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अंग 685

अंग
685
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जोबनु धनु प्रभता कै मद मै अहिनिसि रहै दिवाना ॥1॥
दीन दइआल सदा दुख भंजन ता सिउ मनु न लगाना ॥
जन नानक कोटन मै किनहू गुरमुखि होइ पछाना ॥2॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: जवानी।धन। ताकत के नशे में जगत दिन-रात पागल हुआ रहता है। 1। जो परमात्मा दीनों पर दया करने वाला है।जो सारे दुखों का नाश करने वाला है।जगत उससे अपना मन नहीं जोड़ता। हे दास नानक ! (कह) करोड़ों में से किसी विरले (दुर्लभ) मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के साथ सांझ डाली है। 2। 2।
धनासरी महला 9 ॥
तिह जोगी कउ जुगति न जानउ ॥
लोभ मोह माइआ ममता फुनि जिह घटि माहि पछानउ ॥1॥ रहाउ ॥
पर निंदा उसतति नह जा कै कंचन लोह समानो ॥
हरख सोग ते रहै अतीता जोगी ताहि बखानो ॥1॥
चंचल मनु दह दिसि कउ धावत अचल जाहि ठहरानो ॥
कहु नानक इह बिधि को जो नरु मुकति ताहि तुम मानो ॥2॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 9 ॥ हे भाई ! मैं समझता हूँ कि उस जोगी को (सही) जीवन-जाच (अभी) नहीं आई, जिस (जोगी) के हृदय में लोभ माया के मोह और ममता (की लहरें उठ रही) देखता हूँ। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में पराई निंदा नहीं।पराई खुशमद नहीं।जिसको सोना लोहा एक जैसे ही दिखते हैं। जो मनुष्य खुशी गमी से निर्लिप रहता है; उसको ही जोगी कह। 1। हे नानक ! कह, (हे भाई !) ये सदा भटकता रहने वाला मन दसों दिशाओं में दौड़ता फिरता है।जिस मनुष्य ने इसे अडोल करके टिका लिया है। जो मनुष्य इस किस्म का है।समझ लें उसे विकारों से खलासी मिल गई है। 2। 3।
धनासरी महला 9 ॥
अब मै कउनु उपाउ करउ ॥
जिह बिधि मन को संसा चूकै भउ निधि पारि परउ ॥1॥ रहाउ ॥
जनमु पाइ कछु भलो न कीनो ता ते अधिक डरउ ॥
मन बच क्रम हरि गुन नही गाए यह जीअ सोच धरउ ॥1॥
गुरमति सुनि कछु गिआनु न उपजिओ पसु जिउ उदरु भरउ ॥
कहु नानक प्रभ बिरदु पछानउ तब हउ पतित तरउ ॥2॥4॥9॥9॥13॥58॥4॥93॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 9 ॥ हे भाई ! अब मैं कौन सा यतन करूँ (जिससे मेरे) मन का सहम खत्म हो जाए।और मैं संसार-समुंद्र से पार लांघ जाऊँ। 1।रहाउ। हे भाई ! मानस जन्म प्राप्त करके मैंने कोई भलाई नहीं की।इसलिए मैं बहुत डरता रहता हूँ। मैं (अपने) अंदर (हर वक्त) यही चिंता करता रहता हूँ कि मैंने अपने मन से अपने वचन से।कर्म से (कभी भी) परमात्मा के गुण नहीं गाए। 1। हे भाई ! गुरू की मति सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन की कुछ भी सूझ पैदा नहीं हुई।मैं पशू की तरह (रोज) अपना पेट भर लेता हूँ। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! मैं विकारी तब ही (संसार-समुंद्र से) पार लांघ सकता हूँ अगर आप अपना मूल कदीमों वाला प्यार वाला स्वभाव याद रखे। 2। 4। 9। 9। 13। 58। 4। 93।
धनासरी महला 1 घरु 2 असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु सागरु रतनी भरपूरे ॥
अंम्रितु संत चुगहि नही दूरे ॥
हरि रसु चोग चुगहि प्रभ भावै ॥
सरवर महि हंसु प्रानपति पावै ॥1॥
किआ बगु बपुड़ा छपड़ी नाइ ॥
कीचड़ि डूबै मैलु न जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
रखि रखि चरन धरे वीचारी ॥
दुबिधा छोडि भए निरंकारी ॥
मुकति पदारथु हरि रस चाखे ॥
आवण जाण रहे गुरि राखे ॥2॥
