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अंग 678

अंग
678
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानकु मंगै दानु प्रभ रेन पग साधा ॥4॥3॥27॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! नानक (आपके पास से) आपके संत जनों के चरणों की धूड़ मांगता है। 4। 3। 27।
धनासरी महला 5 ॥
जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥
अनद मंगल गुन गाउ सहज धुनि निहचल राजु कमाउ ॥1॥
तुम घरि आवहु मेरे मीत ॥
तुमरे दोखी हरि आपि निवारे अपदा भई बितीत ॥ रहाउ ॥
प्रगट कीने प्रभ करनेहारे नासन भाजन थाके ॥
घरि मंगल वाजहि नित वाजे अपुनै खसमि निवाजे ॥2॥
असथिर रहहु डोलहु मत कबहू गुर कै बचनि अधारि ॥
जै जै कारु सगल भू मंडल मुख ऊजल दरबार ॥3॥
जिन के जीअ तिनै ही फेरे आपे भइआ सहाई ॥
अचरजु कीआ करनैहारै नानक सचु वडिआई ॥4॥4॥28॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ (हे मेरी जिंदे !) जिसने आपको (संसार में) भेजा है।उसने आपको अपनी ओर प्रेरित करना आरम्भ किया हुआ है।आप आनंद से आत्मिक अडोलता से हृदय-घर में टिका रह। हे जिंदे ! आत्मिक अडोलता की रौंअ में।आनंद-खुशी पैदा करने वाले हरी-गुण गाया कर (इस तरह कामादिक वैरियों पर) अटल राज कर। 1। मेरे मित्र (मन) ! (अब) आप हृदय-घर में टिका रह (आ जा)। परमात्मा ने खुद ही (कामादिक) आपके वैरी दूर कर दिए हैं।(कामादिक वैरियों से पड़ रही मार की) विपदा (अब) समाप्त हैं गई है।रहाउ। उनके अंदर उसने अपना आप प्रगट कर दिया, उनकी भटकनें खत्म हो गई। उनके हृदय-घर में आत्मिक आनंद के (मानो) बाजे सदा बजने लग जाते हैं (हे मेरी जिंदे !) सब कुछ कर सकने वाले पति-प्रभू ने जिन पर मेहर की। 2। (हे जिंदे !) गुरू के उपदेश पर चल के।गुरू के आसरे रह के।आप भी (कामादिक वैरियों की टक्कर में) मजबूती से खड़ा हैं जा।देखना।कभी भी डोलना नहीं। सारी सृष्टि में शोभा होगी।प्रभू की हजूरी में आपका मुँह उज्जवल होंगे। 3। हे नानक ! जिस प्रभू जी ने जीव पैदा किए हुए हैं।वह स्वयं ही इनको (विकारों से) बचाता है।वह खुद ही मददगार बनता है। सब कुछ कर सकने वाले परमात्मा ने ये अनोखी खेल बना दी है।उसकी महिमा सदा कायम रहने वाली है। 4। 4। 28।
धनासरी महला 5 घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुनहु संत पिआरे बिनउ हमारे जीउ ॥
हरि बिनु मुकति न काहू जीउ ॥ रहाउ ॥
मन निरमल करम करि तारन तरन हरि अवरि जंजाल तेरै काहू न काम जीउ ॥
जीवन देवा पारब्रहम सेवा इहु उपदेसु मो कउ गुरि दीना जीउ ॥1॥
तिसु सिउ न लाईऐ हीतु जा को किछु नाही बीतु अंत की बार ओहु संगि न चालै ॥
मनि तनि तू आराध हरि के प्रीतम साध जा कै संगि तेरे बंधन छूटै ॥2॥
गहु पारब्रहम सरन हिरदै कमल चरन अवर आस कछु पटलु न कीजै ॥
