तिना पिछै छुटीऐ पिआरे जो साची सरणाइ ॥2॥ मिठा करि कै खाइआ पिआरे तिनि तनि कीता रोगु ॥ कउड़ा होइ पतिसटिआ पिआरे तिस ते उपजिआ सोगु ॥ भोग भुंचाइ भुलाइअनु पिआरे उतरै नही विजोगु ॥ जो गुर मेलि उधारिआ पिआरे तिन धुरे पइआ संजोगु ॥3॥ माइआ लालचि अटिआ पिआरे चिति न आवहि मूलि ॥ जिन तू विसरहि पारब्रहम सुआमी से तन होए धूड़ि ॥ बिललाट करहि बहुतेरिआ पिआरे उतरै नाही सूलु ॥ जो गुर मेलि सवारिआ पिआरे तिन का रहिआ मूलु ॥4॥ साकत संगु न कीजई पिआरे जे का पारि वसाइ ॥ जिसु मिलिऐ हरि विसरै पिआरे सोु मुहि कालै उठि जाइ ॥ मनमुखि ढोई नह मिलै पिआरे दरगह मिलै सजाइ ॥ जो गुर मेलि सवारिआ पिआरे तिना पूरी पाइ ॥5॥ संजम सहस सिआणपा पिआरे इक न चली नालि ॥ जो बेमुख गोबिंद ते पिआरे तिन कुलि लागै गालि ॥ होदी वसतु न जातीआ पिआरे कूड़ु न चली नालि ॥ सतिगुरु जिना मिलाइओनु पिआरे साचा नामु समालि ॥6॥ सतु संतोखु गिआनु धिआनु पिआरे जिस नो नदरि करे ॥ अनदिनु कीरतनु गुण रवै पिआरे अंम्रिति पूर भरे ॥ दुख सागरु तिन लंघिआ पिआरे भवजलु पारि परे ॥ जिसु भावै तिसु मेलि लैहि पिआरे सेई सदा खरे ॥7॥ संम्रथ पुरखु दइआल देउ पिआरे भगता तिस का ताणु ॥ तिसु सरणाई ढहि पए पिआरे जि अंतरजामी जाणु ॥ हलतु पलतु सवारिआ पिआरे मसतकि सचु नीसाणु ॥ सो प्रभु कदे न वीसरै पिआरे नानक सद कुरबाणु ॥8॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की शरण में पड़े रहते हैं।उनके पद्-चिन्हों पर चल के (माया के मोह के जहर से) बचा जाता है। 2। हे भाई ! मनुष्य ने (सारी उम्र दुनिया के पदार्थों को) मीठा समझ के खाया।उस मीठे ने (उसके) शरीर में रोग पैदा कर दिए। वह रोग दुखदाई हो के शरीर में पक्का टिक जाता है उस (रोग) से चिंता-ग़म पैदा होती है। दुनियावी पदार्थ खिला-खिला के उस परमात्मा ने (खुद ही जीव को) गलत रास्ते पर डाल रखा है।(परमात्मा से जीव का) विछोड़ा खत्म होने को नहीं आता। जिन जीवों को गुरू से मिला के प्रभू ने (पदार्थों के भोगों से) बचा लिया।धुर से लिखे अनुसार उनका (परमात्मा से) मिलाप हो गया। 3। हे प्यारे प्रभू ! जो मनुष्य (सदा) माया के लालच में फसे रहते हैं।उनके चित्त में आप बिल्कुल ही नहीं बसता। हे मालिक प्रभू ! जिनको आपकी याद भूल जाती है वह शरीर (आत्मिक जीवन की पूँजी बनाए बग़ैर ही) मिट्टी हैं जाते हैं। (माया के मोह के कारण दुखी हो हो के) वे बहुत बिलकते हैं।पर उनके अंदर का वह दुख दूर नहीं होता। हे भाई ! गुरू से मिल के जिनका जीवन परमात्मा सुंदर बना देता है।उनके आत्मिक जीवन की पूँजी बची रहती है। 4। हे भाई ! जहाँ तक बस चले।परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य का संग नहीं करना चाहिए।क्योंकि उस मनुष्य को मिलने से परमात्मा बिसर जाता है। (जो मनुष्य साकत का संग करता है) वह बदनामी कमा के दुनिया से चला जाता है। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को परमात्मा की दरगाह में जगह नहीं मिलती।(उसे बल्कि वहाँ) सजा मिलती है।पर। हे भाई ! गुरू से मिला के जिन मनुष्यों का जीवन परमात्मा ने सुंदर बना दिया है।उनको सफलता प्राप्त होती है। 5। हे भाई ! (व्रत नियम आदि) हजारों संयम और हजारों समझदारियां (अगर मनुष्य करता रहे।तो इनमें से) एक भी (परलोक में) मदद नहीं करते। जो लोग परमात्मा से मुँह फेरे रहते हैं।