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अंग 645

अंग
645
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मन की सार न जाणनी हउमै भरमि भुलाइ ॥
गुर परसादी भउ पइआ वडभागि वसिआ मनि आइ ॥
भै पइऐ मनु वसि होआ हउमै सबदि जलाइ ॥
सचि रते से निरमले जोती जोति मिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाइआ नानक सुखि समाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: अहंकार व भ्रम में भूले हुओं को मन की सार नहीं आई। बड़े भाग्यों से सतिगुरू की कृपा से भउ उपजता है और मन में आ के बसता है; (हरी का) भय उपजते ही।और अहंकार सतिगुरू के शबद से जला के मन वश में आता है। जो मनुष्य ज्योति रूपी प्रभू में अपनी बिरती मिला के सच्चे में रंगे गए हैं।वे निर्मल हो गए हैं; (पर) हे नानक ! सतिगुरू के मिलने से ही नाम मिलता है और सुख में समाई होती है। 2।
पउड़ी ॥
एह भूपति राणे रंग दिन चारि सुहावणा ॥
एहु माइआ रंगु कसुंभ खिन महि लहि जावणा ॥
चलदिआ नालि न चलै सिरि पाप लै जावणा ॥
जां पकड़ि चलाइआ कालि तां खरा डरावणा ॥
ओह वेला हथि न आवै फिरि पछुतावणा ॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ राजाओं और रानियों के ये रंग चार दिनों (अर्थात।थोड़े समय) तक ही शोभायमान रहते हैं; माया का ये रंग कुसंभ का रंग है (भाव।कुसंभ की तरह छण-भंगुर है)।छिन-मात्र में उतर जाएगा। (संसार से) चलने के वक्त माया साथ नहीं जाती।(पर इसके कारण किए) पाप अपने सिर ले लिए जाते हैं। जब जम-काल ने पकड़ के आगे लगा लिया।तो (जीव) बहुत भय-भीत होता है; (मनुष्य-जन्म वाला) वह समय फिर नहीं मिलता।इसलिए पछताता है। 6।
सलोकु मः 3 ॥
सतिगुर ते जो मुह फिरे से बधे दुख सहाहि ॥
फिरि फिरि मिलणु न पाइनी जंमहि तै मरि जाहि ॥
सहसा रोगु न छोडई दुख ही महि दुख पाहि ॥
नानक नदरी बखसि लेहि सबदे मेलि मिलाहि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो मनुष्य सतिगुरू की ओर से मनमुख हैं।वह (अंत में) बँधे दुख सहते हैं। प्रभू को मिल नहीं सकते।बार-बार पैदा होते मरते रहते हैं; उन्हें चिंता का रोग कभी नहीं छोड़ता।सदा दुखी ही रहते है। हे नानक ! कृपा-दृष्टि वाला प्रभू अगर उन्हें बख्श ले तो सतिगुरू के शबद के द्वारा उस में मिल जाते हैं। 1।
मः 3 ॥
जो सतिगुर ते मुह फिरे तिना ठउर न ठाउ ॥
जिउ छुटड़ि घरि घरि फिरै दुहचारणि बदनाउ ॥
नानक गुरमुखि बखसीअहि से सतिगुर मेलि मिलाउ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य सतिगुरू से मनमुख हैं उनका ना ठौर ना ठिकाना; वे व्यभचारिन छॅुटड़ स्त्री की भांति हैं।जो घर-घर में बदनाम होती फिरती है। हे नानक ! जो गुरू के सन्मुख हो के बख्शे जाते हैं।वे सतिगुरू की संगति में मिल जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
जो सेवहि सति मुरारि से भवजल तरि गइआ ॥
जो बोलहि हरि हरि नाउ तिन जमु छडि गइआ ॥
से दरगह पैधे जाहि जिना हरि जपि लइआ ॥
हरि सेवहि सेई पुरख जिना हरि तुधु मइआ ॥