सरवर हंसा छोडि न जाइ ॥
प्रेम भगति करि सहजि समाइ ॥
सरवर महि हंसु हंस महि सागरु ॥
अकथ कथा गुर बचनी आदरु ॥3॥
सुंन मंडल इकु जोगी बैसे ॥
नारि न पुरखु कहहु कोऊ कैसे ॥
त्रिभवण जोति रहे लिव लाई ॥
सुरि नर नाथ सचे सरणाई ॥4॥
आनंद मूलु अनाथ अधारी ॥
गुरमुखि भगति सहजि बीचारी ॥
भगति वछल भै काटणहारे ॥
हउमै मारि मिले पगु धारे ॥5॥
अनिक जतन करि कालु संताए ॥
मरणु लिखाइ मंडल महि आए ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 1 घरु 2 असटपदीआ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। गुरू (मानो) एक समुन्द्र (है जो प्रभू की सिफत सालाह से) नाको नाक भरा हुआ है। गुरमुख सिख (उस सागर में से) आत्मिक जीवन देने वाली खुराक (प्राप्त करते हैं जैसे हंस मोती) चुगते हैं।(और गुरू से) दूर नहीं रहते। प्रभू की मेहर के अनुसार संत-हंस हरी-नाम रस (की) चोग चुगते हैं। (गुरसिख) हंस (गुरू-) सरोवर में (टिका रहता है।और) जिंद के मालिक प्रभू को पा लेता है। 1। बिचारा बगुला छपड़ी में क्यों नहाता है। (कुछ नहीं मिलता।बल्कि छपड़ी में नहा के) कीचड़ में डूबता है।(उसकी ये) मैल दूर नहीं होती (जो मनुष्य गुरू समुन्द्र को छोड़ के देवी-देवताओं आदि अन्य के आसरे तलाशता है वह।मानो।छपड़ी में ही नहा रहा है।वहाँ से वह और भी ज्यादा माया-मोह की मैल चिपका लेता है)। 1।रहाउ। गुरसिख बड़ा सचेत हो के पूरा विचारवान हो के (जीवन-यात्रा में) पैर रखता है। परमात्मा के बिना किसी और आसरे की तलाश छोड़ के परमात्मा का ही बन जाता है। परमात्मा के नाम का रस चख के गुरसिख वह पदार्थ हासिल कर लेता है जो माया के मोह से खलासी दिलवा देता है। जिसकी गुरू ने सहायता कर दी उसके जन्म-मरण के चक्कर समाप्त हो गए। 2। (जैसे) हंस मानसरोवर को छोड़ के नहीं जाता (वैसे ही जो सिख गुरू का दर छोड़ के नहीं जाता वह) प्रेमा भक्ति की बरकति से अडोल आत्मिक अवस्था में लीन हो जाता है। जो गुरसिख-हंस गुरू-सरोवर में टिकता है।उसके अंदर गुरू-सरोवर अपना आप प्रगट करता है (उस सिख के अंदर गुरू बस जाता है) – यह कथा अकथ है (भाव। इस आत्मिक अवस्था का बयान नहीं किया जा सकता।सिर्फ ये कह सकते हैं कि) गुरू के बचनों पर चल के वह (लोक-परलोक में) आदर पाता है। 3। जे कोई विरला प्रभू चरणों में जुड़ा हुआ सख्श शून्य अवस्था में टिकता है। उसके अंदर स्त्री-मर्द वाला भेद नहीं रह जाता (भाव।उसके काम चेष्टा अपना प्रभाव नहीं डालती)।बताओ।कोई ये संकल्प कर भी कैसे सकता है। क्योंकि वह तो सदा उस परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है जिसकी ज्योति तीनों भवनों में व्यापक है और देवते मनुष्य नाथ आदि सभी जिस सदा-स्थिर की शरण लिए रखते हैं। 4। (गुरमुख-हंस गुरू-सागर में टिक के उस प्राणपति-प्रभू को मिलता है) जो आत्मिक आनंद का श्रोत है जो निआसरों का आसरा है। गुरमुख उसकी भक्ति के द्वारा और उसके गुणों के विचार के माध्यम से अडोल आत्मिक अवस्था में टिके रहते हैं। वह प्रभू (अपने सेवकों की) भक्ति से प्रेम करता है।उनके सारे डर दूर करने के समर्थ है। गुरमुखि अहंकार को मार के और (साध-संगति में) टिक के उस आनंद-मूल प्रभू (के चरनों) में जुड़ते हैं। 5। अनेकों अन्य ही जतन करने के कारण (सहेड़ी हुई) आत्मिक मौत (का लेख ही अपने माथे पर) लिखा के इस जगत में आया (और यहाँ भी आत्मिक मौत ही गले पड़वाता रहा)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।