Lulla Family

अंग 673

अंग
673
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धनासरी महला 5 ॥
जिह करणी होवहि सरमिंदा इहा कमानी रीति ॥
संत की निंदा साकत की पूजा ऐसी द्रिड़॑ी बिपरीति ॥1॥
माइआ मोह भूलो अवरै हीत ॥
हरिचंदउरी बन हर पात रे इहै तुहारो बीत ॥1॥ रहाउ ॥
चंदन लेप होत देह कउ सुखु गरधभ भसम संगीति ॥
अंम्रित संगि नाहि रुच आवत बिखै ठगउरी प्रीति ॥2॥
उतम संत भले संजोगी इसु जुग महि पवित पुनीत ॥
जात अकारथ जनमु पदारथ काच बादरै जीत ॥3॥
जनम जनम के किलविख दुख भागे गुरि गिआन अंजनु नेत्र दीत ॥
साधसंगि इन दुख ते निकसिओ नानक एक परीत ॥4॥9॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जिन कामों से आप (परमात्मा की दरगाह में) शर्मिंदा होंगे उन कामों को ही आप किए जा रहा है। आप संत जनों की निंदा करता रहता है।और।परमात्मा के साथ टूटे हुए मनुष्यों का आदर-सत्कार करता रहता है।तूने आश्चर्यजनक उल्टी मति ग्रहण की हुई है। 1। हे भाई ! माया के मोह (में फस के) आप गलत राह पर पड़ गया है।(परमात्मा को छोड़ के) और में प्यार डाल रहा है। आपकी अपनी विक्त तो इतनी ही है जितनी जंगल के हरे पक्तों की।जितनी आकाश में दिख रही हरीचंद की नगरी की। 1।रहाउ। हे भाई ! गधा मिट्टी में (लेटने से) खुद को सुखी समझता हैचाहे उसके शरीर पर चंदन का लेप करते रहें (यही हाल आपका है) आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से आपका प्यार नहीं बनता।आप विषियों की ठॅग-बूटी से ही प्यार करता है। 2। हे भाई ! ऊँचे जीवन वाले संत जो इस संसार (के विकारों) में भी पवित्र ही रहते हैं।भले संजोगों से ही मिलते हैं। (उनकी संगति से वंचित रह के) आपका कीमती मानस जन्म व्यर्थ जा रहा है।काँच के बदले में जीता जा रहा है। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जिस मनुष्य की आँखों में गुरू ने आत्मिक सूझ वाला सुरमा डाल दिया।उसके अनेकों जन्मों के किए पाप दूर हो गए। संगति में टिक के वह मनुष्य इन दुखों-पापों से बच निकला।उसने एक परमात्मा के साथ प्यार डाल लिया। 4। 9।
धनासरी महला 5 ॥
पानी पखा पीसउ संत आगै गुण गोविंद जसु गाई ॥
सासि सासि मनु नामु सम॑ारै इहु बिस्राम निधि पाई ॥1॥
तुम॑ करहु दइआ मेरे साई ॥
ऐसी मति दीजै मेरे ठाकुर सदा सदा तुधु धिआई ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री क्रिपा ते मोहु मानु छूटै बिनसि जाइ भरमाई ॥
अनद रूपु रविओ सभ मधे जत कत पेखउ जाई ॥2॥
तुम॑ दइआल किरपाल क्रिपा निधि पतित पावन गोसाई ॥
कोटि सूख आनंद राज पाए मुख ते निमख बुलाई ॥3॥
जाप ताप भगति सा पूरी जो प्रभ कै मनि भाई ॥
नामु जपत त्रिसना सभ बुझी है नानक त्रिपति अघाई ॥4॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं (आपके) संतों की सेवा में (रह के।उनके लिए) पानी (ढोता रहूँ।उनको) पंखा (झलता रहूँ।उनके वास्ते आटा) पीसता रहूँ।और।हे गोबिंद ! आपकी सिफत सालाह ! आपके गुण गाता रहूँ। मेरा मन हरेक सांस के साथ (आपका) नाम चेता करता रहे।मैं आपका यह नाम प्राप्त कर लूँ जो सुख शांति का खजाना है। 1। हे मेरे पति-प्रभू ! (मेरे पर) दया कर। हे मेरे ठाकुर ! मुझे ऐसी बुद्धि दे कि मैं सदा आपका नाम सिमरता रहूँ। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपकी कृपा से (मेरे अंदर से) माया का मोह समाप्त हैं जाए।अहंकार दूर हैं जाए।मेरी भटकना नाश हो जाय। मैं जहाँ-कहीं भी देखूँ।