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अंग 680

अंग
680
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ठाकुरु गाईऐ आतम रंगि ॥
सरणी पावन नाम धिआवन सहजि समावन संगि ॥1॥ रहाउ ॥
जन के चरन वसहि मेरै हीअरै संगि पुनीता देही ॥
जन की धूरि देहु किरपा निधि नानक कै सुखु एही ॥2॥4॥35॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! दिल में प्यार से परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए। उस परमात्मा की शरण में टिके रहना।उसका नाम सिमरना – इस तरीके से आत्मिक अडोलता में टिक के उस में लीन हो जाना है। 1।रहाउ। हे कृपा के खजाने प्रभू ! अगर आपके दासों के चरण मेरे हृदय में बस जाएं।तो उनकी संगति में मेरा शरीर पवित्र हैं जाए। (मेहर कर। मुझे) अपने दासों की चरण-धूड़ बख्श।मुझ नानक के लिए (सबसे बड़ा) सुख यही है। 2। 4। 35।
धनासरी महला 5 ॥
जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥
पाप करे करि मूकरि पावै भेख करै निरबानै ॥1॥
जानत दूरि तुमहि प्रभ नेरि ॥
उत ताकै उत ते उत पेखै आवै लोभी फेरि ॥ रहाउ ॥
जब लगु तुटै नाही मन भरमा तब लगु मुकतु न कोई ॥
कहु नानक दइआल सुआमी संतु भगतु जनु सोई ॥2॥5॥36॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (लालची मनुष्य) अनेकों यतन करता है।लोगों को धोखा देता है।पर सबके दिल की जानने वाला वह परमात्मा (सब कुछ) जानता है विरक्तों वाले धार्मिक पहरावे पहने रखता है।पाप करके (फिर उन पापों से) मुकर भी जाता है। 1। हे प्रभू ! आप (सब जीवों के) नजदीक बसता है।पर (लालची पाखण्डी मनुष्य) आपको दूर (बसता) समझता है। लालची मनुष्य (लालच के) चक्कर में फसा रहता है।(माया की खातिर) उधर देखता है।उधर से और उधर ताकता है (उसका मन टिकता नहीं)।रहाउ। हे भाई ! जब तक मनुष्य के मन की (माया वाली) भटकना दूर नहीं होती।इस (लालच के पँजे से) आजाद नहीं हो सकता। हे नानक ! कह, (पहरावों से भगत नहीं बन जाते) जिस मनुष्य पर मालिक-प्रभू खुद दयावान होता है (और।उसको नाम की दाति देता है) वही मनुष्य संत है भगत है। 2। 5। 36।
धनासरी महला 5 ॥
नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥
नामु द्रिड़ावै नामु जपावै ता का जुग महि धरमा ॥1॥
जन कउ नामु वडाई सोभ ॥
नामो गति नामो पति जन की मानै जो जो होग ॥1॥ रहाउ ॥
नाम धनु जिसु जन कै पालै सोई पूरा साहा ॥
नामु बिउहारा नानक आधारा नामु परापति लाहा ॥2॥6॥37॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे के भाग्य (जाग पड़े) उसे प्यारे गुरू ने परमात्मा का नाम दे दिया। उस मनुष्य का (फिर) सदा का काम ही जगत में ये बन जाता है कि वह औरों को हरी-नाम दृढ़ करवाता है जपवाता है (जपने के लिए प्रेरित करता है)। 1। हे भाई ! परमात्मा के सेवक के लिए परमात्मा का नाम (ही) वडिआई है नाम ही शोभा है। हरी-नाम ही उसकी ऊँची आत्मिक अवस्था है।नाम ही उसकी इज्जत है।जो कुछ परमात्मा की रजा में होता है।सेवक उसको (सिर-माथे) मानता है। 1।रहाउ। हे नानक ! परमात्मा का नाम-धन जिस मनुष्य के पास है।वही पूरा शाहूकार है। वह मनुष्य हरी-नाम सिमरन को ही अपना असल व्यवहार समझता है।नाम का ही उसको असल आसरा रहता है।नाम की ही वह कमाई करता है। 2। 6। 37।
