सोग अगनि तिसु जन न बिआपै ॥2॥
सागरु तरिआ साधू संगे ॥
निरभउ नामु जपहु हरि रंगे ॥3॥
पर धन दोख किछु पाप न फेड़े ॥
जम जंदारु न आवै नेड़े ॥4॥
त्रिसना अगनि प्रभि आपि बुझाई ॥
नानक उधरे प्रभ सरणाई ॥5॥1॥55॥
त्रिपति भई सचु भोजनु खाइआ ॥
मनि तनि रसना नामु धिआइआ ॥1॥
जीवना हरि जीवना ॥
जीवनु हरि जपि साधसंगि ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक प्रकारी बसत्र ओढाए ॥
अनदिनु कीरतनु हरि गुन गाए ॥2॥
हसती रथ असु असवारी ॥
हरि का मारगु रिदै निहारी ॥3॥
मन तन अंतरि चरन धिआइआ ॥
हरि सुख निधान नानक दासि पाइआ ॥4॥2॥56॥
गुर के चरन जीअ का निसतारा ॥
समुंदु सागरु जिनि खिन महि तारा ॥1॥ रहाउ ॥
कोई होआ क्रम रतु कोई तीरथ नाइआ ॥
दासंी हरि का नामु धिआइआ ॥1॥
बंधन काटनहारु सुआमी ॥
जन नानकु सिमरै अंतरजामी ॥2॥3॥57॥
कितै प्रकारि न तूटउ प्रीति ॥ दास तेरे की निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ प्रान मन धन ते पिआरा ॥
हउमै बंधु हरि देवणहारा ॥1॥
चरन कमल सिउ लागउ नेहु ॥
नानक की बेनंती एह ॥2॥4॥58॥
धनासरी महला 9 ॥
काहे रे बन खोजन जाई ॥
सरब निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई ॥1॥ रहाउ ॥
पुहप मधि जिउ बासु बसतु है मुकर माहि जैसे छाई ॥
तैसे ही हरि बसे निरंतरि घट ही खोजहु भाई ॥1॥
बाहरि भीतरि एको जानहु इहु गुर गिआनु बताई ॥
जन नानक बिनु आपा चीनै मिटै न भ्रम की काई ॥2॥1॥
साधो इहु जगु भरम भुलाना ॥
राम नाम का सिमरनु छोडिआ माइआ हाथि बिकाना ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता भाई सुत बनिता ता कै रसि लपटाना ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस मनुष्य का मन परमात्मा के सोहणें चरणों (के प्रेम-रंग में) रंगा जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।