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अंग 667

अंग
667
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि हरि अगम अगाधि बोधि अपरंपर पुरख अपारी ॥
जन कउ क्रिपा करहु जगजीवन जन नानक पैज सवारी ॥4॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह) हे अपहुँच ! हे मनुष्यों की समझ से परे ! हे परे से परे ! हे सर्व व्यापक ! हे बेअंत ! हे जगत जीवन ! अपने दासों पर मेहर कर। और (इस विकारों भरे संसार-समुंद्र में से) दासों की लाज रख ले। 4। 1।
धनासरी महला 4 ॥
हरि के संत जना हरि जपिओ तिन का दूखु भरमु भउ भागी ॥
अपनी सेवा आपि कराई गुरमति अंतरि जागी ॥1॥
हरि कै नामि रता बैरागी ॥
हरि हरि कथा सुणी मनि भाई गुरमति हरि लिव लागी ॥1॥ रहाउ ॥
संत जना की जाति हरि सुआमी तुम॑ ठाकुर हम सांगी ॥
जैसी मति देवहु हरि सुआमी हम तैसे बुलग बुलागी ॥2॥
किआ हम किरम नान॑ निक कीरे तुम॑ वड पुरख वडागी ॥
तुम॑री गति मिति कहि न सकह प्रभ हम किउ करि मिलह अभागी ॥3॥
हरि प्रभ सुआमी किरपा धारहु हम हरि हरि सेवा लागी ॥
नानक दासनि दासु करहु प्रभ हम हरि कथा कथागी ॥4॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा के जिन संत जनों ने परमात्मा का नाम जपा।उनका हरेक दुख।हरेक भ्रम।हरेक डर दूर हो जाता है। परमात्मा खुद ही उनसे अपनी भक्ति करवाता है।(परमात्मा की कृपा से ही) उनके अंदर गुरू का उपदेश अपना प्रभाव डालता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम में मगन रहता है वह माया के मोह से निर्लिप हो जाता है। वह (ज्यों-ज्यों) परमात्मा की सिफत सालाह की बातें सुनता है।उसको वह मन में अच्छी लगती हैं।गुरू के उपदेश की बरकति से उसकी लगन परमात्मा में लगी रहती है। 1।रहाउ। हे हरी प्रभू ! (दुनिया के लोग अपनी उच्च जाति का घमण्ड करते हैं) संत जनों की जाति तो आप स्वयं ही है (संत-जन आपसे ही आत्मिक जीवन लेते हैं)।हे प्रभू ! आप हमारा मालिक है।हम आपके पद्चिन्हों पर चलने वाले हैं। जैसी आप हमें बुद्धि देता है।हम वैसे ही बोल बोलते हैं। 2। हे प्रभू ! हमारी क्या बिसात।हम तो बहुत छोटे कीड़े हैं।छोटे छोटे कृमि हैं।आप बड़ा पुरुख है। हम जीव ये नहीं बता सकते कि आप कैसा है।और कितना बड़ा है।हम अभागे जीव (अपने उद्यम से) आपको कैसे मिल सकते हैं। 3। हे हरी प्रभू ! हे मालिक ! हम पर मेहर कर।हम आपकी सेवा-भक्ति में लगें। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! हमें अपने दासों का दास बना ले।हम आपकी सिफत सालाह की बातें करते रहें। 4। 2।
धनासरी महला 4 ॥
हरि का संतु सतगुरु सत पुरखा जो बोलै हरि हरि बानी ॥
जो जो कहै सुणै सो मुकता हम तिस कै सद कुरबानी ॥1॥
हरि के संत सुनहु जसु कानी ॥
हरि हरि कथा सुनहु इक निमख पल सभि किलविख पाप लहि जानी ॥1॥ रहाउ ॥
ऐसा संतु साधु जिन पाइआ ते वड पुरख वडानी ॥
तिन की धूरि मंगह प्रभ सुआमी हम हरि लोच लुचानी ॥2॥
हरि हरि सफलिओ बिरखु प्रभ सुआमी जिन जपिओ से त्रिपतानी ॥
हरि हरि अंम्रितु पी त्रिपतासे सभ लाथी भूख भुखानी ॥3॥
जिन के वडे भाग वड ऊचे तिन हरि जपिओ जपानी ॥
