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धनासरी
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· शबद · राग धनासरी
हरि हरि अगम अगाधि बोधि अपरंपर पुरख अपारी ॥
हरि हरि अगम अगाधि बोधि अपरंपर पुरख अपारी ॥
जन कउ क्रिपा करहु जगजीवन जन नानक पैज सवारी ॥4॥1॥
जन कउ क्रिपा करहु जगजीवन जन नानक पैज सवारी ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें) हे अपहुँच! हे मनुष्यों की समझ से परे! हे परे से परे! हे सर्व व्यापक! हे बेअंत! हे जगत जीवन! अपने दासों पर मेहर करें। और (इस विकारों भरे संसार-समुंद्र में से) दासों की लाज रख लें। 4। 1।
· शबद · राग धनासरी
हरि के संत जना हरि जपिओ तिन का दूखु भरमु भउ भागी ॥
धनासरी महला 4 ॥
हरि के संत जना हरि जपिओ तिन का दूखु भरमु भउ भागी ॥
अपनी सेवा आपि कराई गुरमति अंतरि जागी ॥1॥
हरि कै नामि रता बैरागी ॥
हरि हरि कथा सुणी मनि भाई गुरमति हरि लिव लागी ॥1॥ रहाउ ॥
संत जना की जाति हरि सुआमी तुम॑ ठाकुर हम सांगी ॥
जैसी मति देवहु हरि सुआमी हम तैसे बुलग बुलागी ॥2॥
किआ हम किरम नान॑ निक कीरे तुम॑ वड पुरख वडागी ॥
तुम॑री गति मिति कहि न सकह प्रभ हम किउ करि मिलह अभागी ॥3॥
हरि प्रभ सुआमी किरपा धारहु हम हरि हरि सेवा लागी ॥
नानक दासनि दासु करहु प्रभ हम हरि कथा कथागी ॥4॥2॥
हरि के संत जना हरि जपिओ तिन का दूखु भरमु भउ भागी ॥
अपनी सेवा आपि कराई गुरमति अंतरि जागी ॥1॥
हरि कै नामि रता बैरागी ॥
हरि हरि कथा सुणी मनि भाई गुरमति हरि लिव लागी ॥1॥ रहाउ ॥
संत जना की जाति हरि सुआमी तुम॑ ठाकुर हम सांगी ॥
जैसी मति देवहु हरि सुआमी हम तैसे बुलग बुलागी ॥2॥
किआ हम किरम नान॑ निक कीरे तुम॑ वड पुरख वडागी ॥
तुम॑री गति मिति कहि न सकह प्रभ हम किउ करि मिलह अभागी ॥3॥
हरि प्रभ सुआमी किरपा धारहु हम हरि हरि सेवा लागी ॥
नानक दासनि दासु करहु प्रभ हम हरि कथा कथागी ॥4॥2॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई! परमात्मा के जिन संत जनों ने परमात्मा का नाम जपा। उनका हरेक दुख। हरेक भ्रम। हरेक डर दूर हो जाता है। परमात्मा खुद ही उनसे अपनी भक्ति करवाता है। (परमात्मा की कृपा से ही) उनके अंदर गुरू का उपदेश अपना प्रभाव डालता है। 1। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा के नाम में मगन रहता है वह माया के मोह से निर्लिप हो जाता है। वह (ज्यों-ज्यों) परमात्मा की सिफत सालाह की बातें सुनता है। उसको वह मन में अच्छी लगती हैं। गुरू के उपदेश की बरकति से उसकी लगन परमात्मा में लगी रहती है। 1। रहाउ। हे हरी प्रभू! (दुनिया के लोग अपनी उच्च जाति का घमण्ड करते हैं) संत जनों की जाति तो आप स्वयं ही हैं (संत-जन आपसे ही आत्मिक जीवन लेते हैं)। हे प्रभू! आप हमारे मालिक हैं। हम आपके पद्चिन्हों पर चलने वाले हैं। जैसी आप हमें बुद्धि देते हैं। हम वैसे ही बोल बोलते हैं। 2। हे प्रभू! हमारी क्या बिसात। हम तो बहुत छोटे कीड़े हैं। छोटे छोटे कृमि हैं। आप बड़े पुरुख हैं। हम जीव ये नहीं बता सकते कि आप कैसे हैं और कितने बड़े हैं। हम अभागे जीव (अपने उद्यम से) आपको कैसे मिल सकते हैं। 3। हे हरी प्रभू! हे मालिक! हम पर मेहर करें। हम आपकी सेवा-भक्ति में लगें। हे नानक! (कहें) हे प्रभू! हमें अपने दासों का दास बना लें। हम आपकी सिफत सालाह की बातें करते रहें। 4। 2।
