जिह करणी होवहि सरमिंदा इहा कमानी रीति ॥
संत की निंदा साकत की पूजा ऐसी द्रिड़॑ी बिपरीति ॥1॥
माइआ मोह भूलो अवरै हीत ॥
हरिचंदउरी बन हर पात रे इहै तुहारो बीत ॥1॥ रहाउ ॥
चंदन लेप होत देह कउ सुखु गरधभ भसम संगीति ॥
अंम्रित संगि नाहि रुच आवत बिखै ठगउरी प्रीति ॥2॥
उतम संत भले संजोगी इसु जुग महि पवित पुनीत ॥
जात अकारथ जनमु पदारथ काच बादरै जीत ॥3॥
जनम जनम के किलविख दुख भागे गुरि गिआन अंजनु नेत्र दीत ॥
साधसंगि इन दुख ते निकसिओ नानक एक परीत ॥4॥9॥
पानी पखा पीसउ संत आगै गुण गोविंद जसु गाई ॥
सासि सासि मनु नामु सम॑ारै इहु बिस्राम निधि पाई ॥1॥
तुम॑ करहु दइआ मेरे साई ॥
ऐसी मति दीजै मेरे ठाकुर सदा सदा तुधु धिआई ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री क्रिपा ते मोहु मानु छूटै बिनसि जाइ भरमाई ॥
अनद रूपु रविओ सभ मधे जत कत पेखउ जाई ॥2॥
तुम॑ दइआल किरपाल क्रिपा निधि पतित पावन गोसाई ॥
कोटि सूख आनंद राज पाए मुख ते निमख बुलाई ॥3॥
जाप ताप भगति सा पूरी जो प्रभ कै मनि भाई ॥
नामु जपत त्रिसना सभ बुझी है नानक त्रिपति अघाई ॥4॥10॥
जिनि कीने वसि अपुनै त्रै गुण भवण चतुर संसारा ॥
जग इसनान ताप थान खंडे किआ इहु जंतु विचारा ॥1॥
प्रभ की ओट गही तउ छूटो ॥
साध प्रसादि हरि हरि हरि गाए बिखै बिआधि तब हूटो ॥1॥ रहाउ ॥
नह सुणीऐ नह मुख ते बकीऐ नह मोहै उह डीठी ॥
ऐसी ठगउरी पाइ भुलावै मनि सभ कै लागै मीठी ॥2॥
माइ बाप पूत हित भ्राता उनि घरि घरि मेलिओ दूआ ॥
किस ही वाधि घाटि किस ही पहि सगले लरि लरि मूआ ॥3॥
हउ बलिहारी सतिगुर अपुने जिनि इहु चलतु दिखाइआ ॥
गूझी भाहि जलै संसारा भगत न बिआपै माइआ ॥4॥
संत प्रसादि महा सुखु पाइआ सगले बंधन काटे ॥
हरि हरि नामु नानक धनु पाइआ अपुनै घरि लै आइआ खाटे ॥5॥11॥
तुम दाते ठाकुर प्रतिपालक नाइक खसम हमारे ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी मः 5 ॥ हे भाई ! जिन कामों से आप (परमात्मा की दरगाह में) शर्मिंदा होंगे उन कामों को ही आप किए जा रहा है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।