अंग
674
धनासरी
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निमख निमख तुम ही प्रतिपालहु हम बारिक तुमरे धारे ॥1॥
निमख निमख तुम ही प्रतिपालहु हम बारिक तुमरे धारे ॥1॥
जिहवा एक कवन गुन कहीऐ ॥
बेसुमार बेअंत सुआमी तेरो अंतु न किन ही लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि पराध हमारे खंडहु अनिक बिधी समझावहु ॥
हम अगिआन अलप मति थोरी तुम आपन बिरदु रखावहु ॥2॥
तुमरी सरणि तुमारी आसा तुम ही सजन सुहेले ॥
राखहु राखनहार दइआला नानक घर के गोले ॥3॥12॥
जिहवा एक कवन गुन कहीऐ ॥
बेसुमार बेअंत सुआमी तेरो अंतु न किन ही लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि पराध हमारे खंडहु अनिक बिधी समझावहु ॥
हम अगिआन अलप मति थोरी तुम आपन बिरदु रखावहु ॥2॥
तुमरी सरणि तुमारी आसा तुम ही सजन सुहेले ॥
राखहु राखनहार दइआला नानक घर के गोले ॥3॥12॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आप ही एक-एक छिन हमारी पालना करते हैं।हम (आपके) बच्चे आपके आसरे (जीते) हैं। 1। (मनुष्य की) एक जीभ से आपका कौन-कौन सा गुण बताया जाए। हे अनगिनत गुणों के मालिक ! हे बेअंत मालिक प्रभू ! किसी भी पक्ष से आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप हमारे करोड़ों अपराध नाश करते हैं।आप हमें अनेकों तरीकों से (जीवन जुगति) समझाते हैं। हम जीव आत्मिक जीवन की सूझ से वंचित हैं।हमारी अक्ल थोड़ी है होछी है।(फिर भी) आप अपना बिरद भरा प्यार वाला स्वभाव सदा कायम रखते हैं। 2। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! हम आपके ही आसरे-सहारे से हैं।हमें आपकी ही (सहायता की) आस है।आप ही हमारे सज्जन हैं।आप ही हमें सुख देने वाले हैं। हे दयावान ! हे सबकी रक्षा करने के समर्थ ! हमारी रक्षा कर।हम आपके घर के गुलाम हैं। 3। 12।
पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥
धनासरी महला 5 ॥
पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥
कहूं न भीजै संजम सुआमी बोलहि मीठे बैन ॥1॥
प्रभ जी को नामु जपत मन चैन ॥
बहु प्रकार खोजहि सभि ता कउ बिखमु न जाई लैन ॥1॥ रहाउ ॥
जाप ताप भ्रमन बसुधा करि उरध ताप लै गैन ॥
इह बिधि नह पतीआनो ठाकुर जोग जुगति करि जैन ॥2॥
अंम्रित नामु निरमोलकु हरि जसु तिनि पाइओ जिसु किरपैन ॥
साधसंगि रंगि प्रभ भेटे नानक सुखि जन रैन ॥3॥13॥
पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥
कहूं न भीजै संजम सुआमी बोलहि मीठे बैन ॥1॥
प्रभ जी को नामु जपत मन चैन ॥
बहु प्रकार खोजहि सभि ता कउ बिखमु न जाई लैन ॥1॥ रहाउ ॥
जाप ताप भ्रमन बसुधा करि उरध ताप लै गैन ॥
इह बिधि नह पतीआनो ठाकुर जोग जुगति करि जैन ॥2॥
अंम्रित नामु निरमोलकु हरि जसु तिनि पाइओ जिसु किरपैन ॥
साधसंगि रंगि प्रभ भेटे नानक सुखि जन रैन ॥3॥13॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! लोग देव-पूजा करते हैं।व्रत रखते हैं।माथे पर तिलक लगाते हैं।तीर्थों पर स्नान करते हैं।(गरीबों को) बड़े दान-पुंन करते है। मीठे बोल बोलते हैं।पर ऐसी किसी भी जुगति से मालिक प्रभू खुश नहीं होता। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपने से ही मन को शांति (प्राप्त होती है)। सारे लोक कई तरीकों से उस परमात्मा का ढूँढते हैं।(पर सिमरन के बिना उसे तलाशना) मुश्किल है।नहीं ढूँढ सकते। 1।रहाउ। हे भाई ! जप-तप करके।सारी धरती के चक्कर लगा के।सिर-भार तप करके। प्राण दसम द्वार पर चढ़ा के।योग मत की युक्तियां करके।जैन मत के तरीके अपना के -इन तरीकों से भी मालिक प्रभू नहीं पतीजता। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला है।परमात्मा की सिफत सालाह एक ऐसा पदार्थ है जिसका कोई मूल्य नहीं पड़ सकता -ये दाति उस मनुष्य ने हासिल की है जिस पर परमात्मा की कृपा हुई है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू की संगति से प्रेम-रंग में जुड़ के जिस मनुष्य को प्रभू जी मिले हैं।उस मनुष्य की जीवन-रात्रि ही सुख-आनंद में बीतती है। 3। 13।
बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥
धनासरी महला 5 ॥
बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥
असथिरु करे निहचलु इहु मनूआ बहुरि न कतहू धावै ॥1॥
है कोऊ ऐसो हमरा मीतु ॥
सगल समग्री जीउ हीउ देउ अरपउ अपनो चीतु ॥1॥ रहाउ ॥
पर धन पर तन पर की निंदा इन सिउ प्रीति न लागै ॥
संतह संगु संत संभाखनु हरि कीरतनि मनु जागै ॥2॥
गुण निधान दइआल पुरख प्रभ सरब सूख दइआला ॥
