जन नानक की सरधा पूरहु ठाकुर भगत तेरे नमसकारे ॥2॥9॥40॥
छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥
एकु नामु दीओ मन मंता बिनसि न कतहू जाति ॥1॥
सतिगुरि पूरै कीनी दाति ॥
हरि हरि नामु दीओ कीरतन कउ भई हमारी गाति ॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै भगतन की राखी पाति ॥
नानक चरन गहे प्रभ अपने सुखु पाइओ दिन राति ॥2॥10॥41॥
पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥
म्रिग त्रिसना आस मिथिआ मीठी इह टेक मनहि साधारी ॥1॥
साकत की आवरदा जाइ ब्रिथारी ॥
जैसे कागद के भार मूसा टूकि गवावत कामि नही गावारी ॥ रहाउ ॥
करि किरपा पारब्रहम सुआमी इह बंधन छुटकारी ॥
बूडत अंध नानक प्रभ काढत साध जना संगारी ॥2॥11॥42॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥
रूप रंग सूख धनु जीअ का पारब्रहम मोरै जाती ॥1॥
रसना राम रसाइनि माती ॥
रंग रंगी राम अपने कै चरन कमल निधि थाती ॥ रहाउ ॥
जिस का सा तिन ही रखि लीआ पूरन प्रभ की भाती ॥
मेलि लीओ आपे सुखदातै नानक हरि राखी पाती ॥2॥12॥43॥
दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥
जो जो तेरे भगत दुखाए ओहु ततकाल तुम मारा ॥1॥
निरखउ तुमरी ओरि हरि नीत ॥
मुरारि सहाइ होहु दास कउ करु गहि उधरहु मीत ॥ रहाउ ॥
सुणी बेनती ठाकुरि मेरै खसमाना करि आपि ॥
नानक अनद भए दुख भागे सदा सदा हरि जापि ॥2॥13॥44॥
चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥
क्रिपा कटाख्य अवलोकनु कीनो दास का दूखु बिदारिओ ॥1॥
हरि जन राखे गुर गोविंद ॥
कंठि लाइ अवगुण सभि मेटे दइआल पुरख बखसंद ॥ रहाउ ॥
जो मागहि ठाकुर अपुने ते सोई सोई देवै ॥
नानक दासु मुख ते जो बोलै ईहा ऊहा सचु होवै ॥2॥14॥45॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।