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धनासरी
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· शबद · राग धनासरी
जपि मन सति नामु सदा सति नामु ॥
जपि मन सति नामु सदा सति नामु ॥
हलति पलति मुख ऊजल होई है नित धिआईऐ हरि पुरखु निरंजना ॥ रहाउ ॥
जह हरि सिमरनु भइआ तह उपाधि गतु कीनी वडभागी हरि जपना ॥
जन नानक कउ गुरि इह मति दीनी जपि हरि भवजलु तरना ॥2॥6॥12॥
हलति पलति मुख ऊजल होई है नित धिआईऐ हरि पुरखु निरंजना ॥ रहाउ ॥
जह हरि सिमरनु भइआ तह उपाधि गतु कीनी वडभागी हरि जपना ॥
जन नानक कउ गुरि इह मति दीनी जपि हरि भवजलु तरना ॥2॥6॥12॥
हिन्दी अर्थ: हे मन! सदा स्थिर प्रभू का नाम सदा जपा करें। हे भाई! सर्व-व्यापक निर्लिप हरी का सदा ध्यान धरना चाहिए। (इस तरह) लोक-परलोक में इज्जत कमा ली जाती है। रहाउ। हे भाई! जिस हृदय में परमात्मा की भक्ति होती है उसमें से हरेक किस्म का झगड़ा-बखेड़ा निकल जाता है। (फिर भी) बहुत भाग्य से ही परमात्मा का भजन हो सकता है। हे भाई! दास नानक को (तो) गुरू ने ये समझ दी है कि परमात्मा का नाम जप के संसार समुंद्र से पार लांघ जाना है। 2। 6। 12।
· शबद · राग धनासरी
मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥
धनासरी महला 4 ॥
मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥
हमरी बेदनि तू जानता साहा अवरु किआ जानै कोइ ॥ रहाउ ॥
साचा साहिबु सचु तू मेरे साहा तेरा कीआ सचु सभु होइ ॥
झूठा किस कउ आखीऐ साहा दूजा नाही कोइ ॥1॥
सभना विचि तू वरतदा साहा सभि तुझहि धिआवहि दिनु राति ॥
सभि तुझ ही थावहु मंगदे मेरे साहा तू सभना करहि इक दाति ॥2॥
सभु को तुझ ही विचि है मेरे साहा तुझ ते बाहरि कोई नाहि ॥
सभि जीअ तेरे तू सभस दा मेरे साहा सभि तुझ ही माहि समाहि ॥3॥
सभना की तू आस है मेरे पिआरे सभि तुझहि धिआवहि मेरे साह ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू मेरे पिआरे सचु नानक के पातिसाह ॥4॥7॥13॥
मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥
हमरी बेदनि तू जानता साहा अवरु किआ जानै कोइ ॥ रहाउ ॥
साचा साहिबु सचु तू मेरे साहा तेरा कीआ सचु सभु होइ ॥
झूठा किस कउ आखीऐ साहा दूजा नाही कोइ ॥1॥
सभना विचि तू वरतदा साहा सभि तुझहि धिआवहि दिनु राति ॥
सभि तुझ ही थावहु मंगदे मेरे साहा तू सभना करहि इक दाति ॥2॥
सभु को तुझ ही विचि है मेरे साहा तुझ ते बाहरि कोई नाहि ॥
सभि जीअ तेरे तू सभस दा मेरे साहा सभि तुझ ही माहि समाहि ॥3॥
सभना की तू आस है मेरे पिआरे सभि तुझहि धिआवहि मेरे साह ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू मेरे पिआरे सचु नानक के पातिसाह ॥4॥7॥13॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे मेरे पातशाह! (मेहर करें) मुझे आपके दर्शनों का आनंद प्राप्त हो जाए। हे मेरे पातशाह! मेरे दिल की पीड़ा को आप ही जानते हैं। कोई और क्या जान सकता है। रहाउ। हे मेरे पातशाह! आप सदा कायम रहने वाले मालिक हैं। आप अटल हैं। जो कुछ आप करते हैं। उसमें कोई भी कमी खामी नहीं। हे पातशाह! (सारे संसार में आपके बिना) और कोई नहीं है (इस वास्ते) किसी को झूठा नहीं कहा जा सकता। 1। हे मेरे पातशाह! आप सब जीवों में मौजूद हैं। सारे जीव दिन-रात आपका ही ध्यान धरते हैं। हे मेरे पातशाह! सारे जीव आपसे ही (मांगें) मांगते हैं। एक आप ही सब जीवों को दातें दे रहे हैं। 2। हे मेरे पातशाह! हरेक जीव आपके हुकम में है। आपसे आकी कोई जीव हो ही नहीं सकता। हे मेरे पातशाह! सारे जीव आपके पैदा किए हुए हैं। ये सारे आपमें ही लीन हो जाते हैं। 3। हे मेरे प्यारे पातशाह! आप सब जीवों की आशाएं-उम्मीदें पूरी करते हैं सारे जीव आपका ही ध्यान धरते हैं। हे नानक के पातशाह! हे मेरे प्यारे! जैसे आपको अच्छा लगता है, वैसे मुझे (अपने चरणों में) रखें। आप ही सदा कायम रहने वाले हैं। 4। 7। 13।
· शबद · राग धनासरी
भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥
