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अंग ६८० · धनासरी

अंग
680
धनासरी
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  1. ठाकुरु गाईऐ आतम रंगि ॥
  2. जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥
  3. नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥
  4. नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥
  5. अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥
  6. संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥

ठाकुरु गाईऐ आतम रंगि ॥

अंग ६७९ से चला आ रहा अंश

ठाकुरु गाईऐ आतम रंगि ॥
सरणी पावन नाम धिआवन सहजि समावन संगि ॥1॥ रहाउ ॥
जन के चरन वसहि मेरै हीअरै संगि पुनीता देही ॥
जन की धूरि देहु किरपा निधि नानक कै सुखु एही ॥2॥4॥35॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! दिल में प्यार से परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए। उस परमात्मा की शरण में टिके रहना।उसका नाम सिमरना - इस तरीके से आत्मिक अडोलता में टिक के उस में लीन हो जाना है। 1।रहाउ। हे कृपा के खजाने प्रभू ! अगर आपके दासों के चरण मेरे हृदय में बस जाएं।तो उनकी संगति में मेरा शरीर पवित्र हो जाए। (मेहर कर। मुझे) अपने दासों की चरण-धूड़ बख्श।मुझ नानक के लिए (सबसे बड़ा) सुख यही है। 2। 4। 35।

जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥

धनासरी महला 5 ॥
जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥
पाप करे करि मूकरि पावै भेख करै निरबानै ॥1॥
जानत दूरि तुमहि प्रभ नेरि ॥
उत ताकै उत ते उत पेखै आवै लोभी फेरि ॥ रहाउ ॥
जब लगु तुटै नाही मन भरमा तब लगु मुकतु न कोई ॥
कहु नानक दइआल सुआमी संतु भगतु जनु सोई ॥2॥5॥36॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (लालची मनुष्य) अनेकों यतन करता है।लोगों को धोखा देता है।पर सबके दिल की जानने वाला वह परमात्मा (सब कुछ) जानता है विरक्तों वाले धार्मिक पहरावे पहने रखता है।पाप करके (फिर उन पापों से) मुकर भी जाता है। 1। हे प्रभू ! आप (सब जीवों के) नजदीक बसते हैं।पर (लालची पाखण्डी मनुष्य) आपको दूर (बसता) समझता है। लालची मनुष्य (लालच के) चक्कर में फसा रहता है।(माया की खातिर) उधर देखता है।उधर से और उधर ताकता है (उसका मन टिकता नहीं)।रहाउ। हे भाई ! जब तक मनुष्य के मन की (माया वाली) भटकना दूर नहीं होती।इस (लालच के पँजे से) आजाद नहीं हो सकता। हे नानक ! कह, (पहरावों से भगत नहीं बन जाते) जिस मनुष्य पर मालिक-प्रभू खुद दयावान होता है (और।उसको नाम की दाति देता है) वही मनुष्य संत है भगत है। 2। 5। 36।

नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥

धनासरी महला 5 ॥
नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥
नामु द्रिड़ावै नामु जपावै ता का जुग महि धरमा ॥1॥
जन कउ नामु वडाई सोभ ॥
नामो गति नामो पति जन की मानै जो जो होग ॥1॥ रहाउ ॥
नाम धनु जिसु जन कै पालै सोई पूरा साहा ॥
नामु बिउहारा नानक आधारा नामु परापति लाहा ॥2॥6॥37॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे के भाग्य (जाग पड़े) उसे प्यारे गुरू ने परमात्मा का नाम दे दिया। उस मनुष्य का (फिर) सदा का काम ही जगत में ये बन जाता है कि वह औरों को हरी-नाम दृढ़ करवाता है जपवाता है (जपने के लिए प्रेरित करता है)। 1। हे भाई ! परमात्मा के सेवक के लिए परमात्मा का नाम (ही) वडिआई है नाम ही शोभा है। हरी-नाम ही उसकी ऊँची आत्मिक अवस्था है।नाम ही उसकी इज्जत है।जो कुछ परमात्मा की रजा में होता है।सेवक उसको (सिर-माथे) मानता है। 1।रहाउ। हे नानक ! परमात्मा का नाम-धन जिस मनुष्य के पास है।वही पूरा शाहूकार है। वह मनुष्य हरी-नाम सिमरन को ही अपना असल व्यवहार समझता है।नाम का ही उसको असल आसरा रहता है।नाम की ही वह कमाई करता है। 2। 6। 37।

नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥

धनासरी महला 5 ॥
नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥
रसि रसि गुण गावउ ठाकुर के मोरै हिरदै बसहु गोपाल ॥1॥
तुम तउ राखनहार दइआल ॥
सुंदर सुघर बेअंत पिता प्रभ होहु प्रभू किरपाल ॥1॥ रहाउ ॥
महा अनंद मंगल रूप तुमरे बचन अनूप रसाल ॥
हिरदै चरण सबदु सतिगुर को नानक बांधिओ पाल ॥2॥7॥38॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ मेरे माथे पर आपकी चरण-धूड़ टिकी रहे।आपका दर्शन करके आँखें पवित्र हो जाती हैं (विकारों से हट जाती हैं)। हे सृष्टि के पालनहार ! मेरे हृदय में आ बस।मैं बड़े स्वाद से आपके गुण गाता रहूँ।1। हे दया के घर प्रभू ! आप तो (सब जीवों की) रक्षा करने में समर्थ हैं। आप सुंदर हैं।समझदार हैं।बेअंत हैं।हे पिता प्रभू ! (मेरे पर भी) दयावान हो। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप आनंद स्वरूप हैं (आनंद ही आनंद; खुशी ही खुशी आपका वजूद है)।हे प्रभू ! आपकी सिफत सालाह की बाणी सुंदर है रसीली है। हे नानक ! जिस मनुष्य ने सतिगुरू की बाणी पल्ले बाँध ली उसके हृदय में परमात्मा के चरण बसे रहते हैं। 2। 7। 38।

अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥

धनासरी महला 5 ॥
अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥
सरब सूख भोग रस देवै मन ही नालि समावै ॥1॥
हमरे पिता गोपाल दइआल ॥
जिउ राखै महतारी बारिक कउ तैसे ही प्रभ पाल ॥1॥ रहाउ ॥
मीत साजन सरब गुण नाइक सदा सलामति देवा ॥
ईत ऊत जत कत तत तुम ही मिलै नानक संत सेवा ॥2॥8॥39॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपने ही ढंग से जीवों को खाने-पीने के लिए देता है।अपने ही ढंग से जीवों को खेलों में मस्त रखता है। (अपने ही ढंग से जीवों को) सारे सुख देता है।सारे स्वादिष्ट पदार्थ देता है।और।सदा सबके अंग-संग टिका रहता है। 1। हे दया के घर ! हे सृष्टि के पालनहार ! हे हमारे पिता प्रभू ! जैसे माँ अपने बच्चे की पालना करती है वैसे ही आप हम जीवों की पालना करने वाले हैं। 1।रहाउ। हे प्रकाश-रूप प्रभू ! आप हमारे मित्र हैं।सज्जन हैं।सारे गुणों के मालिक हैं।सबके जीवन की अगुवाई करने वाले हैं।सदा जीवित हैं। आप हर जगह इस लोक में परलोक में मौजूद हैं।हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने से वह प्रभू मिलता है। 2। 8। 39।

संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥

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धनासरी महला 5 ॥
संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥
राजु मालु जोबनु तनु जीअरा इन ऊपरि लै बारे ॥1॥
मनि तनि राम नाम हितकारे ॥
सूख सहज आनंद मंगल सहित भव निधि पारि उतारे ॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (अपने मन में हृदय में परमात्मा का प्यार सदा टिठकाए रखने वाले) संत जन कृपा के श्रोत दया के श्रोत परमात्मा (के रूप हैं); वे अपने अंदर से काम-क्रोध (आदि विकारों के) जहर जला लेते हैं। ऐसे संतों से राज-माल-जवानी-शरीर-जीवात्मा।सब कुछ कुर्बान कर देनी चाहिए। 1। हे भाई ! जिनके मन में हृदय में परमात्मा के नाम का प्यार सदा बना रहता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद व खुशियां पाते हैं।(औरों को भी) संसार समुंद्र से पार लंघा देते हैं।रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६८० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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