जिन चाखिआ सेई सादु जाणनि जिउ गुंगे मिठिआई ॥ अकथै का किआ कथीऐ भाई चालउ सदा रजाई ॥ गुरु दाता मेले ता मति होवै निगुरे मति न काई ॥ जिउ चलाए तिउ चालह भाई होर किआ को करे चतुराई ॥6॥ इकि भरमि भुलाए इकि भगती राते तेरा खेलु अपारा ॥ जितु तुधु लाए तेहा फलु पाइआ तू हुकमि चलावणहारा ॥ सेवा करी जे किछु होवै अपणा जीउ पिंडु तुमारा ॥ सतिगुरि मिलिऐ किरपा कीनी अंम्रित नामु अधारा ॥7॥ गगनंतरि वासिआ गुण परगासिआ गुण महि गिआन धिआनं ॥ नामु मनि भावै कहै कहावै ततो ततु वखानं ॥ सबदु गुर पीरा गहिर गंभीरा बिनु सबदै जगु बउरानं ॥ पूरा बैरागी सहजि सुभागी सचु नानक मनु मानं ॥8॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: जिन मनुष्यों ने (परमात्मा के नाम का रस) चखा है।(उसका) स्वाद वही जानते हैं (बता नहीं सकते)।जैसे गूंगे मनुष्य की खाई हुई मिठाई (का स्वाद गूंगा खुद ही जानता हे।किसी को बता नहीं सकता)। हे भाई ! नाम-रस है ही अकथ।बयान किया नहीं जा सकता।(मैं तो सदा यही तमन्ना रखता हूँ कि) मैं उस मालिक प्रभू की रजा में चलूँ। (पर रजा में चलने की) सूझ भी तब ही आती है जब गुरू उस दातार प्रभू से मिला दे।जो आदमी गुरू की शरण नहीं पड़ा।उसे ये समझ बिल्कुल भी नहीं आती। हे भाई ! कोई आदमी अपनी समझदारी पर गुमान नहीं कर सकता।जैसे-जैसे परमात्मा हम जीवों को (जीवन-राह पर) चलाता है वैसे वैसे ही हम चलते हैं। 6। हे अपार प्रभू ! अनेकों जीव भटकना में (डाल के तूने) कुमार्ग पर डाले हुए हैं।अनेकों जीव आपकी भक्ति (के रंग) में रंगे हुए हैं, ये (सब) खेल आपका (रचा हुआ) है। जिस तरफ तूने जीवों को लगाया हुआ है वैसा ही फल जीव भोग रहे हैं।आप (सब जीवों को) अपने हुकम में चलाने के समर्थ है। (मेरे पास) अगर कोई चीज मेरी अपनी हैं तो (मैं ये कहने का फख़र कर सकूँ कि) मैं आपकी सेवा कर रहा हूँ।पर मेरा ये जीवन भी तो आपका ही दिया हुआ है और मेरा शरीर भी आपकी ही दाति है। अगर गुरू मिल जाए तो वह कृपा करता है और आत्मिक जीवन देने वाला आपका नाम मुझे (जिंदगी का) आसरा देता है। 7। हे नानक ! जो मनुष्य सदा ऊँचे आत्मिक मण्डल में बसता है (सुरति टिकाए रखता है) उसके अंदर आत्मिक गुण प्रकट होते हैं।आत्मिक गुणों से वह गहरी सांझ डाले रखता है।आत्मिक गुणों में उसकी सुरति जुड़ी रहती है (वही मनुष्य पूरन त्यागी है)। उसके मन को परमात्मा का नाम प्यारा लगता है।वह (खुद नाम) सिमरता है (औरों को सिमरने के लिए) प्रेरित करता है।वह सदा जगत-मूल प्रभू की ही सिफत सालाह करता है। गुरू पीर के शबद को (हृदय में टिका के) वह गहरे जिगरे वाला बन जाता है।पर गुरू शबद से टूट के जगत (माया के मोह में) कमला (हुआ फिरता) है। वह पूर्ण त्यागी मनुष्य अडोल आत्मिक अवस्था में टिक के अच्छे भाग्य वाला बन जाता है।उसका मन सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू (की याद को अपना जीवन-निशाना) मानता है। 8। 1।
सोरठि महला 1 तितुकी ॥ आसा मनसा बंधनी भाई करम धरम बंधकारी ॥ पापि पुंनि जगु जाइआ भाई बिनसै नामु विसारी ॥ इह माइआ जगि मोहणी भाई करम सभे वेकारी ॥1॥ सुणि पंडित करमा कारी ॥ जितु करमि सुखु ऊपजै भाई सु आतम ततु बीचारी ॥ रहाउ ॥ सासतु बेदु बकै खड़ो भाई करम करहु संसारी ॥ पाखंडि मैलु न चूकई भाई अंतरि मैलु विकारी ॥ इन बिधि डूबी माकुरी भाई ऊंडी सिर कै भारी ॥2॥ दुरमति घणी विगूती भाई दूजै भाइ खुआई ॥ बिनु सतिगुर नामु न पाईऐ भाई बिनु नामै भरमु न जाई ॥ सतिगुरु सेवे ता सुखु पाए भाई आवणु जाणु रहाई ॥3॥ साचु सहजु गुर ते ऊपजै भाई मनु निरमलु साचि समाई ॥ गुरु सेवे सो बूझै भाई गुर बिनु मगु न पाई ॥ जिसु अंतरि लोभु कि करम कमावै भाई कूड़ु बोलि बिखु खाई ॥4॥ पंडित दही विलोईऐ भाई विचहु निकलै तथु ॥ जलु मथीऐ जलु देखीऐ भाई इहु जगु एहा वथु ॥ गुर बिनु भरमि विगूचीऐ भाई घटि घटि देउ अलखु ॥5॥ इहु जगु तागो सूत को भाई दह दिस बाधो माइ ॥ बिनु गुर गाठि न छूटई भाई थाके करम कमाइ ॥ इहु जगु भरमि भुलाइआ भाई कहणा किछू न जाइ ॥6॥ गुर मिलिऐ भउ मनि वसै भाई भै मरणा सचु लेखु ॥ मजनु दानु चंगिआईआ भाई दरगह नामु विसेखु ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 तितुकी ॥ हे भाई ! (तीर्थ-व्रत आदि धर्म के नाम कर्म करते हुए भी मायावी आशाएं और फुरने बरकरार रहते हैं।ये) आशाएं और फुरने माया के मोह में बांधने वाले हैं।(ये रस्मी) धार्मिक कर्म (बल्कि) माया के बंधन पैदा करने वाले हैं। हे भाई ! (रस्मी तौर पर माने हुए) पाप और पुंन के कारण जगत पैदा होता है (जनम मरण के चक्कर में आता है)।परमात्मा का नाम भुला के आत्मिक मौत मरता है। हे भाई ! ये माया जगत में (जीवों को) मोहने का काम किए जा रही है।ये सारे (धार्मिक निहित) कर्म व्यर्थ ही जाते हैं। 1। (तीर्थ वर्त आदि धार्मिक मिथे हुए) कर्मों में विश्वास रखने वाले हे पण्डित ! सुन (ये कर्म-धर्म आत्मिक आनंद नहीं पैदा कर सकते)। हे भाई ! जिस काम के द्वारा आत्मिक आनंद पैदा होता है वह (ये) है कि आत्मिक जीवन देने वाले जगत मूल (के गुणों) को अपने विचार-मण्डल में (लाया जाए)। 1।रहाउ। हे पण्डित जी ! आप (लोगों को सुनाने के लिए) वेद-शास्त्र (आदि धर्म-पुस्तकें) खोल के उचारते रहते हैं।पर खुद वही कर्म करते हैं जो माया के मोह में फसाए रखें। हे पंडित ! (इस) पाखण्ड से (मन की) मैल दूर नहीं हो सकती।विकारों की मैल मन के अंदर ही टिकी रहती है। इस तरह तो मकड़ी भी (अपना जाला आप बुन के फिर उसी जाले में) उल्टी सिर भार हैं के मरती है। 2। हे भाई ! दुर्मति के कारण बेअँत दुनियाँ दुखी हो रही है।परमात्मा को बिसार के और ही मोह में डूबी हुई है। परमात्मा का नाम गुरू के बिना नहीं मिल सकता।और प्रभू के नाम के बिना मन की भटकना दूर नहीं होती। जब मनुष्य गुरू की (बताई हुई) सेवा करता है।तब आत्मिक आनँद प्राप्त करता है।और जनम-मरण के चक्कर को समाप्त कर लेता है। 3। हे भाई ! बुरी मति के कारण बेअंत दुनिया दुखी हो रही है।परमात्मा को बिसार के और के मोह में भटकी हुई है।परमात्मा का नाम गुरू के बिना नहीं मिल सकता।और प्रभू के नाम के बिना मन की भटकन दूर नहीं होती। जब मनुष्य गुरू की (बताई हुई) सेवा करता है।गुरू के बिना (ये) रास्ता नहीं मिलता। जिस मनुष्य के मन में लोभ (की लहर) जोर डाल रही हैं।ये रस्मी धार्मिक कर्म करने का उसको कोई (आत्मिक) लाभ नहीं हो सकता।(माया की खातिर) झूठ बोल-बोल के वह मनुष्य (आत्मिक मौत लाने वाला ये झूठ-रूपी) जहर खाता रहता है। 4। हे पंडित ! अगर दही मथें तो उसमें से मक्खन निकलता है। पर अगर पानी मथें।तो पानी ही देखने में आता है।ये (माया-मोह में फसा) जगत (पानी मथ-मथ के) ये पानी ही हासिल करता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना (माया की) भटकना में ही दुखी होते रहते हैं।घट-घट व्यापक अलख परमात्मा से टूटे रहते हैं। 5। हे भाई ! ये जगत सूत्र का धागा (समझ लें।जैसे धागे में गाँठें पड़ी हुई हों।सांसारिक जीवों को) माया के मोह की दसों दिशाओं से गाँठें पड़ी हुई हैं (भाव।मोह में फसे हुए जीव दसों-दिशाओं में खिचे जा रहे हैं)। (अनेकों जीव ये रस्मी धार्मिक) कर्म कर-कर के हार गए।पर गुरू की शरण पड़े बिना मोह की गाँठ नहीं खुलती। हे भाई ! ये जगत (रस्मी धार्मिक कर्म करता हुआ भी मोह की) भटकना में इतना उलझा हुआ है कि बयान नहीं किया जा सकता। 6। हे पंडित ! अगर गुरू मिल जाए तो परमात्मा का डर-अदब मन में बस जाता है।उस डर-अदब में रह के (माया के मोह से) मरना (जीव के माथे पे किए हुए कर्मों का ऐसा) लेख (है जो इसको अटल) (जीवन देता) है। हे भाई ! तीर्थ-स्नान दान-पुंन व और अच्छाईयां परमात्मा का नाम ही हैं।परमात्मा के नाम को ही उसकी हजूरी में प्राथमिकता मिलती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिन मनुष्यों ने (परमात्मा के नाम का रस) चखा है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।