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अंग 677

अंग
677
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धनासरी मः 5 ॥
सो कत डरै जि खसमु सम॑ारै ॥
डरि डरि पचे मनमुख वेचारे ॥1॥ रहाउ ॥
सिर ऊपरि मात पिता गुरदेव ॥
सफल मूरति जा की निरमल सेव ॥
एकु निरंजनु जा की रासि ॥
मिलि साधसंगति होवत परगास ॥1॥
जीअन का दाता पूरन सभ ठाइ ॥
कोटि कलेस मिटहि हरि नाइ ॥
जनम मरन सगला दुखु नासै ॥
गुरमुखि जा कै मनि तनि बासै ॥2॥
जिस नो आपि लए लड़ि लाइ ॥
दरगह मिलै तिसै ही जाइ ॥
सेई भगत जि साचे भाणे ॥
जमकाल ते भए निकाणे ॥3॥
साचा साहिबु सचु दरबारु ॥
कीमति कउणु कहै बीचारु ॥
घटि घटि अंतरि सगल अधारु ॥
नानकु जाचै संत रेणारु ॥4॥3॥24॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य पति-प्रभू को अपने हृदय में बसाए रखता है।वह कहीं भी नहीं डरता। परअपने मन के पीछे चलने वाले निमाणे (मौत आदि से डर के) डर-डर के ख्वार होते रहते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! उस प्रकाश-रूप प्रभू को माता-पिता की तरह जो मनुष्य अपने सिर के ऊपर (रखवाला समझता है)। जिस परमात्मा के दर्शन करने से सारे फल प्राप्त होते हैं।जिसकी सेवा-भक्ति पवित्र जीवन वाली बना देती है। माया से निर्लिप प्रभू का नाम ही जिस मनुष्य (के आत्मिक जीवन) का सरमाया बन जाता है। साध-संगति में मिल के उस मनुष्य के अंदर जीवन-प्रकाश हो जाता है। 1। हे भाई ! जो परमात्मा सब जीवों को दातें देने वाला है।जो हर जगह मौजूद है। जिस प्रभू के नाम में जुड़ने से करोड़ों दुख-कलेश मिट जाते हैं। उसके जनम-मरण का सारा दुख नाश हो जाता है। गुरू के द्वारा वह प्रभू जिस मनुष्य के मन में हृदय में आ बसता है। 2। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य को स्वयं अपने पल्ले से लगा लेता है। उसी को ही परमात्मा की हजूरी में जगह मिलती है। हे भाई ! वही मनुष्य परमात्मा के भक्त कहलवा सकते हैं। जो उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा को प्यारे लगते हैं।वह मनुष्य मौत से निडर हो जाते हैं। 3। हे भाई ! मालिक प्रभू सदा कायम रहने वाला है।उसका दरबार (भी) सदा कायम रहने वाला है। कोई मनुष्य उसकी कीमत नहीं विचार सकता। वह प्रभू हरेक के शरीर में बसता है।(सब जीवों के) अंदर बसता है।सब जीवों का आसरा है। नानक उस प्रभू के संत जनों की चरण-धूड़ माँगता है। 4। 3। 24।
धनासरी महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
घरि बाहरि तेरा भरवासा तू जन कै है संगि ॥
करि किरपा प्रीतम प्रभ अपुने नामु जपउ हरि रंगि ॥1॥
जन कउ प्रभ अपने का ताणु ॥
जो तू करहि करावहि सुआमी सा मसलति परवाणु ॥ रहाउ ॥
पति परमेसरु गति नाराइणु धनु गुपाल गुण साखी ॥
चरन सरन नानक दास हरि हरि संती इह बिधि जाती ॥2॥1॥25॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! आपके सेवक को घर के अंदर भी।घर से बाहर भी आपका ही सहारा रहता है।आप अपने सेवक के (सदा) साथ रहता है। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! (मेरे पर भी) मेहर कर।मैं आपके प्यार में टिक के आपका नाम जपता रहूँ। 1। हे भाई ! प्रभू के सेवक को अपने प्रभू का आसरा होता है। हे मालिक प्रभू ! जो कुछ आप करता है जो कुछ आप (सेवक से) करवाता है।(सेवक को) वही प्रेरणा पसंद आती है।रहाउ। हे भाई ! (परमात्मा के सेवक के लिए) परमात्मा (का नाम ही) इज्जत है।परमात्मा (का नाम ही) ऊँची आत्मिक अवस्था है।परमात्मा के गुणों की साखियां सेवक के लिए धन-पदार्थ हैं। हे नानक ! प्रभू के सेवक प्रभू के चरणों की शरण पड़े रहते हैं।संत जनों ने उसी को ही (सही) जीवन जुगति समझा है। 2। 1। 25।
