सरणी पावन नाम धिआवन सहजि समावन संगि ॥1॥ रहाउ ॥
जन के चरन वसहि मेरै हीअरै संगि पुनीता देही ॥
जन की धूरि देहु किरपा निधि नानक कै सुखु एही ॥2॥4॥35॥
जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥
पाप करे करि मूकरि पावै भेख करै निरबानै ॥1॥
जानत दूरि तुमहि प्रभ नेरि ॥
उत ताकै उत ते उत पेखै आवै लोभी फेरि ॥ रहाउ ॥
जब लगु तुटै नाही मन भरमा तब लगु मुकतु न कोई ॥
कहु नानक दइआल सुआमी संतु भगतु जनु सोई ॥2॥5॥36॥
नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥
नामु द्रिड़ावै नामु जपावै ता का जुग महि धरमा ॥1॥
जन कउ नामु वडाई सोभ ॥
नामो गति नामो पति जन की मानै जो जो होग ॥1॥ रहाउ ॥
नाम धनु जिसु जन कै पालै सोई पूरा साहा ॥
नामु बिउहारा नानक आधारा नामु परापति लाहा ॥2॥6॥37॥
नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥
रसि रसि गुण गावउ ठाकुर के मोरै हिरदै बसहु गोपाल ॥1॥
तुम तउ राखनहार दइआल ॥
सुंदर सुघर बेअंत पिता प्रभ होहु प्रभू किरपाल ॥1॥ रहाउ ॥
महा अनंद मंगल रूप तुमरे बचन अनूप रसाल ॥
हिरदै चरण सबदु सतिगुर को नानक बांधिओ पाल ॥2॥7॥38॥
अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥
सरब सूख भोग रस देवै मन ही नालि समावै ॥1॥
हमरे पिता गोपाल दइआल ॥
जिउ राखै महतारी बारिक कउ तैसे ही प्रभ पाल ॥1॥ रहाउ ॥
मीत साजन सरब गुण नाइक सदा सलामति देवा ॥
ईत ऊत जत कत तत तुम ही मिलै नानक संत सेवा ॥2॥8॥39॥
संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥
राजु मालु जोबनु तनु जीअरा इन ऊपरि लै बारे ॥1॥
मनि तनि राम नाम हितकारे ॥
सूख सहज आनंद मंगल सहित भव निधि पारि उतारे ॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! दिल में प्यार से परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।