अंग
678
धनासरी
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नानकु मंगै दानु प्रभ रेन पग साधा ॥4॥3॥27॥
नानकु मंगै दानु प्रभ रेन पग साधा ॥4॥3॥27॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! नानक (आपके पास से) आपके संत जनों के चरणों की धूड़ मांगता है। 4। 3। 27।
जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥
धनासरी महला 5 ॥
जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥
अनद मंगल गुन गाउ सहज धुनि निहचल राजु कमाउ ॥1॥
तुम घरि आवहु मेरे मीत ॥
तुमरे दोखी हरि आपि निवारे अपदा भई बितीत ॥ रहाउ ॥
प्रगट कीने प्रभ करनेहारे नासन भाजन थाके ॥
घरि मंगल वाजहि नित वाजे अपुनै खसमि निवाजे ॥2॥
असथिर रहहु डोलहु मत कबहू गुर कै बचनि अधारि ॥
जै जै कारु सगल भू मंडल मुख ऊजल दरबार ॥3॥
जिन के जीअ तिनै ही फेरे आपे भइआ सहाई ॥
अचरजु कीआ करनैहारै नानक सचु वडिआई ॥4॥4॥28॥
जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥
अनद मंगल गुन गाउ सहज धुनि निहचल राजु कमाउ ॥1॥
तुम घरि आवहु मेरे मीत ॥
तुमरे दोखी हरि आपि निवारे अपदा भई बितीत ॥ रहाउ ॥
प्रगट कीने प्रभ करनेहारे नासन भाजन थाके ॥
घरि मंगल वाजहि नित वाजे अपुनै खसमि निवाजे ॥2॥
असथिर रहहु डोलहु मत कबहू गुर कै बचनि अधारि ॥
जै जै कारु सगल भू मंडल मुख ऊजल दरबार ॥3॥
जिन के जीअ तिनै ही फेरे आपे भइआ सहाई ॥
अचरजु कीआ करनैहारै नानक सचु वडिआई ॥4॥4॥28॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ (हे मेरी जिंदे !) जिसने आपको (संसार में) भेजा है।उसने आपको अपनी ओर प्रेरित करना आरम्भ किया हुआ है।आप आनंद से आत्मिक अडोलता से हृदय-घर में टिका रह। हे जिंदे ! आत्मिक अडोलता की रौंअ में।आनंद-खुशी पैदा करने वाले हरी-गुण गाया कर (इस तरह कामादिक वैरियों पर) अटल राज कर। 1। मेरे मित्र (मन) ! (अब) आप हृदय-घर में टिका रह (आ जा)। परमात्मा ने खुद ही (कामादिक) आपके वैरी दूर कर दिए हैं।(कामादिक वैरियों से पड़ रही मार की) विपदा (अब) समाप्त हो गई है।रहाउ। उनके अंदर उसने अपना आप प्रगट कर दिया, उनकी भटकनें खत्म हो गई। उनके हृदय-घर में आत्मिक आनंद के (मानो) बाजे सदा बजने लग जाते हैं (हे मेरी जिंदे !) सब कुछ कर सकने वाले पति-प्रभू ने जिन पर मेहर की। 2। (हे जिंदे !) गुरू के उपदेश पर चल के।गुरू के आसरे रह के।आप भी कामादिक वैरियों के सामने मजबूती से खड़े हो जाइए। ध्यान रखिए, कभी डोलिए नहीं। सारी सृष्टि में शोभा होगी।प्रभू की हजूरी में आपका मुँह उज्जवल होंगे। 3। हे नानक ! जिस प्रभू जी ने जीव पैदा किए हुए हैं।वह स्वयं ही इनको (विकारों से) बचाता है।वह खुद ही मददगार बनता है। सब कुछ कर सकने वाले परमात्मा ने ये अनोखी खेल बना दी है।उसकी महिमा सदा कायम रहने वाली है। 4। 4। 28।
सुनहु संत पिआरे बिनउ हमारे जीउ ॥
धनासरी महला 5 घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुनहु संत पिआरे बिनउ हमारे जीउ ॥
हरि बिनु मुकति न काहू जीउ ॥ रहाउ ॥
मन निरमल करम करि तारन तरन हरि अवरि जंजाल तेरै काहू न काम जीउ ॥
जीवन देवा पारब्रहम सेवा इहु उपदेसु मो कउ गुरि दीना जीउ ॥1॥
तिसु सिउ न लाईऐ हीतु जा को किछु नाही बीतु अंत की बार ओहु संगि न चालै ॥
मनि तनि तू आराध हरि के प्रीतम साध जा कै संगि तेरे बंधन छूटै ॥2॥
गहु पारब्रहम सरन हिरदै कमल चरन अवर आस कछु पटलु न कीजै ॥
सोई भगतु गिआनी धिआनी तपा सोई नानक जा कउ किरपा कीजै ॥3॥1॥29॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुनहु संत पिआरे बिनउ हमारे जीउ ॥
हरि बिनु मुकति न काहू जीउ ॥ रहाउ ॥
मन निरमल करम करि तारन तरन हरि अवरि जंजाल तेरै काहू न काम जीउ ॥
जीवन देवा पारब्रहम सेवा इहु उपदेसु मो कउ गुरि दीना जीउ ॥1॥
तिसु सिउ न लाईऐ हीतु जा को किछु नाही बीतु अंत की बार ओहु संगि न चालै ॥
मनि तनि तू आराध हरि के प्रीतम साध जा कै संगि तेरे बंधन छूटै ॥2॥
