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669
धनासरी
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गुन कहु हरि लहु करि सेवा सतिगुर इव हरि हरि नामु धिआई ॥
गुन कहु हरि लहु करि सेवा सतिगुर इव हरि हरि नामु धिआई ॥
हरि दरगह भावहि फिरि जनमि न आवहि हरि हरि हरि जोति समाई ॥1॥
जपि मन नामु हरी होहि सरब सुखी ॥
हरि जसु ऊच सभना ते ऊपरि हरि हरि हरि सेवि छडाई ॥ रहाउ ॥
हरि क्रिपा निधि कीनी गुरि भगति हरि दीनी तब हरि सिउ प्रीति बनि आई ॥
बहु चिंत विसारी हरि नामु उरि धारी नानक हरि भए है सखाई ॥2॥2॥8॥
हरि दरगह भावहि फिरि जनमि न आवहि हरि हरि हरि जोति समाई ॥1॥
जपि मन नामु हरी होहि सरब सुखी ॥
हरि जसु ऊच सभना ते ऊपरि हरि हरि हरि सेवि छडाई ॥ रहाउ ॥
हरि क्रिपा निधि कीनी गुरि भगति हरि दीनी तब हरि सिउ प्रीति बनि आई ॥
बहु चिंत विसारी हरि नामु उरि धारी नानक हरि भए है सखाई ॥2॥2॥8॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा के गुण याद किया करें। (इस तरह) परमात्मा को मिलने का यतन करते रहें। गुरू की (बताई) सेवा किया करें। इस तरीके से सदा हरी का नाम सिमरते रहें। (सिमरन की बरकति से) आप परमात्मा की दरगाह में पसंद आ जाएँगे। दुबारा जनम (मरन के चक्कर) में नहीं आएँगे। आप परमात्मा की ज्योति में सदा लीन रहेंगे। 1। हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम जपा करें। आप हर जगह सुखी रहेंगे। परमात्मा की सिफत सालाह बड़ा श्रेष्ठ काम है। और सब कामों से बढ़िया काम है। परमात्मा की सेवा-भक्ति करते रहें। (ये सेवा-भक्ति सब दुखों विकारों से) बचा लेती है।रहाउ। हे भाई ! कृपा के खजाने परमात्मा ने जिस मनुष्य पर कृपा की। गुरू ने उस मनुष्य को परमात्मा की भक्ति की दाति बख्श दी। तब उस मनुष्य का प्रेम परमात्मा से बन गया। हे नानक ! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम अपने दिल में बसा लिया। उसने (दुनियावी अन्य) बहुत सारी चिंताएं बिसार दीं। परमात्मा उसका साथी मित्र बन गया। 2। 2। 8।
हरि पड़ु हरि लिखु हरि जपि हरि गाउ हरि भउजलु पारि उतारी ॥
धनासरी महला 4 ॥
हरि पड़ु हरि लिखु हरि जपि हरि गाउ हरि भउजलु पारि उतारी ॥
मनि बचनि रिदै धिआइ हरि होइ संतुसटु इव भणु हरि नामु मुरारी ॥1॥
मनि जपीऐ हरि जगदीस ॥
मिलि संगति साधू मीत ॥
सदा अनंदु होवै दिनु राती हरि कीरति करि बनवारी ॥ रहाउ ॥
हरि हरि करी द्रिसटि तब भइओ मनि उदमु हरि हरि नामु जपिओ गति भई हमारी ॥
जन नानक की पति राखु मेरे सुआमी हरि आइ परिओ है सरणि तुमारी ॥2॥3॥9॥
हरि पड़ु हरि लिखु हरि जपि हरि गाउ हरि भउजलु पारि उतारी ॥
मनि बचनि रिदै धिआइ हरि होइ संतुसटु इव भणु हरि नामु मुरारी ॥1॥
मनि जपीऐ हरि जगदीस ॥
मिलि संगति साधू मीत ॥
सदा अनंदु होवै दिनु राती हरि कीरति करि बनवारी ॥ रहाउ ॥
हरि हरि करी द्रिसटि तब भइओ मनि उदमु हरि हरि नामु जपिओ गति भई हमारी ॥
जन नानक की पति राखु मेरे सुआमी हरि आइ परिओ है सरणि तुमारी ॥2॥3॥9॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम पढ़ा कर। परमात्मा का नाम लिखता रह। परमात्मा का नाम जपा कर। परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाया कर। परमात्मा संसार समुंद्र से पार लंघा लेता है। हे भाई ! मन में। हृदय में। जीभ से परमात्मा का नाम याद किया कर। हे भाई ! संतोखी हो के इस तरह परमात्मा का नाम उचारा कर। 1। जगत के मालिक हरी का नाम मन में जप हे मित्र ! गुरू की संगति में मिल के (ऐसा कर)। हे मित्र ! परमात्मा की सिफत सालाह किया कर। (इस तरह) दिन रात सदा आत्मिक आनंद बना रहता है।रहाउ। हे भाई ! जब परमात्मा ने मेहर की निगाह की। तब मन में उद्यम पैदा हुआ। तब ही हमने नाम जपा। और हमारी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई। हे मेरे मालिक प्रभू ! अपने दास नानक की इज्जत रख। आपका ये दास आपकी शरण आ पड़ा है (अपने दास को नाम जपने की दाति बख्श)। 2। 3। 9।
चउरासीह सिध बुध तेतीस कोटि मुनि जन सभि चाहहि हरि जीउ तेरो नाउ ॥
धनासरी महला 4 ॥
चउरासीह सिध बुध तेतीस कोटि मुनि जन सभि चाहहि हरि जीउ तेरो नाउ ॥
गुर प्रसादि को विरला पावै जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि भाउ ॥1॥
जपि मन रामै नामु हरि जसु ऊतम काम ॥
जो गावहि सुणहि तेरा जसु सुआमी हउ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥ रहाउ ॥
सरणागति प्रतिपालक हरि सुआमी जो तुम देहु सोई हउ पाउ ॥
