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अंग 681

अंग
681
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धंनि सु थानु धंनि ओइ भवना जा महि संत बसारे ॥
जन नानक की सरधा पूरहु ठाकुर भगत तेरे नमसकारे ॥2॥9॥40॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! वह स्थान भाग्यशाली है।वह घर भाग्यशाली है।जिनमें संत जन बसते हैं। हे ठाकुर ! दास की तमन्ना पूरी कर।कि आपके भक्तों को सदा सिर झुकाता रहूँ। 2। 9। 40।
धनासरी महला 5 ॥
छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥
एकु नामु दीओ मन मंता बिनसि न कतहू जाति ॥1॥
सतिगुरि पूरै कीनी दाति ॥
हरि हरि नामु दीओ कीरतन कउ भई हमारी गाति ॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै भगतन की राखी पाति ॥
नानक चरन गहे प्रभ अपने सुखु पाइओ दिन राति ॥2॥10॥41॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।गुरू उसको) अपने चरणों में लगा के उसको बड़ी ताकत वाली (माया) से बचा लेता है। उसके मन के लिए गुरू परमात्मा का नाम-मंत्र देता है; जो ना नाश होता है ना ही कहीं गायब होता है। 1। हे भाई ! पूरे गुरू ने (मेरे पर) कृपा की है। (गुरू ने मुझे) परमात्मा का नाम कीर्तन करने के लिए दिया है।(जिसकी बरकति से) मेरी उच्च आत्मिक अवस्था बन गई है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू ने (हमेशा ही) अपने भक्तों का पक्ष लिया है।(भक्तों की) लाज रखी है। हे नानक ! जिस मनुष्य ने (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के चरण पकड़ लिए उसने दिन-रात हर वक्त आत्मिक आनंद पाया है। 2। 10। 41।
धनासरी महला 5 ॥
पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥
म्रिग त्रिसना आस मिथिआ मीठी इह टेक मनहि साधारी ॥1॥
साकत की आवरदा जाइ ब्रिथारी ॥
जैसे कागद के भार मूसा टूकि गवावत कामि नही गावारी ॥ रहाउ ॥
करि किरपा पारब्रहम सुआमी इह बंधन छुटकारी ॥
बूडत अंध नानक प्रभ काढत साध जना संगारी ॥2॥11॥42॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! पराया धन चुराना।लोभ करना।झूठ बोलना।निंदा करनी – इसी तरह करते हुए (साकत सारी उम्र) गुजारता है। जैसे प्यासे हिरन को मारीचिका अच्छी लगती है।वैसे ही साकत झूठी आशाओं को अच्छा समझता है।(झूठी आशाओं की) टेक को अपने मन में स्तंभ बनाता है। 1। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य की उम्र अवश्य व्यर्थ जाती है। जैसे कोई चूहा कुतर-कुतर के कागजों के ढेर बेकार कर देता है।पर वह कागज उस मूर्ख के काम नहीं आते।रहाउ। हे मालिक प्रभू ! आप आप ही कृपा करके (माया के) इन बँधनों से छुड़वाता है। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! माया के मोह में अँधे हो चुके मनुष्यों को।मोह में डूबते हुओं को।संत जनों की संगति में ला के आप खुद ही डूबने से बचाता है। 2। 11। 42।
धनासरी महला 5 ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥
रूप रंग सूख धनु जीअ का पारब्रहम मोरै जाती ॥1॥
रसना राम रसाइनि माती ॥
रंग रंगी राम अपने कै चरन कमल निधि थाती ॥ रहाउ ॥
जिस का सा तिन ही रखि लीआ पूरन प्रभ की भाती ॥
मेलि लीओ आपे सुखदातै नानक हरि राखी पाती ॥2॥12॥43॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! मालिक प्रभू (का नाम) बार-बार सिमर के शरीर मन व हृदय शांत हो जाते हैं। हे भाई ! मेरे वास्ते भी परमात्मा का नाम ही रूप है।रंग है।सुख है।धन है।और ऊँची जाति है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य की जीभ परमात्मा के नाम-रसायन में मस्त रहती है। और प्यारे प्रभू के प्रेम-रंग से रंगी जाती है।वही मनुष्य परमात्मा के कोमल चरणों की याद का खजाना (अपने हृदय में) इकट्ठा कर लेता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू का (जीवों के दुखों रोगों से) बचाने का तरीका उक्तम है।जो मनुष्य उस प्रभू का (सेवक) बन गया।उसको उसने बचा लिया। हे नानक ! (शरण पड़े मनुष्य को) सुखदाते प्रभू ने आप ही सदा (अपने चरणों में) मिला लिया।और उसकी इज्जत रख ली। 2। 12। 43।
धनासरी महला 5 ॥
दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥
जो जो तेरे भगत दुखाए ओहु ततकाल तुम मारा ॥1॥
निरखउ तुमरी ओरि हरि नीत ॥
मुरारि सहाइ होहु दास कउ करु गहि उधरहु मीत ॥ रहाउ ॥
सुणी बेनती ठाकुरि मेरै खसमाना करि आपि ॥
नानक अनद भए दुख भागे सदा सदा हरि जापि ॥2॥13॥44॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे प्रभू ! (आपके भक्तों के) सारे वैरी दुश्मन आपकी कृपा से दूर होते हैं।आपका तेज-प्रताप (सारे जगत में) स्पष्ट है। जो जो आपके भक्त को दुख देता है।आप उसको तुरंत (आत्मिक) मौत मार देता है। 1। हे मुरारी ! हे हरी ! मैं सदा आपकी ओर (सहायता के लिए) ताकता रहता हूँ। (अपने) दास के वास्ते मददगार बन।हे मित्र प्रभू ! (अपने सेवक का) हाथ पकड़ के इस को बचा ले।रहाउ। हे नानक ! (कह) मेरे मालिक प्रभू ने पति वाला फर्ज पूरा करके (जिस मनुष्य की) विनती खुद सुन ली। उस मनुष्य को सदा ही परमात्मा का नाम जप के आत्मिक आनंद मिलता रहा।उसके सारे दुख नाश हो गए। 2। 13। 44।
धनासरी महला 5 ॥
चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥
क्रिपा कटाख्य अवलोकनु कीनो दास का दूखु बिदारिओ ॥1॥
हरि जन राखे गुर गोविंद ॥
कंठि लाइ अवगुण सभि मेटे दइआल पुरख बखसंद ॥ रहाउ ॥
जो मागहि ठाकुर अपुने ते सोई सोई देवै ॥
नानक दासु मुख ते जो बोलै ईहा ऊहा सचु होवै ॥2॥14॥45॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू ने चारों तरफ (सारी सृष्टि में) अपनी कला फैलाई हुई है।उसने (अपने दास के) सिर पर सदा ही अपना हाथ रखा हुआ है। मेहर की निगाह से अपने दास की ओर देखता है।और।उसका हरेक दुख दूर कर देता है। 1। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक की (हमेशा) रखवाली करता है। (सेवक को अपने) गले से लगा के दया-का-घर सर्व-व्यापक बख्शनहार प्रभू उनके सारे अवगुण मिटा देता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू के दास अपने प्रभू से जो कुछ माँगते हैं वह वही कुछ उनको देता है। हे नानक ! (प्रभू का) सेवक जो कुछ मुँह से बोलता है।वह इस लोक में परलोक में अटल हो जाता है। 2। 14। 45।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।