फिरत फिरत भेटे जन साधू पूरै गुरि समझाइआ ॥
आन सगल बिधि कांमि न आवै हरि हरि नामु धिआइआ ॥1॥
ता ते मोहि धारी ओट गोपाल ॥
सरनि परिओ पूरन परमेसुर बिनसे सगल जंजाल ॥ रहाउ ॥
सुरग मिरत पइआल भू मंडल सगल बिआपे माइ ॥
जीअ उधारन सभ कुल तारन हरि हरि नामु धिआइ ॥2॥
नानक नामु निरंजनु गाईऐ पाईऐ सरब निधाना ॥
करि किरपा जिसु देइ सुआमी बिरले काहू जाना ॥3॥3॥21॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
छोडि जाहि से करहि पराल ॥
कामि न आवहि से जंजाल ॥
संगि न चालहि तिन सिउ हीत ॥
जो बैराई सेई मीत ॥1॥
ऐसे भरमि भुले संसारा ॥
जनमु पदारथु खोइ गवारा ॥ रहाउ ॥
साचु धरमु नही भावै डीठा ॥
झूठ धोह सिउ रचिओ मीठा ॥
दाति पिआरी विसरिआ दातारा ॥
जाणै नाही मरणु विचारा ॥2॥
वसतु पराई कउ उठि रोवै ॥
करम धरम सगला ई खोवै ॥
हुकमु न बूझै आवण जाणे ॥
पाप करै ता पछोताणे ॥3॥
जो तुधु भावै सो परवाणु ॥
तेरे भाणे नो कुरबाणु ॥
नानकु गरीबु बंदा जनु तेरा ॥
राखि लेइ साहिबु प्रभु मेरा ॥4॥1॥22॥
मोहि मसकीन प्रभु नामु अधारु ॥
खाटण कउ हरि हरि रोजगारु ॥
संचण कउ हरि एको नामु ॥
हलति पलति ता कै आवै काम ॥1॥
नामि रते प्रभ रंगि अपार ॥
साध गावहि गुण एक निरंकार ॥ रहाउ ॥
साध की सोभा अति मसकीनी ॥
संत वडाई हरि जसु चीनी ॥
अनदु संतन कै भगति गोविंद ॥
सूखु संतन कै बिनसी चिंद ॥2॥
जह साध संतन होवहि इकत्र ॥
तह हरि जसु गावहि नाद कवित ॥
साध सभा महि अनद बिस्राम ॥
उन संगु सो पाए जिसु मसतकि कराम ॥3॥
दुइ कर जोड़ि करी अरदासि ॥
चरन पखारि कहां गुणतास ॥
प्रभ दइआल किरपाल हजूरि ॥
नानकु जीवै संता धूरि ॥4॥2॥23॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।