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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 665 · धनासरी

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अंग
665
धनासरी
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  1. प्रभ साचे की साची कार ॥
  2. जो हरि सेवहि तिन बलि जाउ ॥
  3. मनु मरै धातु मरि जाइ ॥
  4. काचा धनु संचहि मूरख गावार ॥

प्रभ साचे की साची कार ॥

अंग 664 से चला आ रहा अंश

प्रभ साचे की साची कार ॥
नानक नामि सवारणहार ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! सदा कायम रहने वाले प्रभू की ये अटल मर्यादा है कि वह अपने नाम में जोड़ के जीवों के जीवन सुंदर बना देने वाला है। 4। 4।

जो हरि सेवहि तिन बलि जाउ ॥

धनासरी महला 3 ॥
जो हरि सेवहि तिन बलि जाउ ॥
तिन हिरदै साचु सचा मुखि नाउ ॥
साचो साचु समालिहु दुखु जाइ ॥
साचै सबदि वसै मनि आइ ॥1॥
गुरबाणी सुणि मैलु गवाए ॥
सहजे हरि नामु मंनि वसाए ॥1॥ रहाउ ॥
कूड़ु कुसतु त्रिसना अगनि बुझाए ॥
अंतरि सांति सहजि सुखु पाए ॥
गुर कै भाणै चलै ता आपु जाइ ॥
साचु महलु पाए हरि गुण गाइ ॥2॥
न सबदु बूझै न जाणै बाणी ॥
मनमुखि अंधे दुखि विहाणी ॥
सतिगुरु भेटे ता सुखु पाए ॥
हउमै विचहु ठाकि रहाए ॥3॥
किस नो कहीऐ दाता इकु सोइ ॥
किरपा करे सबदि मिलावा होइ ॥
मिलि प्रीतम साचे गुण गावा ॥
नानक साचे साचा भावा ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 3 ॥ (हे भाई ! गुरबाणी का आसरा ले के) जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करते हैं। मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। उनके हृदय में सदा-स्थिर प्रभू बसा रहता है। उनके मुँह में सदा-स्थिर हरी-नाम टिका रहता है। हे भाई ! सदा स्थिर प्रभू को ही (दिल में) संभाल के रखा करो (इसकी बरकति से हरेक) दुख दूर हो जाते हैं। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले शबद में जुड़ने से (हरी-नाम) मन में आ बसता है। 1। हे भाई ! गुरू की बाणी सुना कर। (ये बाणी मन में से विकारों की) मैल दूर कर देती है। (ये बाणी) आत्मिक अडोलता में (टिका के) परमात्मा का नाम मन में बसा देती है। 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की बाणी मन में से) झूठ-फरेब खत्म कर देती है। तृष्णा की आग बुझा देती है। (गुरबाणी की बरकति से) मन में शांति पैदा हो जाती है। आत्मिक अडोलता में टिका जाते हैं। आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। (जब मनुष्य गुरबाणी के अनुसार) गुरू की रजा में चलता है। तब (उसके अंदर से) स्वै भाव दूर हो जाता है। तब वह प्रभू की सिफत सालाह के गीत गा गा के सदा स्थिर रहने वाला ठिकाना प्राप्त कर लेता है (प्रभू चरणों में लीन रहता है)। 2। हे भाई ! जो मनुष्य ना गुरू के शबद को समझता है। ना गुरू की बाणी से गहरी सांझ डालता है। माया के मोह में अंधे हो चुके। और अपने मन के पीछे चलने वाले (उस मनुष्य की उम्र) दुख में ही गुजरती है। जब उसको गुरू मिल जाता है। तब वह आत्मिक आनंद हासिल करता है। गुरू उसके मन में से अहंकार को मार खत्म कर देता है। पर। हे भाई ! (परमात्मा के बिना) और किसी के आगे अरजोई की नहीं जा सकती। सिर्फ परमात्मा ही (गुरू के मिलाप की दाति) देने वाला है। जब परमात्मा (ये) कृपा करता है। तब गुरू के शबद में जुड़ने से (प्रभू से) मिलाप हो जाता है। हे नानक ! (कह, अगर प्रभू की मेहर हो तो) मैं प्रीतम गुरू को मिल के सदा-स्थिर प्रभू के गीत गा सकता हूँ। सदा स्थिर प्रभू का नाम जप-जप के सदा-स्थिर प्रभू को प्यारा लग सकता हूँ। 4। 5।

