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अंग 684

अंग
684
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
चरन कमल जा का मनु रापै ॥
सोग अगनि तिसु जन न बिआपै ॥2॥
सागरु तरिआ साधू संगे ॥
निरभउ नामु जपहु हरि रंगे ॥3॥
पर धन दोख किछु पाप न फेड़े ॥
जम जंदारु न आवै नेड़े ॥4॥
त्रिसना अगनि प्रभि आपि बुझाई ॥
नानक उधरे प्रभ सरणाई ॥5॥1॥55॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य का मन परमात्मा के सोहणें चरणों (के प्रेम-रंग में) रंगा जाता है। उस मनुष्य पर चिंता की आग जोर नहीं डाल सकती। 2। गुरू की संगति में (नाम जपने की बरकति से) संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। हे भाई ! प्रेम सं निर्भय प्रभू का नाम जपा करो।3। हे भाई ! (सिमरन के सदका) पराए धन (आदि) के कोई ऐब आदि दुष्कर्म नहीं होते। भयानक यम भी नजदीक नहीं फटकता (मौत का डर नहीं व्याप्ता।आत्मिक मौत नजदीक नहीं आती)। 4। हे भाई ! (जो मनुष्य प्रभू के गुण गाते हैं) उनकी तृष्णा की आग प्रभू ने खुद बुझा दी है। हे नानक ! प्रभू की शरण पड़ कर (अनेकों जीव तृष्णा की आग में से) बच निकलते हैं। 5। 1। 55।
धनासरी महला 5 ॥
त्रिपति भई सचु भोजनु खाइआ ॥
मनि तनि रसना नामु धिआइआ ॥1॥
जीवना हरि जीवना ॥
जीवनु हरि जपि साधसंगि ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक प्रकारी बसत्र ओढाए ॥
अनदिनु कीरतनु हरि गुन गाए ॥2॥
हसती रथ असु असवारी ॥
हरि का मारगु रिदै निहारी ॥3॥
मन तन अंतरि चरन धिआइआ ॥
हरि सुख निधान नानक दासि पाइआ ॥4॥2॥56॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! उसको (माया की तृष्णा की ओर से) शांति आ जाती है -जिस मनुष्य ने सदा-स्थिर हरी नाम (की) खुराक खानी शुरू कर दी और अपने मन में।हृदय में।जीभ से परमात्मा का नाम सिमरना शुरू कर दिया। 1। हे भाई ! यही है असल जीवन।यही है असल जिंदगी – साध-संगति में (बैठ के) परमात्मा का नाम जपा करो1।रहाउ। उसने (मानो) कई किस्मों के (रंग-बिरंगे) कपड़े पहन लिए हैं (और वह इन सुंदर पोशाकों का आनंद ले रहा है) जो मनुष्य हर वक्त परमात्मा की सिफत सालाह करता है।प्रभू के गुण गाता है। 2। वह (जैसे) हाथी।रथों।घोड़ों की सवारी (के सुख मजे ले रहा है)। हे भाई ! जो मनुष्य अपने हृदय में परमात्मा के मिलाप का राह ताकता रहता है। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य ने अपने मन में हृदय में परमात्मा के चरणों का ध्यान धरना शुरू कर दिया है। उस दास ने सुखों के खजाने प्रभू को पा लिया है। 4। 2। 56।
धनासरी महला 5 ॥
गुर के चरन जीअ का निसतारा ॥
समुंदु सागरु जिनि खिन महि तारा ॥1॥ रहाउ ॥
कोई होआ क्रम रतु कोई तीरथ नाइआ ॥
दासंी हरि का नामु धिआइआ ॥1॥
बंधन काटनहारु सुआमी ॥
जन नानकु सिमरै अंतरजामी ॥2॥3॥57॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! जिस (गुरू) ने (शरण आए मनुष्य को सदा) एक छिन में संसार समुंद्र से पार लंघा दिया; उस गुरू के चरणों का ध्यान जिंद के वास्ते संसार-समुंद्र से पार लंघाने के लिए वसीला हैं। 1।रहाउ। हे भाई1 कोई मनुष्य धार्मिक रस्मों का प्रेमी बन जाता है; कोई मनुष्य तीर्थों पर स्नान करता फिरता है। परमात्मा के दासों ने (सदा) परमात्मा का नाम ही सिमरा है। 1। हे भाई !जो सबका मालिक है।जो (जीवों के माया के) बंधन काटने की समर्था रखता है। दास नानक (भी उस परमात्मा का नाम) सिमरता है जो सबके दिल की जानने वाला है। 2। 3। 57।
