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धनासरी
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· शबद · राग धनासरी
हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥
धनासरी महला 4 ॥
हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥
हरि हरि क्रिपा करहु प्रभ अपनी मुखि देवहु हरि निमखाती ॥1॥
हरि बिनु रहि न सकउ इक राती ॥
जिउ बिनु अमलै अमली मरि जाई है तिउ हरि बिनु हम मरि जाती ॥ रहाउ ॥
तुम हरि सरवर अति अगाह हम लहि न सकहि अंतु माती ॥
तू परै परै अपरंपरु सुआमी मिति जानहु आपन गाती ॥2॥
हरि के संत जना हरि जपिओ गुर रंगि चलूलै राती ॥
हरि हरि भगति बनी अति सोभा हरि जपिओ ऊतम पाती ॥3॥
आपे ठाकुरु आपे सेवकु आपि बनावै भाती ॥
नानकु जनु तुमरी सरणाई हरि राखहु लाज भगाती ॥4॥5॥
हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥
हरि हरि क्रिपा करहु प्रभ अपनी मुखि देवहु हरि निमखाती ॥1॥
हरि बिनु रहि न सकउ इक राती ॥
जिउ बिनु अमलै अमली मरि जाई है तिउ हरि बिनु हम मरि जाती ॥ रहाउ ॥
तुम हरि सरवर अति अगाह हम लहि न सकहि अंतु माती ॥
तू परै परै अपरंपरु सुआमी मिति जानहु आपन गाती ॥2॥
हरि के संत जना हरि जपिओ गुर रंगि चलूलै राती ॥
हरि हरि भगति बनी अति सोभा हरि जपिओ ऊतम पाती ॥3॥
आपे ठाकुरु आपे सेवकु आपि बनावै भाती ॥
नानकु जनु तुमरी सरणाई हरि राखहु लाज भगाती ॥4॥5॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे हरी! हे स्वामी! मैं पपीहा आपके नाम की बूँद के लिए तड़प रहा हूँ। (मेहर करें)। आपका नाम मेरे वास्ते (स्वाति) बूँद बन जाए। हे हरी! हे प्रभू! अपनी मेहर करें। आँख झपकने जितने समय के लिए ही मेरे मुँह में (अपने नाम की स्वाति) बूँद डाल दें। 1। हे भाई! परमात्मा के नाम के बिना मैं रक्ती भर समय के लिए भी नहीं रह सकता। जैसे (अफीम आदि) नशे के बिना अमली (नशे का आदी) मनुष्य तड़प उठता है, वैसे ही परमात्मा के नाम के बिना मैं घबरा जाता हूँ। रहाउ। हे प्रभू! आप (गुणों का) बड़ा ही गहरा समुंद्र हैं। हम आपकी गहराई का अंत रक्ती भर भी नहीं पा सकते। आप परे से परे हैं। आप बेअंत हैं। हे स्वामी! आप कैसे हैं और कितने बड़े हैं, ये भेद आप खुद ही जानते हैं। 2। हे भाई! परमात्मा के जिन संत जनों ने परमात्मा का नाम जपा। वे गुरू के (बख्शे हुए) गाढ़े प्रेम-रंग में रंगे गए। उनके अंदर परमात्मा की भक्ति का रंग बन गया। उनको (लोक-परलोक में) बड़ी शोभा मिली। जिन्होंने प्रभू का नाम जपा। उन्हें श्रेष्ठ सम्मान प्राप्त हुआ। 3। पर, हे भाई! भक्ति करने की विधि प्रभू खुद ही बनाता है (खुद ही सबब बनाता है)। वह खुद ही मालिक है खुद ही सेवक है। हे प्रभू! आपका दास नानक आपकी शरण आया है। आप खुद ही अपने भक्तों की इज्जत रखते हैं। 4। 5।
· शबद · राग धनासरी
कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥
धनासरी महला 4 ॥
कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥
हरि हरि जपु बेड़ी हरि तुलहा हरि जपिओ तरै तराकी ॥1॥
हरि जी लाज रखहु हरि जन की ॥
हरि हरि जपनु जपावहु अपना हम मागी भगति इकाकी ॥ रहाउ ॥
हरि के सेवक से हरि पिआरे जिन जपिओ हरि बचनाकी ॥
लेखा चित्र गुपति जो लिखिआ सभ छूटी जम की बाकी ॥2॥
हरि के संत जपिओ मनि हरि हरि लगि संगति साध जना की ॥
दिनीअरु सूरु त्रिसना अगनि बुझानी सिव चरिओ चंदु चंदाकी ॥3॥
तुम वड पुरख वड अगम अगोचर तुम आपे आपि अपाकी ॥
जन नानक कउ प्रभ किरपा कीजै करि दासनि दास दसाकी ॥4॥6॥
कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥
हरि हरि जपु बेड़ी हरि तुलहा हरि जपिओ तरै तराकी ॥1॥
हरि जी लाज रखहु हरि जन की ॥
हरि हरि जपनु जपावहु अपना हम मागी भगति इकाकी ॥ रहाउ ॥
हरि के सेवक से हरि पिआरे जिन जपिओ हरि बचनाकी ॥
लेखा चित्र गुपति जो लिखिआ सभ छूटी जम की बाकी ॥2॥
