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अंग 669

अंग
669
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुन कहु हरि लहु करि सेवा सतिगुर इव हरि हरि नामु धिआई ॥
हरि दरगह भावहि फिरि जनमि न आवहि हरि हरि हरि जोति समाई ॥1॥
जपि मन नामु हरी होहि सरब सुखी ॥
हरि जसु ऊच सभना ते ऊपरि हरि हरि हरि सेवि छडाई ॥ रहाउ ॥
हरि क्रिपा निधि कीनी गुरि भगति हरि दीनी तब हरि सिउ प्रीति बनि आई ॥
बहु चिंत विसारी हरि नामु उरि धारी नानक हरि भए है सखाई ॥2॥2॥8॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा के गुण याद किया कर।(इस तरह) परमात्मा को मिलने का यतन करता रह।गुरू की (बताई) सेवा किया कर।इस तरीके से सदा हरी का नाम सिमरता रह। (सिमरन की बरकति से) आप परमात्मा की दरगाह में पसंद आ जाएगा।दुबारा जनम (मरन के चक्कर) में नहीं आएगा।आप परमात्मा की ज्योति में सदा लीन रहेगा। 1। हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम जपा कर।आप हर जगह सुखी रहेगा। परमात्मा की सिफत सालाह बड़ा श्रेष्ठ काम है।और सब कामों से बढ़िया काम है।परमात्मा की सेवा-भक्ति करता रह।(ये सेवा-भक्ति सब दुखों विकारों से) बचा लेती है।रहाउ। हे भाई ! कृपा के खजाने परमात्मा ने जिस मनुष्य पर कृपा की।गुरू ने उस मनुष्य को परमात्मा की भक्ति की दाति बख्श दी।तब उस मनुष्य का प्रेम परमात्मा से बन गया। हे नानक ! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम अपने दिल में बसा लिया।उसने (दुनियावी अन्य) बहुत सारी चिंताएं बिसार दीं।परमात्मा उसका साथी मित्र बन गया। 2। 2। 8।
धनासरी महला 4 ॥
हरि पड़ु हरि लिखु हरि जपि हरि गाउ हरि भउजलु पारि उतारी ॥
मनि बचनि रिदै धिआइ हरि होइ संतुसटु इव भणु हरि नामु मुरारी ॥1॥
मनि जपीऐ हरि जगदीस ॥
मिलि संगति साधू मीत ॥
सदा अनंदु होवै दिनु राती हरि कीरति करि बनवारी ॥ रहाउ ॥
हरि हरि करी द्रिसटि तब भइओ मनि उदमु हरि हरि नामु जपिओ गति भई हमारी ॥
जन नानक की पति राखु मेरे सुआमी हरि आइ परिओ है सरणि तुमारी ॥2॥3॥9॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम पढ़ा कर।परमात्मा का नाम लिखता रह।परमात्मा का नाम जपा कर।परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाया कर।परमात्मा संसार समुंद्र से पार लंघा लेता है। हे भाई ! मन में।हृदय में।जीभ से परमात्मा का नाम याद किया कर।हे भाई ! संतोखी हो के इस तरह परमात्मा का नाम उचारा कर। 1। जगत के मालिक हरी का नाम मन में जप हे मित्र ! गुरू की संगति में मिल के (ऐसा कर)। हे मित्र ! परमात्मा की सिफत सालाह किया कर।(इस तरह) दिन रात सदा आत्मिक आनंद बना रहता है।रहाउ। हे भाई ! जब परमात्मा ने मेहर की निगाह की।तब मन में उद्यम पैदा हुआ।तब ही हमने नाम जपा।और हमारी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई। हे मेरे मालिक प्रभू ! अपने दास नानक की इज्जत रख।आपका ये दास आपकी शरण आ पड़ा है (अपने दास को नाम जपने की दाति बख्श)। 2। 3। 9।
धनासरी महला 4 ॥
चउरासीह सिध बुध तेतीस कोटि मुनि जन सभि चाहहि हरि जीउ तेरो नाउ ॥
गुर प्रसादि को विरला पावै जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि भाउ ॥1॥
जपि मन रामै नामु हरि जसु ऊतम काम ॥
