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अंग 640

अंग
640
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मेरा तेरा छोडीऐ भाई होईऐ सभ की धूरि ॥
घटि घटि ब्रहमु पसारिआ भाई पेखै सुणै हजूरि ॥
जितु दिनि विसरै पारब्रहमु भाई तितु दिनि मरीऐ झूरि ॥
करन करावन समरथो भाई सरब कला भरपूरि ॥4॥
प्रेम पदारथु नामु है भाई माइआ मोह बिनासु ॥
तिसु भावै ता मेलि लए भाई हिरदै नाम निवासु ॥
गुरमुखि कमलु प्रगासीऐ भाई रिदै होवै परगासु ॥
प्रगटु भइआ परतापु प्रभ भाई मउलिआ धरति अकासु ॥5॥
गुरि पूरै संतोखिआ भाई अहिनिसि लागा भाउ ॥
रसना रामु रवै सदा भाई साचा सादु सुआउ ॥
करनी सुणि सुणि जीविआ भाई निहचलु पाइआ थाउ ॥
जिसु परतीति न आवई भाई सो जीअड़ा जलि जाउ ॥6॥
बहु गुण मेरे साहिबै भाई हउ तिस कै बलि जाउ ॥
ओहु निरगुणीआरे पालदा भाई देइ निथावे थाउ ॥
रिजकु संबाहे सासि सासि भाई गूड़ा जा का नाउ ॥
जिसु गुरु साचा भेटीऐ भाई पूरा तिसु करमाउ ॥7॥
तिसु बिनु घड़ी न जीवीऐ भाई सरब कला भरपूरि ॥
सासि गिरासि न विसरै भाई पेखउ सदा हजूरि ॥
साधू संगि मिलाइआ भाई सरब रहिआ भरपूरि ॥
जिना प्रीति न लगीआ भाई से नित नित मरदे झूरि ॥8॥
अंचलि लाइ तराइआ भाई भउजलु दुखु संसारु ॥
करि किरपा नदरि निहालिआ भाई कीतोनु अंगु अपारु ॥
मनु तनु सीतलु होइआ भाई भोजनु नाम अधारु ॥
नानक तिसु सरणागती भाई जि किलबिख काटणहारु ॥9॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! भेद भाव त्याग देने चाहिए।सबके चरणों की धूड़ बन जाना चाहिए। हे भाई ! परमात्मा हरेक शरीर में बस रहा है।वह सबके अंग-संग हो के (सबके कामों को) देखता है (सबकी बातें) सुनता है। हे भाई ! जिस दिन परमात्मा भूल जाए।उस दिन दुखी हो के (हम) आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। हे भाई ! (ये याद रखो कि) परमात्मा सब कुछ कर सकने वाला है और (जीवों से) करवा सकने वाला है।परमात्मा में सारी ताकतें मौजूद हैं। 4। हे भाई ! (जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के) प्यार का कीमती धन मौजूद है।हरी-नाम मौजूद है (उसके अंदर से) माया के मोह का नाश हो जाता है। हे भाई ! उस परमात्मा को (जब) अच्छा लगे तब वह (जिसको अपने चरणों में) मिला लेता है (उसके) हृदय में उस प्रभू के नाम का निवास हो जाता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख होने से (हृदय का) कमल फूल खिल उठता है।दिल में (आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश हो जाता है। हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य के अंदर) परमात्मा की ताकत प्रकट हो जाती है (मनुष्य को समझ आ जाता है कि परमात्मा बेअंत शक्तियों का मालिक है।और प्रभू की ताकत से ही) धरती खिली हुई है।आकाश खिला हुआ है। 5। हे भाई ! जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने संतोख की दाति दे दी।(उसके अंदर) दिन रात (प्रभू चरनों का) प्यार बना रहता है। वह मनुष्य सदा (अपनी) जीभ से परमात्मा का नाम जपता रहता है।(नाम जपने का ये) स्वाद (ये) निशाना (उसके अंदर) सदा कायम रहता है। हे भाई ! वह मनुष्य अपने कानों से (परमात्मा की सिफत सालाह) सुन-सुन के आत्मिक जीवन हासिल करता रहता है।(वह प्रभू-चरणों में) अटल स्थान की प्राप्ति बनाए रहता है। पर। हे भाई ! जिस मनुष्य को (गुरू पर) ऐतबार नहीं होता उसकी (दुर्भाग्यपूर्ण) जीवात्मा (विकारों में) जल जाती है (और आत्मिक मौत सहेड़ लेती है)। 