अंग
677
धनासरी
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश
धनासरी मः 5 ॥
धनासरी मः 5 ॥
सो कत डरै जि खसमु सम॑ारै ॥
डरि डरि पचे मनमुख वेचारे ॥1॥ रहाउ ॥
सिर ऊपरि मात पिता गुरदेव ॥
सफल मूरति जा की निरमल सेव ॥
एकु निरंजनु जा की रासि ॥
मिलि साधसंगति होवत परगास ॥1॥
जीअन का दाता पूरन सभ ठाइ ॥
कोटि कलेस मिटहि हरि नाइ ॥
जनम मरन सगला दुखु नासै ॥
गुरमुखि जा कै मनि तनि बासै ॥2॥
जिस नो आपि लए लड़ि लाइ ॥
दरगह मिलै तिसै ही जाइ ॥
सेई भगत जि साचे भाणे ॥
जमकाल ते भए निकाणे ॥3॥
साचा साहिबु सचु दरबारु ॥
कीमति कउणु कहै बीचारु ॥
घटि घटि अंतरि सगल अधारु ॥
नानकु जाचै संत रेणारु ॥4॥3॥24॥
सो कत डरै जि खसमु सम॑ारै ॥
डरि डरि पचे मनमुख वेचारे ॥1॥ रहाउ ॥
सिर ऊपरि मात पिता गुरदेव ॥
सफल मूरति जा की निरमल सेव ॥
एकु निरंजनु जा की रासि ॥
मिलि साधसंगति होवत परगास ॥1॥
जीअन का दाता पूरन सभ ठाइ ॥
कोटि कलेस मिटहि हरि नाइ ॥
जनम मरन सगला दुखु नासै ॥
गुरमुखि जा कै मनि तनि बासै ॥2॥
जिस नो आपि लए लड़ि लाइ ॥
दरगह मिलै तिसै ही जाइ ॥
सेई भगत जि साचे भाणे ॥
जमकाल ते भए निकाणे ॥3॥
साचा साहिबु सचु दरबारु ॥
कीमति कउणु कहै बीचारु ॥
घटि घटि अंतरि सगल अधारु ॥
नानकु जाचै संत रेणारु ॥4॥3॥24॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य पति-प्रभू को अपने हृदय में बसाए रखता है।वह कहीं भी नहीं डरता। परअपने मन के पीछे चलने वाले निमाणे (मौत आदि से डर के) डर-डर के ख्वार होते रहते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! उस प्रकाश-रूप प्रभू को माता-पिता की तरह जो मनुष्य अपने सिर के ऊपर (रखवाला समझता है)। जिस परमात्मा के दर्शन करने से सारे फल प्राप्त होते हैं।जिसकी सेवा-भक्ति पवित्र जीवन वाली बना देती है। माया से निर्लिप प्रभू का नाम ही जिस मनुष्य (के आत्मिक जीवन) का सरमाया बन जाता है। साध-संगति में मिल के उस मनुष्य के अंदर जीवन-प्रकाश हो जाता है। 1। हे भाई ! जो परमात्मा सब जीवों को दातें देने वाला है।जो हर जगह मौजूद है। जिस प्रभू के नाम में जुड़ने से करोड़ों दुख-कलेश मिट जाते हैं। उसके जनम-मरण का सारा दुख नाश हो जाता है। गुरू के द्वारा वह प्रभू जिस मनुष्य के मन में हृदय में आ बसता है। 2। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य को स्वयं अपने पल्ले से लगा लेता है। उसी को ही परमात्मा की हजूरी में जगह मिलती है। हे भाई ! वही मनुष्य परमात्मा के भक्त कहलवा सकते हैं। जो उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा को प्यारे लगते हैं।वह मनुष्य मौत से निडर हो जाते हैं। 3। हे भाई ! मालिक प्रभू सदा कायम रहने वाला है।उसका दरबार (भी) सदा कायम रहने वाला है। कोई मनुष्य उसकी कीमत नहीं विचार सकता। वह प्रभू हरेक के शरीर में बसता है।(सब जीवों के) अंदर बसता है।सब जीवों का आसरा है। नानक उस प्रभू के संत जनों की चरण-धूड़ माँगता है। 4। 3। 24।
