संता नालि वैरु कमावदे दुसटा नालि मोहु पिआरु ॥
अगै पिछै सुखु नही मरि जंमहि वारो वार ॥
त्रिसना कदे न बुझई दुबिधा होइ खुआरु ॥
मुह काले तिना निंदका तितु सचै दरबारि ॥
नानक नाम विहूणिआ ना उरवारि न पारि ॥2॥
जो हरि नामु धिआइदे से हरि हरि नामि रते मन माही ॥
जिना मनि चिति इकु अराधिआ तिना इकस बिनु दूजा को नाही ॥
सेई पुरख हरि सेवदे जिन धुरि मसतकि लेखु लिखाही ॥
हरि के गुण नित गावदे हरि गुण गाइ गुणी समझाही ॥
वडिआई वडी गुरमुखा गुर पूरै हरि नामि समाही ॥17॥
सतिगुर की सेवा गाखड़ी सिरु दीजै आपु गवाइ ॥
सबदि मरहि फिरि ना मरहि ता सेवा पवै सभ थाइ ॥
पारस परसिऐ पारसु होवै सचि रहै लिव लाइ ॥
जिसु पूरबि होवै लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै प्रभु आइ ॥
नानक गणतै सेवकु ना मिलै जिसु बखसे सो पवै थाइ ॥1॥
महलु कुमहलु न जाणनी मूरख अपणै सुआइ ॥
सबदु चीनहि ता महलु लहहि जोती जोति समाइ ॥
सदा सचे का भउ मनि वसै ता सभा सोझी पाइ ॥
सतिगुरु अपणै घरि वरतदा आपे लए मिलाइ ॥
नानक सतिगुरि मिलिऐ सभ पूरी पई जिस नो किरपा करे रजाइ ॥2॥
धंनु धनु भाग तिना भगत जना जो हरि नामा हरि मुखि कहतिआ ॥
धनु धनु भाग तिना संत जना जो हरि जसु स्रवणी सुणतिआ ॥
धनु धनु भाग तिना साध जना हरि कीरतनु गाइ गुणी जन बणतिआ ॥
धनु धनु भाग तिना गुरमुखा जो गुरसिख लै मनु जिणतिआ ॥
सभ दू वडे भाग गुरसिखा के जो गुर चरणी सिख पड़तिआ ॥18॥
ब्रहमु बिंदै तिस दा ब्रहमतु रहै एक सबदि लिव लाइ ॥
नव निधी अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरहि जो हरि हिरदै सदा वसाइ ॥
बिनु सतिगुर नाउ न पाईऐ बुझहु करि वीचारु ॥
नानक पूरै भागि सतिगुरु मिलै सुखु पाए जुग चारि ॥1॥
किआ गभरू किआ बिरधि है मनमुख त्रिसना भुख न जाइ ॥
गुरमुखि सबदे रतिआ सीतलु होए आपु गवाइ ॥
अंदरु त्रिपति संतोखिआ फिरि भुख न लगै आइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 3॥ निंदक मनुष्य संत-जनों से वैर करते हैं और दुर्जनों से मोह-प्यार रखते हैं; उन्हें लोक-परलोक में कहीं सुख नहीं मिलता।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।