उनके (तो) खानदान को (भी) कलंक का टीका लग जाता है। (साकत मनुष्य हृदय में) बसते (कीमती हरी-नाम) पदार्थ से सांझ नहीं डालता (दुनिया के नाशवंत पदार्थों से ही मोह डाले रखता है।पर कोई भी) नाशवंत पदार्थ (परलोक में) साथ नहीं जाता। हे भाई ! जिन मनुष्यों को उस परमात्मा ने गुरू मिला दिया है वह मनुष्य सदा कायम रहने वाला हरी नाम (अपने दिल में) बसाए रखते हें। 6। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है।उसके अंदर सेवा-संतोख।ज्ञान-ध्यान (आदि गुण पैदा हो जाते हैं)। वह मनुष्य हर वक्त परमात्मा की सिफत सालाह करता रहता है। परमात्मा के गुण याद करता रहता है।(उसका हृदय) आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से नाको-नाक भरा रहता है। वे मनुष्य दुखों के समुंद्र से पार लांघ जाते हैं वे संसार-समुंद्र को पार हो जाते हैं। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर प्रभू की मेहर की निगाह होती है उन्हें अपने में मिला लेता है और वे अच्छे जीवन वाले हो जाते है7। हे भाई ! परमात्मा सारी ताकतों का मालिक है।सर्व-व्यापक है।दया का घर है।प्रकाश-स्वरूप है।भक्तों को (हमेशा) उसका आसरा रहता है। हे भाई ! भक्त उस परमात्मा की शरण में पड़े रहते हैं।जो सबके दिलों की जानने वाला है।और समझदार है। हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभू) सदा कायम रहने वाली मोहर लगा देता है।उसका ये लोक और परलोक सँवर जाता है। हे नानक ! कह,हे भाई ! (मेरी तो सदा यही तमन्ना है) कि वह परमात्मा मुझे कभी ना भूले।मैं (उससे) सदा सदके जाता हूँ। 8। 2।
सोरठि महला 5 घरु 2 असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ पाठु पड़िओ अरु बेदु बीचारिओ निवलि भुअंगम साधे ॥ पंच जना सिउ संगु न छुटकिओ अधिक अहंबुधि बाधे ॥1॥ पिआरे इन बिधि मिलणु न जाई मै कीए करम अनेका ॥ हारि परिओ सुआमी कै दुआरै दीजै बुधि बिबेका ॥ रहाउ ॥ मोनि भइओ करपाती रहिओ नगन फिरिओ बन माही ॥ तट तीरथ सभ धरती भ्रमिओ दुबिधा छुटकै नाही ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 2 असटपदीआ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! कोई मनुष्य वेद (आदि धर्म-पुस्तकों को) पढ़ता है और विचारता है।कोई मनुष्य निवली कर्म करता है।कोई कुण्डलनी नाड़ी के रास्ते प्राण चढ़ाता है। (पर इन साधनों से कामादिक) पाँचों से साथ खतम नहीं हो सकता।(बल्कि) ज्यादा अहंकार में (मनुष्य) बंध जाता है। 1। हे भाई1 मेरे देखते हुए ही लोग अनेकों ही (मिथे हुए धार्मिक) कर्म करते हैं।पर इन तरीकों से परमात्मा के चरणों में जुड़ा नहीं जा सकता। हे भाई ! मैं तो इन कर्मों का आसरा छोड़ के मालिक प्रभू के दर पर आ गिरा हूँ (और प्रार्थना करता रहता हूँ – हे प्रभू ! मुझे भलाई बुराई की) परख कर सकने वाली अक्ल दे।रहाउ। हे भाई ! कोई मनुष्य चुप साधे बैठा है।कोई कर पाती बन गया है (बर्तनों की जगह अपना हाथ ही बरतता है)।कोई जंगलों में नंगा घूमता फिरता है। कोई मनुष्य सारे तीर्थों का रटन कर रहा है।कोई सारी धरती का भ्रमण कर रहा है।(पर इस तरह भी) मन की डांवा-डोल स्थिति समाप्त नहीं होती। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की शरण में पड़े रहते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।