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अंग 642

अंग
642
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मन कामना तीरथ जाइ बसिओ सिरि करवत धराए ॥
मन की मैलु न उतरै इह बिधि जे लख जतन कराए ॥3॥
कनिक कामिनी हैवर गैवर बहु बिधि दानु दातारा ॥
अंन बसत्र भूमि बहु अरपे नह मिलीऐ हरि दुआरा ॥4॥
पूजा अरचा बंदन डंडउत खटु करमा रतु रहता ॥
हउ हउ करत बंधन महि परिआ नह मिलीऐ इह जुगता ॥5॥
जोग सिध आसण चउरासीह ए भी करि करि रहिआ ॥
वडी आरजा फिरि फिरि जनमै हरि सिउ संगु न गहिआ ॥6॥
राज लीला राजन की रचना करिआ हुकमु अफारा ॥
सेज सोहनी चंदनु चोआ नरक घोर का दुआरा ॥7॥
हरि कीरति साधसंगति है सिरि करमन कै करमा ॥
कहु नानक तिसु भइओ परापति जिसु पुरब लिखे का लहना ॥8॥
तेरो सेवकु इह रंगि माता ॥
भइओ क्रिपालु दीन दुख भंजनु हरि हरि कीरतनि इहु मनु राता ॥ रहाउ दूजा ॥1॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! कोई मनुष्य अपनी मनोकामना के अनुसार तीर्थों पे जा बसा है।(मुक्ति का चाहवान अपने) सिर पर (शिव जी वाला) आरा रखवाता है (और।अपने आप को चिरवा लेता है)। पर अगर कोई मनुष्य (ऐसे) लाखों ही यतन करे।इस तरह भी मन की (विकारों की) मैल नहीं उतरती। 3। हे भाई ! कोई मनुष्य सोना।स्त्री।बढ़िया घोड़े।बढ़िया हाथी (और ऐसे ही) कई किसमों के दान करने वाला है। कोई मनुष्य अन्न दान करता है।कपड़े दान करता है।जमीन दान करता है।(इस तरह भी) परमात्मा के दर पर पहुँचा नहीं जा सकता। 4। हे भाई ! कोई मनुष्य देव-पूजा में।देवताओं को नमस्कार दंडवत करने में।खट् कर्म करने में मस्त रहता है। पर वह भी (इन मिथे हुए धार्मिक कर्मों को करने के कारण अपने आप को धार्मिक समझ के) अहंकार करता-करता (माया के मोह के) बँधनों में जकड़ा रहता है।इस ढंग से भी परमात्मा को नहीं मिला जा सकता। 5। योग-मत में सिद्धों के प्रसिद्ध चौरासी आसन हैं।ये आसन कर करके भी मनुष्य थक जाता है। उम्र तो लंबी कर लेता है।पर इस तरह परमात्मा से मिलाप का संजोग नहीं बनता।बार बार जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहता है। 6। हे भाई ! कई ऐसे हैं जो राज हकूमत के रंग तमाशे भोगते हैं।राजाओं वाले ठाठ-बाठ बनाते हैं।लोगों पर हुकम चलाते हैं।कोई उनका हुकम मोड़ नहीं सकता। सुंदर स्त्री की सेज भोगते हैं।(अपने शरीर पर) चंदन व इत्र लगाते हैं।पर ये सब कुछ तो भयानक नर्क की ओर ले जाने वाले हैं। 7। हे भाई ! साध-संगति में बैठ के परमात्मा की सिफत सालाह करनी- ये कर्म और सारे कर्मों से श्रेष्ठ है।पर। हे नानक ! कह, ये अवसर उस मनुष्य को ही मिलता है जिसके माथे पर पूर्बले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार लेख लिखा होता है। 8। हे भाई ! आपका सेवक आपकी सिफत सालाह के रंग में मस्त रहता है। हे भाई ! दीनों के दुख दूर करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य पर दयावान होता है।उसका ये मन परमात्मा की सिफत सालाह के रंग में रंगा रहता है।रहाउ दूजा। 1। 3।
रागु सोरठि वार महले 4 की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 1 ॥
सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥
दंदी मैलु न कतु मनि जीभै सचा सोइ ॥
ससुरै पेईऐ भै वसी सतिगुरु सेवि निसंग ॥