धनासरी महला 5 ॥
नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥
रसि रसि गुण गावउ ठाकुर के मोरै हिरदै बसहु गोपाल ॥1॥
तुम तउ राखनहार दइआल ॥
सुंदर सुघर बेअंत पिता प्रभ होहु प्रभू किरपाल ॥1॥ रहाउ ॥
महा अनंद मंगल रूप तुमरे बचन अनूप रसाल ॥
हिरदै चरण सबदु सतिगुर को नानक बांधिओ पाल ॥2॥7॥38॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ मेरे माथे पर आपकी चरण-धूड़ टिकी रहे।आपका दर्शन करके आँखें पवित्र हैं जाती हैं (विकारों से हट जाती हैं)। हे सृष्टि के पालनहार ! मेरे हृदय में आ बस।मैं बड़े स्वाद से आपके गुण गाता रहूँ।1। हे दया के घर प्रभू ! आप तो (सब जीवों की) रक्षा करने में समर्थ है। आप सुंदर है।समझदार है।बेअंत है।हे पिता प्रभू ! (मेरे पर भी) दयावान हो। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप आनंद स्वरूप है (आनंद ही आनंद; खुशी ही खुशी आपका वजूद है)।हे प्रभू ! आपकी सिफत सालाह की बाणी सुंदर है रसीली है। हे नानक ! जिस मनुष्य ने सतिगुरू की बाणी पल्ले बाँध ली उसके हृदय में परमात्मा के चरण बसे रहते हैं। 2। 7। 38।
धनासरी महला 5 ॥
अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥
सरब सूख भोग रस देवै मन ही नालि समावै ॥1॥
हमरे पिता गोपाल दइआल ॥
जिउ राखै महतारी बारिक कउ तैसे ही प्रभ पाल ॥1॥ रहाउ ॥
मीत साजन सरब गुण नाइक सदा सलामति देवा ॥
ईत ऊत जत कत तत तुम ही मिलै नानक संत सेवा ॥2॥8॥39॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपने ही ढंग से जीवों को खाने-पीने के लिए देता है।अपने ही ढंग से जीवों को खेलों में मस्त रखता है। (अपने ही ढंग से जीवों को) सारे सुख देता है।सारे स्वादिष्ट पदार्थ देता है।और।सदा सबके अंग-संग टिका रहता है। 1। हे दया के घर ! हे सृष्टि के पालनहार ! हे हमारे पिता प्रभू ! जैसे माँ अपने बच्चे की पालना करती है वैसे ही आप हम जीवों की पालना करने वाला है। 1।रहाउ। हे प्रकाश-रूप प्रभू ! आप हमारा मित्र है।सज्जन है।सारे गुणों का मालिक है।सबकी जीवन की अगुवाई करने वाला है।सदा जीवित है। आप हर जगह इस लोक में परलोक में मौजूद है।हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने से वह प्रभू मिलता है। 2। 8। 39।
धनासरी महला 5 ॥
संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥
राजु मालु जोबनु तनु जीअरा इन ऊपरि लै बारे ॥1॥
मनि तनि राम नाम हितकारे ॥
सूख सहज आनंद मंगल सहित भव निधि पारि उतारे ॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! (अपने मन में हृदय में परमात्मा का प्यार सदा टिठकाए रखने वाले) संत जन कृपा के श्रोत दया के श्रोत परमात्मा (के रूप हैं); वे अपने अंदर से काम-क्रोध (आदि विकारों के) जहर जला लेते हैं। ऐसे संतों से राज-माल-जवानी-शरीर-जीवात्मा।सब कुछ कुर्बान कर देनी चाहिए। 1। हे भाई ! जिनके मन में हृदय में परमात्मा के नाम का प्यार सदा बना रहता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद व खुशियां पाते हैं।(औरों को भी) संसार समुंद्र से पार लंघा देते हैं।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! दिल में प्यार से परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।