नानक गुरमुखि बुझीऐ जा आपे नदरि करेइ ॥1॥
जिन गुरमुखि नामु धिआइआ आए ते परवाणु ॥
नानक कुल उधारहि आपणा दरगह पावहि माणु ॥2॥
गुरमुखि सखीआ सिख गुरू मेलाईआ ॥
इकि सेवक गुर पासि इकि गुरि कारै लाईआ ॥
जिना गुरु पिआरा मनि चिति तिना भाउ गुरू देवाईआ ॥
गुर सिखा इको पिआरु गुर मिता पुता भाईआ ॥
गुरु सतिगुरु बोलहु सभि गुरु आखि गुरू जीवाईआ ॥14॥
नानक नामु न चेतनी अगिआनी अंधुले अवरे करम कमाहि ॥
जम दरि बधे मारीअहि फिरि विसटा माहि पचाहि ॥1॥
नानक सतिगुरु सेवहि आपणा से जन सचे परवाणु ॥
हरि कै नाइ समाइ रहे चूका आवणु जाणु ॥2॥
धनु संपै माइआ संचीऐ अंते दुखदाई ॥
घर मंदर महल सवारीअहि किछु साथि न जाई ॥
हर रंगी तुरे नित पालीअहि कितै कामि न आई ॥
जन लावहु चितु हरि नाम सिउ अंति होइ सखाई ॥
जन नानक नामु धिआइआ गुरमुखि सुखु पाई ॥15॥
बिनु करमै नाउ न पाईऐ पूरै करमि पाइआ जाइ ॥
नानक नदरि करे जे आपणी ता गुरमति मेलि मिलाइ ॥1॥
इक दझहि इक दबीअहि इकना कुते खाहि ॥
इकि पाणी विचि उसटीअहि इकि भी फिरि हसणि पाहि ॥
नानक एव न जापई किथै जाइ समाहि ॥2॥
तिन का खाधा पैधा माइआ सभु पवितु है जो नामि हरि राते ॥
तिन के घर मंदर महल सराई सभि पवितु हहि जिनी गुरमुखि सेवक सिख अभिआगत जाइ वरसाते ॥
तिन के तुरे जीन खुरगीर सभि पवितु हहि जिनी गुरमुखि सिख साध संत चड़ि जाते ॥
तिन के करम धरम कारज सभि पवितु हहि जो बोलहि हरि हरि राम नामु हरि साते ॥
जिन कै पोतै पुंनु है से गुरमुखि सिख गुरू पहि जाते ॥16॥
नानक नावहु घुथिआ हलतु पलतु सभु जाइ ॥
जपु तपु संजमु सभु हिरि लइआ मुठी दूजै भाइ ॥
जम दरि बधे मारीअहि बहुती मिलै सजाइ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सतिगुरू के सन्मुख होने से मनुष्य इस तरह स्वैभाव गवाता है और।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।