Lulla Family

अंग 646

अंग
646
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
विणु नावै सभि भरमदे नित जगि तोटा सैसारि ॥
मनमुखि करम कमावणे हउमै अंधु गुबारु ॥
गुरमुखि अंम्रितु पीवणा नानक सबदु वीचारि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: नाम के बिना सारे लोग भटकते फिरते हैं;उनको संसार में सदा घाटा ही घाटा है; हे नानक ! मनमुख तो अहंकार के आसरे ऐसे कर्म कमाते हैं जो घोर अंधकार पैदा करते हैं। पर सतिगुरू के सन्मुख जीव शबद को विचार के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते हैं। 1।
मः 3 ॥
सहजे जागै सहजे सोवै ॥
गुरमुखि अनदिनु उसतति होवै ॥
मनमुख भरमै सहसा होवै ॥
अंतरि चिंता नीद न सोवै ॥
गिआनी जागहि सवहि सुभाइ ॥
नानक नामि रतिआ बलि जाउ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख होता है वह आत्मिक अडोलता में ही जागता है और आत्मिक अडोलता में ही सोता है (भाव।जागते हुए हरी में लीन और सोते हुए भी हरी में लीन रहता है) उसे हर रोज (भाव।हर वक्त) हरी की उस्तति (का ही आहर होता) है। मनमुख भटकता है।क्योंकि उसे सदा तौखला रहता है; मन में चिंता होने के कारण वह (सुख की) नींद नहीं सोता। प्रभू के साथ गहरी सांझ रखने वाले बँदे प्रभू के प्यार में ही जागते सोते हैं (भाव।जागते-सोते हुए एक-रस रहते हैं)। हे नानक ! मैं नाम में रंगे हुओं से सदके हूँ। 2।
पउड़ी ॥
से हरि नामु धिआवहि जो हरि रतिआ ॥
हरि इकु धिआवहि इकु इको हरि सतिआ ॥
हरि इको वरतै इकु इको उतपतिआ ॥
जो हरि नामु धिआवहि तिन डरु सटि घतिआ ॥
गुरमती देवै आपि गुरमुखि हरि जपिआ ॥9॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जो मनुष्य हरी में रंगे हुए हैं।वे उसका नाम सिमरते हैं; उस एक हरी को ध्याते हैं।जो सदा कायम रहने वाला है जो एक खुद हर जगह में व्यापक है और जिस एक ने ही (सारी सृष्टि) पैदा की है। जो मनुष्य नाम सिमरते हैं।उन्होंने सारा डर दूर कर दिया है।पर। वही गुरमुख नाम सिमरता है जिसे प्रभू खुद गुरू की मति के द्वारा ये दाति देता है। 9।
सलोक मः 3 ॥
अंतरि गिआनु न आइओ जितु किछु सोझी पाइ ॥
विणु डिठा किआ सालाहीऐ अंधा अंधु कमाइ ॥
नानक सबदु पछाणीऐ नामु वसै मनि आइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिस ज्ञान से कुछ समझ पड़नी थी वह ज्ञान तो अंदर प्रकट नहीं हुआ। फिर जिस (हरी) को देखा नहीं उसकी उस्तति कैसे हो।ज्ञान-हीन मनुष्य अज्ञानता की कमाई ही करता है। हे नानक ! अगर सतिगुरू के शबद को पहचाने तो हरी का नाम मन में आ बसता है। 1।
मः 3 ॥
इका बाणी इकु गुरु इको सबदु वीचारि ॥
सचा सउदा हटु सचु रतनी भरे भंडार ॥
गुर किरपा ते पाईअनि जे देवै देवणहारु ॥
सचा सउदा लाभु सदा खटिआ नामु अपारु ॥
विखु विचि अंम्रितु प्रगटिआ करमि पीआवणहारु ॥
नानक सचु सलाहीऐ धंनु सवारणहारु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ केवल बाणी ही प्रामाणिक गुरू है।गुरू के शबद को ही विचारो- यही सदा-स्थिर रहने वाला सौदा है। यही सच्ची हाट है जिसमें रत्नों के भण्डार भरे पड़े हैं। अगर देने वाला (हरी) दे तो (ये खजाने) सतिगुरू की कृपा से मिलते हैं। जिस मनुष्य ने यह सच्चा सौदा (कर के) बेअंत प्रभू का नाम लाभ कमाया है। उसको (माया) जहर में व्यवहार करते हुए ही नाम-अमृत मिल जाता है।पर ये अमृत पिलाने वाला प्रभू अपनी मेहर से ही पिलाता है। हे नानक ! उस सराहने-योग्य परमात्मा को सिमरें जो (जीवों को नाम की दाति दे के) सँवारता है। 2।
