ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि एकु सिमरि एकु सिमरि एकु सिमरि पिआरे ॥
कलि कलेस लोभ मोह महा भउजलु तारे ॥ रहाउ ॥
सासि सासि निमख निमख दिनसु रैनि चितारे ॥
साधसंग जपि निसंग मनि निधानु धारे ॥1॥
चरन कमल नमसकार गुन गोबिद बीचारे ॥
साध जना की रेन नानक मंगल सूख सधारे ॥2॥1॥31॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि सासि समाले ॥
इह लोकि परलोकि संगि सहाई जत कत मोहि रखवाले ॥1॥
गुर का बचनु बसै जीअ नाले ॥
जलि नही डूबै तसकरु नही लेवै भाहि न साकै जाले ॥1॥ रहाउ ॥
निरधन कउ धनु अंधुले कउ टिक मात दूधु जैसे बाले ॥
सागर महि बोहिथु पाइओ हरि नानक करी क्रिपा किरपाले ॥2॥1॥32॥
भए क्रिपाल दइआल गोबिंदा अंम्रितु रिदै सिंचाई ॥
नव निधि रिधि सिधि हरि लागि रही जन पाई ॥1॥
संतन कउ अनदु सगल ही जाई ॥
ग्रिहि बाहरि ठाकुरु भगतन का रवि रहिआ स्रब ठाई ॥1॥ रहाउ ॥
ता कउ कोइ न पहुचनहारा जा कै अंगि गुसाई ॥
जम की त्रास मिटै जिसु सिमरत नानक नामु धिआई ॥2॥2॥33॥
दरबवंतु दरबु देखि गरबै भूमवंतु अभिमानी ॥
राजा जानै सगल राजु हमरा तिउ हरि जन टेक सुआमी ॥1॥
जे कोऊ अपुनी ओट समारै ॥
जैसा बितु तैसा होइ वरतै अपुना बलु नही हारै ॥1॥ रहाउ ॥
आन तिआगि भए इक आसर सरणि सरणि करि आए ॥
संत अनुग्रह भए मन निरमल नानक हरि गुन गाए ॥2॥3॥34॥
जा कउ हरि रंगु लागो इसु जुग महि सो कहीअत है सूरा ॥
आतम जिणै सगल वसि ता कै जा का सतिगुरु पूरा ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी महला 5 घरु 7 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।