घरि बाहरि तेरा भरवासा तू जन कै है संगि ॥
धनासरी महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
घरि बाहरि तेरा भरवासा तू जन कै है संगि ॥
करि किरपा प्रीतम प्रभ अपुने नामु जपउ हरि रंगि ॥1॥
जन कउ प्रभ अपने का ताणु ॥
जो तू करहि करावहि सुआमी सा मसलति परवाणु ॥ रहाउ ॥
पति परमेसरु गति नाराइणु धनु गुपाल गुण साखी ॥
चरन सरन नानक दास हरि हरि संती इह बिधि जाती ॥2॥1॥25॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
घरि बाहरि तेरा भरवासा तू जन कै है संगि ॥
करि किरपा प्रीतम प्रभ अपुने नामु जपउ हरि रंगि ॥1॥
जन कउ प्रभ अपने का ताणु ॥
जो तू करहि करावहि सुआमी सा मसलति परवाणु ॥ रहाउ ॥
पति परमेसरु गति नाराइणु धनु गुपाल गुण साखी ॥
चरन सरन नानक दास हरि हरि संती इह बिधि जाती ॥2॥1॥25॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! आपके सेवक को घर के अंदर भी।घर से बाहर भी आपका ही सहारा रहता है।आप अपने सेवक के (सदा) साथ रहते हैं। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! (मेरे पर भी) मेहर कर।मैं आपके प्यार में टिक के आपका नाम जपता रहूँ। 1। हे भाई ! प्रभू के सेवक को अपने प्रभू का आसरा होता है। हे मालिक प्रभू ! जो कुछ आप करते हैं जो कुछ आप (सेवक से) करवाते हैं।(सेवक को) वही प्रेरणा पसंद आती है।रहाउ। हे भाई ! (परमात्मा के सेवक के लिए) परमात्मा (का नाम ही) इज्जत है।परमात्मा (का नाम ही) ऊँची आत्मिक अवस्था है।परमात्मा के गुणों की साखियां सेवक के लिए धन-पदार्थ हैं। हे नानक ! प्रभू के सेवक प्रभू के चरणों की शरण पड़े रहते हैं।संत जनों ने उसी को ही (सही) जीवन जुगति समझा है। 2। 1। 25।
सगल मनोरथ प्रभ ते पाए कंठि लाइ गुरि राखे ॥
धनासरी महला 5 ॥
सगल मनोरथ प्रभ ते पाए कंठि लाइ गुरि राखे ॥
संसार सागर महि जलनि न दीने किनै न दुतरु भाखे ॥1॥
जिन कै मनि साचा बिस्वासु ॥
पेखि पेखि सुआमी की सोभा आनदु सदा उलासु ॥ रहाउ ॥
चरन सरनि पूरन परमेसुर अंतरजामी साखिओ ॥
जानि बूझि अपना कीओ नानक भगतन का अंकुरु राखिओ ॥2॥2॥26॥
सगल मनोरथ प्रभ ते पाए कंठि लाइ गुरि राखे ॥
संसार सागर महि जलनि न दीने किनै न दुतरु भाखे ॥1॥
जिन कै मनि साचा बिस्वासु ॥
पेखि पेखि सुआमी की सोभा आनदु सदा उलासु ॥ रहाउ ॥
चरन सरनि पूरन परमेसुर अंतरजामी साखिओ ॥
