अंग 648

अंग
648
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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इउ गुरमुखि आपु निवारीऐ सभु राजु स्रिसटि का लेइ ॥
नानक गुरमुखि बुझीऐ जा आपे नदरि करेइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू के सन्मुख होने से मनुष्य इस तरह स्वैभाव गवाता है और।मानो। सारी सृष्टि का राज ले लेता है। हे नानक ! जब हरी खुद कृपा भरी नजर करता है तब सतिगुरू के सन्मुख हो के ये समझ आती है। 1।
मः 3 ॥
जिन गुरमुखि नामु धिआइआ आए ते परवाणु ॥
नानक कुल उधारहि आपणा दरगह पावहि माणु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (संसार में) आए वह मनुष्य कबूल हैं जिन्होंने सतिगुरू के बताए राह पर चल कर नाम सिमरा है; हे नानक ! वह मनुष्य अपना कुल तार लेते हैं और खुद दरगाह में आदर पाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
गुरमुखि सखीआ सिख गुरू मेलाईआ ॥
इकि सेवक गुर पासि इकि गुरि कारै लाईआ ॥
जिना गुरु पिआरा मनि चिति तिना भाउ गुरू देवाईआ ॥
गुर सिखा इको पिआरु गुर मिता पुता भाईआ ॥
गुरु सतिगुरु बोलहु सभि गुरु आखि गुरू जीवाईआ ॥14॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सतिगुरू ने गुरमुख सिख (रूप) सहेलियां (आपस में) मिलाई हैं; उनमें से कई सतिगुरू के पास सेवा करती हैं।कईयों को सतिगुरू ने (और) कामों में लगाया हुआ है; जिनके मन में प्यारा गुरू बसता है।सतिगुरू उनको अपना प्यार बख्शता है। सतिगुरू का अपने सिखों मित्रों पुत्रों और भाईयों से एक जैसा ही प्यार होता है। (हे सिख सहेलियो !) सारे ही ‘गुरू गुरू’ कहो।‘गुरू गुरू’ कहने से गुरू आत्मिक जीवन दे देता है। 14।
सलोकु मः 3 ॥
नानक नामु न चेतनी अगिआनी अंधुले अवरे करम कमाहि ॥
जम दरि बधे मारीअहि फिरि विसटा माहि पचाहि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 । हे नानक ! अंधे अज्ञानी नाम नहीं सिमरते और और ही काम करते रहते हैं। (नतीजा ये निकलता है कि) जम के दर पर बंधे हुए मार खाते हैं और फिर (विकार-रूपी) विष्टा में सड़ते हैं। 1।
मः 3 ॥
नानक सतिगुरु सेवहि आपणा से जन सचे परवाणु ॥
हरि कै नाइ समाइ रहे चूका आवणु जाणु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे नानक ! जो मनुष्य अपने सतिगुरू की बताई हुई कार करते हैं वे मनुष्य सच्चे और कबूल हैं; वे हरी के नाम में लीन रहते हैं और उनका पैदा होना-मरना समाप्त हो जाता है। 2।
पउड़ी ॥
धनु संपै माइआ संचीऐ अंते दुखदाई ॥
घर मंदर महल सवारीअहि किछु साथि न जाई ॥
हर रंगी तुरे नित पालीअहि कितै कामि न आई ॥
जन लावहु चितु हरि नाम सिउ अंति होइ सखाई ॥
जन नानक नामु धिआइआ गुरमुखि सुखु पाई ॥15॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ धन। दौलत और माया इकट्ठी की जाती है।पर आखिर को दुखदाई होती है; घर।मंदिर और महल बनाए जाते हैं।पर कुछ भी साथ नहीं जाता। कई रंगों के घोड़े सदा पाले जाते हैं।पर किसी काम नहीं आते। हे भाई सज्जनो ! हरी के नाम से चित्त जोड़ो।जो आखिर को साथी बने। हे दास नानक ! जो मनुष्य नाम सिमरता है।वह सतिगुरू के सन्मुख रह के सुख पाता है। 15।
सलोकु मः 3 ॥
बिनु करमै नाउ न पाईऐ पूरै करमि पाइआ जाइ ॥
नानक नदरि करे जे आपणी ता गुरमति मेलि मिलाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ पूरी मेहर से ही हरी का नाम पाया जा सकता है।मेहर (कृपा) के बिना नाम नहीं मिलता; हे नानक ! अगर हरी अपनी कृपा-दृष्टि करे।तो सतिगुरू की शिक्षा में लीन करके मिला लेता है। 1।
मः 1 ॥
इक दझहि इक दबीअहि इकना कुते खाहि ॥
इकि पाणी विचि उसटीअहि इकि भी फिरि हसणि पाहि ॥
नानक एव न जापई किथै जाइ समाहि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (मरने पर) कोई जलाए जाते हैं।कोई दबाए जाते हैं।एक को कुत्ते खाते हैं। कोई जल प्रवाह कर दिए जाते हैं और कोई सूखे कूँएं में रख दिए जाते हैं।पर। हे नानक ! (शरीर के) जलाने-दबाने आदि से ये पता नहीं लग सकता कि रूहें कहाँ जा बसती हैं। 2।
पउड़ी ॥
तिन का खाधा पैधा माइआ सभु पवितु है जो नामि हरि राते ॥
तिन के घर मंदर महल सराई सभि पवितु हहि जिनी गुरमुखि सेवक सिख अभिआगत जाइ वरसाते ॥
तिन के तुरे जीन खुरगीर सभि पवितु हहि जिनी गुरमुखि सिख साध संत चड़ि जाते ॥
तिन के करम धरम कारज सभि पवितु हहि जो बोलहि हरि हरि राम नामु हरि साते ॥
जिन कै पोतै पुंनु है से गुरमुखि सिख गुरू पहि जाते ॥16॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जो मनुष्य हरी के नाम रंग में रंगे हुए हैं।उनका माया का उपयोग।खाना-पहनना सब कुछ पवित्र है; उनके घर।मन्दिर।महल और सराएं सब पवित्र हैं।जिनमें गुरमुख सेवक सिख व अतिथि जा के सुख लेते हैं। उनके घोड़े।ज़ीनें।ताहरू सब पवित्र हैं।जिन पर गुरसिख साध संत चढ़ते हैं; उनके काम-काज सब पवित्र हैं जो हर वक्त हरी का नाम उचारते हैं। (पहले किए कर्मों के अनुसार) जिन के पल्ले (भले संस्कार रूप) पुंन हैं।वे गुरसिख सिख सतिगुरू की शरण आते हैं। 16।
सलोकु मः 3 ॥
नानक नावहु घुथिआ हलतु पलतु सभु जाइ ॥
जपु तपु संजमु सभु हिरि लइआ मुठी दूजै भाइ ॥
जम दरि बधे मारीअहि बहुती मिलै सजाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! नाम से टूटे हुए का लोक-परलोक सब व्यर्थ जाता है; उनका जप तप और संजम सब छिन जाता है।और माया के मोह में (उनकी मति) ठॅगी जाती है; जम के द्वार पर बँधे हुए मार खाते हैं और (उनको) बहुत सज़ा मिलती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सतिगुरू के सन्मुख होने से मनुष्य इस तरह स्वैभाव गवाता है और।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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