हरि के संत जपिओ मनि हरि हरि लगि संगति साध जना की ॥
दिनीअरु सूरु त्रिसना अगनि बुझानी सिव चरिओ चंदु चंदाकी ॥3॥
तुम वड पुरख वड अगम अगोचर तुम आपे आपि अपाकी ॥
जन नानक कउ प्रभ किरपा कीजै करि दासनि दास दसाकी ॥4॥6॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई! मुझे वह धर्म बता जिससे जगत के विकारों के झमेलों से बचा जा सके। मैं इन झमेलों से बचना चाहता हूँ। बताएँ। मैं कैसे बचूँ। (उक्तर-) परमात्मा के नाम का जाप बेड़ी है। नाम ही तुलहा है। जिस मनुष्य ने हरी का नाम जपा वह तैराक बन के (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाता है। 1। हे प्रभू जी! (दुनिया के विकारों के झमेलों में से) अपने सेवक की इज्जत बचा लें। हे हरी! मुझे अपना नाम जपने की समर्था दें। मैं (आपसे) सिर्फ आपकी भक्ति का दान माँग रहा हूँ। रहाउ। हे भाई! जिन मनुष्यों ने गुरू के बचनों के द्वारा परमात्मा का नाम जपा। वे सेवक परमात्मा को प्यारे लगते हैं। चित्र-गुप्त ने जो भी उनके (कर्मों का) लेख लिख रखा था। धर्मराज का वह सारा हिसाब ही समाप्त हो जाता है। 2। हे भाई! जिन संत जनों ने साध जनों की संगति में बैठ के अपने मन में परमात्मा के नाम का जाप किया। उनके अंदर कल्याण स्वरूप (परमात्मा प्रगट हो गया। मानो) ठंडक पहुँचाने वाला चाँद निकल आया हैं। जिसने (उनके हृदय में से) तृष्णा की आग बुझा दी; (जिसने विकारों का) तपता सूरज (शांत कर दिया)। 3। हे प्रभू! आप सबसे बड़े हैं। आप सर्व-व्यापक हैं; आप अपहुँच हैं; ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा आप तक नहीं पहुँचा जा सकता। आप (हर जगह) खुद ही खुद। स्वयं ही स्वयं है। हे प्रभू! अपने दास नानक पर मेहर करें। और, अपने दासों के दासों का दास बना लें। 4। 6।
· शबद · राग धनासरी
उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥
धनासरी महला 4 घरु 5 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥
अद्रिसटु अगोचरु अपरंपर सुआमी गुरि पूरै प्रगट करि दीने ॥1॥
राम पारस चंदन हम कासट लोसट ॥
हरि संगि हरी सतसंगु भए हरि कंचनु चंदनु कीने ॥1॥ रहाउ ॥
नव छिअ खटु बोलहि मुख आगर मेरा हरि प्रभु इव न पतीने ॥
जन नानक हरि हिरदै सद धिआवहु इउ हरि प्रभु मेरा भीने ॥2॥1॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥
अद्रिसटु अगोचरु अपरंपर सुआमी गुरि पूरै प्रगट करि दीने ॥1॥
राम पारस चंदन हम कासट लोसट ॥
हरि संगि हरी सतसंगु भए हरि कंचनु चंदनु कीने ॥1॥ रहाउ ॥
नव छिअ खटु बोलहि मुख आगर मेरा हरि प्रभु इव न पतीने ॥
जन नानक हरि हिरदै सद धिआवहु इउ हरि प्रभु मेरा भीने ॥2॥1॥7॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 घरु 5 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य के हृदय में उस परमात्मा का नाम) प्रगट कर दिया है; जो इन आँखों से नहीं दिखाई देता। जो ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। बेअंत है। जो सबका मालिक है। (वह मनुष्य उस) मुरारी को मन मोहन के नाम को अपने दिल में बसा के सोच-मण्डल में टिका के सदा जपता रहता है। 1। हे भाई! परमात्मा पारस है। हम जीव लोहा हैं। परमात्मा चंदन है। हम जीव काठ हैं। जिस मनुष्य का परमात्मा के साथ सत्संग हो जाता है। परमात्मा उस को (लोहे से) सोना बना देता है। (काठ से) चंदन बना देता है। 1। रहाउ। (हे भाई! कई पण्डित) नौ व्याकरणों और छह शास्त्रों को मुँह जबानी उचार लेते हैं। (पर) प्यारा हरी-प्रभू इस तरह खुश नहीं होता। हे दास नानक! (कहें, हे भाई!) परमात्मा को अपने हृदय में सदा बसाए रखें। (सिर्फ) इस तरह परमात्मा सदा प्रसन्न होता है। 2। 1। 7।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 668 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।