धनासरी महला 5 ॥
कितै प्रकारि न तूटउ प्रीति ॥ दास तेरे की निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ प्रान मन धन ते पिआरा ॥
हउमै बंधु हरि देवणहारा ॥1॥
चरन कमल सिउ लागउ नेहु ॥
नानक की बेनंती एह ॥2॥4॥58॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ ता कि किसी भी तरह से (उनकी आपके से) प्रीति टूट ना जाए – हे प्रभू ! आपके दासों का रहन-सहन पवित्र रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के दासों को अपनी जिंद से।प्राणों से।मन से।धन से प्यारा है जो अहंकार के रास्ते में बाँध लगाने की समर्था रखता है। 1। हे भाई !उसके सुंदर चरणों के साथ (नानक का) प्यार बना रहे। नानक की (भी परमात्मा के दर पर सदा) यही अरदास है 2। 4। 58।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धनासरी महला 9 ॥
काहे रे बन खोजन जाई ॥
सरब निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई ॥1॥ रहाउ ॥
पुहप मधि जिउ बासु बसतु है मुकर माहि जैसे छाई ॥
तैसे ही हरि बसे निरंतरि घट ही खोजहु भाई ॥1॥
बाहरि भीतरि एको जानहु इहु गुर गिआनु बताई ॥
जन नानक बिनु आपा चीनै मिटै न भ्रम की काई ॥2॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। धनासरी महला 9 ॥ हे भाई ! (परमात्मा को) ढूँढने के लिए जंगलों में क्यों जाता है। परमात्मा सबमें बसने वाला है।(फिर भी) सदा (माया के प्रभाव से) निर्लिप रहता है।वह परमात्मा आपके साथ बसता है। 1।रहाउ। हे भाई ! जैसे फूल में सुगंधि बसती है।जैसे शीशे में (शीशा देखने वाले का) अक्स बसता है। वैसे ही परमात्मा एक-रस सबके अंदर बसता है।(इस वास्ते उसको) अपने हृदय में ही तलाश। 1। हे भाई ! गुरू का (आत्मिक जीवन का) उपदेश ये बताता है कि (अपने शरीर के) अंदर (और अपने शरीर से) बाहर (हर जगह) एक परमात्मा को (बसता) समझो। हे दास नानक ! अपना आत्मिक जीवन परखे बिना (मन पर पड़ा हुआ) भटकना का जाला दूर नहीं हो सकता (और।तब तक सर्व-व्यापक परमात्मा की सूझ नहीं आ सकती)। 2। 1।
धनासरी महला 9 ॥
साधो इहु जगु भरम भुलाना ॥
राम नाम का सिमरनु छोडिआ माइआ हाथि बिकाना ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता भाई सुत बनिता ता कै रसि लपटाना ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 9 ॥ हे संत जनो ! ये जगत (माया की) भटकना में (पड़ कर) गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। प्रभू के नाम का सिमरन छोड़े रहता है।और।माया के हाथ में बिका रहता है (माया के बदले आत्मिक जीवन गवा देता है)। 1।रहाउ। हे संत जनो ! माता।पिता।भाई।पुत्र।स्त्री- (भूला हुआ जगत) इनके मोह में फसा रहता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस मनुष्य का मन परमात्मा के सोहणें चरणों (के प्रेम-रंग में) रंगा जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।