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अंग 674

अंग
674
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
निमख निमख तुम ही प्रतिपालहु हम बारिक तुमरे धारे ॥1॥
जिहवा एक कवन गुन कहीऐ ॥
बेसुमार बेअंत सुआमी तेरो अंतु न किन ही लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि पराध हमारे खंडहु अनिक बिधी समझावहु ॥
हम अगिआन अलप मति थोरी तुम आपन बिरदु रखावहु ॥2॥
तुमरी सरणि तुमारी आसा तुम ही सजन सुहेले ॥
राखहु राखनहार दइआला नानक घर के गोले ॥3॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आप ही एक-एक छिन हमारी पालना करता है।हम (आपके) बच्चे आपके आसरे (जीते) हैं। 1। (मनुष्य की) एक जीभ से आपका कौन-कौन सा गुण बताया जाए। हे अनगिनत गुणों के मालिक ! हे बेअंत मालिक प्रभू ! किसी भी पक्ष से आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप हमारे करोड़ों अपराध नाश करता है।आप हमें अनेकों तरीकों से (जीवन जुगति) समझाता है। हम जीव आत्मिक जीवन की सूझ से वंचित हैं।हमारी अक्ल थोड़ी है होछी है।(फिर भी) आप अपना बिरद भरा प्यार वाला स्वभाव सदा कायम रखता है। 2। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! हम आपके ही आसरे-सहारे से हैं।हमें आपकी ही (सहायता की) आस है।आप ही हमारा सज्जन है।आप ही हमें सुख देने वाला है। हे दयावान ! हे सबकी रक्षा करने के समर्थ ! हमारी रक्षा कर।हम आपके घर के गुलाम हैं। 3। 12।
धनासरी महला 5 ॥
पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥
कहूं न भीजै संजम सुआमी बोलहि मीठे बैन ॥1॥
प्रभ जी को नामु जपत मन चैन ॥
बहु प्रकार खोजहि सभि ता कउ बिखमु न जाई लैन ॥1॥ रहाउ ॥
जाप ताप भ्रमन बसुधा करि उरध ताप लै गैन ॥
इह बिधि नह पतीआनो ठाकुर जोग जुगति करि जैन ॥2॥
अंम्रित नामु निरमोलकु हरि जसु तिनि पाइओ जिसु किरपैन ॥
साधसंगि रंगि प्रभ भेटे नानक सुखि जन रैन ॥3॥13॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! लोग देव-पूजा करते हैं।व्रत रखते हैं।माथे पर तिलक लगाते हैं।तीर्थों पर स्नान करते हैं।(गरीबों को) बड़े दान-पुंन करते है। मीठे बोल बोलते हैं।पर ऐसी किसी भी जुगति से मालिक प्रभू खुश नहीं होता। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपने से ही मन को शांति (प्राप्त होती है)। सारे लोक कई तरीकों से उस परमात्मा का ढूँढते हैं।(पर सिमरन के बिना उसे तलाशना) मुश्किल है।नहीं ढूँढ सकते। 1।रहाउ। हे भाई ! जप-तप करके।सारी धरती के चक्कर लगा के।सिर-भार तप करके। प्राण दसम द्वार पर चढ़ा के।योग मत की युक्तियां करके।जैन मत के तरीके अपना के -इन तरीकों से भी मालिक प्रभू नहीं पतीजता। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला है।परमात्मा की सिफत सालाह एक ऐसा पदार्थ है जिसका कोई मूल्य नहीं पड़ सकता -ये दाति उस मनुष्य ने हासिल की है जिस पर परमात्मा की कृपा हुई है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू की संगति से प्रेम-रंग में जुड़ के जिस मनुष्य को प्रभू जी मिले हैं।उस मनुष्य की जीवन-रात्रि ही सुख-आनंद में बीतती है। 3। 13।
धनासरी महला 5 ॥
बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥
असथिरु करे निहचलु इहु मनूआ बहुरि न कतहू धावै ॥1॥
है कोऊ ऐसो हमरा मीतु ॥
सगल समग्री जीउ हीउ देउ अरपउ अपनो चीतु ॥1॥ रहाउ ॥
पर धन पर तन पर की निंदा इन सिउ प्रीति न लागै ॥
संतह संगु संत संभाखनु हरि कीरतनि मनु जागै ॥2॥
