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अंग 682

अंग
682
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धनासरी महला 5 ॥
अउखी घड़ी न देखण देई अपना बिरदु समाले ॥
हाथ देइ राखै अपने कउ सासि सासि प्रतिपाले ॥1॥
प्रभ सिउ लागि रहिओ मेरा चीतु ॥
आदि अंति प्रभु सदा सहाई धंनु हमारा मीतु ॥ रहाउ ॥
मनि बिलास भए साहिब के अचरज देखि बडाई ॥
हरि सिमरि सिमरि आनद करि नानक प्रभि पूरन पैज रखाई ॥2॥15॥46॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (वह प्रभू अपने सेवक को) कोई दुख देने वाला समय नहीं देता।वह अपना प्यार वाला बिरद स्वभाव सदा याद रखता है। प्रभू अपना हाथ दे के अपने सेवक की रक्षा करता है।(सेवक को उसके) हरेक सांस के साथ पालता रहता है। 1। हे भाई ! मेरा मन (भी) उस प्रभू से जुड़ा रहता है। जो आरम्भ से आखिर तक सदा ही मददगार बना रहता है।हमारा वह मित्र प्रभू धन्य है (उसकी सदा तारीफ करनी चाहिए)।रहाउ। हे भाई ! मालिक प्रभू के हैरान करने वाले करिश्मे देख के।उसका बड़प्पन देख के (सेवक के) मन में (भी) खुशियां बनी रहती हैं। हे नानक ! आप भी परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के आत्मिक आनंद ले।(जिस भी मनुष्य ने सिमरन किया) प्रभू ने पूरे तौर पर उसकी इज्जत रख ली। 2। 15। 46।
धनासरी महला 5 ॥
जिस कउ बिसरै प्रानपति दाता सोई गनहु अभागा ॥
चरन कमल जा का मनु रागिओ अमिअ सरोवर पागा ॥1॥
तेरा जनु राम नाम रंगि जागा ॥
आलसु छीजि गइआ सभु तन ते प्रीतम सिउ मनु लागा ॥ रहाउ ॥
जह जह पेखउ तह नाराइण सगल घटा महि तागा ॥
नाम उदकु पीवत जन नानक तिआगे सभि अनुरागा ॥2॥16॥47॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! उस मनुष्य को बद्-किस्मत समझो।जिसको जिंद का मालिक प्रभू बिसर जाता है। जिस मनुष्य का मन परमात्मा के कोमल चरनों का प्रेमी हो जाता है।वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल का सरोवर ढूँढ लेता है। 1। हे प्रभू ! आपका सेवक आपके नाम रंग में टिक के (माया के मोह से सदा) सचेत रहता है। उसके शरीर में से सारा आलस समाप्त हो जाता है।उसका मन।(हे भाई !) प्रीतम प्रभू से जुड़ा रहता है।रहाउ। हे भाई ! (उसके सिमरन की बरकति से) मैं (भी) जिधर-जिधर देखता हूँ।वहाँ वहाँ परमात्मा ही सारे शरीरों में मौजूद दिखता है जैसे धागा (सारे मणकों में परोया होता है)। हे नानक ! प्रभू के दास उस का नाम-जल पीते ही और सारे मोह-प्यार छोड़ देते हैं। 2। 19। 47।
धनासरी महला 5 ॥
जन के पूरन होए काम ॥
कली काल महा बिखिआ महि लजा राखी राम ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपुना निकटि न आवै जाम ॥
मुकति बैकुंठ साध की संगति जन पाइओ हरि का धाम ॥1॥
चरन कमल हरि जन की थाती कोटि सूख बिस्राम ॥
गोबिंदु दमोदर सिमरउ दिन रैनि नानक सद कुरबान ॥2॥17॥48॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के सेवक के सारे काम सफल हो जाते हैं। इस झमेलों भरे संसार में।इस बड़ी (मोहनी) माया में।परमात्मा (अपने सेवकों की) इज्जत रख लेता है। 1।रहाउ। हे भाई ! अपने मालिक प्रभू का नाम बार-बार सिमर के (सेवकों के) नजदीक आत्मिक मौत नहीं फटकती। सेवक गुरू की संगति प्राप्त कर लेते हैं जो परमात्मा का घर है।(ये साध-संगति ही उनके वास्ते) विष्णु की पुरी है।विकारों से खलासी (पाने की जगह) है। 1। हे भाई ! प्रभू के सेवकों के लिए प्रभू के चरन ही आसरा हैं।करोड़ों सुखों का ठिकाना हैं। हे नानक ! (कह, हे भाई !) मैं (भी) उस गोबिंद को दामोदर को दिन-रात सिमरता रहता हूँ।और उससे सदके जाता हूँ। 2। 17। 48।
