हलति पलति मुख ऊजल होई है नित धिआईऐ हरि पुरखु निरंजना ॥ रहाउ ॥
जह हरि सिमरनु भइआ तह उपाधि गतु कीनी वडभागी हरि जपना ॥
जन नानक कउ गुरि इह मति दीनी जपि हरि भवजलु तरना ॥2॥6॥12॥
मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥
हमरी बेदनि तू जानता साहा अवरु किआ जानै कोइ ॥ रहाउ ॥
साचा साहिबु सचु तू मेरे साहा तेरा कीआ सचु सभु होइ ॥
झूठा किस कउ आखीऐ साहा दूजा नाही कोइ ॥1॥
सभना विचि तू वरतदा साहा सभि तुझहि धिआवहि दिनु राति ॥
सभि तुझ ही थावहु मंगदे मेरे साहा तू सभना करहि इक दाति ॥2॥
सभु को तुझ ही विचि है मेरे साहा तुझ ते बाहरि कोई नाहि ॥
सभि जीअ तेरे तू सभस दा मेरे साहा सभि तुझ ही माहि समाहि ॥3॥
सभना की तू आस है मेरे पिआरे सभि तुझहि धिआवहि मेरे साह ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू मेरे पिआरे सचु नानक के पातिसाह ॥4॥7॥13॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥
कोटि पराध मिटे खिन भीतरि जां गुरमुखि नामु समारे ॥1॥
मेरा मनु लागा है राम पिआरे ॥
दीन दइआलि करी प्रभि किरपा वसि कीने पंच दूतारे ॥1॥ रहाउ ॥
तेरा थानु सुहावा रूपु सुहावा तेरे भगत सोहहि दरबारे ॥
सरब जीआ के दाते सुआमी करि किरपा लेहु उबारे ॥2॥
तेरा वरनु न जापै रूपु न लखीऐ तेरी कुदरति कउनु बीचारे ॥
जलि थलि महीअलि रविआ स्रब ठाई अगम रूप गिरधारे ॥3॥
कीरति करहि सगल जन तेरी तू अबिनासी पुरखु मुरारे ॥
जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी जन नानक सरनि दुआरे ॥4॥1॥
बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥
कमल हेति बिनसिओ है भवरा उनि मारगु निकसि न पाइओ ॥1॥
अब मन एकस सिउ मोहु कीना ॥
मरै न जावै सद ही संगे सतिगुर सबदी चीना ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मन ! सदा स्थिर प्रभू का नाम सदा जपा कर।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।