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681
धनासरी
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धंनि सु थानु धंनि ओइ भवना जा महि संत बसारे ॥
धंनि सु थानु धंनि ओइ भवना जा महि संत बसारे ॥
जन नानक की सरधा पूरहु ठाकुर भगत तेरे नमसकारे ॥2॥9॥40॥
जन नानक की सरधा पूरहु ठाकुर भगत तेरे नमसकारे ॥2॥9॥40॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! वह स्थान भाग्यशाली है। वह घर भाग्यशाली है। जिनमें संत जन बसते हैं। हे ठाकुर ! दास की तमन्ना पूरी कर। कि आपके भक्तों को सदा सिर झुकाता रहूँ। 2। 9। 40।
छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥
धनासरी महला 5 ॥
छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥
एकु नामु दीओ मन मंता बिनसि न कतहू जाति ॥1॥
सतिगुरि पूरै कीनी दाति ॥
हरि हरि नामु दीओ कीरतन कउ भई हमारी गाति ॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै भगतन की राखी पाति ॥
नानक चरन गहे प्रभ अपने सुखु पाइओ दिन राति ॥2॥10॥41॥
छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥
एकु नामु दीओ मन मंता बिनसि न कतहू जाति ॥1॥
सतिगुरि पूरै कीनी दाति ॥
हरि हरि नामु दीओ कीरतन कउ भई हमारी गाति ॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै भगतन की राखी पाति ॥
नानक चरन गहे प्रभ अपने सुखु पाइओ दिन राति ॥2॥10॥41॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। गुरू उसको) अपने चरणों में लगा के उसको बड़ी ताकत वाली (माया) से बचा लेता है। उसके मन के लिए गुरू परमात्मा का नाम-मंत्र देता है; जो ना नाश होता है ना ही कहीं गायब होता है। 1। हे भाई ! पूरे गुरू ने (मेरे पर) कृपा की है। (गुरू ने मुझे) परमात्मा का नाम कीर्तन करने के लिए दिया है। (जिसकी बरकति से) मेरी उच्च आत्मिक अवस्था बन गई है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू ने (हमेशा ही) अपने भक्तों का पक्ष लिया है। (भक्तों की) लाज रखी है। हे नानक ! जिस मनुष्य ने (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के चरण पकड़ लिए उसने दिन-रात हर वक्त आत्मिक आनंद पाया है। 2। 10। 41।
पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥
धनासरी महला 5 ॥
पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥
म्रिग त्रिसना आस मिथिआ मीठी इह टेक मनहि साधारी ॥1॥
साकत की आवरदा जाइ ब्रिथारी ॥
जैसे कागद के भार मूसा टूकि गवावत कामि नही गावारी ॥ रहाउ ॥
करि किरपा पारब्रहम सुआमी इह बंधन छुटकारी ॥
बूडत अंध नानक प्रभ काढत साध जना संगारी ॥2॥11॥42॥
पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥
म्रिग त्रिसना आस मिथिआ मीठी इह टेक मनहि साधारी ॥1॥
साकत की आवरदा जाइ ब्रिथारी ॥
जैसे कागद के भार मूसा टूकि गवावत कामि नही गावारी ॥ रहाउ ॥
करि किरपा पारब्रहम सुआमी इह बंधन छुटकारी ॥
बूडत अंध नानक प्रभ काढत साध जना संगारी ॥2॥11॥42॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! पराया धन चुराना। लोभ करना। झूठ बोलना। निंदा करनी - इसी तरह करते हुए (साकत सारी उम्र) गुजारता है। जैसे प्यासे हिरन को मारीचिका अच्छी लगती है। वैसे ही साकत झूठी आशाओं को अच्छा समझता है। (झूठी आशाओं की) टेक को अपने मन में स्तंभ बनाता है। 1। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य की उम्र अवश्य व्यर्थ जाती है। जैसे कोई चूहा कुतर-कुतर के कागजों के ढेर बेकार कर देता है। पर वह कागज उस मूर्ख के काम नहीं आते।रहाउ। हे मालिक प्रभू ! आप स्वयं ही कृपा करके (माया के) इन बँधनों से छुड़वाते हैं। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! माया के मोह में अँधे हो चुके मनुष्यों को। मोह में डूबते हुओं को। संत जनों की संगति में ला के आप खुद ही डूबने से बचाते हैं। 2। 11। 42।
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥
धनासरी महला 5 ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥
रूप रंग सूख धनु जीअ का पारब्रहम मोरै जाती ॥1॥
रसना राम रसाइनि माती ॥
रंग रंगी राम अपने कै चरन कमल निधि थाती ॥ रहाउ ॥
जिस का सा तिन ही रखि लीआ पूरन प्रभ की भाती ॥
मेलि लीओ आपे सुखदातै नानक हरि राखी पाती ॥2॥12॥43॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥
रूप रंग सूख धनु जीअ का पारब्रहम मोरै जाती ॥1॥
रसना राम रसाइनि माती ॥
रंग रंगी राम अपने कै चरन कमल निधि थाती ॥ रहाउ ॥
जिस का सा तिन ही रखि लीआ पूरन प्रभ की भाती ॥
मेलि लीओ आपे सुखदातै नानक हरि राखी पाती ॥2॥12॥43॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! मालिक प्रभू (का नाम) बार-बार सिमर के शरीर मन व हृदय शांत हो जाते हैं। हे भाई ! मेरे वास्ते भी परमात्मा का नाम ही रूप है। रंग है। सुख है। धन है। और ऊँची जाति है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य की जीभ परमात्मा के नाम-रसायन में मस्त रहती है। और प्यारे प्रभू के प्रेम-रंग से रंगी जाती है। वही मनुष्य परमात्मा के कोमल चरणों की याद का खजाना (अपने हृदय में) इकट्ठा कर लेता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू का (जीवों के दुखों रोगों से) बचाने का तरीका उक्तम है। जो मनुष्य उस प्रभू का (सेवक) बन गया। उसको उसने बचा लिया। हे नानक ! (शरण पड़े मनुष्य को) सुखदाते प्रभू ने आप ही सदा (अपने चरणों में) मिला लिया। और उसकी इज्जत रख ली। 2। 12। 43।
दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥
धनासरी महला 5 ॥
दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥
जो जो तेरे भगत दुखाए ओहु ततकाल तुम मारा ॥1॥
निरखउ तुमरी ओरि हरि नीत ॥
मुरारि सहाइ होहु दास कउ करु गहि उधरहु मीत ॥ रहाउ ॥
सुणी बेनती ठाकुरि मेरै खसमाना करि आपि ॥
नानक अनद भए दुख भागे सदा सदा हरि जापि ॥2॥13॥44॥
दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥
जो जो तेरे भगत दुखाए ओहु ततकाल तुम मारा ॥1॥
निरखउ तुमरी ओरि हरि नीत ॥
मुरारि सहाइ होहु दास कउ करु गहि उधरहु मीत ॥ रहाउ ॥
सुणी बेनती ठाकुरि मेरै खसमाना करि आपि ॥
नानक अनद भए दुख भागे सदा सदा हरि जापि ॥2॥13॥44॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे प्रभू ! (आपके भक्तों के) सारे वैरी दुश्मन आपकी कृपा से दूर होते हैं। आपका तेज-प्रताप (सारे जगत में) स्पष्ट है। जो जो आपके भक्त को दुख देता है। आप उसको तुरंत (आत्मिक) मौत मार देते हैं। 1। हे मुरारी ! हे हरी ! मैं सदा आपकी ओर (सहायता के लिए) ताकता रहता हूँ। (अपने) दास के वास्ते मददगार बन। हे मित्र प्रभू ! (अपने सेवक का) हाथ पकड़ के इस को बचा ले।रहाउ। हे नानक ! (कह) मेरे मालिक प्रभू ने पति वाला फर्ज पूरा करके (जिस मनुष्य की) विनती खुद सुन ली। उस मनुष्य को सदा ही परमात्मा का नाम जप के आत्मिक आनंद मिलता रहा। उसके सारे दुख नाश हो गए। 2। 13। 44।
चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥
धनासरी महला 5 ॥
चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥
क्रिपा कटाख्य अवलोकनु कीनो दास का दूखु बिदारिओ ॥1॥
हरि जन राखे गुर गोविंद ॥
कंठि लाइ अवगुण सभि मेटे दइआल पुरख बखसंद ॥ रहाउ ॥
जो मागहि ठाकुर अपुने ते सोई सोई देवै ॥
नानक दासु मुख ते जो बोलै ईहा ऊहा सचु होवै ॥2॥14॥45॥
चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥
क्रिपा कटाख्य अवलोकनु कीनो दास का दूखु बिदारिओ ॥1॥
हरि जन राखे गुर गोविंद ॥
कंठि लाइ अवगुण सभि मेटे दइआल पुरख बखसंद ॥ रहाउ ॥
जो मागहि ठाकुर अपुने ते सोई सोई देवै ॥
नानक दासु मुख ते जो बोलै ईहा ऊहा सचु होवै ॥2॥14॥45॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू ने चारों तरफ (सारी सृष्टि में) अपनी कला फैलाई हुई है। उसने (अपने दास के) सिर पर सदा ही अपना हाथ रखा हुआ है। मेहर की निगाह से अपने दास की ओर देखता है। और। उसका हरेक दुख दूर कर देता है। 1। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक की (हमेशा) रखवाली करता है। (सेवक को अपने) गले से लगा के दया-का-घर सर्व-व्यापक बख्शनहार प्रभू उनके सारे अवगुण मिटा देता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू के दास अपने प्रभू से जो कुछ माँगते हैं वह वही कुछ उनको देता है। हे नानक ! (प्रभू का) सेवक जो कुछ मुँह से बोलता है। वह इस लोक में परलोक में अटल हो जाता है। 2। 14। 45।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 681 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।