सोई भगतु गिआनी धिआनी तपा सोई नानक जा कउ किरपा कीजै ॥3॥1॥29॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घर 6 ॥ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्यारे संत जनो ! मेरी विनती सुनो। परमात्मा (के सिमरन) के बिना (माया के बँधनों से) किसी की भी खलासी नहीं होती।रहाउ। हे मन ! (जीवन को) पवित्र करने वाले (हरी सिमरन के) काम किया कर।परमात्मा (का नाम ही संसार-समुंद्र से) पार लंघाने के लिए जहाज है।(दुनिया के) और सारे जंजाल आपके किसी भी काम नहीं आने वाले। प्रकाश-रूप परमात्मा की सेवा-भक्ति ही (असल) जीवन है, ये शिक्षा मुझे गुरू ने दी है। 1। हे भाई ! उस (धन-पदार्थ) से प्यार नहीं डालना चाहिए।जिसकी कोई पायां नहीं।वह (धन-पदार्थ) आखिर के वक्त साथ नहीं जाता। अपने मन में हृदय में आप परमात्मा का नाम सिमरा कर।परमात्मा से प्यार करने वाले संत जनों (की संगति किया कर)।क्योंकि उन (संत जनों की) संगति में आपके (माया के) बँधन समाप्त हैं सकते हैं। 2। हे भाई ! परमात्मा का आसरा ले।(अपने) हृदय में (परमात्मा के) कोमल चरण (बसा) (परमात्मा के बिना) किसी और की आस नहीं करनी चाहिए।कोई और आसरा नहीं ढूँढना चाहिए। हे नानक ! वही मनुष्य भक्त है।वही ज्ञानवान है।वही सुरति-अभ्यासी है।वही तपस्वी है।जिस पर परमात्मा कृपा करता है। 3। 1। 29।
धनासरी महला 5 ॥
मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥
देखहु पसारि नैन सुनहु साधू के बैन प्रानपति चिति राखु सगल है मरना ॥ रहाउ ॥
चंदन चोआ रस भोग करत अनेकै बिखिआ बिकार देखु सगल है फीके एकै गोबिद को नामु नीको कहत है साध जन ॥
तनु धनु आपन थापिओ हरि जपु न निमख जापिओ अरथु द्रबु देखु कछु संगि नाही चलना ॥1॥
जा को रे करमु भला तिनि ओट गही संत पला तिन नाही रे जमु संतावै साधू की संगना ॥
पाइओ रे परम निधानु मिटिओ है अभिमानु एकै निरंकार नानक मनु लगना ॥2॥2॥30॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे मेरे प्यारे ! हे भाई ! (परमात्मा के दर से) परमात्मा (का नाम) मांगना सबसे अच्छा काम है। हे सज्जन ! गुरू की बाणी (हमेशा) सुनते रहो।जिंद के मालिक प्रभू को अपने दिल में बसाए रखो।आँखें खोल के देखो।(आखिर) सबने मरना है।रहाउ। हे सज्जन ! आप चंदन-इत्र का प्रयोग करता है और अनेकों ही स्वादिष्ट खाने खाता है।पर।देख।ये विकार पैदा करने वाले सारे ही मायावी भोग फीके हैं।संत जन कहते हैं कि सिर्फ परमात्मा का नाम ही अच्छा है। आप इस शरीर का।इस धन को अपना समझ रहा है।(इनके मोह में फंस के) परमात्मा का नाम आप एक छिन भर भी नहीं जपता।देख।ये धन-पदार्थ कुछ भी (आपके) साथ नहीं जाएगा। हे भाई ! जिस मनुष्य के भाग्य अच्छे हुए।उसने संतों का आसरा लिया।उसने संतों का पल्ला पकड़ा।हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की संगति में रहते हैं।उन्हें मौत का डर नहीं सता सकता। हे नानक ! जिस मनुष्य का मन सिर्फ परमात्मा में जुड़ा रहता है उसने सबसे बढ़िया खजाना पा लिया उसके अंदर से अहंकार मिट गया। 2। 2। 30।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! नानक (आपके पास से) आपके संत जनों के चरणों की धूड़ मांगता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।