· शबद · राग धनासरी
हरि का संतु सतगुरु सत पुरखा जो बोलै हरि हरि बानी ॥
धनासरी महला 4 ॥
हरि का संतु सतगुरु सत पुरखा जो बोलै हरि हरि बानी ॥
जो जो कहै सुणै सो मुकता हम तिस कै सद कुरबानी ॥1॥
हरि के संत सुनहु जसु कानी ॥
हरि हरि कथा सुनहु इक निमख पल सभि किलविख पाप लहि जानी ॥1॥ रहाउ ॥
ऐसा संतु साधु जिन पाइआ ते वड पुरख वडानी ॥
तिन की धूरि मंगह प्रभ सुआमी हम हरि लोच लुचानी ॥2॥
हरि हरि सफलिओ बिरखु प्रभ सुआमी जिन जपिओ से त्रिपतानी ॥
हरि हरि अंम्रितु पी त्रिपतासे सभ लाथी भूख भुखानी ॥3॥
जिन के वडे भाग वड ऊचे तिन हरि जपिओ जपानी ॥
तिन हरि संगति मेलि प्रभ सुआमी जन नानक दास दसानी ॥4॥3॥
हरि का संतु सतगुरु सत पुरखा जो बोलै हरि हरि बानी ॥
जो जो कहै सुणै सो मुकता हम तिस कै सद कुरबानी ॥1॥
हरि के संत सुनहु जसु कानी ॥
हरि हरि कथा सुनहु इक निमख पल सभि किलविख पाप लहि जानी ॥1॥ रहाउ ॥
ऐसा संतु साधु जिन पाइआ ते वड पुरख वडानी ॥
तिन की धूरि मंगह प्रभ सुआमी हम हरि लोच लुचानी ॥2॥
हरि हरि सफलिओ बिरखु प्रभ सुआमी जिन जपिओ से त्रिपतानी ॥
हरि हरि अंम्रितु पी त्रिपतासे सभ लाथी भूख भुखानी ॥3॥
जिन के वडे भाग वड ऊचे तिन हरि जपिओ जपानी ॥
तिन हरि संगति मेलि प्रभ सुआमी जन नानक दास दसानी ॥4॥3॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई! गुरू महापुरुख है। गुरू परमात्मा का संत है। जो परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उचारता है। जो जो मनुष्य इस बाणी को पढ़ता-सुनता है वह पापों से मुक्त हो जाता है। हे भाई! मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ। 1। हे परमात्मा के संत जनो! परमात्मा की सिफत सालाह ध्यान से सुना करें। आँख झपकने के जितने समय के लिए। एक पल के वास्ते भी अगर परमात्मा के सिफत सालाह की बातें सुनें, तो सारे पाप-दोख उतर जाते हैं। 1। हे भाई! जिन मनुष्यों ने ऐसा संत गुरू पा लिया है। वह बड़े मनुष्य (ऊँचे जीवन वाले मनुष्य) बन गए हैं। हे प्रभू! हे सवामी! हे हरी! मैं उनके चरणों की धूड़ मांगता हूँ। मुझे उनके चरणों की धूड़ की चाहत है। 2। हे प्रभू! हे सवामी! हे हरी! आप सारे फल देने वाला (मानो) वृक्ष हैं। जिन लोगों ने आपका नाम जपा वे (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो गए। हे हरी! आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है। (भाग्यशाली मनुष्य ये जल) पी के तृपत हो जाते हैं। उनकी और सारी भूख उतर जाती है। 3। हे भाई! जिन लोगों के बहुत ऊँचे भाग्य होते हैं। वे परमात्मा के नाम का जाप जपते हैं। हे दास नानक! (कहें) हे हरी! हे प्रभू! हे स्वामी! मुझे उनकी संगति में मिलाए रखें। मुझे उनके दासों का दास बना दें। 4। 3।
