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अंग 683

अंग
683
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
महा कलोल बुझहि माइआ के करि किरपा मेरे दीन दइआल ॥
अपणा नामु देहि जपि जीवा पूरन होइ दास की घाल ॥1॥
सरब मनोरथ राज सूख रस सद खुसीआ कीरतनु जपि नाम ॥
जिस कै करमि लिखिआ धुरि करतै नानक जन के पूरन काम ॥2॥20॥51॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे दीनों पर दया करने वाले मेरे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप कृपा करता है।माया के रंग-तमाशे उस पर प्रभाव नहीं डाल सकते। हे प्रभू ! (मुझे भी) अपना नाम बख्श।आपका नाम जप के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त कर सकूँ।आपके (इस) दास की मेहनत सफल हैं जाए। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम जप के।परमात्मा की सिफत सालाह करके सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं (मानो) राज के सुख और रस मिल जाते हैं।सदा आनंद बना रहता है। (पर) हे नानक ! करतार ने जिस मनुष्य की किस्मत में धुर दरगाह से (ये नाम की दाति) लिख दी।उसी मनुष्य के सारे कार्य सफल होते हैं। 2। 20। 51।
धनासरी मः 5 ॥
जन की कीनी पारब्रहमि सार ॥
निंदक टिकनु न पावनि मूले ऊडि गए बेकार ॥1॥ रहाउ ॥
जह जह देखउ तह तह सुआमी कोइ न पहुचनहार ॥
जो जो करै अवगिआ जन की होइ गइआ तत छार ॥1॥
करनहारु रखवाला होआ जा का अंतु न पारावार ॥
नानक दास रखे प्रभि अपुनै निंदक काढे मारि ॥2॥21॥52॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी म: 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा ने (सदा ही) अपने सेवकों की संभाल की है। (उनकी) निंदा करने वाले उनके मुकाबले में बिल्कुल ही अड़ नहीं सकते।(जैसे हवा के आगे बादल उड़ जाते हैं वैसे ही निंदक सेवकों के मुकाबले में हमेशा) नकारे हो के उड़ गए। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा की कोई भी बराबरी नहीं कर सकता।मैं जहाँ जहाँ देखता हूँ वहाँ ही वह मालिक प्रभू बसता है। उसके सेवक की जो भी निरादरी करता है।(वह आत्मिक जीवन में) तुरंत राख हो जाता है। 1। हे भाई ! जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।जिसकी हस्ती का परला-उरला छोर नहीं पाया जा सकता।वह सबको पैदा करने वाला परमात्मा (अपने सेवकों का सदा) रखवाला रहता है। हे नानक ! प्रभू ने अपने सेवकों की सदा रखवाली की है।और उनकी निंदा करने वालों को आत्मिक मौत मार के (अपने दर से) निकाल बाहर करता है। 2। 21। 52।
धनासरी महला 5 घरु 9 पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि चरन सरन गोबिंद दुख भंजना दास अपुने कउ नामु देवहु ॥
द्रिसटि प्रभ धारहु क्रिपा करि तारहु भुजा गहि कूप ते काढि लेवहु ॥ रहाउ ॥
काम क्रोध करि अंध माइआ के बंध अनिक दोखा तनि छादि पूरे ॥
प्रभ बिना आन न राखनहारा नामु सिमरावहु सरनि सूरे ॥1॥
पतित उधारणा जीअ जंत तारणा बेद उचार नही अंतु पाइओ ॥
गुणह सुख सागरा ब्रहम रतनागरा भगति वछलु नानक गाइओ ॥2॥1॥53॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घरु 9 पड़ताल ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे हरी ! हे गोबिंद ! हे दुखों का नाश करने वाले ! हम आपके चरणों की शरण में आये है, अपने दास को अपना नाम बख्श। हे प्रभू ! (अपने दास पर) मेहर की निगाह कर।कृपा करके (दास को संसार समुंद्र से) पार लंघा ले।(दास की) बाँह पकड़ के (दास को मोह के) कूएं में से निकाल ले।रहाउ। हे प्रभू ! काम-क्रोध (आदि विकारों) के कारण (जीव) अंधे हुए पड़े हैं।माया के बँधनों में फसे पड़े हैं।अनेकों विकार (इनके) शरीर में पूरी तरह से प्रभाव डाले बैठे हैं। हे प्रभू ! आपके बिना कोई और (जीवों की विकारों से) रक्षा करने के लायक नहीं।हे शरण आए की लाज रख सकने वाले ! अपना नाम जपा !। 1। हे विकारियों को बचाने वाले ! हे सारे जीवों को पार लंघाने वाले ! वेदों को पढ़ने वाले भी आपके गुणों का अंत नहीं पा सके। हे नानक ! (कह) हे गुणों के समुंद्र ! हे रत्नों की खान पारब्रहम ! मैं आपको भक्ति से प्यार करने वाला जान के आपकी सिफत सालाह कर रहा हूँ। 2। 1। 53।
धनासरी महला 5 ॥
हलति सुखु पलति सुखु नित सुखु सिमरनो नामु गोबिंद का सदा लीजै ॥
मिटहि कमाणे पाप चिराणे साधसंगति मिलि मुआ जीजै ॥1॥ रहाउ ॥
राज जोबन बिसरंत हरि माइआ महा दुखु एहु महांत कहै ॥
आस पिआस रमण हरि कीरतन एहु पदारथु भागवंतु लहै ॥1॥
सरणि समरथ अकथ अगोचरा पतित उधारण नामु तेरा ॥
अंतरजामी नानक के सुआमी सरबत पूरन ठाकुरु मेरा ॥2॥2॥54॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सदा सिमरना चाहिए।सिमरन इस लोक में और परलोक में सदा ही सुख देने वाला है (सिमरन की बरकति से) चिरों के किए हुए पाप मिट जाते हैं। हे भाई ! साध-संगति में मिल के (सिमरन करने से) आत्मिक मौत मरा हुआ मनुष्य दोबारा आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। 1।रहाउ। हे भाई ! राज और जवानी (के हुल्लारे) परमात्मा का नाम भुला देते हैं।माया का मोह बड़े दुखों (का मूल) है – ये बात महापुरुख बताते हैं। परमात्मा के नाम के सिमरन।परमात्मा की सिफत सालाह की आस व तमन्ना – ये कीमती चीज कोई दुर्लभ भाग्यशाली मनुष्य प्राप्त करता है। 1। हे शरण आए की सहायता करने के लायक ! हे अकॅथ !।हे अगोचर !। आपका नाम विकारियों को विकारों से बचा लेने वाला है। हे अंतरजामी ! हे नानक के मालिक !हे भाई ! मेरा मालिक प्रभू सब जगह व्यापक है। 2। 2। 58।
धनासरी महला 5 घरु 12
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बंदना हरि बंदना गुण गावहु गोपाल राइ ॥ रहाउ ॥
वडै भागि भेटे गुरदेवा ॥
कोटि पराध मिटे हरि सेवा ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घरु 12 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! परमात्मा को हमेशा नमस्कार किया करो।प्रभू पातशाह के गुण गाते रहो।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य को खुश-किस्मती से गुरू मिल जाता है। (गुरू के द्वारा) परमात्मा की सेवा-भक्ति करने से उसके करोड़ों पाप मिट जाते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दीनों पर दया करने वाले मेरे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप कृपा करता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।