मनु मरै धातु मरि जाइ ॥

धनासरी महला 3 ॥
मनु मरै धातु मरि जाइ ॥
बिनु मन मूए कैसे हरि पाइ ॥
इहु मनु मरै दारू जाणै कोइ ॥
मनु सबदि मरै बूझै जनु सोइ ॥1॥
जिस नो बखसे हरि दे वडिआई ॥
गुर परसादि वसै मनि आई ॥ रहाउ ॥
गुरमुखि करणी कार कमावै ॥
ता इसु मन की सोझी पावै ॥
मनु मै मतु मैगल मिकदारा ॥
गुरु अंकसु मारि जीवालणहारा ॥2॥
मनु असाधु साधै जनु कोई ॥
अचरु चरै ता निरमलु होई ॥
गुरमुखि इहु मनु लइआ सवारि ॥
हउमै विचहु तजै विकार ॥3॥
जो धुरि रखिअनु मेलि मिलाइ ॥
कदे न विछुड़हि सबदि समाइ ॥
आपणी कला आपे प्रभु जाणै ॥
नानक गुरमुखि नामु पछाणै ॥4॥6॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 3 ॥ (हे भाई ! उस हरी-नाम की बरकति से मनुष्य का) मन विकारों का असर नहीं कबूलता। मन की तृष्णा समाप्त हो जाती है। जब तक मन विकारों से अछूता नहीं होता। मनुष्य परमात्मा का मिलाप प्राप्त नहीं कर सकता। हे भाई ! कोई विरला मनुष्य ही वह दवाई जानता है। जिसके इस्तेमाल से इस मन पर विकारों का असर ना हो सके। (जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है) वह मनुष्य समझ लेता है कि गुरू के शबद में जुड़ने से मन विकारों से अछूता हो जाता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा बख्शिश करता है। जिसको इज्जत देता है। उस मनुष्य के मन में गुरू की कृपा से (परमात्मा का नाम) आ बसता है।रहाउ। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (गुरू की ओर से मिले) करने योग्य काम करने आरम्भ कर देता है। तब उसको इस मन (को वश में रखने) की समझ आ जाती है। (जब मनुष्य ये समझ लेता है कि) मन (अहंकार के) नशे में मस्त हो के (मस्त) हाथी जैसा हुआ रहता है। गुरू ही (अपने शबद का) अंकुश बरत के (विकारों में आत्मिक मौत मरे हुए मन को) आत्मिक जीवन देने की समर्था रखता है। 2। हे भाई ! ये मन बड़ी मुश्किल से वश में आता है। कोई विरला मनुष्य इसे बस में लाता है। जब मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर मन के) असाध रोग (कामादिक) को खत्म कर लेता है। तब (इसका मन) पवित्र हो जाता है। गुरू की शरण पड़े रहने वाला मनुष्य इस मन को सुंदर बना लेता है। और अपने अंदर से अहंकार आदि विकारों को निकाल देता है। 3। हे भाई ! जिन मनुष्यों को उस (परमात्मा) ने धुर से ही अपने चरणों में जोड़े रखा है। वह गुरू के शबद में लीन रहके कभी भी (प्रभू से) नहीं विछुड़ते। हे भाई ! प्रभू खुद ही अपनी छुपी हुई शक्ति को जानता है (कि किस को वह अपने साथ जोड़े रखता है)। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा के नाम से सांझ बनाए रखता है। 4। 6।

काचा धनु संचहि मूरख गावार ॥

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धनासरी महला 3 ॥
काचा धनु संचहि मूरख गावार ॥
मनमुख भूले अंध गावार ॥
बिखिआ कै धनि सदा दुखु होइ ॥
ना साथि जाइ न परापति होइ ॥1॥
साचा धनु गुरमती पाए ॥
काचा धनु फुनि आवै जाए ॥ रहाउ ॥
मनमुखि भूले सभि मरहि गवार ॥
भवजलि डूबे न उरवारि न पारि ॥
सतिगुरु भेटे पूरै भागि ॥
साचि रते अहिनिसि बैरागि ॥2॥
चहु जुग महि अंम्रितु साची बाणी ॥
पूरै भागि हरि नामि समाणी ॥
सिध साधिक तरसहि सभि लोइ ॥
पूरै भागि परापति होइ ॥3॥
सभु किछु साचा साचा है सोइ ॥
ऊतम ब्रहमु पछाणै कोइ ॥
सचु साचा सचु आपि द्रिड़ाए ॥

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 3 ॥ हे भाई ! मूर्ख अंजान लोग (सिर्फ दुनियावी) नाशवंत धन (ही) जोड़ते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले। माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं। हे भाई ! माया के धन से सदा दुख (ही) मिलता है। ये धन ना ही मनुष्य के साथ जाता है और ना ही (इसे इकट्ठा कर-करके) संतोष ही मिलता है। 1। जो मनुष्य गुरू की मति पर चलते हैं। वे सदा कायम रहने वाले हरी-नाम-धन को हासिल कर लेते हैं। (पर दुनिया वाला) नाशवंत धन कभी मनुष्य को मिल जाता है कभी हाथ से निकल जाता है।रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (माया के मोह के कारण) गलत राह पड़ कर आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। संसार समुंद्र में डूब जाते हैं। ना इस पार रहते हैं। ना उस पार (ना ये माया आखिर तक साथ निभाती है। ना नाम-धन जोड़ा होता है)। जिन मनुष्यों को पूरी किस्मत से गुरू मिल जाता है वह दिन रात (हर वक्त) सदा-स्थिर हरी-नाम में मगन रहते हैं (नाम की बरकति से माया की ओर से) उपरामता में टिके रहते हैं। 2। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाली गुरबाणी सदा ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (बाँटती है)। पूरी किस्मत से (मनुष्य इस बाणी की बरकति से) परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है। हे भाई ! करामाती योगी और साधना करने वाले योगी सारे ही जगत में (इस बाणी की खातिर) तरले लेते हैं। पर पूरी किस्मत से मिलती है। 3। हे भाई ! जो कोई विरला मनुष्य पवित्र-स्वरूप परमात्मा के साथ सांझ डालता है उसे हरेक चीज़ सदा-स्थिर प्रभू का रूप दिखाई देती है। उसे हर जगह वह सदा-स्थिर प्रभू ही बसता दिखता है। हे नानक ! सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा अपना सदा-स्थिर नाम खुद ही (मनुष्य के दिल में) पक्का करता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 665 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।