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अंग 675

अंग
675
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अउखध मंत्र मूल मन एकै मनि बिस्वासु प्रभ धारिआ ॥
चरन रेन बांछै नित नानकु पुनह पुनह बलिहारिआ ॥2॥16॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे मन ! परमात्मा का एक नाम ही सारी दवाओं का मूल है।सारे मंत्रों का मूल है।जिस मनूष्य ने अपने मन में परमात्मा के लिए श्रद्धा धारण कर ली है। नानक उसके चरणों की धूड़ सदा मांगता है।नानक उस मनुष्य से सदा सदके जाता है। 2। 16।
धनासरी महला 5 ॥
मेरा लागो राम सिउ हेतु ॥
सतिगुरु मेरा सदा सहाई जिनि दुख का काटिआ केतु ॥1॥ रहाउ ॥
हाथ देइ राखिओ अपुना करि बिरथा सगल मिटाई ॥
निंदक के मुख काले कीने जन का आपि सहाई ॥1॥
साचा साहिबु होआ रखवाला राखि लीए कंठि लाइ ॥
निरभउ भए सदा सुख माणे नानक हरि गुण गाइ ॥2॥17॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई !मेरा परमात्मा से प्यार बन गया है। 1।रहाउ। जिस गुरू ने (शरण आए हरेक मनुष्य का) चोटी वाला तारा ही सदा के लिए काट दिया है (जो गुरू हरेक शरण आए मनुष्य के दुखों की जड़ ही काट देता है)।वह गुरू मेरा भी सदा के लिए मददगार बन गया है (हे भाई ! वह परमात्मा अपने सेवकों को अपना) हाथ दे के (दुखों से) बचाता है।(सेवकों को) अपने बना के उनका सारा दुख-दर्द मिटा देता है। परमात्मा अपने सेवकों का आप मददगार बनता है।और।उनकी निंदा करने वालों का मुँह काला करता है। 1। हे नानक ! सदा कायम रहने वाला मालिक (अपने सेवकों का स्वयं) रक्षक बनता है।उनको अपने गले से लगा के रखता है। परमात्मा के सेवक परमात्मा के गुण गा-गा के।और सदा आत्मिक आनंद पा कर (दुख-कलेशों से) निडर हो जाते हैं। 2। 17।
धनासिरी महला 5 ॥
अउखधु तेरो नामु दइआल ॥
मोहि आतुर तेरी गति नही जानी तूं आपि करहि प्रतिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
धारि अनुग्रहु सुआमी मेरे दुतीआ भाउ निवारि ॥
बंधन काटि लेहु अपुने करि कबहू न आवह हारि ॥1॥
तेरी सरनि पइआ हउ जीवां तूं संम्रथु पुरखु मिहरवानु ॥
आठ पहर प्रभ कउ आराधी नानक सद कुरबानु ॥2॥18॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे दया के घर प्रभू ! आपका नाम (मेरे हरेक रोग की) दवा है।पर। मुझ दुखी ने समझा ही नहीं कि आप कितनी ऊँची आत्मिक अवस्था वाला है।(फिर भी) आप खुद मेरी पालना करता है। 1।रहाउ। हे मेरे मालिक ! मेरे पर मेहर कर (मेरे अंदर से) माया का मोह दूर कर। हे प्रभू ! हमारे (माया के मोह के) बँधन काट के हमें अपने बना लो।हम कभी (मानस जनम की बाजी) हार के ना आएं। 1। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) आपकी शरण पड़ कर मैं आत्मिक जीवन वाला बना रहता हूँ (मुझे अपनी शरण में रख) आप सारी शक्तियों का मालिक है।आप सर्व-व्यापक है।आप (सब पर) दया करने वाला है। (हे भाई ! मेरी यही अरदास है कि) मैं आठों पहर परमात्मा की आराधना करता रहूँ।मैं उससे सदा कुर्बान जाता हूँ। 2। 18।
रागु धनासरी महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हा हा प्रभ राखि लेहु ॥
हम ते किछू न होइ मेरे स्वामी करि किरपा अपुना नामु देहु ॥1॥ रहाउ ॥