· शबद · राग धनासरी
हम अंधुले अंध बिखै बिखु राते किउ चालह गुर चाली ॥
धनासरी महला 4 ॥
हम अंधुले अंध बिखै बिखु राते किउ चालह गुर चाली ॥
सतगुरु दइआ करे सुखदाता हम लावै आपन पाली ॥1॥
गुरसिख मीत चलहु गुर चाली ॥
जो गुरु कहै सोई भल मानहु हरि हरि कथा निराली ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के संत सुणहु जन भाई गुरु सेविहु बेगि बेगाली ॥
सतगुरु सेवि खरचु हरि बाधहु मत जाणहु आजु कि काल॑ी ॥2॥
हरि के संत जपहु हरि जपणा हरि संतु चलै हरि नाली ॥
जिन हरि जपिआ से हरि होए हरि मिलिआ केल केलाली ॥3॥
हरि हरि जपनु जपि लोच लोुचानी हरि किरपा करि बनवाली ॥
जन नानक संगति साध हरि मेलहु हम साध जना पग राली ॥4॥4॥
हम अंधुले अंध बिखै बिखु राते किउ चालह गुर चाली ॥
सतगुरु दइआ करे सुखदाता हम लावै आपन पाली ॥1॥
गुरसिख मीत चलहु गुर चाली ॥
जो गुरु कहै सोई भल मानहु हरि हरि कथा निराली ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के संत सुणहु जन भाई गुरु सेविहु बेगि बेगाली ॥
सतगुरु सेवि खरचु हरि बाधहु मत जाणहु आजु कि काल॑ी ॥2॥
हरि के संत जपहु हरि जपणा हरि संतु चलै हरि नाली ॥
जिन हरि जपिआ से हरि होए हरि मिलिआ केल केलाली ॥3॥
हरि हरि जपनु जपि लोच लोुचानी हरि किरपा करि बनवाली ॥
जन नानक संगति साध हरि मेलहु हम साध जना पग राली ॥4॥4॥
हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई! हम जीव माया के मोह में बहुत अँधे हो के मायावी पदार्थों के जहर में मगन रहते हैं। हम कैसे गुरू के बताए हुए राह पर चल सकते हैं। सुखों को देने वाला गुरू (खुद ही) मेहर करे। और हमें अपने साथ लगा ले। 1। हे गुरसिख मित्रो! गुरू के बताए हुए राह पर चलें। (गुरू कहता है कि परमात्मा की सिफत सालाह किया करें। ये) जो कुछ गुरू कहता है। इसको (अपने लिए) भला समझें। (क्योंकि) प्रभू की सिफत सालाह अनोखी (तब्दीली जीवन में पैदा कर देती है)। 1। रहाउ। हे हरी के संत जनो! हे भाईयो! सुनें। जल्दी ही गुरू की शरण पड़ जाएँ। गुरू की शरण पड़ कर (जीवन यात्रा के लिए) परमात्मा के नाम की खर्ची (पल्ले) बाँधें। कहीं ये ना समझ लें कि आज (ये काम कर लेंगे) सवेरे (ये काम कर लेंगे। टाल-मटोल नहीं करना)। 2। हे हरी के संत जनो! परमात्मा के नाम का जाप किया करें। (इस जाप की बरकति से) हरी का संत हरी की रजा में चलने लग जाता है। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपते हैं। वे परमात्मा का रूप हो जाते हैं। रंग-तमाशे करने वाला तमाशेबाज (चोजी) प्रभू उन्हें मिल जाता है। 3। हे दास नानक! (कहें) हे बनवारी प्रभू! मुझे आपका नाम जपने की चाहत लगी हुई है। मेहर करें। मुझे साध-संगति में मिलाए रखें। मुझे आपके संत-जनों की धूड़ मिली रहे। 4। 4।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 667 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।