उसके) माया के बँधन काट देता है।हे भाई ! मेरा मन (भी) गुरू के शबद में (ही) मगन रहता है। हे नानक ! (गुरू की कृपा से जिस मनुष्य को) सारे डरों से रहित गोबिंद मिल जाता है।उसके अंदर सदा आनंद बना रहता है।परमात्मा के चरणों में लीन रह के वह मनुष्य सारे सुख प्राप्त कर लेता है। 8। (हे भाई ! गुरू के दर पर पड़ने से) मानस-जीवन वाली यात्रा सफल हो जाती है। गुरू को मिल के जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। 1।रहाउ दूजा। 1। 3।
धनासरी महला 1 छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ तीरथि नावण जाउ तीरथु नामु है ॥ तीरथु सबद बीचारु अंतरि गिआनु है ॥ गुर गिआनु साचा थानु तीरथु दस पुरब सदा दसाहरा ॥ हउ नामु हरि का सदा जाचउ देहु प्रभ धरणीधरा ॥ संसारु रोगी नामु दारू मैलु लागै सच बिना ॥ गुर वाकु निरमलु सदा चानणु नित साचु तीरथु मजना ॥1॥ साचि न लागै मैलु किआ मलु धोईऐ ॥ गुणहि हारु परोइ किस कउ रोईऐ ॥ वीचारि मारै तरै तारै उलटि जोनि न आवए ॥ आपि पारसु परम धिआनी साचु साचे भावए ॥ आनंदु अनदिनु हरखु साचा दूख किलविख परहरे ॥ सचु नामु पाइआ गुरि दिखाइआ मैलु नाही सच मने ॥2॥ संगति मीत मिलापु पूरा नावणो ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 छंत ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। मैं (भी) तीर्थों पर स्नान करने जाता हूँ (पर मेरे वास्ते परमात्मा का) नाम (ही) तीर्थ है। गुरू के शबद को विचार-मण्डल में टिकाना (मेरे लिए) तीर्थ है (क्योंकि इसकी बरकति से) मेरे अंदर परमात्मा के साथ गहरी सांझ बनती है। सतिगुरू का दिया हुआ ये ज्ञान मेरे वास्ते सदा कायम रहने वाला तीर्थ-स्थान है।मेरे लिए दसों पवित्र दिन हैं।मेरे लिए गंगा का जन्म-दिन है। मैं तो सदा प्रभू का नाम ही माँगता हूँ और (अरदास करता हूँ-) हे धरती के आसरे प्रभू ! (मुझे अपना नाम) दे। जगत (विकारों में) रोगी हुआ पड़ा है।परमात्मा का नाम (इन रोगों का) इलाज है।सदा-स्थिर प्रभू के नाम के बिना (मन को विकारों की) मैल लग जाती है। गुरू का पवित्र शबद (मनुष्य को) सदा (आत्मिक) प्रकाश (देता है।यही) नित्य सदा कायम रहने वाला तीर्थ है।यही तीर्थ स्नान है। 1। सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ने से मन को (विकारों की) मैल नहीं लगती।(फिर तीर्थ आदि पर जा के) कोई मैल धोने की आवश्यक्ता नहीं रहती। परमात्मा के गुणों का हार (हृदय में) परो के किसी के आगे पुकार करने की भी जरूरत नहीं रहती। जो मनुष्य गुरू के शबद के विचार द्वारा (अपने मन को विकारों की ओर से) मार लेता है।वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है।(औरों को भी) पार लंघा लेता है।वह दोबारा (के चक्कर) में नहीं आता। वह मनुष्य आप पारस बन जाता है।बड़ी ही ऊँची सुरति का मालिक हैं जाता है।वह सदा-स्थिर प्रभू का रूप बन जाता है।वह सदा-स्थिर प्रभू को प्यारा लगने लग पड़ता है। उसके अंदर हर वक्त आनंद बना रहता है।सदा-स्थिर रहने वाली खुशी पैदा हो जाती है।वह मनुष्य अपने (सारे) दुख-पाप दूर कर लेता है। जिस मनुष्य ने सदा-स्थिर प्रभू का नाम प्राप्त कर लिया।जिसको गुरू ने (प्रभू) दिखा दिया।उसके सदा-स्थिर नाम जपते मन को कभी विकारों की मैल नहीं लगती। 2। साध-संगति में मित्र-प्रभू का मिलाप हो जाना – यही वह तीर्थ-स्नान है जिसमें कोई कमी नहीं रह जाती।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(अब मेरा जी करता है कि) मुझे कोई ऐसा संत मिल जाए।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।