पउड़ी ॥
जिना अंदरि कूड़ु वरतै सचु न भावई ॥
जे को बोलै सचु कूड़ा जलि जावई ॥
कूड़िआरी रजै कूड़ि जिउ विसटा कागु खावई ॥
जिसु हरि होइ क्रिपालु सो नामु धिआवई ॥
हरि गुरमुखि नामु अराधि कूड़ु पापु लहि जावई ॥10॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिनके हृदय में झूठ व्यापक है उन्हें सत्य अच्छा नहीं लगता; अगर कोई मनुष्य सच बोले।तो झूठा (सुन के) जल-बल जाता है; झूठ का व्यापारी झूठ में ही प्रसन्न होता है।जैसे कौआ विष्टा खाता है (और खुश होता है)। जिस मनुष्य पर हरी दयालु हो।वह नाम जपता है। अगर सतिगुरू के सन्मुख हो के हरी का नाम आराधें तो झूठ का पाप उतर जाता है। 10।
सलोकु मः 3 ॥
सेखा चउचकिआ चउवाइआ एहु मनु इकतु घरि आणि ॥
एहड़ तेहड़ छडि तू गुर का सबदु पछाणु ॥
सतिगुर अगै ढहि पउ सभु किछु जाणै जाणु ॥
आसा मनसा जलाइ तू होइ रहु मिहमाणु ॥
सतिगुर कै भाणै भी चलहि ता दरगह पावहि माणु ॥
नानक जि नामु न चेतनी तिन धिगु पैनणु धिगु खाणु ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे (बातों में) आए हुए शेख ! इस मन को ठिकाने पर ला। टेढ़ी-मेढ़ी बातें छोड़ और सतिगुरू के शबद को समझ। हे शेख ! जो (सबका) जानकार सतिगुरू सब कुछ समझता है उसके चरणों में लग; आशाएं और मन की दौड़ मिटा के अपने आप को जगत में मेहमान समझ; अगर आप सतिगुरू की रजा में चलेगा तो ईश्वर की दरगाह में आदर पाएगा। हे नानक ! जो मनुष्य नाम नहीं सिमरते।उनका (अच्छा) खाना और (अच्छा) पहनना सब धिक्कार है। 1।
मः 3 ॥
हरि गुण तोटि न आवई कीमति कहणु न जाइ ॥
नानक गुरमुखि हरि गुण रवहि गुण महि रहै समाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हरी के गुण बयान करते हुए वे गुण समाप्त नहीं होते।और ना ही ये बताया जा सकता है कि इन गुणों की कीमत क्या है; (पर) हे नानक ! गुरमुख हरी के गुण गाते हैं।(जो मनुष्य प्रभू के गुण गाता है वह) गुणों में लीन हुआ रहता है। 2।
पउड़ी ॥
हरि चोली देह सवारी कढि पैधी भगति करि ॥
हरि पाटु लगा अधिकाई बहु बहु बिधि भाति करि ॥
कोई बूझै बूझणहारा अंतरि बिबेकु करि ॥
सो बूझै एहु बिबेकु जिसु बुझाए आपि हरि ॥
जनु नानकु कहै विचारा गुरमुखि हरि सति हरि ॥11॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (ये मानस) शरीर।जैसे।चोली है जो प्रभू ने बनाई है और भक्ति (-रूप का कसीदा) काढ़ के ये चोली पहनने योग्य बनती है। (इस चोली को) बहुत तरह के कई प्रकार के हरी-नाम के गोटे लगे हुए हैं; (इस भेद को) मन में विचार के कोई विरला ही समझने वाला समझता है। इस विचार को वही समझता है जिसे हरी खुद समझाए। नानक दास ये विचार बताता है कि सदा स्थिर रहने वाला हरी गुरू के द्वारा (सिमरा जा सकता है)। 11।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “नाम के बिना सारे लोग भटकते फिरते हैं;उनको संसार में सदा घाटा ही घाटा है; हे नानक ! मनमुख तो अहंकार के आसरे ऐसे कर्म कमाते हैं जो घोर अंधकार पैदा करते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।