अगनि कुटंब सागर संसार ॥
भरम मोह अगिआन अंधार ॥1॥
ऊच नीच सूख दूख ॥
ध्रापसि नाही त्रिसना भूख ॥2॥
मनि बासना रचि बिखै बिआधि ॥
पंच दूत संगि महा असाध ॥3॥
जीअ जहानु प्रान धनु तेरा ॥
नानक जानु सदा हरि नेरा ॥4॥1॥19॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु धनासरी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! हमें बचा ले।हमें बचा ले। हे मेरे मालिक ! (इन विकारों से बचने के लिए) हम जीवों से कुछ नहीं हो सकता।मेहर कर ! अपना नाम बख्श !। 1।रहाउ। हे प्रभू ! ये संसार-समुंद्र परिवार (के मोह) की आग (से भरा पड़ा) है। भटकना। माया का मोह।आत्मिक जीवन से बेसमझी- ये सारे घुप अंधकार बनाए हुए हैं। 1। हे प्रभू ! दुनिया के सुख मिलने से जीव को अहंकार पैदा हो जाता है।दुख मिलने पर वह ढलती सोच वाली हालत में जाता है। जीव (माया से किसी भी समय) तृप्त नहीं होता।इसे माया की प्यास माया की भूख चिपकी रहती है। 2। हे प्रभू ! जीव अपने मन में वासनाएं खड़ी करके विषौ-विकारों के कारण रोग सहेड़ लेता है। ये बड़े आकी (कामादिक) पाँचो वैरी इसके साथ चिपके रहते हैं। 3। हे प्रभू !) ये सारे जीव।ये जगत।ये धन।जीवों के प्राण – ये सब कुछ आपका ही रचा हुआ है (आप ही विकारों से बचाने के समर्थ है) हे नानक ! (अगर इन वैरियों से बचना है तो) परमात्मा को सदा अपने अंग-संग बसता समझ। 4। 1। 19।
धनासरी महला 5 ॥
दीन दरद निवारि ठाकुर राखै जन की आपि ॥
तरण तारण हरि निधि दूखु न सकै बिआपि ॥1॥
साधू संगि भजहु गुपाल ॥
आन संजम किछु न सूझै इह जतन काटि कलि काल ॥ रहाउ ॥
आदि अंति दइआल पूरन तिसु बिना नही कोइ ॥
जनम मरण निवारि हरि जपि सिमरि सुआमी सोइ ॥2॥
बेद सिंम्रिति कथै सासत भगत करहि बीचारु ॥
मुकति पाईऐ साधसंगति बिनसि जाइ अंधारु ॥3॥
चरन कमल अधारु जन का रासि पूंजी एक ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा अनाथों के दुख दूर करके अपने सेवकों की लाज स्वयं रखता है। वह प्रभू (संसार समुंद्र से पार) लंघाने के लिए (जैसे) जहाज है।वह हरी सारे सुखों का खजाना है।(उसकी शरण पड़ने से कोई) दुख व्याप नहीं सकता। 1। हे भाई ! गुरू की संगति में (रह के) परमात्मा का नाम जपा कर। इन यत्नों से ही संसार के झमेलों के फंदों को काट।(मुझे इसके बिना) और कोई युक्ति नहीं सूझती।रहाउ। हे भाई ! जो दया का घर।सर्व-व्यापक प्रभू हमेशा ही (जीवों के सिर पर रखवाला) है और उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं उसी मालिक का नाम सदा सिमरा कर।उसी हरी का नाम जप के अपने जनम-मरण के चक्कर दूर कर। 2। हे भाई ! वेद-स्मृति-शास्त्र (हरेक धर्म पुस्तक जिस परमात्मा का) वर्णन करती है।भक्त जन (भी जिस परमात्मा के गुणों के) विचार करते हैं। साध-संगति में (उसका नाम सिमर के जगत के झमेलों से) निजात मिलती है।(माया के मोह के) अंधेरे दूर हो जाते हैं। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा के सुंदर चरण ही भक्तों (के आत्मिक जीवन) की राशि-पूँजी है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मन ! परमात्मा का एक नाम ही सारी दवाओं का मूल है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।