जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥
अनद मंगल गुन गाउ सहज धुनि निहचल राजु कमाउ ॥1॥
तुम घरि आवहु मेरे मीत ॥
तुमरे दोखी हरि आपि निवारे अपदा भई बितीत ॥ रहाउ ॥
प्रगट कीने प्रभ करनेहारे नासन भाजन थाके ॥
घरि मंगल वाजहि नित वाजे अपुनै खसमि निवाजे ॥2॥
असथिर रहहु डोलहु मत कबहू गुर कै बचनि अधारि ॥
जै जै कारु सगल भू मंडल मुख ऊजल दरबार ॥3॥
जिन के जीअ तिनै ही फेरे आपे भइआ सहाई ॥
अचरजु कीआ करनैहारै नानक सचु वडिआई ॥4॥4॥28॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुनहु संत पिआरे बिनउ हमारे जीउ ॥
हरि बिनु मुकति न काहू जीउ ॥ रहाउ ॥
मन निरमल करम करि तारन तरन हरि अवरि जंजाल तेरै काहू न काम जीउ ॥
जीवन देवा पारब्रहम सेवा इहु उपदेसु मो कउ गुरि दीना जीउ ॥1॥
तिसु सिउ न लाईऐ हीतु जा को किछु नाही बीतु अंत की बार ओहु संगि न चालै ॥
मनि तनि तू आराध हरि के प्रीतम साध जा कै संगि तेरे बंधन छूटै ॥2॥
गहु पारब्रहम सरन हिरदै कमल चरन अवर आस कछु पटलु न कीजै ॥
सोई भगतु गिआनी धिआनी तपा सोई नानक जा कउ किरपा कीजै ॥3॥1॥29॥
मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥
देखहु पसारि नैन सुनहु साधू के बैन प्रानपति चिति राखु सगल है मरना ॥ रहाउ ॥
चंदन चोआ रस भोग करत अनेकै बिखिआ बिकार देखु सगल है फीके एकै गोबिद को नामु नीको कहत है साध जन ॥
तनु धनु आपन थापिओ हरि जपु न निमख जापिओ अरथु द्रबु देखु कछु संगि नाही चलना ॥1॥
जा को रे करमु भला तिनि ओट गही संत पला तिन नाही रे जमु संतावै साधू की संगना ॥
पाइओ रे परम निधानु मिटिओ है अभिमानु एकै निरंकार नानक मनु लगना ॥2॥2॥30॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! नानक (आपके पास से) आपके संत जनों के चरणों की धूड़ मांगता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।