मनमुखि करम कमावणे हउमै अंधु गुबारु ॥
गुरमुखि अंम्रितु पीवणा नानक सबदु वीचारि ॥1॥
सहजे जागै सहजे सोवै ॥
गुरमुखि अनदिनु उसतति होवै ॥
मनमुख भरमै सहसा होवै ॥
अंतरि चिंता नीद न सोवै ॥
गिआनी जागहि सवहि सुभाइ ॥
नानक नामि रतिआ बलि जाउ ॥2॥
से हरि नामु धिआवहि जो हरि रतिआ ॥
हरि इकु धिआवहि इकु इको हरि सतिआ ॥
हरि इको वरतै इकु इको उतपतिआ ॥
जो हरि नामु धिआवहि तिन डरु सटि घतिआ ॥
गुरमती देवै आपि गुरमुखि हरि जपिआ ॥9॥
अंतरि गिआनु न आइओ जितु किछु सोझी पाइ ॥
विणु डिठा किआ सालाहीऐ अंधा अंधु कमाइ ॥
नानक सबदु पछाणीऐ नामु वसै मनि आइ ॥1॥
इका बाणी इकु गुरु इको सबदु वीचारि ॥
सचा सउदा हटु सचु रतनी भरे भंडार ॥
गुर किरपा ते पाईअनि जे देवै देवणहारु ॥
सचा सउदा लाभु सदा खटिआ नामु अपारु ॥
विखु विचि अंम्रितु प्रगटिआ करमि पीआवणहारु ॥
नानक सचु सलाहीऐ धंनु सवारणहारु ॥2॥
जिना अंदरि कूड़ु वरतै सचु न भावई ॥
जे को बोलै सचु कूड़ा जलि जावई ॥
कूड़िआरी रजै कूड़ि जिउ विसटा कागु खावई ॥
जिसु हरि होइ क्रिपालु सो नामु धिआवई ॥
हरि गुरमुखि नामु अराधि कूड़ु पापु लहि जावई ॥10॥
सेखा चउचकिआ चउवाइआ एहु मनु इकतु घरि आणि ॥
एहड़ तेहड़ छडि तू गुर का सबदु पछाणु ॥
सतिगुर अगै ढहि पउ सभु किछु जाणै जाणु ॥
आसा मनसा जलाइ तू होइ रहु मिहमाणु ॥
सतिगुर कै भाणै भी चलहि ता दरगह पावहि माणु ॥
नानक जि नामु न चेतनी तिन धिगु पैनणु धिगु खाणु ॥1॥
हरि गुण तोटि न आवई कीमति कहणु न जाइ ॥
नानक गुरमुखि हरि गुण रवहि गुण महि रहै समाइ ॥2॥
हरि चोली देह सवारी कढि पैधी भगति करि ॥
हरि पाटु लगा अधिकाई बहु बहु बिधि भाति करि ॥
कोई बूझै बूझणहारा अंतरि बिबेकु करि ॥
सो बूझै एहु बिबेकु जिसु बुझाए आपि हरि ॥
जनु नानकु कहै विचारा गुरमुखि हरि सति हरि ॥11॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “नाम के बिना सारे लोग भटकते फिरते हैं;उनको संसार में सदा घाटा ही घाटा है; हे नानक ! मनमुख तो अहंकार के आसरे ऐसे कर्म कमाते हैं जो घोर अंधकार पैदा करते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।