परथाइ साखी महा पुरख बोलदे साझी सगल जहानै ॥
गुरमुखि होइ सु भउ करे आपणा आपु पछाणै ॥
गुर परसादी जीवतु मरै ता मन ही ते मनु मानै ॥
जिन कउ मन की परतीति नाही नानक से किआ कथहि गिआनै ॥1॥
गुरमुखि चितु न लाइओ अंति दुखु पहुता आइ ॥
अंदरहु बाहरहु अंधिआं सुधि न काई पाइ ॥
पंडित तिन की बरकती सभु जगतु खाइ जो रते हरि नाइ ॥
जिन गुर कै सबदि सलाहिआ हरि सिउ रहे समाइ ॥
पंडित दूजै भाइ बरकति न होवई ना धनु पलै पाइ ॥
पड़ि थके संतोखु न आइओ अनदिनु जलत विहाइ ॥
कूक पूकार न चुकई ना संसा विचहु जाइ ॥
नानक नाम विहूणिआ मुहि कालै उठि जाइ ॥2॥
हरि सजण मेलि पिआरे मिलि पंथु दसाई ॥
जो हरि दसे मितु तिसु हउ बलि जाई ॥
गुण साझी तिन सिउ करी हरि नामु धिआई ॥
हरि सेवी पिआरा नित सेवि हरि सुखु पाई ॥
बलिहारी सतिगुर तिसु जिनि सोझी पाई ॥12॥
पंडित मैलु न चुकई जे वेद पड़ै जुग चारि ॥
त्रै गुण माइआ मूलु है विचि हउमै नामु विसारि ॥
पंडित भूले दूजै लागे माइआ कै वापारि ॥
अंतरि त्रिसना भुख है मूरख भुखिआ मुए गवार ॥
सतिगुरि सेविऐ सुखु पाइआ सचै सबदि वीचारि ॥
अंदरहु त्रिसना भुख गई सचै नाइ पिआरि ॥
नानक नामि रते सहजे रजे जिना हरि रखिआ उरि धारि ॥1॥
मनमुख हरि नामु न सेविआ दुखु लगा बहुता आइ ॥
अंतरि अगिआनु अंधेरु है सुधि न काई पाइ ॥
मनहठि सहजि न बीजिओ भुखा कि अगै खाइ ॥
नामु निधानु विसारिआ दूजै लगा जाइ ॥
नानक गुरमुखि मिलहि वडिआईआ जे आपे मेलि मिलाइ ॥2॥
हरि रसना हरि जसु गावै खरी सुहावणी ॥
जो मनि तनि मुखि हरि बोलै सा हरि भावणी ॥
जो गुरमुखि चखै सादु सा त्रिपतावणी ॥
गुण गावै पिआरे नित गुण गाइ गुणी समझावणी ॥
जिसु होवै आपि दइआलु सा सतिगुरू गुरू बुलावणी ॥13॥
हसती सिरि जिउ अंकसु है अहरणि जिउ सिरु देइ ॥
मनु तनु आगै राखि कै ऊभी सेव करेइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 3॥ महापुरुष किसी के संबंध में शिक्षा के वचन बोलते हैं (पर वह शिक्षा) सारे संसार के लिए सांझे होते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।