जो गावहि सुणहि तेरा जसु सुआमी हउ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥ रहाउ ॥
सरणागति प्रतिपालक हरि सुआमी जो तुम देहु सोई हउ पाउ ॥
दीन दइआल क्रिपा करि दीजै नानक हरि सिमरण का है चाउ ॥2॥4॥10॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे प्रभू ! योग-मत के चौरासी आगू।महात्मा बुद्ध जैसे ज्ञानवान।तेतीस करोड़ देवते।अनेकों ऋषि-मुनि।ये सारे आपका नाम (प्राप्त करना) चाहते हैं। पर कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से (ये दाति) हासिल करता है।(नाम की दाति उनको ही मिलती है) जिनके माथे पर धुर दरगाह से हरी-नाम का प्रेम-लेख लिखा हुआ है। 1। हे मन ! परमात्मा का नाम ही जपा कर।परमात्मा की सिफत सालाह करना सबसे श्रेष्ठ काम है। हे मालिक प्रभू ! जो मनुष्य आपकी सिफत सालाह गाते हैं।सुनते हैं।मैं उनसे सदा कुर्बान जाता हूँ।रहाउ। हे शरण आए की पालना करने वाले मालिक-प्रभू ! मैं (आपके दर से) वही कुछ ले सकता हूँ जो आप खुद देता है। हे दीनों पर दया करने वाले ! कृपा करके नानक को अपने नाम की दाति दे।(नानक को) आपके नाम के सिमरन का चाव है। 2। 4। 10।
धनासरी महला 4 ॥
सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊतम बानी ॥
गाविआ सुणिआ तिन का हरि थाइ पावै जिन सतिगुर की आगिआ सति सति करि मानी ॥1॥
बोलहु भाई हरि कीरति हरि भवजल तीरथि ॥
हरि दरि तिन की ऊतम बात है संतहु हरि कथा जिन जनहु जानी ॥ रहाउ ॥
आपे गुरु चेला है आपे आपे हरि प्रभु चोज विडानी ॥
जन नानक आपि मिलाए सोई हरि मिलसी अवर सभ तिआगि ओहा हरि भानी ॥2॥5॥11॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई ! सेवक (कहलवाने वाले) सारे (गुरू-दर पर प्रभू की) पूजा-भक्ति करने आते हैं।और परमात्मा की सिफत सालाह के साथ भरपूर उक्तम गुरबाणी को गाते हैं।पर। परमात्मा उन मनुष्यों की बाणी का गाना और सुनना कबूल करता है।जिन्होंने गुरू के हुकम को बिल्कुल सही जान के उस पर अमल (भी) किया है। 1। हे भाई ! संसार समुंद्र से पार लंघाने वाले (गुरू-) तीर्थ की शरण पड़ कर परमात्मा की सिफत सालाह किया करो। परमात्मा के दर पर उन लोगों की बहुत शोभा होती है।जिन लोगों ने परमात्मा की सिफत सालाह के साथ गहरी सांझ डाली हुई है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू आप ही गुरू है।आप ही सिख है।प्रभू खुद ही आश्चर्यजनक तमाशे करने वाला है। हे दास नानक ! वही मनुष्य परमात्मा को मिल सकता है जिसको परमात्मा स्वयं मिलाता है।हे भाई ! और सारा (सहारे-आसरे) छोड़ के (गुरू की आज्ञा में चल के सिफत सालाह किया कर) प्रभू को वह सिफत सालाह ही प्यारी लगती है। 2। 5। 11।
धनासरी महला 4 ॥
इछा पूरकु सरब सुखदाता हरि जा कै वसि है कामधेना ॥
सो ऐसा हरि धिआईऐ मेरे जीअड़े ता सरब सुख पावहि मेरे मना ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे मेरी जिंदे ! जो हरी सारी ही कामनाएं पूरी करने वाला है।जो सारे ही सुख देने वाला है।जिसके वश में (स्वर्ग में रहने वाली समझी गई) कामधेनु है उस ऐसी स्मर्था वाले परमात्मा का सिमरन करना चाहिए।हे मेरे मन ! (जब आप परमात्मा का सिमरन करेगा) तब सारे सुख हासिल कर लेगा। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा के गुण याद किया कर।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।