6। हे भाई ! मेरे मालिक प्रभू में बेअंत गुण हैं। मैं उससे सदके-कुर्बान जाता हूँ। हे भाई ! वह मालिक गुणहीन को (भी) पालता है।वह निआसरे मनुष्य को सहारा देता है। वह मालिक हरेक सांस के साथ रिजक पहुँचाता है।उसका नाम (सिमरन करने वाले के मन पर प्रेम का) गाढ़ा रंग चढ़ा देता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को सच्चा गुरू मिल जाता है (उसको प्रभू मिल जाता है) उसकी किस्मत जाग जाती है। 7। हे भाई ! वह परमात्मा सारी ही ताकतों से भरपूर है।उस (की याद) के बिना एक घड़ी भी (मनुष्य का) आत्मिक जीवन कायम नहीं रह सकता। हे भाई ! मैं तो उस परमात्मा को अपने अंग-संग बसता देखता हूँ।मुझे वह खाते हुए सांस लेते हुए कभी भी नहीं भूलता। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा ने गुरू की संगति में मिला दिया।उसे वह परमात्मा हर जगह मौजूद दिखाई देने लग जाता है।पर। हे भाई ! जिनके अंदर परमात्मा का प्यार पैदा नहीं होता।वह सदा चिंतातुर हो-हो के आत्मिक मौत मरता रहता है। 8। हे भाई ! (शरण में आए मनुष्य को) अपने पल्लू से लगा के परमात्मा खुद इस दुख-रूपी संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। प्रभू (उस पर) कृपा करके (उसको) मेहर की निगाह से देखता है।उसका बेअंत पक्ष करता है। हे भाई ! मनुष्य का मन ठंडा हो जाता है।शरीर शांत हो जाता है।वह (अपने आत्मिक जीवन के लिए) नाम की खुराक़ (खाता है)।नाम का सहारा लेता है। हे नानक ! (कह) हे भाई ! उस परमात्मा की शरण पड़ो।जो सारे पाप काट सकता है। 9। 1।
सोरठि महला 5 ॥
मात गरभ दुख सागरो पिआरे तह अपणा नामु जपाइआ ॥
बाहरि काढि बिखु पसरीआ पिआरे माइआ मोहु वधाइआ ॥
जिस नो कीतो करमु आपि पिआरे तिसु पूरा गुरू मिलाइआ ॥
सो आराधे सासि सासि पिआरे राम नाम लिव लाइआ ॥1॥
मनि तनि तेरी टेक है पिआरे मनि तनि तेरी टेक ॥
तुधु बिनु अवरु न करनहारु पिआरे अंतरजामी एक ॥ रहाउ ॥
कोटि जनम भ्रमि आइआ पिआरे अनिक जोनि दुखु पाइ ॥
साचा साहिबु विसरिआ पिआरे बहुती मिलै सजाइ ॥
जिन भेटै पूरा सतिगुरू पिआरे से लागे साचै नाइ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे प्यारे (भाई) ! माँ का पेट दुखों का समुंद्र है।वहाँ (प्रभू ने जीव से) अपने नाम का सिमरन करवाया (और।इसे दुखों से बचाए रखा)। माँ के पेट में से निकाल के (जन्म दे के।प्रभू ने जीव के लिए।आत्मिक जीवन को समाप्त कर देने वाली माया के मोह का) जहर बिखेर दिया (और।इस तरह जीव के हृदय में) माया का मोह बढ़ा दिया। हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू स्वयं मेहर करता है।उसको पूरे गुरू से मिलवाता है। वह मनुष्य हरेक सांस के साथ परमात्मा का सिमरन करता है।और।परमात्मा के नाम की लगन (अपने अंदर) बनाए रखता है। 1। हे प्यारे प्रभू ! (मेरे) मन में (मेरे) हृदय में सदा आपका ही आसरा है (आप ही माया के मोह से बचाने वाला है)। हे प्यारे प्रभू ! आप ही सबके दिलों की जानने वाला है। आपके बिना और कोई नहीं जो सब कुछ करने की समर्था वाला हैं।रहाउ। हे भाई ! अनेकों जूनियों के दुख सह के करोड़ों जन्मों में भटक के (जीव मनुष्य के जन्म में) आता है।(पर। यहाँ इसे) सदा कायम रहने वाला मालिक भूल जाता है।और इसे बड़ी सजा मिलती है। हे भाई ! जिन मनुष्यों को पूरा गुरू मिल जाता है।वे सदा-स्थिर प्रभू के नाम में सुरति जोड़ते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! भेद भाव त्याग देने चाहिए।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।