धनासरी महला 5 घरु 1 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥
कोटि पराध मिटे खिन भीतरि जां गुरमुखि नामु समारे ॥1॥
मेरा मनु लागा है राम पिआरे ॥
दीन दइआलि करी प्रभि किरपा वसि कीने पंच दूतारे ॥1॥ रहाउ ॥
तेरा थानु सुहावा रूपु सुहावा तेरे भगत सोहहि दरबारे ॥
सरब जीआ के दाते सुआमी करि किरपा लेहु उबारे ॥2॥
तेरा वरनु न जापै रूपु न लखीऐ तेरी कुदरति कउनु बीचारे ॥
जलि थलि महीअलि रविआ स्रब ठाई अगम रूप गिरधारे ॥3॥
कीरति करहि सगल जन तेरी तू अबिनासी पुरखु मुरारे ॥
जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी जन नानक सरनि दुआरे ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥
कोटि पराध मिटे खिन भीतरि जां गुरमुखि नामु समारे ॥1॥
मेरा मनु लागा है राम पिआरे ॥
दीन दइआलि करी प्रभि किरपा वसि कीने पंच दूतारे ॥1॥ रहाउ ॥
तेरा थानु सुहावा रूपु सुहावा तेरे भगत सोहहि दरबारे ॥
सरब जीआ के दाते सुआमी करि किरपा लेहु उबारे ॥2॥
तेरा वरनु न जापै रूपु न लखीऐ तेरी कुदरति कउनु बीचारे ॥
जलि थलि महीअलि रविआ स्रब ठाई अगम रूप गिरधारे ॥3॥
कीरति करहि सगल जन तेरी तू अबिनासी पुरखु मुरारे ॥
जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी जन नानक सरनि दुआरे ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घरु 1 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे जनम-मरण के चक्कर नाश करने वाले! हे दुखों का नाश करने वाले! हे मालिक! हे भक्ति से प्यार करने वाले! हे आकार रहित! जब कोई मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (आपका) नाम दिल में बसाता है। उसके करोड़ों पाप एक छिन में मिट जाते हैं। 1। हे भाई! मेरा मन प्यारे परमात्मा (के नाम) से लगा हुआ है। दीनों पर दया करने वाले प्रभू ने (खुद ही) कृपा की है। और पाँचों (कामादिक) वैरी (मेरे) वश में कर दिए हैं। 1। हे प्रभू! आपका स्थान सुंदर है। आपका रूप सुंदर है। आपके भक्त आपके दरबार में सुंदर लगते हैं। हे सारे जीवों को दातें देने वाले मालिक प्रभू! मेहर करें; (मुझे कामादिक वैरियों से) बचाए रखें। 2। हे प्रभू! आपका कोई रंग नहीं दिखता; आपकी कोई सूरति नहीं दिखती। कोई मनुष्य नहीं सोच सकता कि आप कितने ताकतवर हैं। हे अपहुँच परमात्मा! आप पानी में धरती पर आकाश में हर जगह मौजूद हैं। 3। हे मुरारी! आप नाश-रहित हैं (अविनाशी हैं); आप सर्व व्यापक हैं। आपके सारे सेवक आपकी सिफॅत सालाह करते हैं। हे दास नानक! (कहें) हे स्वामी! मैं आपके दर पर आ गिरा हूँ। मैं आपकी शरण आया हूँ। जैसे आपको अच्छा लगे। उसी तरह मेरी रक्षा करें। 4। 1।
· शबद · राग धनासरी
बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥
धनासरी महला 5 ॥
बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥
कमल हेति बिनसिओ है भवरा उनि मारगु निकसि न पाइओ ॥1॥
अब मन एकस सिउ मोहु कीना ॥
मरै न जावै सद ही संगे सतिगुर सबदी चीना ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥
कमल हेति बिनसिओ है भवरा उनि मारगु निकसि न पाइओ ॥1॥
अब मन एकस सिउ मोहु कीना ॥
मरै न जावै सद ही संगे सतिगुर सबदी चीना ॥1॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई! मछली पानी से विछुड़ के जान दे देती है क्योंकि उस (मछली) ने पानी के साथ प्यारा बढ़ाया हुआ है। कमल के फूल के प्यार में भौरे ने मौत गले लगा ली। (क्योंकि) उस ने (कमल के फूल में से) निकल के (बाहर का) रास्ता ना तलाशा। 1। हे मन! जिस मनुष्य ने अब (इस जनम में) एक परमात्मा से प्यार कर लिया है। वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। वह सदा ही परमात्मा के चरणों में मगन रहता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह परमात्मा के साथ अपनत्व बनाए रखता है। 1। रहाउ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 670 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।