गुण गावा पिआरे नित गुरमुखि भ्रम भउ गइआ ॥7॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य सच्चे हरी को सेवते हैं।वे संसार समुंद्र को पार कर लेते हैं; जो मनुष्य हरी का नाम सिमरते हैं।उन्हें जम छोड़ जाता है; जिन्होंने हरी का नाम जपा है।उन्हें दरगाह में आदर मिलता है; (पर) हे हरी ! जिन पर आपकी मेहर होती है।वही मनुष्य आपकी भक्ति करते हैं। सतिगुरू के सन्मुख हैं के भ्रम और डर दूर हैं जाते हैं।(मेहर कर) हे प्यारे ! मैं भी सदा आपके गुण गाऊँ। 7।
सलोकु मः 3 ॥
थालै विचि तै वसतू पईओ हरि भोजनु अंम्रितु सारु ॥
जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ पाईऐ मोख दुआरु ॥
इहु भोजनु अलभु है संतहु लभै गुर वीचारि ॥
एह मुदावणी किउ विचहु कढीऐ सदा रखीऐ उरि धारि ॥
एह मुदावणी सतिगुरू पाई गुरसिखा लधी भालि ॥
नानक जिसु बुझाए सु बुझसी हरि पाइआ गुरमुखि घालि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिस हृदय-रूपी थाल में (सत्य-संतोष और विचार) तीन चीजें पड़ी हैं।उस हृदय-थाल में श्रेष्ठ अमृत भोजन हरी का नाम (परोसा जाता) है। जिस के खाने से मन अघा जाता है और विकारों से खलासी का दर प्राप्त होता है। हे संत जनो ! ये भोजन दुर्लभ है।सतिगुरू की (बताई हुई) विचार से मिलता है। आत्मिक आनंद देने वाली इस (सिफत सालाह की आत्मिक खुराक की बात) गुरू ने बताई है। गुरू के सिखों ने खोज के पा ली है।इसको सदैव अपने दिल में संभाल के रखना चाहिए;ये भूलनी नहीं चाहिए। हे नानक ! जिस मनुष्य को (इसकी) समझ देता है वह समझता है।और वह सतिगुरू के सन्मुख हो के मेहनत से हरी को मिलता है। 1।
मः 3 ॥
जो धुरि मेले से मिलि रहे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥
आपि विछोड़ेनु से विछुड़े दूजै भाइ खुआइ ॥
नानक विणु करमा किआ पाईऐ पूरबि लिखिआ कमाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हरी ने जो धुर से मिलाए हैं।वही मनुष्य सतिगुरू से चित्त जोड़ के (हरी में) लीन हुए हैं; (पर) जो उस हरी ने खुद विछोड़े हैं।वे माया के मोह में (फस के) विछुड़ चुके हरी से विछड़े हुए हैं। हे नानक ! की हुई कमाई के बिना कुछ नहीं मिलता।आरम्भ से (किए कर्मों के अनुसार) उकरे हुए (संस्कार-रूपी लेखों की कमाई) कमानी पड़ती है। 2।
पउड़ी ॥
बहि सखीआ जसु गावहि गावणहारीआ ॥
हरि नामु सलाहिहु नित हरि कउ बलिहारीआ ॥
जिनी सुणि मंनिआ हरि नाउ तिना हउ वारीआ ॥
गुरमुखीआ हरि मेलु मिलावणहारीआ ॥
हउ बलि जावा दिनु राति गुर देखणहारीआ ॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हरी की सिफत सालाह करने वाली (संत-जन रूप) सहेलियां इकट्ठी बैठ के स्वयं हरी का यश गाती हैं। हरी से सदके जाती हैं (औरों को शिक्षा देती हैं कि) ‘सदा हरी के नाम की उपमा करो’ मैं सदके हूँ जिन्होंने सुन के हरी का नाम माना है। उन हरी को मिलाने वाली गुरमुख सहेलियों से मैं सदके हूँ; सतिगुरू के दर्शन करने वालियों से मैं दिन-रात बलिहारे जाता हूँ। 8।
सलोकु मः 3 ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अहंकार व भ्रम में भूले हुओं को मन की सार नहीं आई।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।