हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥
हरि हरि क्रिपा करहु प्रभ अपनी मुखि देवहु हरि निमखाती ॥1॥
हरि बिनु रहि न सकउ इक राती ॥
जिउ बिनु अमलै अमली मरि जाई है तिउ हरि बिनु हम मरि जाती ॥ रहाउ ॥
तुम हरि सरवर अति अगाह हम लहि न सकहि अंतु माती ॥
तू परै परै अपरंपरु सुआमी मिति जानहु आपन गाती ॥2॥
हरि के संत जना हरि जपिओ गुर रंगि चलूलै राती ॥
हरि हरि भगति बनी अति सोभा हरि जपिओ ऊतम पाती ॥3॥
आपे ठाकुरु आपे सेवकु आपि बनावै भाती ॥
नानकु जनु तुमरी सरणाई हरि राखहु लाज भगाती ॥4॥5॥
कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥
हरि हरि जपु बेड़ी हरि तुलहा हरि जपिओ तरै तराकी ॥1॥
हरि जी लाज रखहु हरि जन की ॥
हरि हरि जपनु जपावहु अपना हम मागी भगति इकाकी ॥ रहाउ ॥
हरि के सेवक से हरि पिआरे जिन जपिओ हरि बचनाकी ॥
लेखा चित्र गुपति जो लिखिआ सभ छूटी जम की बाकी ॥2॥
हरि के संत जपिओ मनि हरि हरि लगि संगति साध जना की ॥
दिनीअरु सूरु त्रिसना अगनि बुझानी सिव चरिओ चंदु चंदाकी ॥3॥
तुम वड पुरख वड अगम अगोचर तुम आपे आपि अपाकी ॥
जन नानक कउ प्रभ किरपा कीजै करि दासनि दास दसाकी ॥4॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥
अद्रिसटु अगोचरु अपरंपर सुआमी गुरि पूरै प्रगट करि दीने ॥1॥
राम पारस चंदन हम कासट लोसट ॥
हरि संगि हरी सतसंगु भए हरि कंचनु चंदनु कीने ॥1॥ रहाउ ॥
नव छिअ खटु बोलहि मुख आगर मेरा हरि प्रभु इव न पतीने ॥
जन नानक हरि हिरदै सद धिआवहु इउ हरि प्रभु मेरा भीने ॥2॥1॥7॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी महला 4 ॥ हे हरी ! हे स्वामी ! मैं पपीहा आपके नाम की बूँद के लिए तड़प रहा हूँ।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।