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अंग 665

अंग
665
राग धनासरी
राग: धनासरी · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
प्रभ साचे की साची कार ॥
नानक नामि सवारणहार ॥4॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! सदा कायम रहने वाले प्रभू की ये अटल मर्यादा है कि वह अपने नाम में जोड़ के जीवों के जीवन सुंदर बना देने वाला है। 4। 4।
धनासरी महला 3 ॥
जो हरि सेवहि तिन बलि जाउ ॥
तिन हिरदै साचु सचा मुखि नाउ ॥
साचो साचु समालिहु दुखु जाइ ॥
साचै सबदि वसै मनि आइ ॥1॥
गुरबाणी सुणि मैलु गवाए ॥
सहजे हरि नामु मंनि वसाए ॥1॥ रहाउ ॥
कूड़ु कुसतु त्रिसना अगनि बुझाए ॥
अंतरि सांति सहजि सुखु पाए ॥
गुर कै भाणै चलै ता आपु जाइ ॥
साचु महलु पाए हरि गुण गाइ ॥2॥
न सबदु बूझै न जाणै बाणी ॥
मनमुखि अंधे दुखि विहाणी ॥
सतिगुरु भेटे ता सुखु पाए ॥
हउमै विचहु ठाकि रहाए ॥3॥
किस नो कहीऐ दाता इकु सोइ ॥
किरपा करे सबदि मिलावा होइ ॥
मिलि प्रीतम साचे गुण गावा ॥
नानक साचे साचा भावा ॥4॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 3 ॥ (हे भाई ! गुरबाणी का आसरा ले के) जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करते हैं।मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। उनके हृदय में सदा-स्थिर प्रभू बसा रहता है।उनके मुँह में सदा-स्थिर हरी-नाम टिका रहता है। हे भाई ! सदा स्थिर प्रभू को ही (दिल में) संभाल के रखा करो (इसकी बरकति से हरेक) दुख दूर हो जाते हैं। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले शबद में जुड़ने से (हरी-नाम) मन में आ बसता है। 1। हे भाई ! गुरू की बाणी सुना कर।(ये बाणी मन में से विकारों की) मैल दूर कर देती है। (ये बाणी) आत्मिक अडोलता में (टिका के) परमात्मा का नाम मन में बसा देती है। 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की बाणी मन में से) झूठ-फरेब खत्म कर देती है।तृष्णा की आग बुझा देती है। (गुरबाणी की बरकति से) मन में शांति पैदा हो जाती है।आत्मिक अडोलता में टिका जाते हैं।आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। (जब मनुष्य गुरबाणी के अनुसार) गुरू की रजा में चलता है।तब (उसके अंदर से) स्वै भाव दूर हो जाता है। तब वह प्रभू की सिफत सालाह के गीत गा गा के सदा स्थिर रहने वाला ठिकाना प्राप्त कर लेता है (प्रभू चरणों में लीन रहता है)। 2। हे भाई ! जो मनुष्य ना गुरू के शबद को समझता है।ना गुरू की बाणी से गहरी सांझ डालता है। माया के मोह में अंधे हो चुके।और अपने मन के पीछे चलने वाले (उस मनुष्य की उम्र) दुख में ही गुजरती है। जब उसको गुरू मिल जाता है।तब वह आत्मिक आनंद हासिल करता है। गुरू उसके मन में से अहंकार को मार खत्म कर देता है। पर। हे भाई ! (परमात्मा के बिना) और किसी के आगे अरजोई की नहीं जा सकती।सिर्फ परमात्मा ही (गुरू के मिलाप की दाति) देने वाला है। जब परमात्मा (ये) कृपा करता है।तब गुरू के शबद में जुड़ने से (प्रभू से) मिलाप हो जाता है। हे नानक ! (कह, अगर प्रभू की मेहर हो तो) मैं प्रीतम गुरू को मिल के सदा-स्थिर प्रभू के गीत गा सकता हूँ। सदा स्थिर प्रभू का नाम जप-जप के सदा-स्थिर प्रभू को प्यारा लग सकता हूँ। 4। 5।
धनासरी महला 3 ॥
मनु मरै धातु मरि जाइ ॥
बिनु मन मूए कैसे हरि पाइ ॥
इहु मनु मरै दारू जाणै कोइ ॥
मनु सबदि मरै बूझै जनु सोइ ॥1॥
जिस नो बखसे हरि दे वडिआई ॥
गुर परसादि वसै मनि आई ॥ रहाउ ॥
गुरमुखि करणी कार कमावै ॥
ता इसु मन की सोझी पावै ॥
मनु मै मतु मैगल मिकदारा ॥
गुरु अंकसु मारि जीवालणहारा ॥2॥
मनु असाधु साधै जनु कोई ॥
अचरु चरै ता निरमलु होई ॥
गुरमुखि इहु मनु लइआ सवारि ॥
हउमै विचहु तजै विकार ॥3॥
जो धुरि रखिअनु मेलि मिलाइ ॥
कदे न विछुड़हि सबदि समाइ ॥
आपणी कला आपे प्रभु जाणै ॥