परहरि कपड़ु जे पिर मिलै खुसी रावै पिरु संगि ॥
सदा सीगारी नाउ मनि कदे न मैलु पतंगु ॥
देवर जेठ मुए दुखि ससू का डरु किसु ॥
जे पिर भावै नानका करम मणी सभु सचु ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु सोरठि वार महले 4 की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला 1॥ सोरठि रागिनी हमेशा मधुर लगे अगर (इसके द्वारा प्रभू के गुण गाने से) सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मन में बस जाए। निंदा करने वाली आदत ना रहे।मन में किसी से वैर-विरोध ना हो।और जीभ पर सदा सच्चा मालिक हो। (इस तरह जीव-स्त्री) लोक-परलोक में (परमात्मा के) डर में जीवन गुजारती है और गुरू की सेवा करके बेझिझक हो जाती है (भाव।कोई सहम दबा नहीं पाता)। दिखावा छोड़ के अगर पति-प्रभू को मिल जाए तो पति भी प्रसन्न हो के इसको अपने साथ मिलाता है; जिस जीव-स्त्री के मन में प्रभू का नाम टिक जाए वह (इस नाम-श्रृंगार से) सदा सजी रहती है और कभी (विकारों की उसे) रक्ती भर मैल नहीं लगती। उस जीव-स्त्री के कामादिक विकार समाप्त हो जाते हैं।माया का भी कोई दबाव उस पर नहीं रह जाता। हे नानक ! (प्रभू पति को मन में बसा के) अगर जीव-स्त्री पति-प्रभू को अच्छी लगे तो उसके माथे के भाग्यों की टीका (समझें) उसे हर जगह सच्चा प्रभू ही (दिखता है)। 1।
मः 4 ॥
सोरठि तामि सुहावणी जा हरि नामु ढंढोले ॥
गुर पुरखु मनावै आपणा गुरमती हरि हरि बोले ॥
हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥
हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥
गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥
जनु नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गोल गोले ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ सोरठि रागिनी तभी सुंदर है।जब (इसके द्वारा जीव-स्त्री) हरी के नाम की खोज करे। अपने बड़े पति हरी को प्रसन्न करे और सतिगुरू की शिक्षा ले के प्रभू का सिमरन करे; दिन रात हरी के प्रेम में खिंची हुई अपने (शरीर रूपी) चोले को हरी के रंग में रंगे रखे। मैंने सारा संसार तलाश के देख लिया है परमात्मा जैसा कोई पुरुष नहीं मिला। गुरू सतिगुरू ने हरी का नाम (मेरे हृदय में) दृढ़ किया है।(इसलिए अब) मेरा मन कहीं डोलता नहीं। दास नानक प्रभू का दास है और गुरू सतिगुरू के दासों का दास है।
पउड़ी ॥
तू आपे सिसटि करता सिरजणहारिआ ॥
तुधु आपे खेलु रचाइ तुधु आपि सवारिआ ॥
दाता करता आपि आपि भोगणहारिआ ॥
सभु तेरा सबदु वरतै उपावणहारिआ ॥
हउ गुरमुखि सदा सलाही गुर कउ वारिआ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ीI। हे सृजनहार ! आप खुद ही संसार को रचने वाला है; (संसार रूप) खेल बना के तूने खुद ही इसे सुंदर बनाया है; संसार रचने वाला आप खुद ही है। इसे दातें बख्शने वाला भी आप स्वयं ही है।उन दातों को भोगने वाला भी आप खुद ही है; हे पैदा करने वाले ! सब जगह आपकी जीवन रौंअ बरत रही है। (पर) मैं अपने सतिगुरू से सदके हूँ जिसके सन्मुख हैं के आपकी सिफत सालाह सदा कर सकता हूँ। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! कोई मनुष्य अपनी मनोकामना के अनुसार तीर्थों पे जा बसा है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।