अउखी घड़ी न देखण देई अपना बिरदु समाले ॥
हाथ देइ राखै अपने कउ सासि सासि प्रतिपाले ॥1॥
प्रभ सिउ लागि रहिओ मेरा चीतु ॥
आदि अंति प्रभु सदा सहाई धंनु हमारा मीतु ॥ रहाउ ॥
मनि बिलास भए साहिब के अचरज देखि बडाई ॥
हरि सिमरि सिमरि आनद करि नानक प्रभि पूरन पैज रखाई ॥2॥15॥46॥
जिस कउ बिसरै प्रानपति दाता सोई गनहु अभागा ॥
चरन कमल जा का मनु रागिओ अमिअ सरोवर पागा ॥1॥
तेरा जनु राम नाम रंगि जागा ॥
आलसु छीजि गइआ सभु तन ते प्रीतम सिउ मनु लागा ॥ रहाउ ॥
जह जह पेखउ तह नाराइण सगल घटा महि तागा ॥
नाम उदकु पीवत जन नानक तिआगे सभि अनुरागा ॥2॥16॥47॥
जन के पूरन होए काम ॥
कली काल महा बिखिआ महि लजा राखी राम ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपुना निकटि न आवै जाम ॥
मुकति बैकुंठ साध की संगति जन पाइओ हरि का धाम ॥1॥
चरन कमल हरि जन की थाती कोटि सूख बिस्राम ॥
गोबिंदु दमोदर सिमरउ दिन रैनि नानक सद कुरबान ॥2॥17॥48॥
मांगउ राम ते इकु दानु ॥
सगल मनोरथ पूरन होवहि सिमरउ तुमरा नामु ॥1॥ रहाउ ॥
चरन तुम॑ारे हिरदै वासहि संतन का संगु पावउ ॥
सोग अगनि महि मनु न विआपै आठ पहर गुण गावउ ॥1॥
स्वसति बिवसथा हरि की सेवा मध्यंत प्रभ जापण ॥
नानक रंगु लगा परमेसर बाहुड़ि जनम न छापण ॥2॥18॥49॥
मांगउ राम ते सभि थोक ॥
मानुख कउ जाचत स्रमु पाईऐ प्रभ कै सिमरनि मोख ॥1॥ रहाउ ॥
घोखे मुनि जन सिंम्रिति पुरानां बेद पुकारहि घोख ॥
क्रिपा सिंधु सेवि सचु पाईऐ दोवै सुहेले लोक ॥1॥
आन अचार बिउहार है जेते बिनु हरि सिमरन फोक ॥
नानक जनम मरण भै काटे मिलि साधू बिनसे सोक ॥2॥19॥50॥
त्रिसना बुझै हरि कै नामि ॥
महा संतोखु होवै गुर बचनी प्रभ सिउ लागै पूरन धिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (वह प्रभू अपने सेवक को) कोई दुख देने वाला समय नहीं देता।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।