मन की मैलु न उतरै इह बिधि जे लख जतन कराए ॥3॥
कनिक कामिनी हैवर गैवर बहु बिधि दानु दातारा ॥
अंन बसत्र भूमि बहु अरपे नह मिलीऐ हरि दुआरा ॥4॥
पूजा अरचा बंदन डंडउत खटु करमा रतु रहता ॥
हउ हउ करत बंधन महि परिआ नह मिलीऐ इह जुगता ॥5॥
जोग सिध आसण चउरासीह ए भी करि करि रहिआ ॥
वडी आरजा फिरि फिरि जनमै हरि सिउ संगु न गहिआ ॥6॥
राज लीला राजन की रचना करिआ हुकमु अफारा ॥
सेज सोहनी चंदनु चोआ नरक घोर का दुआरा ॥7॥
हरि कीरति साधसंगति है सिरि करमन कै करमा ॥
कहु नानक तिसु भइओ परापति जिसु पुरब लिखे का लहना ॥8॥
तेरो सेवकु इह रंगि माता ॥
भइओ क्रिपालु दीन दुख भंजनु हरि हरि कीरतनि इहु मनु राता ॥ रहाउ दूजा ॥1॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 1 ॥
सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥
दंदी मैलु न कतु मनि जीभै सचा सोइ ॥
ससुरै पेईऐ भै वसी सतिगुरु सेवि निसंग ॥
परहरि कपड़ु जे पिर मिलै खुसी रावै पिरु संगि ॥
सदा सीगारी नाउ मनि कदे न मैलु पतंगु ॥
देवर जेठ मुए दुखि ससू का डरु किसु ॥
जे पिर भावै नानका करम मणी सभु सचु ॥1॥
सोरठि तामि सुहावणी जा हरि नामु ढंढोले ॥
गुर पुरखु मनावै आपणा गुरमती हरि हरि बोले ॥
हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥
हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥
गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥
जनु नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गोल गोले ॥2॥
तू आपे सिसटि करता सिरजणहारिआ ॥
तुधु आपे खेलु रचाइ तुधु आपि सवारिआ ॥
दाता करता आपि आपि भोगणहारिआ ॥
सभु तेरा सबदु वरतै उपावणहारिआ ॥
हउ गुरमुखि सदा सलाही गुर कउ वारिआ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! कोई मनुष्य अपनी मनोकामना के अनुसार तीर्थों पे जा बसा है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।