गुण निधान दइआल पुरख प्रभ सरब सूख दइआला ॥
मागै दानु नामु तेरो नानकु जिउ माता बाल गुपाला ॥3॥14॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ जो मित्र मुझे माया के बँधनों से छुड़ा ले।मुझे परमात्मा मिला दे।मुझे परमात्मा का नाम सदा सुनाया करे। मेरे इस मन को डोलने से चंचलता से हटा ले।ता कि ये फिर किसी भी तरफ ना भटके (मैं अपना सब कुछ उसके हवाले कर दूँ)। 1। यदि मुझे कोई ऐसा मित्र मिल जाए (जो मुझे माया के बँधनों से छुड़ा ले) मैं उसे अपना सारा धन-पदार्थ।अपनी जिंद। अपना हृदय दे दूँ।मैं अपना चित्त उसके हवाले कर दूँ। 1।रहाउ। (कोई ऐसा मित्र मिल जाए जिसकी कृपा से) पराया धन।पराई स्त्री।पराई निंदा- इन सबसे मेरा प्यार ना रहे। मैं संतों का संग किया करूँ।मेरा संतों से बचन-बिलास रहे।परमात्मा की सिफत सालाह में मेरा मन हर वक्त सुचेत रहा करे। 2। हे गुणों के खजाने ! हे दया के घर ! हे सर्व व्यापक ! हे प्रभू ! हे सारे सुखों की बख्शिश करने वाले ! हे गोपाल ! जैसे बच्चे अपनी माँ से (खाने-पीने के लिए माँगते हैं) मैं आपका दास नानक आपसे आपके नाम का दान माँगता हूँ। 3। 14।
धनासरी महला 5 ॥
हरि हरि लीने संत उबारि ॥
हरि के दास की चितवै बुरिआई तिस ही कउ फिरि मारि ॥1॥ रहाउ ॥
जन का आपि सहाई होआ निंदक भागे हारि ॥
भ्रमत भ्रमत ऊहां ही मूए बाहुड़ि ग्रिहि न मंझारि ॥1॥
नानक सरणि परिओ दुख भंजन गुन गावै सदा अपारि ॥
निंदक का मुखु काला होआ दीन दुनीआ कै दरबारि ॥2॥15॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपने संतों को सदा ही बचाता । अगर कोई मनुष्य परमात्मा के सेवक की कोई हानि करने की सोचें सोचता है।तो परमात्मा उसको ही आत्मिक मौत मार देता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक का आप मददगार बनता है। उसके निंदक (निंदा के काम में) हार खा के भाग जाते हैं। निंदक मनुष्य निंदा के काम में भटक के निंदा के चक्कर में ही आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं।और फिर अनेकों जूनियों में जा पड़ते हैं। 1। हे नानक ! (कह, हे भाई ! जो मनुष्य) दुखों के नाश करने वाले परमात्मा की शरण आ पड़ता है। वह उस बेअंत प्रभू में लीन हो के सदा उसके गुण गाता रहता है।पर।उसकी निंदा करने वाले मनुष्य का मुँह दुनिया के दरबार में और दीन के दरबार में (लोक-परलोक में) काला होता है (निंदक लोक-परलोक में बदनामी कमाता है)। 2। 15।
धनासिरी महला 5 ॥
अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥
पतित पुनीत कीए खिन भीतरि सगला रोगु बिदारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गोसटि भई साध कै संगमि काम क्रोधु लोभु मारिआ ॥
सिमरि सिमरि पूरन नाराइन संगी सगले तारिआ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों ने इस मानस जन्म में (विकारों से) बचा सकने वाले परमात्मा को याद करना शुरू कर दिया। परमात्मा ने एक छिन में उन्हें विकारियों से पवित्र जीवन वाले बना दिया।उनके सारे रोग काट दिए। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में जिन मनुष्यों का मेल हो गया।(परमात्मा ने उनके अंदर से) काम-क्रोध-लोभ मार दिया। सर्व-व्यापक परमात्मा का नाम बार-बार सिमर के उन्होंने अपने सारे साथी भी (संसार-समंद्र से) पार लंघा लिए। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आप ही एक-एक छिन हमारी पालना करता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।