जानि बूझि अपना कीओ नानक भगतन का अंकुरु राखिओ ॥2॥2॥26॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! उन मनुष्यों को गुरू ने (अपने) गले से लगा के (संसार-समुंद्र से) बचा लिया।उन्होंने अपनी सारी मुरादें परमात्मा से हासिल कर लीं। गुरू परमेश्वर ने उनको संसार-समुंद्र (के विकारों की आग) में नहीं जलने दिया।(उनमें से) किसी ने भी ये नहीं कहा कि संसार-समुंद्र में से पार लांघना मुश्किल है। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में (गुरू परमेश्वर के लिए) अटल श्रद्धा (बन जाती) है। मालिक प्रभू की शोभा-वडिआई देख-देख के उनके अंदर सदा आनंद बना रहता है।खुशी बनी रहती है।रहाउ। हे भाई ! उन मनुष्यों ने सर्व-व्यापक परमात्मा की शरण में रह के हरेक के दिल की जानने वाले परमात्मा को प्रत्यक्ष (हर जगह) देख लिया है। हे नानक ! (उनके दिल की) जान के समझ के परमात्मा ने उनको अपना बना लिया।(और।इस तरह अपने उन) भक्तों के अंदर भगती के फूटते कोमल अंकुर को (विकारों की आग में जलने से) परमात्मा ने बचा लिया। 2। 2। 26।
जह जह पेखउ तह हजूरि दूरि कतहु न जाई ॥
धनासरी महला 5 ॥
जह जह पेखउ तह हजूरि दूरि कतहु न जाई ॥
रवि रहिआ सरबत्र मै मन सदा धिआई ॥1॥
ईत ऊत नही बीछुड़ै सो संगी गनीऐ ॥
बिनसि जाइ जो निमख महि सो अलप सुखु भनीऐ ॥ रहाउ ॥
प्रतिपालै अपिआउ देइ कछु ऊन न होई ॥
सासि सासि संमालता मेरा प्रभु सोई ॥2॥
अछल अछेद अपार प्रभ ऊचा जा का रूपु ॥
जपि जपि करहि अनंदु जन अचरज आनूपु ॥3॥
सा मति देहु दइआल प्रभ जितु तुमहि अराधा ॥
जह जह पेखउ तह हजूरि दूरि कतहु न जाई ॥
रवि रहिआ सरबत्र मै मन सदा धिआई ॥1॥
ईत ऊत नही बीछुड़ै सो संगी गनीऐ ॥
बिनसि जाइ जो निमख महि सो अलप सुखु भनीऐ ॥ रहाउ ॥
प्रतिपालै अपिआउ देइ कछु ऊन न होई ॥
सासि सासि संमालता मेरा प्रभु सोई ॥2॥
अछल अछेद अपार प्रभ ऊचा जा का रूपु ॥
जपि जपि करहि अनंदु जन अचरज आनूपु ॥3॥
सा मति देहु दइआल प्रभ जितु तुमहि अराधा ॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! मैं जहाँ-जहाँ देखता हूँ वहाँ-वहाँ ही परमात्मा हाजिर-नाजर है।वह किसी भी जगह से दूर नहीं। हे (मेरे) मन ! आप सदा उस प्रभू का सिमरन किया कर।जो सब में बस रहा है। 1। हे भाई ! उस (परमात्मा) को ही (असल) समझना चाहिए।(जो हमसे) इस लोक में परलोक में (कहीं भी) अलग नहीं होता। उस सुख को होछा सुख कहना चाहिए जो आँख झपकने जितने समय में ही समाप्त हो जाता है।रहाउ। हे भाई ! मेरा वह प्रभू भोजन दे के (सबको) पालता है।(उसकी कृपा से) किसी भी चीज की कमी नहीं रहती। वह प्रभू (हमारी) हरेक सांस के साथ-साथ हमारी संभाल करता रहता है। 2। हे भाई ! जो प्रभू छला नहीं जा सकता।नाश नहीं किया जा सकता।जिसकी हस्ती सबसे ऊँची है। और हैरान करने वाली है।जिसके बराबर का और कोई नहीं। उसके भक्त उसका नाम जप-जप के आत्मिक आनंद लेते रहते हैं। 3। हे दया के घर प्रभू ! मुझे वह समझ बख्श जिसकी बरकति से मैं आपको ही सिमरता रहूँ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६७७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।