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अंग 686

अंग
686
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जनमु पदारथु दुबिधा खोवै ॥
आपु न चीनसि भ्रमि भ्रमि रोवै ॥6॥
कहतउ पड़तउ सुणतउ एक ॥
धीरज धरमु धरणीधर टेक ॥
जतु सतु संजमु रिदै समाए ॥
चउथे पद कउ जे मनु पतीआए ॥7॥
साचे निरमल मैलु न लागै ॥
गुर कै सबदि भरम भउ भागै ॥
सूरति मूरति आदि अनूपु ॥
नानकु जाचै साचु सरूपु ॥8॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा के बिना किसी और आसरे की तलाश में वह अमूल्य मानस जनम गवा लेता है; जो मनुष्य (बेचारे बगुले की तरह अहंकार की छपड़ी में ही नहाता है।और) अपने आत्मिक जीवन को नहीं पहचानता।वह (अहंकार में) भटक-भटक के दुखी होता है 6। (पर) जो मनुष्य एक परमात्मा की सिफत सालाह ही (नित्य) उचारता है।पढ़ता है और सुनता है और धरती के आसरे प्रभू की टेक पकड़ता है वह गंभीर स्वभाव ग्रहण करता है वह (मनुष्य जीवन के) फर्ज को (पहचानता है)। अगर मनुष्य (गुरू की शरण में रह के) अपने मन को उस आत्मिक अवस्था में पहुँचा ले जहाँ माया के तीनों ही गुण जोर नहीं डाल सकते।तो (सहज ही) जत-सत और संजम उसके हृदय में लीन रहते हैं। 7। सदा-स्थिर प्रभू में टिक के पवित्र हुए मनुष्य के मन को विकारों की मैल नहीं चिपकती। गुरू के शबद की बरकति से उसकी भटकना दूर हो जाती है उसका (दुनियावी) डर-सहम समाप्त हो जाता है। जिसकी प्रभु की (सुंदर) सूरत और जिसका अस्तित्व आदि से ही चला । नानक (भी) उस सदा-स्थिर हस्ती वाले प्रभू (के दर से नाम की दाति) मांगता है जिस जैसा और कोई नहीं है8। 1।
धनासरी महला 1 ॥
सहजि मिलै मिलिआ परवाणु ॥
ना तिसु मरणु न आवणु जाणु ॥
ठाकुर महि दासु दास महि सोइ ॥
जह देखा तह अवरु न कोइ ॥1॥
गुरमुखि भगति सहज घरु पाईऐ ॥
बिनु गुर भेटे मरि आईऐ जाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
सो गुरु करउ जि साचु द्रिड़ावै ॥
अकथु कथावै सबदि मिलावै ॥
हरि के लोग अवर नही कारा ॥
साचउ ठाकुरु साचु पिआरा ॥2॥
तन महि मनूआ मन महि साचा ॥
सो साचा मिलि साचे राचा ॥
सेवकु प्रभ कै लागै पाइ ॥
सतिगुरु पूरा मिलै मिलाइ ॥3॥
आपि दिखावै आपे देखै ॥
हठि न पतीजै ना बहु भेखै ॥
घड़ि भाडे जिनि अंम्रितु पाइआ ॥
प्रेम भगति प्रभि मनु पतीआइआ ॥4॥
पड़ि पड़ि भूलहि चोटा खाहि ॥
बहुतु सिआणप आवहि जाहि ॥
नामु जपै भउ भोजनु खाइ ॥
गुरमुखि सेवक रहे समाइ ॥5॥
पूजि सिला तीरथ बन वासा ॥
भरमत डोलत भए उदासा ॥
मनि मैलै सूचा किउ होइ ॥
साचि मिलै पावै पति सोइ ॥6॥
आचारा वीचारु सरीरि ॥
आदि जुगादि सहजि मनु धीरि ॥
पल पंकज महि कोटि उधारे ॥
करि किरपा गुरु मेलि पिआरे ॥7॥
किसु आगै प्रभ तुधु सालाही ॥
तुधु बिनु दूजा मै को नाही ॥
जिउ तुधु भावै तिउ राखु रजाइ ॥
नानक सहजि भाइ गुण गाइ ॥8॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 ॥ जो मनुष्य गुरू के माध्यम से अडोल अवस्था में टिक के प्रभू-चरनों में जुड़ता है।उसका प्रभू-चरणों में जुड़ना कबूल हो जाता है। उस मनुष्य को ना आत्मिक मौत आती है।ना ही जनम-मरन का चक्कर। ऐसा प्रभू का दास प्रभू में लीन रहता है।प्रभू ऐसे सेवक के अंदर प्रकट हो जाता है। वह सेवक जिधर देखता है उसे परमात्मा के बिना और कोई नहीं दिखता। 1। गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की भक्ति करने से वह (आत्मिक) ठिकाना मिल जाता है जहाँ मन हमेशा अडोल अवस्था में टिका रहता है। (पर) गुरू को मिले बिना (मनुष्य) आत्मिक मौत मर के जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। 1।रहाउ। मैं (भी) वही गुरू धारण करना चाहता हूँ जो सदा-स्थिर प्रभू को (मेरे हृदय में) पक्की तरह टिका दे। जो मुझसे अकॅथ प्रभू की सिफत सालाह करवाए।और अपने शबद के द्वारा मुझे प्रभू चरणों में जोड़ दे। परमात्मा के भक्त को (सिफत सालाह के बिना) कोई और कार नहीं (सूझती)। भगत सदा-स्थिर प्रभू को ही सिमरता है।