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अंग 668

अंग
668
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धनासरी महला 4 ॥
हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥
हरि हरि क्रिपा करहु प्रभ अपनी मुखि देवहु हरि निमखाती ॥1॥
हरि बिनु रहि न सकउ इक राती ॥
जिउ बिनु अमलै अमली मरि जाई है तिउ हरि बिनु हम मरि जाती ॥ रहाउ ॥
तुम हरि सरवर अति अगाह हम लहि न सकहि अंतु माती ॥
तू परै परै अपरंपरु सुआमी मिति जानहु आपन गाती ॥2॥
हरि के संत जना हरि जपिओ गुर रंगि चलूलै राती ॥
हरि हरि भगति बनी अति सोभा हरि जपिओ ऊतम पाती ॥3॥
आपे ठाकुरु आपे सेवकु आपि बनावै भाती ॥
नानकु जनु तुमरी सरणाई हरि राखहु लाज भगाती ॥4॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे हरी ! हे स्वामी ! मैं पपीहा आपके नाम की बूँद के लिए तड़प रहा हूँ।(मेहर कर)।आपका नाम मेरे वास्ते (स्वाति) बूँद बन जाए। हे हरी ! हे प्रभू ! अपनी मेहर कर।आँख झपकने जितने समय के लिए ही मेरे मुँह में (अपने नाम की स्वाति) बूँद डाल दे। 1। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना मैं रक्ती भर समय के लिए भी नहीं रह सकता। जैसे (अफीम आदि) नशे के बिना अमली (नशे का आदी) मनुष्य तड़प उठता है।वैसे ही परमात्मा के नाम के बिना मैं घबरा जाता हूँ।रहाउ। हे प्रभू ! आप (गुणों का) बड़ा ही गहरा समुंद्र है।हम आपकी गहराई का अंत रक्ती भर भी नहीं पा सकते। आप परे से परे है।आप बेअंत है।हे स्वामी ! आप कैसा है और कितना बड़ा है, ये भेद आप खुद ही जानता है। 2। हे भाई ! परमात्मा के जिन संत जनों ने परमात्मा का नाम जपा।वे गुरू के (बख्शे हुए) गाढ़े प्रेम-रंग में रंगे गए। उनके अंदर परमात्मा की भक्ति का रंग बन गया।उनको (लोक-परलोक में) बड़ी शोभा मिली।जिन्होंने प्रभू का नाम जपा।उन्हें श्रेष्ठ सम्मान प्राप्त हुआ। 3। पर। हे भाई ! भक्ति करने की विधि प्रभू खुद ही बनाता है (खुद ही सबब बनाता है)।वह खुद ही मालिक है खुद ही सेवक है। हे प्रभू ! आपका दास नानक आपकी शरण आया है।आप खुद ही अपने भक्तों की इज्जत रखता है। 4। 5।
धनासरी महला 4 ॥
कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥
हरि हरि जपु बेड़ी हरि तुलहा हरि जपिओ तरै तराकी ॥1॥
हरि जी लाज रखहु हरि जन की ॥
हरि हरि जपनु जपावहु अपना हम मागी भगति इकाकी ॥ रहाउ ॥
हरि के सेवक से हरि पिआरे जिन जपिओ हरि बचनाकी ॥
लेखा चित्र गुपति जो लिखिआ सभ छूटी जम की बाकी ॥2॥
हरि के संत जपिओ मनि हरि हरि लगि संगति साध जना की ॥
दिनीअरु सूरु त्रिसना अगनि बुझानी सिव चरिओ चंदु चंदाकी ॥3॥
तुम वड पुरख वड अगम अगोचर तुम आपे आपि अपाकी ॥
जन नानक कउ प्रभ किरपा कीजै करि दासनि दास दसाकी ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई ! मुझे वह धर्म बता जिससे जगत के विकारों के झमेलों से बचा जा सके।मैं इन झमेलों से बचना चाहता हूँ।बता।मैं कैसे बचूँ। (उक्तर-) परमात्मा के नाम का जाप बेड़ी है।नाम ही तुलहा है।जिस मनुष्य ने हरी का नाम जपा वह तैराक बन के (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाता है। 1। हे प्रभू जी ! (दुनिया के विकारों के झमेलों में से) अपने सेवक की इज्जत बचा ले। हे हरी ! मुझे अपना नाम जपने की समर्था दे।मैं (आपसे) सिर्फ आपकी भक्ति का दान माँग रहा हूँ।रहाउ। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू के बचनों के द्वारा परमात्मा का नाम जपा।वे सेवक परमात्मा को प्यारे लगते हैं। चित्र-गुप्त ने जो भी उनके (कर्मों का) लेख लिख रखा था।धर्मराज का वह सारा हिसाब ही समाप्त हो जाता है। 2। हे भाई ! जिन संत जनों ने साध जनों की संगति में बैठ के अपने मन में परमात्मा के नाम का जाप किया। उनके अंदर कल्याण स्वरूप (परमात्मा प्रगट हो गया।मानो) ठंडक पहुँचाने वाला चाँद निकल आया हैं।जिसने (उनके हृदय में से) तृष्णा की आग बुझा दी; (जिसने विकारों का) तपता सूरज (शांत कर दिया)। 3। हे प्रभू ! आप सबसे बड़ा है।आप सर्व-व्यापक है; आप अपहुँच है; ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा आप तक नहीं पहुँचा जा सकता।आप (हर जगह) खुद ही खुद।स्वयं ही स्वयं है। हे प्रभू ! अपने दास नानक पर मेहर कर।और।अपने दासों के दासों का दास बना ले। 4। 6।
धनासरी महला 4 घरु 5 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥
अद्रिसटु अगोचरु अपरंपर सुआमी गुरि पूरै प्रगट करि दीने ॥1॥
राम पारस चंदन हम कासट लोसट ॥
हरि संगि हरी सतसंगु भए हरि कंचनु चंदनु कीने ॥1॥ रहाउ ॥
नव छिअ खटु बोलहि मुख आगर मेरा हरि प्रभु इव न पतीने ॥
जन नानक हरि हिरदै सद धिआवहु इउ हरि प्रभु मेरा भीने ॥2॥1॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 घरु 5 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य के हृदय में उस परमात्मा का नाम) प्रगट कर दिया है; जो इन आँखों से नहीं दिखाई देता। जो ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।बेअंत है।जो सबका मालिक है।(वह मनुष्य उस) मुरारी को मन मोहन के नाम को अपने दिल में बसा के सोच-मण्डल में टिका के सदा जपता रहता है। 1। हे भाई ! परमात्मा पारस है।हम जीव लोहा हैं।परमात्मा चंदन है।हम जीव काठ हैं। जिस मनुष्य का परमात्मा के साथ सत्संग हो जाता है।परमात्मा उस को (लोहे से) सोना बना देता है।(काठ से) चंदन बना देता है। 1।रहाउ। (हे भाई ! कई पण्डित) नौ व्याकरणों और छह शास्त्रों को मुँह जबानी उचार लेते हैं।(पर) प्यारा हरी-प्रभू इस तरह खुश नहीं होता। हे दास नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा को अपने हृदय में सदा बसाए रखो।(सिर्फ) इस तरह परमात्मा सदा प्रसन्न होता है। 2। 1। 7।
धनासरी महला 4 ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धनासरी महला 4 ॥ हे हरी ! हे स्वामी ! मैं पपीहा आपके नाम की बूँद के लिए तड़प रहा हूँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।