अपणा नामु देहि जपि जीवा पूरन होइ दास की घाल ॥1॥
सरब मनोरथ राज सूख रस सद खुसीआ कीरतनु जपि नाम ॥
जिस कै करमि लिखिआ धुरि करतै नानक जन के पूरन काम ॥2॥20॥51॥
जन की कीनी पारब्रहमि सार ॥
निंदक टिकनु न पावनि मूले ऊडि गए बेकार ॥1॥ रहाउ ॥
जह जह देखउ तह तह सुआमी कोइ न पहुचनहार ॥
जो जो करै अवगिआ जन की होइ गइआ तत छार ॥1॥
करनहारु रखवाला होआ जा का अंतु न पारावार ॥
नानक दास रखे प्रभि अपुनै निंदक काढे मारि ॥2॥21॥52॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि चरन सरन गोबिंद दुख भंजना दास अपुने कउ नामु देवहु ॥
द्रिसटि प्रभ धारहु क्रिपा करि तारहु भुजा गहि कूप ते काढि लेवहु ॥ रहाउ ॥
काम क्रोध करि अंध माइआ के बंध अनिक दोखा तनि छादि पूरे ॥
प्रभ बिना आन न राखनहारा नामु सिमरावहु सरनि सूरे ॥1॥
पतित उधारणा जीअ जंत तारणा बेद उचार नही अंतु पाइओ ॥
गुणह सुख सागरा ब्रहम रतनागरा भगति वछलु नानक गाइओ ॥2॥1॥53॥
हलति सुखु पलति सुखु नित सुखु सिमरनो नामु गोबिंद का सदा लीजै ॥
मिटहि कमाणे पाप चिराणे साधसंगति मिलि मुआ जीजै ॥1॥ रहाउ ॥
राज जोबन बिसरंत हरि माइआ महा दुखु एहु महांत कहै ॥
आस पिआस रमण हरि कीरतन एहु पदारथु भागवंतु लहै ॥1॥
सरणि समरथ अकथ अगोचरा पतित उधारण नामु तेरा ॥
अंतरजामी नानक के सुआमी सरबत पूरन ठाकुरु मेरा ॥2॥2॥54॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बंदना हरि बंदना गुण गावहु गोपाल राइ ॥ रहाउ ॥
वडै भागि भेटे गुरदेवा ॥
कोटि पराध मिटे हरि सेवा ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दीनों पर दया करने वाले मेरे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप कृपा करता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।