धनासरी महला 5 ॥
सगल मनोरथ प्रभ ते पाए कंठि लाइ गुरि राखे ॥
संसार सागर महि जलनि न दीने किनै न दुतरु भाखे ॥1॥
जिन कै मनि साचा बिस्वासु ॥
पेखि पेखि सुआमी की सोभा आनदु सदा उलासु ॥ रहाउ ॥
चरन सरनि पूरन परमेसुर अंतरजामी साखिओ ॥
जानि बूझि अपना कीओ नानक भगतन का अंकुरु राखिओ ॥2॥2॥26॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! उन मनुष्यों को गुरू ने (अपने) गले से लगा के (संसार-समुंद्र से) बचा लिया।उन्होंने अपनी सारी मुरादें परमात्मा से हासिल कर लीं। गुरू परमेश्वर ने उनको संसार-समुंद्र (के विकारों की आग) में नहीं जलने दिया।(उनमें से) किसी ने भी ये नहीं कहा कि संसार-समुंद्र में से पार लांघना मुश्किल है। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में (गुरू परमेश्वर के लिए) अटल श्रद्धा (बन जाती) है। मालिक प्रभू की शोभा-वडिआई देख-देख के उनके अंदर सदा आनंद बना रहता है।खुशी बनी रहती है।रहाउ। हे भाई ! उन मनुष्यों ने सर्व-व्यापक परमात्मा की शरण में रह के हरेक के दिल की जानने वाले परमात्मा को प्रत्यक्ष (हर जगह) देख लिया है। हे नानक ! (उनके दिल की) जान के समझ के परमात्मा ने उनको अपना बना लिया।(और।इस तरह अपने उन) भक्तों के अंदर भगती के फूटते कोमल अंकुर को (विकारों की आग में जलने से) परमात्मा ने बचा लिया। 2। 2। 26।
धनासरी महला 5 ॥
जह जह पेखउ तह हजूरि दूरि कतहु न जाई ॥
रवि रहिआ सरबत्र मै मन सदा धिआई ॥1॥
ईत ऊत नही बीछुड़ै सो संगी गनीऐ ॥
बिनसि जाइ जो निमख महि सो अलप सुखु भनीऐ ॥ रहाउ ॥
प्रतिपालै अपिआउ देइ कछु ऊन न होई ॥
सासि सासि संमालता मेरा प्रभु सोई ॥2॥
अछल अछेद अपार प्रभ ऊचा जा का रूपु ॥
जपि जपि करहि अनंदु जन अचरज आनूपु ॥3॥
सा मति देहु दइआल प्रभ जितु तुमहि अराधा ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! मैं जहाँ-जहाँ देखता हूँ वहाँ-वहाँ ही परमात्मा हाजिर-नाजर है।वह किसी भी जगह से दूर नहीं। हे (मेरे) मन ! आप सदा उस प्रभू का सिमरन किया कर।जो सब में बस रहा है। 1। हे भाई ! उस (परमात्मा) को ही (असल) समझना चाहिए।(जो हमसे) इस लोक में परलोक में (कहीं भी) अलग नहीं होता। उस सुख को होछा सुख कहना चाहिए जो आँख झपकने जितने समय में ही समाप्त हो जाता है।रहाउ। हे भाई ! मेरा वह प्रभू भोजन दे के (सबको) पालता है।(उसकी कृपा से) किसी भी चीज की कमी नहीं रहती। वह प्रभू (हमारी) हरेक सांस के साथ-साथ हमारी संभाल करता रहता है। 2। हे भाई ! जो प्रभू छला नहीं जा सकता।नाश नहीं किया जा सकता।जिसकी हस्ती सबसे ऊँची है। और हैरान करने वाली है।जिसके बराबर का और कोई नहीं। उसके भक्त उसका नाम जप-जप के आत्मिक आनंद लेते रहते हैं। 3। हे दया के घर प्रभू ! मुझे वह समझ बख्श जिसकी बरकति से मैं आपको ही सिमरता रहूँ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य पति-प्रभू को अपने हृदय में बसाए रखता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।