धनासरी महला 5 ॥
मांगउ राम ते इकु दानु ॥
सगल मनोरथ पूरन होवहि सिमरउ तुमरा नामु ॥1॥ रहाउ ॥
चरन तुम॑ारे हिरदै वासहि संतन का संगु पावउ ॥
सोग अगनि महि मनु न विआपै आठ पहर गुण गावउ ॥1॥
स्वसति बिवसथा हरि की सेवा मध्यंत प्रभ जापण ॥
नानक रंगु लगा परमेसर बाहुड़ि जनम न छापण ॥2॥18॥49॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! मैं परमात्मा से एक ख़ैर माँगता हूँ (परमात्मा के आगे मैं विनती करता हूँ-) हे प्रभू ! मैं आपका नाम (सदा) सिमरता रहूँ। (आपके सिमरन की बरकति से) सारी मुरादें पूरी हैं जाती हैं। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपके चरण मेरे हृदय में बसते रहें।मैं आपके संत जनों की संगति हासिल कर लूँ। मैं आठों पहर आपके गुण गाता रहूँ।(आपकी सिफत सालाह की बरकति से) मन चिंता की आग में नहीं फसता। 1। हे नानक ! हमेशा प्रभू का नाम जपने से।हरी की सेवा भक्ति करने से (मन में) शांति की हालत बनी रहती है। जिस मनुष्य (के मन में) परमात्मा का प्यार बन जाए वह बार-बार जनम-मरन (के चक्कर) में नहीं आता। 2। 18। 49।
धनासरी महला 5 ॥
मांगउ राम ते सभि थोक ॥
मानुख कउ जाचत स्रमु पाईऐ प्रभ कै सिमरनि मोख ॥1॥ रहाउ ॥
घोखे मुनि जन सिंम्रिति पुरानां बेद पुकारहि घोख ॥
क्रिपा सिंधु सेवि सचु पाईऐ दोवै सुहेले लोक ॥1॥
आन अचार बिउहार है जेते बिनु हरि सिमरन फोक ॥
नानक जनम मरण भै काटे मिलि साधू बिनसे सोक ॥2॥19॥50॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! मैं (तो) सारे पदार्थ परमात्मा से (ही) माँगता हूँ। मनुष्यों से माँगते हुए निरी परेशानी ही हासिल होती है।(दूसरी तरफ) परमात्मा के सिमरन के द्वारा (पदार्थ भी मिलते हैं और) माया के मोह से खलासी (भी) प्राप्त हो जाती है। 1।रहाउ। हे भाई ! ऋ़षियों ने स्मृतियों-पुराणों को ध्यान से विचार के देखे।वेदों को (भी) विचार के ऊँची आवाज में पढ़ते हैं। (पर) कृपा के समुंद्र परमात्मा की शरण पड़ कर ही उसका सदा-स्थिर नाम प्राप्त होता है (जिसकी बरकति से) लोक-परलोक दोनों ही सुखद हो जाते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा के सिमरन के बिना जितने और भी धार्मिक रिवाज और व्यवहार हैं सारे व्यर्थ हैं। हे नानक ! गुरू को मिल के जनम-मरण के सारे डर काटे जाते हैं।और सारी चिंता-फिक्र नाश हो जाते हैं। 2। 19। 50।
धनासरी महला 5 ॥
त्रिसना बुझै हरि कै नामि ॥
महा संतोखु होवै गुर बचनी प्रभ सिउ लागै पूरन धिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम में जुड़ने से (माया के मोह की) प्यास समाप्त हो जाती है। गुरू की बाणी का आसरा लेने से (मन में) बड़ा संतोष पैदा हो जाता है।और।परमात्मा के चरणों में पूरे तौर पर सुरति जुड़ जाती है। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (वह प्रभू अपने सेवक को) कोई दुख देने वाला समय नहीं देता।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।