दीन दइआल क्रिपा करि दीजै नानक हरि सिमरण का है चाउ ॥2॥4॥10॥
चउरासीह सिध बुध तेतीस कोटि मुनि जन सभि चाहहि हरि जीउ तेरो नाउ ॥
गुर प्रसादि को विरला पावै जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि भाउ ॥1॥
जपि मन रामै नामु हरि जसु ऊतम काम ॥
जो गावहि सुणहि तेरा जसु सुआमी हउ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥ रहाउ ॥
सरणागति प्रतिपालक हरि सुआमी जो तुम देहु सोई हउ पाउ ॥
दीन दइआल क्रिपा करि दीजै नानक हरि सिमरण का है चाउ ॥2॥4॥10॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे प्रभू ! योग-मत के चौरासी आगू। महात्मा बुद्ध जैसे ज्ञानवान। तेतीस करोड़ देवते। अनेकों ऋषि-मुनि। ये सारे आपका नाम (प्राप्त करना) चाहते हैं। पर कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से (ये दाति) हासिल करता है। (नाम की दाति उनको ही मिलती है) जिनके माथे पर धुर दरगाह से हरी-नाम का प्रेम-लेख लिखा हुआ है। 1। हे मन ! परमात्मा का नाम ही जपा कर। परमात्मा की सिफत सालाह करना सबसे श्रेष्ठ काम है। हे मालिक प्रभू ! जो मनुष्य आपकी सिफत सालाह गाते हैं। सुनते हैं। मैं उनसे सदा कुर्बान जाता हूँ।रहाउ। हे शरण आए की पालना करने वाले मालिक-प्रभू ! मैं (आपके दर से) वही कुछ ले सकता हूँ जो आप खुद देते हैं। हे दीनों पर दया करने वाले ! कृपा करके नानक को अपने नाम की दाति दे। (नानक को) आपके नाम के सिमरन का चाव है। 2। 4। 10।
सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊतम बानी ॥
धनासरी महला 4 ॥
सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊतम बानी ॥
गाविआ सुणिआ तिन का हरि थाइ पावै जिन सतिगुर की आगिआ सति सति करि मानी ॥1॥
बोलहु भाई हरि कीरति हरि भवजल तीरथि ॥
हरि दरि तिन की ऊतम बात है संतहु हरि कथा जिन जनहु जानी ॥ रहाउ ॥
आपे गुरु चेला है आपे आपे हरि प्रभु चोज विडानी ॥
जन नानक आपि मिलाए सोई हरि मिलसी अवर सभ तिआगि ओहा हरि भानी ॥2॥5॥11॥
सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊतम बानी ॥
गाविआ सुणिआ तिन का हरि थाइ पावै जिन सतिगुर की आगिआ सति सति करि मानी ॥1॥
बोलहु भाई हरि कीरति हरि भवजल तीरथि ॥
हरि दरि तिन की ऊतम बात है संतहु हरि कथा जिन जनहु जानी ॥ रहाउ ॥
आपे गुरु चेला है आपे आपे हरि प्रभु चोज विडानी ॥
जन नानक आपि मिलाए सोई हरि मिलसी अवर सभ तिआगि ओहा हरि भानी ॥2॥5॥11॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई ! सेवक (कहलवाने वाले) सारे (गुरू-दर पर प्रभू की) पूजा-भक्ति करने आते हैं। और परमात्मा की सिफत सालाह के साथ भरपूर उक्तम गुरबाणी को गाते हैं। पर। परमात्मा उन मनुष्यों की बाणी का गाना और सुनना कबूल करता है। जिन्होंने गुरू के हुकम को बिल्कुल सही जान के उस पर अमल (भी) किया है। 1। हे भाई ! संसार समुंद्र से पार लंघाने वाले (गुरू-) तीर्थ की शरण पड़ कर परमात्मा की सिफत सालाह किया करो। परमात्मा के दर पर उन लोगों की बहुत शोभा होती है। जिन लोगों ने परमात्मा की सिफत सालाह के साथ गहरी सांझ डाली हुई है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू आप ही गुरू है। आप ही सिख है। प्रभू खुद ही आश्चर्यजनक तमाशे करने वाला है। हे दास नानक ! वही मनुष्य परमात्मा को मिल सकता है जिसको परमात्मा स्वयं मिलाता है। हे भाई ! और सारा (सहारे-आसरे) छोड़ के (गुरू की आज्ञा में चल के सिफत सालाह किया कर) प्रभू को वह सिफत सालाह ही प्यारी लगती है। 2। 5। 11।
इछा पूरकु सरब सुखदाता हरि जा कै वसि है कामधेना ॥
धनासरी महला 4 ॥
इछा पूरकु सरब सुखदाता हरि जा कै वसि है कामधेना ॥
सो ऐसा हरि धिआईऐ मेरे जीअड़े ता सरब सुख पावहि मेरे मना ॥1॥
इछा पूरकु सरब सुखदाता हरि जा कै वसि है कामधेना ॥
सो ऐसा हरि धिआईऐ मेरे जीअड़े ता सरब सुख पावहि मेरे मना ॥1॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे मेरी जिंदे ! जो हरी सारी ही कामनाएं पूरी करने वाला है। जो सारे ही सुख देने वाला है। जिसके वश में (स्वर्ग में रहने वाली समझी गई) कामधेनु है उस ऐसी समर्थता वाले परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। हे मेरे मन ! (जब आप परमात्मा का सिमरन करेंगे) तब सारे सुख हासिल कर लेंगे। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 669 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।