तिन हरि संगति मेलि प्रभ सुआमी जन नानक दास दसानी ॥4॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई ! गुरू महापुरुख है।गुरू परमात्मा का संत है।जो परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उचारता है। जो जो मनुष्य इस बाणी को पढ़ता-सुनता है वह पापों से मुक्त हो जाता है।हे भाई ! मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ। 1। हे परमात्मा के संत जनो ! परमात्मा की सिफत सालाह ध्यान से सुना करो। आँख झपकने के जितने समय के लिए।एक पल के वास्ते भी अगर परमात्मा के सिफत सालाह की बातें सुनो।तो सारे पाप-दोख उतर जाते हैं। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने ऐसा संत गुरू पा लिया है।वह बड़े मनुष्य (ऊँचे जीवन वाले मनुष्य) बन गए हैं। हे प्रभू ! हे सवामी ! हे हरी ! मैं उनके चरणों की धूड़ मांगता हूँ।मुझे उनके चरणों की धूड़ की चाहत है। 2। हे प्रभू ! हे सवामी ! हे हरी ! आप सारे फल देने वाला (मानो) वृक्ष है।जिन लोगों ने आपका नाम जपा वे (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हैं गए। हे हरी ! आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है।(भाग्यशाली मनुष्य ये जल) पी के तृपत हैं जाते हैं।उनकी और सारी भूख उतर जाती है। 3। हे भाई ! जिन लोगों के बहुत ऊँचे भाग्य होते हैं।वे परमात्मा के नाम का जाप जपते हैं। हे दास नानक ! (कह) हे हरी ! हे प्रभू ! हे स्वामी ! मुझे उनकी संगति में मिलाए रख।मुझे उनके दासों का दास बना दे। 4। 3।
धनासरी महला 4 ॥
हम अंधुले अंध बिखै बिखु राते किउ चालह गुर चाली ॥
सतगुरु दइआ करे सुखदाता हम लावै आपन पाली ॥1॥
गुरसिख मीत चलहु गुर चाली ॥
जो गुरु कहै सोई भल मानहु हरि हरि कथा निराली ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के संत सुणहु जन भाई गुरु सेविहु बेगि बेगाली ॥
सतगुरु सेवि खरचु हरि बाधहु मत जाणहु आजु कि काल॑ी ॥2॥
हरि के संत जपहु हरि जपणा हरि संतु चलै हरि नाली ॥
जिन हरि जपिआ से हरि होए हरि मिलिआ केल केलाली ॥3॥
हरि हरि जपनु जपि लोच लोुचानी हरि किरपा करि बनवाली ॥
जन नानक संगति साध हरि मेलहु हम साध जना पग राली ॥4॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 4 ॥ हे भाई ! हम जीव माया के मोह में बहुत अँधे हो के मायावी पदार्थों के जहर में मगन रहते हैं।हम कैसे गुरू के बताए हुए राह पर चल सकते हैं। सुखों को देने वाला गुरू (खुद ही) मेहर करे।और हमें अपने साथ लगा ले। 1। हे गुरसिख मित्रो ! गुरू के बताए हुए राह पर चलो। (गुरू कहता है कि परमात्मा की सिफत सालाह किया केरो।ये) जो कुछ गुरू कहता है।इसको (अपने लिए) भला समझो।(क्योंकि) प्रभू की सिफत सालाह अनोखी (तब्दीली जीवन में पैदा कर देती है)। 1।रहाउ। हे हरी के संत जनो ! हे भाईयो ! सुनो।जल्दी ही गुरू की शरण पड़ जाएँ। गुरू की शरण पड़ कर (जीवन यात्रा के लिए) परमात्मा के नाम की खर्ची (पल्ले) बाँधो।कहीं ये ना समझ लेना कि आज (ये काम कर लेंगे) सवेरे (ये काम कर लेंगे।टाल-मटोल नहीं करना)। 2। हे हरी के संत जनो ! परमात्मा के नाम का जाप किया करो।(इस जाप की बरकति से) हरी का संत हरी की रजा में चलने लग जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपते हैं।वे परमात्मा का रूप हो जाते हैं।रंग-तमाशे करने वाला तमाशेबाज (चोजी) प्रभू उन्हें मिल जाता है। 3। हे दास नानक ! (कह) हे बनवारी प्रभू ! मुझे आपका नाम जपने की चाहत लगी हुई है।मेहर कर। मुझे साध-संगति में मिलाए रख।मुझे आपके संत-जनों की धूड़ मिली रहे। 4। 4।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह) हे अपहुँच ! हे मनुष्यों की समझ से परे ! हे परे से परे ! हे सर्व व्यापक ! हे बेअंत ! हे जगत जीवन ! अपने दासों पर मेहर कर।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।