जिहवा एक कवन गुन कहीऐ ॥
बेसुमार बेअंत सुआमी तेरो अंतु न किन ही लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि पराध हमारे खंडहु अनिक बिधी समझावहु ॥
हम अगिआन अलप मति थोरी तुम आपन बिरदु रखावहु ॥2॥
तुमरी सरणि तुमारी आसा तुम ही सजन सुहेले ॥
राखहु राखनहार दइआला नानक घर के गोले ॥3॥12॥
पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥
कहूं न भीजै संजम सुआमी बोलहि मीठे बैन ॥1॥
प्रभ जी को नामु जपत मन चैन ॥
बहु प्रकार खोजहि सभि ता कउ बिखमु न जाई लैन ॥1॥ रहाउ ॥
जाप ताप भ्रमन बसुधा करि उरध ताप लै गैन ॥
इह बिधि नह पतीआनो ठाकुर जोग जुगति करि जैन ॥2॥
अंम्रित नामु निरमोलकु हरि जसु तिनि पाइओ जिसु किरपैन ॥
साधसंगि रंगि प्रभ भेटे नानक सुखि जन रैन ॥3॥13॥
बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥
असथिरु करे निहचलु इहु मनूआ बहुरि न कतहू धावै ॥1॥
है कोऊ ऐसो हमरा मीतु ॥
सगल समग्री जीउ हीउ देउ अरपउ अपनो चीतु ॥1॥ रहाउ ॥
पर धन पर तन पर की निंदा इन सिउ प्रीति न लागै ॥
संतह संगु संत संभाखनु हरि कीरतनि मनु जागै ॥2॥
गुण निधान दइआल पुरख प्रभ सरब सूख दइआला ॥
मागै दानु नामु तेरो नानकु जिउ माता बाल गुपाला ॥3॥14॥
हरि हरि लीने संत उबारि ॥
हरि के दास की चितवै बुरिआई तिस ही कउ फिरि मारि ॥1॥ रहाउ ॥
जन का आपि सहाई होआ निंदक भागे हारि ॥
भ्रमत भ्रमत ऊहां ही मूए बाहुड़ि ग्रिहि न मंझारि ॥1॥
नानक सरणि परिओ दुख भंजन गुन गावै सदा अपारि ॥
निंदक का मुखु काला होआ दीन दुनीआ कै दरबारि ॥2॥15॥
अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥
पतित पुनीत कीए खिन भीतरि सगला रोगु बिदारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गोसटि भई साध कै संगमि काम क्रोधु लोभु मारिआ ॥
सिमरि सिमरि पूरन नाराइन संगी सगले तारिआ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आप ही एक-एक छिन हमारी पालना करता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।