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अंग 634

अंग
634
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सोरठि महला 9 ॥
प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥
अपने सुख सिउ ही जगु फांधिओ को काहू को नाही ॥1॥ रहाउ ॥
सुख मै आनि बहुतु मिलि बैठत रहत चहू दिसि घेरै ॥
बिपति परी सभ ही संगु छाडित कोऊ न आवत नेरै ॥1॥
घर की नारि बहुतु हितु जा सिउ सदा रहत संग लागी ॥
जब ही हंस तजी इह कांइआ प्रेत प्रेत करि भागी ॥2॥
इह बिधि को बिउहारु बनिओ है जा सिउ नेहु लगाइओ ॥
अंत बार नानक बिनु हरि जी कोऊ कामि न आइओ ॥3॥12॥139॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे मित्र ! (अपने) मन में (ये बात) पक्के तोर पर समझ लें कि सारा संसार अपने सुख के साथ ही बँधा हुआ है। कोई भी किसी का (आखिर तक निभाने वाला साथी) नहीं (बनता)। 1।रहाउ। हे मित्र ! (जब मनुष्य) सुख में (होता है।तब) कई यार दोस्त मिल के (उसके पास) बैठते हैं।और।(उसे) चारों और से घेरे रखते हैं। (पर जब उसे कोई) मुसीबत आती है।सारे ही साथ छोड़ जाते हैं।(फिर) कोई भी (उसके) नजदीक नहीं फटकता। 1। हे मित्र ! घर की स्त्री (भी) जिससे बड़ा प्यार होता है।जो सदा (पति के) साथ लगी रहती है। जिस वक्त (पति की) जीवात्मा इस शरीर को छोड़ देती है।(स्त्री उससे ये कह के) परे हट जाती है कि ये मर चुका है मर चुका है। 2। हे नानक ! (कह, हे मित्र ! दुनिया का) इस तरह का व्यवहार बना हुआ है जिससे (मनुष्य ने) प्यार डाला हुआ है।(पर। हे मित्र ! आखिरी समय में परमात्मा के बिना और कोई भी (मनुष्य की) मदद नहीं कर सकता। 3। 12। 139।
सोरठि महला 1 घरु 1 असटपदीआ चउतुकी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुबिधा न पड़उ हरि बिनु होरु न पूजउ मड़ै मसाणि न जाई ॥
त्रिसना राचि न पर घरि जावा त्रिसना नामि बुझाई ॥
घर भीतरि घरु गुरू दिखाइआ सहजि रते मन भाई ॥
तू आपे दाना आपे बीना तू देवहि मति साई ॥1॥
मनु बैरागि रतउ बैरागी सबदि मनु बेधिआ मेरी माई ॥
अंतरि जोति निरंतरि बाणी साचे साहिब सिउ लिव लाई ॥ रहाउ ॥
असंख बैरागी कहहि बैराग सो बैरागी जि खसमै भावै ॥
हिरदै सबदि सदा भै रचिआ गुर की कार कमावै ॥
एको चेतै मनूआ न डोलै धावतु वरजि रहावै ॥
सहजे माता सदा रंगि राता साचे के गुण गावै ॥2॥
मनूआ पउणु बिंदु सुखवासी नामि वसै सुख भाई ॥
जिहबा नेत्र सोत्र सचि राते जलि बूझी तुझहि बुझाई ॥
आस निरास रहै बैरागी निज घरि ताड़ी लाई ॥
भिखिआ नामि रजे संतोखी अंम्रितु सहजि पीआई ॥3॥
दुबिधा विचि बैरागु न होवी जब लगु दूजी राई ॥
सभु जगु तेरा तू एको दाता अवरु न दूजा भाई ॥
मनमुखि जंत दुखि सदा निवासी गुरमुखि दे वडिआई ॥
अपर अपार अगंम अगोचर कहणै कीम न पाई ॥4॥
सुंन समाधि महा परमारथु तीनि भवण पति नामं ॥
मसतकि लेखु जीआ जगि जोनी सिरि सिरि लेखु सहामं ॥
करम सुकरम कराए आपे आपे भगति द्रिड़ामं ॥
मनि मुखि जूठि लहै भै मानं आपे गिआनु अगामं ॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 घरु 1 असटपदीआ चउतुकी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। मैं परमात्मा के बिना किसी और आसरे की तलाश में नहीं पड़ता।मैं प्रभू के बिना किसी और को नहीं पूजता।मैं कहीं समाधियों।शमशानों में भी नहीं जाता। माया की तृष्णा में फंस के मैं (परमात्मा के दर के बिना) किसी और घर में नहीं जाता।मेरी मायावी तृष्णा परमात्मा के नाम ने मिटा दी है। गुरू ने मुझे मेरे हृदय में ही परमात्मा का निवास-स्थान दिखा दिया है।और अडोल अवस्था में रंगे हुए मेरे मन को वह सहज-अवस्था अच्छी लग रही है। हे मेरे सांई ! (ये सब आपकी ही मेहर है) आप खुद ही (मेरे दिल की) जानने वाला है; खुद ही पहचानने वाला है।आप खुद ही मुझे (अच्छी) मति देता है (जिस कारण आपका दर छोड़ के किसी और तरफ नहीं भटकता)। 