हउमै जलते जलि मुए भ्रमि आए दूजै भाइ ॥
पूरै सतिगुरि राखि लीए आपणै पंनै पाइ ॥
इहु जगु जलता नदरी आइआ गुर कै सबदि सुभाइ ॥
सबदि रते से सीतल भए नानक सचु कमाइ ॥1॥
सफलिओ सतिगुरु सेविआ धंनु जनमु परवाणु ॥
जिना सतिगुरु जीवदिआ मुइआ न विसरै सेई पुरख सुजाण ॥
कुलु उधारे आपणा सो जनु होवै परवाणु ॥
गुरमुखि मुए जीवदे परवाणु हहि मनमुख जनमि मराहि ॥
नानक मुए न आखीअहि जि गुर कै सबदि समाहि ॥2॥
हरि पुरखु निरंजनु सेवि हरि नामु धिआईऐ ॥
सतसंगति साधू लगि हरि नामि समाईऐ ॥
हरि तेरी वडी कार मै मूरख लाईऐ ॥
हउ गोला लाला तुधु मै हुकमु फुरमाईऐ ॥
हउ गुरमुखि कार कमावा जि गुरि समझाईऐ ॥2॥
पूरबि लिखिआ कमावणा जि करतै आपि लिखिआसु ॥
मोह ठगउली पाईअनु विसरिआ गुणतासु ॥
मतु जाणहु जगु जीवदा दूजै भाइ मुइआसु ॥
जिनी गुरमुखि नामु न चेतिओ से बहणि न मिलनी पासि ॥
दुखु लागा बहु अति घणा पुतु कलतु न साथि कोई जासि ॥
लोका विचि मुहु काला होआ अंदरि उभे सास ॥
मनमुखा नो को न विसही चुकि गइआ वेसासु ॥
नानक गुरमुखा नो सुखु अगला जिना अंतरि नाम निवासु ॥1॥
से सैण से सजणा जि गुरमुखि मिलहि सुभाइ ॥
सतिगुर का भाणा अनदिनु करहि से सचि रहे समाइ ॥
दूजै भाइ लगे सजण न आखीअहि जि अभिमानु करहि वेकार ॥
मनमुख आप सुआरथी कारजु न सकहि सवारि ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥2॥
तुधु आपे जगतु उपाइ कै आपि खेलु रचाइआ ॥
त्रै गुण आपि सिरजिआ माइआ मोहु वधाइआ ॥
विचि हउमै लेखा मंगीऐ फिरि आवै जाइआ ॥
जिना हरि आपि क्रिपा करे से गुरि समझाइआ ॥
बलिहारी गुर आपणे सदा सदा घुमाइआ ॥3॥
माइआ ममता मोहणी जिनि विणु दंता जगु खाइआ ॥
मनमुख खाधे गुरमुखि उबरे जिनी सचि नामि चितु लाइआ ॥
बिनु नावै जगु कमला फिरै गुरमुखि नदरी आइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 3॥ (संसारी जीव) अहंकार में जलते हुए जल मरे थे और माया के मोह में भटक-भटक के जब गुरू के दर पर आए तो पूरे सतिगुरू ने अपने साथ लगा के बचा लिए।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।