सदा स्थिर प्रभू उसको प्यारा लगता है। उसका मन शरीर के अंदर ही रहता है (भाव।माया-मोह में ग्रसित हुआ दसों दिशाओं में भागता नहीं फिरता)।उसके मन में सदा-स्थिर प्रभू प्रकट हो जाता है। जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है गुरू उसको प्रभू-चरणों में मिला देता है। वह सेवक प्रभू के चरणों में जुड़ा रहता है। वह सेवक सदा-स्थिर प्रभू को सिमर के और उसमें मिल के उस (की याद) में लीन रहता है। 3। परमात्मा अपने दर्शन आप ही (गुरू के माध्यम से) करवाता है। खुद ही (सब जीवों के) दिल की जानता है (इस वास्ते वह) हठ द्वारा किए कर्मों पर नहीं पतीजता।ना ही बहुत सारे (धार्मिक) भेषों पर प्रसन्न होता है। जिस प्रभू ने (सारे) शरीर बनाए हैं और (गुरू की शरण आए किसी भाग्यशाली के हृदय में) नाम-अमृत डाला है उसी प्रभू ने उसका मन प्रेमा-भक्ती में जोड़ा है। 4। जो मनुष्य (विद्या) पढ़-पढ़ के (विद्या के घमण्ड में से ही सिमरन से) टूट जाते हैं वे (आत्मिक मौत की) चोटें सहते रहते हैं। (विद्या की) बहुती चातुरता के कारण जनम-मरन के चक्कर में पड़ते हैं। जो जो मनुष्य प्रभू का नाम जपते हैं और प्रभू के डर-अदब को अपनी आत्मा की खुराक बनाते हैं। वह सेवक गुरू की शरण पड़ कर प्रभू में लीन रहते हैं। 5। जो मनुष्य पत्थर (की मूर्तियां) पूजता रहा।तीर्थों पर स्नान करता रहा।जंगलों में निवास रखता रहा। त्यागी बन के जगह-जगह भटकता-डोलता फिरा (और इन्हीं कर्मों को धर्म समझता रहा)। अगर उसका मन मैला ही रहा तो वह पवित्र कैसे हो सकता है। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में (सिमरन कर-करके) लीन होता है (वही पवित्र होता है।और) वह (लोक-परलोक में) इज्जत पाता है। 6। जिसके अंदर ऊँचा आचरण भी है और ऊँची (आत्मिक) सूझ भी है, जिसका मन सदा ही अडोल अवस्था में टिका रहता है और गंभीर रहता है जो आँख झपकने जितने समय में करोड़ों लोगों को (विकारों से) बचा लेता है- हे प्यारे प्रभू ! मेहर करके मुझे वह गुरू मिला 7। हे नानक ! प्रभू दर पर यूँ अरदास कर- हे प्रभू ! मैं किस आदमी के सामने आपकी सिफत सालाह करूँ। मुझे तो आपके बिना और कोई नहीं दिखता। जैसे आपकी मेहर हैं मुझे अपनी रजा में रख। ता कि (आपका दास) अडोल आत्मिक अवस्था में टिक के आपके गुण गाए। 8। 2।
धनासरी मः 5 घरु 6 असटपदी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो जो जूनी आइओ तिह तिह उरझाइओ माणस जनमु संजोगि पाइआ ॥
ताकी है ओट साध राखहु दे करि हाथ करि किरपा मेलहु हरि राइआ ॥1॥
अनिक जनम भ्रमि थिति नही पाई ॥
करउ सेवा गुर लागउ चरन गोविंद जी का मारगु देहु जी बताई ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक उपाव करउ माइआ कउ बचिति धरउ मेरी मेरी करत सद ही विहावै ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घरु 6 असटपदी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे गुरू ! जो जो जीव (जिस किसी) जून में आया है।उस उस (जून) में ही (माया के मोह में) फंस रहा है।मानस जनम (किसी ने) किस्मत से प्राप्त किया है। हे गुरू ! मैंने तो आपका आसरा देखा है।अपना हाथ दे के (मुझे माया के मोह से) बचा ले।मेहर करके मुझे प्रभू-पातशाह से मिला दे। 1। हे सतिगुरू ! अनेकों जूनियों में भटक-भटक के (जूनियों से बचने का और कोई) ठिकाना नहीं मिला। अब मैं आपकी शरण में आ पड़ा हुआ हूँ।मैं आपकी ही सेवा करता हूँ।मुझे परमात्मा (के मिलाप) का रास्ता बता दे। 1।रहाउ। हे भाई !मैं (नित्य) माया की खातिर (ही) अनेकों तरह के उपाय करता रहता हूँ।मैं (माया को ही) विशेष तौर पर अपने मन में बसाए रखता हूँ।हमेशा ‘मेरी माया।मेरी माया’ करते हुए ही (मेरी उम्र बीतती) जा रही है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा के बिना किसी और आसरे की तलाश में वह अमूल्य मानस जनम गवा लेता है; जो मनुष्य (बेचारे बगुले की तरह अहंकार की छपड़ी में ही नहाता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।