मागै दानु नामु तेरो नानकु जिउ माता बाल गुपाला ॥3॥14॥
बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥
असथिरु करे निहचलु इहु मनूआ बहुरि न कतहू धावै ॥1॥
है कोऊ ऐसो हमरा मीतु ॥
सगल समग्री जीउ हीउ देउ अरपउ अपनो चीतु ॥1॥ रहाउ ॥
पर धन पर तन पर की निंदा इन सिउ प्रीति न लागै ॥
संतह संगु संत संभाखनु हरि कीरतनि मनु जागै ॥2॥
गुण निधान दइआल पुरख प्रभ सरब सूख दइआला ॥
मागै दानु नामु तेरो नानकु जिउ माता बाल गुपाला ॥3॥14॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ जो मित्र मुझे माया के बँधनों से छुड़ा ले।मुझे परमात्मा मिला दे।मुझे परमात्मा का नाम सदा सुनाया करे। मेरे इस मन को डोलने से चंचलता से हटा ले।ता कि ये फिर किसी भी तरफ ना भटके (मैं अपना सब कुछ उसके हवाले कर दूँ)। 1। यदि मुझे कोई ऐसा मित्र मिल जाए (जो मुझे माया के बँधनों से छुड़ा ले) मैं उसे अपना सारा धन-पदार्थ।अपनी जिंद। अपना हृदय दे दूँ।मैं अपना चित्त उसके हवाले कर दूँ। 1।रहाउ। (कोई ऐसा मित्र मिल जाए जिसकी कृपा से) पराया धन।पराई स्त्री।पराई निंदा- इन सबसे मेरा प्यार ना रहे। मैं संतों का संग किया करूँ।मेरा संतों से बचन-बिलास रहे।परमात्मा की सिफत सालाह में मेरा मन हर वक्त सुचेत रहा करे। 2। हे गुणों के खजाने ! हे दया के घर ! हे सर्व व्यापक ! हे प्रभू ! हे सारे सुखों की बख्शिश करने वाले ! हे गोपाल ! जैसे बच्चे अपनी माँ से (खाने-पीने के लिए माँगते हैं) मैं आपका दास नानक आपसे आपके नाम का दान माँगता हूँ। 3। 14।
हरि हरि लीने संत उबारि ॥
धनासरी महला 5 ॥
हरि हरि लीने संत उबारि ॥
हरि के दास की चितवै बुरिआई तिस ही कउ फिरि मारि ॥1॥ रहाउ ॥
जन का आपि सहाई होआ निंदक भागे हारि ॥
भ्रमत भ्रमत ऊहां ही मूए बाहुड़ि ग्रिहि न मंझारि ॥1॥
नानक सरणि परिओ दुख भंजन गुन गावै सदा अपारि ॥
निंदक का मुखु काला होआ दीन दुनीआ कै दरबारि ॥2॥15॥
हरि हरि लीने संत उबारि ॥
हरि के दास की चितवै बुरिआई तिस ही कउ फिरि मारि ॥1॥ रहाउ ॥
जन का आपि सहाई होआ निंदक भागे हारि ॥
भ्रमत भ्रमत ऊहां ही मूए बाहुड़ि ग्रिहि न मंझारि ॥1॥
नानक सरणि परिओ दुख भंजन गुन गावै सदा अपारि ॥
निंदक का मुखु काला होआ दीन दुनीआ कै दरबारि ॥2॥15॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपने संतों को सदा ही बचाता । अगर कोई मनुष्य परमात्मा के सेवक की कोई हानि करने की सोचें सोचता है।तो परमात्मा उसको ही आत्मिक मौत मार देता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक का आप मददगार बनता है। उसके निंदक (निंदा के काम में) हार खा के भाग जाते हैं। निंदक मनुष्य निंदा के काम में भटक के निंदा के चक्कर में ही आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं।और फिर अनेकों जूनियों में जा पड़ते हैं। 1। हे नानक ! (कह, हे भाई ! जो मनुष्य) दुखों के नाश करने वाले परमात्मा की शरण आ पड़ता है। वह उस बेअंत प्रभू में लीन हो के सदा उसके गुण गाता रहता है।पर।उसकी निंदा करने वाले मनुष्य का मुँह दुनिया के दरबार में और दीन के दरबार में (लोक-परलोक में) काला होता है (निंदक लोक-परलोक में बदनामी कमाता है)। 2। 15।
अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥
धनासिरी महला 5 ॥
अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥
पतित पुनीत कीए खिन भीतरि सगला रोगु बिदारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गोसटि भई साध कै संगमि काम क्रोधु लोभु मारिआ ॥
सिमरि सिमरि पूरन नाराइन संगी सगले तारिआ ॥1॥
अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥
पतित पुनीत कीए खिन भीतरि सगला रोगु बिदारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गोसटि भई साध कै संगमि काम क्रोधु लोभु मारिआ ॥
सिमरि सिमरि पूरन नाराइन संगी सगले तारिआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों ने इस मानस जन्म में (विकारों से) बचा सकने वाले परमात्मा को याद करना शुरू कर दिया। परमात्मा ने एक छिन में उन्हें विकारियों से पवित्र जीवन वाले बना दिया।उनके सारे रोग काट दिए। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में जिन मनुष्यों का मेल हो गया।(परमात्मा ने उनके अंदर से) काम-क्रोध-लोभ मार दिया। सर्व-व्यापक परमात्मा का नाम बार-बार सिमर के उन्होंने अपने सारे साथी भी (संसार-समंद्र से) पार लंघा लिए। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६७४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।