नानक गुरमुखि नामु पछाणै ॥4॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 3 ॥ (हे भाई ! उस हरी-नाम की बरकति से मनुष्य का) मन विकारों का असर नहीं कबूलता।मन की तृष्णा समाप्त हो जाती है। जब तक मन विकारों से अछूता नहीं होता।मनुष्य परमात्मा का मिलाप प्राप्त नहीं कर सकता। हे भाई ! कोई विरला मनुष्य ही वह दवाई जानता है।जिसके इस्तेमाल से इस मन पर विकारों का असर ना हो सके। (जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है) वह मनुष्य समझ लेता है कि गुरू के शबद में जुड़ने से मन विकारों से अछूता हैं जाता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा बख्शिश करता है।जिसको इज्जत देता है। उस मनुष्य के मन में गुरू की कृपा से (परमात्मा का नाम) आ बसता है।रहाउ। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (गुरू की ओर से मिले) करने योग्य काम करने आरम्भ कर देता है। तब उसको इस मन (को वश में रखने) की समझ आ जाती है। (जब मनुष्य ये समझ लेता है कि) मन (अहंकार के) नशे में मस्त हो के (मस्त) हाथी जैसा हुआ रहता है। गुरू ही (अपने शबद का) अंकुश बरत के (विकारों में आत्मिक मौत मरे हुए मन को) आत्मिक जीवन देने की समर्था रखता है। 2। हे भाई ! ये मन बड़ी मुश्किल से वश में आता है।कोई विरला मनुष्य इसे बस में लाता है। जब मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर मन के) असाध रोग (कामादिक) को खत्म कर लेता है।तब (इसका मन) पवित्र हो जाता है। गुरू की शरण पड़े रहने वाला मनुष्य इस मन को सुंदर बना लेता है। और अपने अंदर से अहंकार आदि विकारों को निकाल देता है। 3। हे भाई ! जिन मनुष्यों को उस (परमात्मा) ने धुर से ही अपने चरणों में जोड़े रखा है। वह गुरू के शबद में लीन रहके कभी भी (प्रभू से) नहीं विछुड़ते। हे भाई ! प्रभू खुद ही अपनी छुपी हुई शक्ति को जानता है (कि किस को वह अपने साथ जोड़े रखता है)। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा के नाम से सांझ बनाए रखता है। 4। 6।
धनासरी महला 3 ॥
काचा धनु संचहि मूरख गावार ॥
मनमुख भूले अंध गावार ॥
बिखिआ कै धनि सदा दुखु होइ ॥
ना साथि जाइ न परापति होइ ॥1॥
साचा धनु गुरमती पाए ॥
काचा धनु फुनि आवै जाए ॥ रहाउ ॥
मनमुखि भूले सभि मरहि गवार ॥
भवजलि डूबे न उरवारि न पारि ॥
सतिगुरु भेटे पूरै भागि ॥
साचि रते अहिनिसि बैरागि ॥2॥
चहु जुग महि अंम्रितु साची बाणी ॥
पूरै भागि हरि नामि समाणी ॥
सिध साधिक तरसहि सभि लोइ ॥
पूरै भागि परापति होइ ॥3॥
सभु किछु साचा साचा है सोइ ॥
ऊतम ब्रहमु पछाणै कोइ ॥
सचु साचा सचु आपि द्रिड़ाए ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: धनासरी महला 3 ॥ हे भाई ! मूर्ख अंजान लोग (सिर्फ दुनियावी) नाशवंत धन (ही) जोड़ते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले।माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं। हे भाई ! माया के धन से सदा दुख (ही) मिलता है। ये धन ना ही मनुष्य के साथ जाता है और ना ही (इसे इकट्ठा कर-करके) संतोष ही मिलता है। 1। जो मनुष्य गुरू की मति पर चलते हैं।वे सदा कायम रहने वाले हरी-नाम-धन को हासिल कर लेते हैं। (पर दुनिया वाला) नाशवंत धन कभी मनुष्य को मिल जाता है कभी हाथ से निकल जाता है।रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (माया के मोह के कारण) गलत राह पड़ कर आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। संसार समुंद्र में डूब जाते हैं।ना इस पार रहते हैं।ना उस पार (ना ये माया आखिर तक साथ निभाती है।ना नाम-धन जोड़ा होता है)। जिन मनुष्यों को पूरी किस्मत से गुरू मिल जाता है वह दिन रात (हर वक्त) सदा-स्थिर हरी-नाम में मगन रहते हैं (नाम की बरकति से माया की ओर से) उपरामता में टिके रहते हैं। 2। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाली गुरबाणी सदा ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (बाँटती है)। पूरी किस्मत से (मनुष्य इस बाणी की बरकति से) परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है। हे भाई ! करामाती योगी और साधना करने वाले योगी सारे ही जगत में (इस बाणी की खातिर) तरले लेते हैं। पर पूरी किस्मत से मिलती है। 3। हे भाई ! जो कोई विरला मनुष्य पवित्र-स्वरूप परमात्मा के साथ सांझ डालता है उसे हरेक चीज़ सदा-स्थिर प्रभू का रूप दिखाई देती है। उसे हर जगह वह सदा-स्थिर प्रभू ही बसता दिखता है। हे नानक ! सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा अपना सदा-स्थिर नाम खुद ही (मनुष्य के दिल में) पक्का करता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! सदा कायम रहने वाले प्रभू की ये अटल मर्यादा है कि वह अपने नाम में जोड़ के जीवों के जीवन सुंदर बना देने वाला है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।