गहु पारब्रहम सरन हिरदै कमल चरन अवर आस कछु पटलु न कीजै ॥
सोई भगतु गिआनी धिआनी तपा सोई नानक जा कउ किरपा कीजै ॥3॥1॥29॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घर 6 ॥ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्यारे संत जनो ! मेरी विनती सुनो। परमात्मा (के सिमरन) के बिना (माया के बँधनों से) किसी की भी खलासी नहीं होती।रहाउ। हे मन ! (जीवन को) पवित्र करने वाले (हरी सिमरन के) काम किया कर।परमात्मा (का नाम ही संसार-समुंद्र से) पार लंघाने के लिए जहाज है।(दुनिया के) और सारे जंजाल आपके किसी भी काम नहीं आने वाले। प्रकाश-रूप परमात्मा की सेवा-भक्ति ही (असल) जीवन है, ये शिक्षा मुझे गुरू ने दी है। 1। हे भाई ! उस (धन-पदार्थ) से प्यार नहीं डालना चाहिए।जिसकी कोई पायां नहीं।वह (धन-पदार्थ) आखिर के वक्त साथ नहीं जाता। अपने मन में हृदय में आप परमात्मा का नाम सिमरा कर।परमात्मा से प्यार करने वाले संत जनों (की संगति किया कर)।क्योंकि उन (संत जनों की) संगति में आपके (माया के) बँधन समाप्त हो सकते हैं। 2। हे भाई ! परमात्मा का आसरा ले।(अपने) हृदय में (परमात्मा के) कोमल चरण (बसा) (परमात्मा के बिना) किसी और की आस नहीं करनी चाहिए।कोई और आसरा नहीं ढूँढना चाहिए। हे नानक ! वही मनुष्य भक्त है।वही ज्ञानवान है।वही सुरति-अभ्यासी है।वही तपस्वी है।जिस पर परमात्मा कृपा करता है। 3। 1। 29।
मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥
धनासरी महला 5 ॥
मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥
देखहु पसारि नैन सुनहु साधू के बैन प्रानपति चिति राखु सगल है मरना ॥ रहाउ ॥
चंदन चोआ रस भोग करत अनेकै बिखिआ बिकार देखु सगल है फीके एकै गोबिद को नामु नीको कहत है साध जन ॥
तनु धनु आपन थापिओ हरि जपु न निमख जापिओ अरथु द्रबु देखु कछु संगि नाही चलना ॥1॥
जा को रे करमु भला तिनि ओट गही संत पला तिन नाही रे जमु संतावै साधू की संगना ॥
पाइओ रे परम निधानु मिटिओ है अभिमानु एकै निरंकार नानक मनु लगना ॥2॥2॥30॥
मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥
देखहु पसारि नैन सुनहु साधू के बैन प्रानपति चिति राखु सगल है मरना ॥ रहाउ ॥
चंदन चोआ रस भोग करत अनेकै बिखिआ बिकार देखु सगल है फीके एकै गोबिद को नामु नीको कहत है साध जन ॥
तनु धनु आपन थापिओ हरि जपु न निमख जापिओ अरथु द्रबु देखु कछु संगि नाही चलना ॥1॥
जा को रे करमु भला तिनि ओट गही संत पला तिन नाही रे जमु संतावै साधू की संगना ॥
पाइओ रे परम निधानु मिटिओ है अभिमानु एकै निरंकार नानक मनु लगना ॥2॥2॥30॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे मेरे प्यारे ! हे भाई ! (परमात्मा के दर से) परमात्मा (का नाम) मांगना सबसे अच्छा काम है। हे सज्जन ! गुरू की बाणी (हमेशा) सुनते रहो।जिंद के मालिक प्रभू को अपने दिल में बसाए रखो।आँखें खोल के देखो।(आखिर) सबने मरना है।रहाउ। हे सज्जन ! आप चंदन-इत्र का प्रयोग करते हैं और अनेकों ही स्वादिष्ट खाने खाते हैं।पर।देख।ये विकार पैदा करने वाले सारे ही मायावी भोग फीके हैं।संत जन कहते हैं कि सिर्फ परमात्मा का नाम ही अच्छा है। आप इस शरीर का।इस धन को अपना समझ रहा है।(इनके मोह में फंस के) परमात्मा का नाम आप एक छिन भर भी नहीं जपता।देख।ये धन-पदार्थ कुछ भी (आपके) साथ नहीं जाएगा। हे भाई ! जिस मनुष्य के भाग्य अच्छे हुए।उसने संतों का आसरा लिया।उसने संतों का पल्ला पकड़ा।हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की संगति में रहते हैं।उन्हें मौत का डर नहीं सता सकता। हे नानक ! जिस मनुष्य का मन सिर्फ परमात्मा में जुड़ा रहता है उसने सबसे बढ़िया खजाना पा लिया उसके अंदर से अहंकार मिट गया। 2। 2। 30।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६७८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।