सबमें मुझे आप ही आनंद स्वरूप बसता दिखे। 2। हे धरती के पति ! आप दयालु है।कृपालु है।आप दया का खजाना है।आप विकारियों को पवित्र करने वाला है। जब मैं आँख झपकने जितने समय के लिए भी मुँह से आपका नाम उचारता हूँ।मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने राज-भाग के करोड़ों सुख-आनंद भोग लिए हैं। 3। हे नानक ! वही जाप-ताप वही भक्ति सिरे चढ़ी समझें।जो परमात्मा को पसंद आती है। परमात्मा का नाम जपने से सारी तृष्णा समाप्त हो जाती है।(मायावी पदार्थों की ओर से) पूरे तौर पर तृप्त हो जाते हैं। 4। 10।
धनासरी महला 5 ॥
जिनि कीने वसि अपुनै त्रै गुण भवण चतुर संसारा ॥
जग इसनान ताप थान खंडे किआ इहु जंतु विचारा ॥1॥
प्रभ की ओट गही तउ छूटो ॥
साध प्रसादि हरि हरि हरि गाए बिखै बिआधि तब हूटो ॥1॥ रहाउ ॥
नह सुणीऐ नह मुख ते बकीऐ नह मोहै उह डीठी ॥
ऐसी ठगउरी पाइ भुलावै मनि सभ कै लागै मीठी ॥2॥
माइ बाप पूत हित भ्राता उनि घरि घरि मेलिओ दूआ ॥
किस ही वाधि घाटि किस ही पहि सगले लरि लरि मूआ ॥3॥
हउ बलिहारी सतिगुर अपुने जिनि इहु चलतु दिखाइआ ॥
गूझी भाहि जलै संसारा भगत न बिआपै माइआ ॥4॥
संत प्रसादि महा सुखु पाइआ सगले बंधन काटे ॥
हरि हरि नामु नानक धनु पाइआ अपुनै घरि लै आइआ खाटे ॥5॥11॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जिस (माया) ने सारे त्रैगुणी संसार को चार-कूट जगत को अपने वश में किया हुआ है। जिसने यॅज्ञ करने वाले।स्नान करने वाले।तप करने वाले स्तम्भों को चकनाचूर कर रखा है।इस जीव विचारे की क्या ताकत है (कि उससे टक्कर ले सके) । 1। हे भाई ! जब मनुष्य ने परमात्मा का पल्ला पकड़ा।तब वह (माया के फंदे से) बच गया। जब गुरू की कृपा से मनुष्य ने परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने शुरू कर दिए।तब विकारों का रोग (उसके अंदर से) खत्म हो गया। 1।रहाउ। हे भाई ! वह माया जब मनुष्य को आ के भरमाती है।तब ना उसकी आवाज सुनाई देती है।ना वह मुँह से बोलती है।ना ही आँखों से दिखती है। कोई ऐसी नशीली चीज खिला के मनुष्य को गलत राह पर डाल देती है कि सबके मन को वह प्यारी लगती है। 2। हे भाई ! माता-पिता-पुत्र-मित्र-भाई।उस माया ने हरेक के दिल में भेद भाव डाल रखा है। किसी के पास (माया) बहुत है।किसी के पास थोड़ी है (बस।इसी बात पर) सारे (आपस में) लड़-लड़ के खपते रहते हैं। 3। हे भाई ! मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ।जिसने मुझे (माया का) ये तमाशा (आॅखों से) दिखा दिया है। (मैंने देख लिया है कि माया की इस) छुपी हुई आग में सारा जगत जल रहा है।परमात्मा की भक्ति करने वाले मनुष्य पर माया (अपना) जोर नहीं डाल सकती। 4। हे नानक ! गुरू की कृपा से (जिस मनुष्य ने) परमात्मा का नाम-धन ढूँढ लिया है।और ये धन कमा के अपने हृदय में बसा लिया है। वह बड़ा आत्मिक आनंद पाता है।उसके (मायावी) सारे बंधन काटे जाते हैं। 5। 11।
धनासरी महला 5 ॥
तुम दाते ठाकुर प्रतिपालक नाइक खसम हमारे ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी मः 5 ॥ हे प्रभू ! आप सबको दातें देने वाला है।आप मालिक है।आप सबको पालने वाला है।आप हमारा नायक है (जीवन की अगुवाई देने वाला है)।आप हमारा पति है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जिन कामों से आप (परमात्मा की दरगाह में) शर्मिंदा होंगे उन कामों को ही आप किए जा रहा है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।