1। हे मेरी माँ ! मेरा मन गुरू के शबद में भेदा गया है (परोया गया है।शबद की बरकति से मेरे अंदर परमात्मा से विछुड़ने का अहिसास पैदा हो गया है)।वही मनुष्य (दरअसल में) त्यागी है जिसका मन परमात्मा के बिरह-रंग में रंगा गया है।उस (वैरागी) के अंदर प्रभू की ज्योति जग पड़ती है। वह एक-रस सिफत सालाह की बाणी में (मस्त) रहता है।सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभू (के चरणों में) उसकी सुरति जुड़ी रहती है। 1।रहाउ। अनेकों ही वैरागी वैराग की बातें करते हैं।पर असल वैरागी वह है जो (परमात्मा के विरह-रंग में इतना रंगा हुआ है कि वह) पति-प्रभू को प्यारा लगने लगता है। वह गुरू के शबद के द्वारा अपने दिल में (परमात्मा की याद को बसाता है और) सदा परमात्मा के भय-अदब में मस्त (रह के) गुरू के द्वारा बताए हुए कार्य करता है। वह बैरागी सिर्फ परमात्मा को याद करता है (जिस कारण उसका) मन (माया की ओर) डोलता नहीं।वह बैरागी (माया की तरफ) भागते मन को रोक के (प्रभू चरणों में) रोके रखता है। अडोल अवस्था में मस्त वह वैरागी सदा (प्रभू के नाम-) रंग में रंगा रहता है।और सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करता है। 2। हे भाई ! (जिस मनुष्य का) चंचल मन रक्ती भर भी आत्मिक आनंद में निवास देने वाले नाम में बसता है (वह मनुष्य असल बैरागी है।और वह बैरागी) आत्मिक आनंद लेता है। हे प्रभू ! तूने स्वयं (उस वैरागी को जीवन के सही रास्ते की) समझ दी है।(जिसकी बरकति से उसकी तृष्णा-) अग्नि बुझ गई है।और उसकी जीभ उसकी आँखें (आदि) इन्द्रियां सदा-स्थिर (हरी-नाम) में रंगे रहते हैं। वह बैरागी दुनिया की आशाओं से निर्मोह हो के जीवन व्यतीत करता है।वह (दुनियावी घर-धाट के अपनत्व को त्याग के) उस घर में सुरति जोड़े रखता है जो सच-मुच उसका अपना ही रहेगा। ऐसे बैरागी (गुरू-दर से मिली) नाम-भिक्षा से अघाए रहते हैं।तृप्त रहते हैं।संतुष्ट रहते हैं (क्योंकि उनको गुरू ने) अडोल आत्मिक अवस्था में टिका के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पिला दिया है। 3। जब तक (मन में) रक्ती भर भी कोई और झाक है किसी और आसरे की तलाश है तब तक विरह अवस्था पैदा नहीं हो सकती। (पर हे प्रभू ! ये विरह की) दाति देने वाला एक आप खुद ही है।आपके बिना कोई और (ये दाति) देने वाला नहीं।और ये सारा जगत आपका अपना ही (रचा हुआ) है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा दुख में टिके रहते हैं।जो लोग गुरू की शरण पड़ते हैं उनको प्रभू (नाम की दाति दे के) आदर-सम्मान बख्शता है। उस बेअंत अपहुँच और अगोचर प्रभू की कीमत (जीवों के) बयान करने से नहीं बताई जा सकती (उसके बराबर का और कोई कहा नहीं जा सकता)। 4। परमात्मा एक ऐसी आत्मिक अवस्था का मालिक है कि उस पर माया के फुरने असर नहीं डाल सकते।वह तीनों ही भवनों का मालिक है।उसका नाम जीवों के लिए महान ऊँचा श्रेष्ठ धन है। जगत में जितने भी जीव जन्म लेते हैं उनके माथे पर (उनके किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार परमात्मा की रज़ा में ही) लेख (लिखा जाता है।हरेक जीव को) अपने-अपने सिर पर लिखा लेख सहना पड़ता है। परमात्मा स्वयं ही (साधारण) काम और अच्छे काम (जीवों से) करवाता है।खुद ही (जीवों के हृदय में अपनी) भक्ति दृढ़ करता है। अपहुँच प्रभू खुद ही (जीवों को अपनी) गहरी सांझ बख्शता है।(सच्चा वैरागी) परमात्मा के डर-अदब में रच जाता है।उसके मन में और मुँह में (पहले जो भी विकारों की निंदा आदि की) मैल (होती है वह) दूर हो जाती है। 5।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सोरठि महला 9 ॥ हे मित्र ! (अपने) मन में (ये बात) पक्के तोर पर समझ लें कि सारा संसार अपने सुख के साथ ही बँधा हुआ है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।