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अंग 670

अंग
670
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जपि मन सति नामु सदा सति नामु ॥
हलति पलति मुख ऊजल होई है नित धिआईऐ हरि पुरखु निरंजना ॥ रहाउ ॥
जह हरि सिमरनु भइआ तह उपाधि गतु कीनी वडभागी हरि जपना ॥
जन नानक कउ गुरि इह मति दीनी जपि हरि भवजलु तरना ॥2॥6॥12॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे मन ! सदा स्थिर प्रभू का नाम सदा जपा कर। हे भाई ! सर्व-व्यापक निर्लिप हरी का सदा ध्यान धरना चाहिए।(इस तरह) लोक-परलोक में इज्जत कमा ली जाती है।रहाउ। हे भाई ! जिस हृदय में परमात्मा की भक्ति होती है उसमें से हरेक किस्म का झगड़ा-बखेड़ा निकल जाता है।(फिर भी) बहुत भाग्य से ही परमात्मा का भजन हो सकता है। हे भाई ! दास नानक को (तो) गुरू ने ये समझ दी है कि परमात्मा का नाम जप के संसार समुंद्र से पार लांघ जाना है। 2। 6। 12।
धनासरी महला 4 ॥
मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥
हमरी बेदनि तू जानता साहा अवरु किआ जानै कोइ ॥ रहाउ ॥
साचा साहिबु सचु तू मेरे साहा तेरा कीआ सचु सभु होइ ॥
झूठा किस कउ आखीऐ साहा दूजा नाही कोइ ॥1॥
सभना विचि तू वरतदा साहा सभि तुझहि धिआवहि दिनु राति ॥
सभि तुझ ही थावहु मंगदे मेरे साहा तू सभना करहि इक दाति ॥2॥
सभु को तुझ ही विचि है मेरे साहा तुझ ते बाहरि कोई नाहि ॥
सभि जीअ तेरे तू सभस दा मेरे साहा सभि तुझ ही माहि समाहि ॥3॥
सभना की तू आस है मेरे पिआरे सभि तुझहि धिआवहि मेरे साह ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू मेरे पिआरे सचु नानक के पातिसाह ॥4॥7॥13॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे मेरे पातशाह ! (मेहर कर) मुझे आपके दर्शनों का आनंद प्राप्त हैं जाए। हे मेरे पातशाह ! मेरे दिल की पीड़ा को आप ही जानता है।कोई और क्या जान सकता है।रहाउ। हे मेरे पातशाह ! आप सदा कायम रहने वाला मालिक है।आप अटल है।जो कुछ आप करता है।उसमें कोई भी कमी खामी नहीं। हे पातशाह ! (सारे संसार में आपके बिना) और कोई नहीं है (इस वास्ते) किसी को झूठा नहीं कहा जा सकता। 1। हे मेरे पातशाह ! आप सब जीवों में मौजूद है।सारे जीव दिन-रात आपका ही ध्यान धरते हैं। हे मेरे पातशाह ! सारे जीव आपसे ही (मांगें) मांगते हैं।एक आप ही सब जीवों को दातें दे रहा है। 2। हे मेरे पातशाह ! हरेक जीव आपके हुकम में है।आपसे आकी कोई जीव हैं ही नहीं सकता। हे मेरे पातशाह ! सारे जीव आपके पैदा किए हुए हैं।ये सारे आपके में ही लीन हैं जाते हैं। 3। हे मेरे प्यारे पातशाह ! आप सब जीवों की आशाएं-उम्मीदें पूरी करता है सारे जीव आपका ही ध्यान धरते हैं। हे नानक के पातशाह ! हे मेरे प्यारे ! जैसे आपको अच्छा लगता है।वैसे मुझे (अपने चरणों में) रख।आप ही सदा कायम रहने वाला है। 4। 7। 13।
धनासरी महला 5 घरु 1 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥
कोटि पराध मिटे खिन भीतरि जां गुरमुखि नामु समारे ॥1॥
मेरा मनु लागा है राम पिआरे ॥
दीन दइआलि करी प्रभि किरपा वसि कीने पंच दूतारे ॥1॥ रहाउ ॥
तेरा थानु सुहावा रूपु सुहावा तेरे भगत सोहहि दरबारे ॥
सरब जीआ के दाते सुआमी करि किरपा लेहु उबारे ॥2॥
तेरा वरनु न जापै रूपु न लखीऐ तेरी कुदरति कउनु बीचारे ॥
जलि थलि महीअलि रविआ स्रब ठाई अगम रूप गिरधारे ॥3॥
कीरति करहि सगल जन तेरी तू अबिनासी पुरखु मुरारे ॥
जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी जन नानक सरनि दुआरे ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 घरु 1 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे जनम-मरण के चक्कर नाश करने वाले ! हे दुखों का नाश करने वाले ! हे मालिक ! हे भक्ति से प्यार करने वाले ! हे आकार रहित ! जब कोई मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (आपका) नाम दिल में बसाता है। उसके करोड़ों पाप एक छिन में मिट जाते हैं। 1। हे भाई ! मेरा मन प्यारे परमात्मा (के नाम) से लगा हुआ है। दीनों पर दया करने वाले प्रभू ने (खुद ही) कृपा की है।और पाँचों (कामादिक) वैरी (मेरे) वश में कर दिए हैं। 1। हे प्रभू ! आपका स्थान सुंदर है।आपका रूप सुंदर है।आपके भक्त आपके दरबार में सुंदर लगते हैं। हे सारे जीवों को दातें देने वाले मालिक प्रभू ! मेहर कर; (मुझे कामादिक वैरियों से) बचाए रख। 2। हे प्रभू ! आपका कोई रंग नहीं दिखता; आपकी कोई सूरति नहीं दिखती।कोई मनुष्य नहीं सोच सकता कि आप कितना ताकतवर है। हे अपहुँच परमात्मा ! आप पानी में धरती पर आकाश में हर जगह मौजूद है। 3। हे मुरारी ! आप नाश-रहित है (अविनाशी है); आप सर्व व्यापक है।आपके सारे सेवक आपकी सिफॅत सालाह करते हैं। हे दास नानक ! (कह) हे स्वामी ! मैं आपके दर पर आ गिरा हूँ।मैं आपकी शरण आया हूँ।जैसे आपको अच्छा लगे।उसी तरह मेरी रक्षा कर। 4। 1।
धनासरी महला 5 ॥
बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥
कमल हेति बिनसिओ है भवरा उनि मारगु निकसि न पाइओ ॥1॥
अब मन एकस सिउ मोहु कीना ॥
मरै न जावै सद ही संगे सतिगुर सबदी चीना ॥1॥ रहाउ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 5 ॥ हे भाई ! मछली पानी से विछुड़ के जान दे देती है क्योंकि उस (मछली) ने पानी के साथ प्यारा बढ़ाया हुआ है। कमल के फूल के प्यार में भौरे ने मौत गले लगा ली।(क्योंकि) उस ने (कमल के फूल में से) निकल के (बाहर का) रास्ता ना तलाशा। 1। हे मन ! जिस मनुष्य ने अब (इस जनम में) एक परमात्मा से प्यार कर लिया है। वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता।वह सदा ही परमात्मा के चरणों में मगन रहता है।गुरू के शबद में जुड़ के वह परमात्मा के साथ अपनत्व बनाए रखता है। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मन ! सदा स्थिर प्रभू का नाम सदा जपा कर।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।