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अंग ६३१ · सोरठ

अंग
631
सोरठ
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  1. अपने गुर ऊपरि कुरबानु ॥
  2. सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥
  3. जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥
  4. रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥
  5. मन की मन ही माहि रही ॥
  6. मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥

अपने गुर ऊपरि कुरबानु ॥

अंग ६३० से चला आ रहा अंश

अपने गुर ऊपरि कुरबानु ॥
भए किरपाल पूरन प्रभ दाते जीअ होए मिहरवान ॥ रहाउ ॥
नानक जन सरनाई ॥
जिनि पूरन पैज रखाई ॥
सगले दूख मिटाई ॥
सुखु भुंचहु मेरे भाई ॥2॥28॥92॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! मैं अपने गुरू से सदके जाता हूँ। (जिसकी मेहर से) सर्व-व्यापक दातार प्रभू जी (सेवकों पर) कृपाल होते हैं।सारें जीवों पर मेहरवान होते हैं।रहाउ। हे दास नानक ! (कह) हे मेरे भाईयो ! उस परमात्मा की शरण पड़े रहो। जिस ने (शरण आए मनुष्यों की) इज्जत (दुखों-विकारों के मुकाबले पर) अच्छी तरह रख ली। जिसने उनके सारे दुख दूर कर दिए। हे भाईओ ! (आप भी उसकी शरण पड़ कर) आत्मिक आनंद लो। 2। 28। 92।

सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥

सोरठि महला 5 ॥
सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥
राखु पैज नाम अपुने की करन करावनहारे ॥1॥
प्रभ जीउ खसमाना करि पिआरे ॥
बुरे भले हम थारे ॥ रहाउ ॥
सुणी पुकार समरथ सुआमी बंधन काटि सवारे ॥
पहिरि सिरपाउ सेवक जन मेले नानक प्रगट पहारे ॥2॥29॥93॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे मेरे ठाकुर ! (मेरी) विनती सुन।सारे छोटे बड़े जीव आपके ही आसरे हैं हे सब कुछ कर सकने और करा सकने वाले प्रभू !(आपका नाम है ‘शरण योग’।हम जीव आपके ही आसरे हैं)आप अपने (इस) नाम की लाज रख (और।हमारे माया के बँधन काट)। 1। हे प्यारे प्रभू जी ! (आप हमारे पति हैं) पति वाले फर्ज पूरे कर। (चाहे हम) बुरे हैं (चाहे हम) अच्छे हैं।हम आपके ही हैं (हमारे विकारों के बँधन काट)।रहाउ। हे नानक ! (कह,हे भाई ! जिन सेवकों की) पुकार सब ताकतों के मालिक प्रभू ने सुन ली।उनके (माया के) बँधन काट के प्रभू ने उनके जीवन सुंदर बना दिए। उन सेवकों को दासों को आदर-मान दे के अपने चरणों में मिला लिया।और।संसार में प्रमुख कर दिया। 2। 29। 93।

जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥

सोरठि महला 5 ॥
जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥
अंगीकारु कीओ प्रभ अपुने भव निधि पारि उतारे ॥1॥
संतन के कारज सगल सवारे ॥
दीन दइआल क्रिपाल क्रिपा निधि पूरन खसम हमारे ॥ रहाउ ॥
आउ बैठु आदरु सभ थाई ऊन न कतहूं बाता ॥
भगति सिरपाउ दीओ जन अपुने प्रतापु नानक प्रभ जाता ॥2॥30॥94॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हमारा पति-प्रभू) संत जनों के सारे काम सँवार देता है (दुनिया के) सारे जीवों को उनके आज्ञाकार बना देता है। सेवकों का सदा पक्ष करता है।और।उनको संसार समुंद्र से पार लंघा लेता है। 1। हे भाई !(हमारा पति-प्रभू) सँत-जनों के सारे काम सँवार देता है। हे भाई ! हमारा पति दीनों पर दया करने वाला है।कृपा का घर है।कृपा का खजाना है।सब ताकतों का मालिक है। हे नानक ! (कह, परमात्मा के सेवकों को संत जनों को) हर जगह आदर मिलता है (हर जगह लोग) स्वागत करते हैं।(संतजनों को) किसी बात की कोई कमी नहीं रहती। परमात्मा अपने सेवकों को भक्ति (का) सिरोपा बख्शता है (इस तरह) परमात्मा का तेज-प्रताप (सारे संसार में) रौशन हो जाता है। 2। 30। 94।

रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥

सोरठि महला 9
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥
स्रवन गोबिंद गुनु सुनउ अरु गाउ रसना गीति ॥1॥ रहाउ ॥
करि साधसंगति सिमरु माधो होहि पतित पुनीत ॥
कालु बिआलु जिउ परिओ डोलै मुखु पसारे मीत ॥1॥
आजु कालि फुनि तोहि ग्रसि है समझि राखउ चीति ॥
कहै नानकु रामु भजि लै जातु अउसरु बीत ॥2॥1॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे (मेरे) मन ! परमात्मा से प्यार बना। (हे भाई !) कानों से परमात्मा की उस्तति सुना कर।और।जीभ से परमात्मा (की सिफत सालाह) के गीत गाया कर।रहाउ। हे भाई ! गुरमुखों की संगत किया कर।परमात्मा का सिमरन करता रह।(सिमरन की बरकति से) विकारी भी पवित्र बन जाते हैं। हे मित्र ! (इस काम में आलस ना कर।देख) मौत साँप की तरह मुँह खोल के घूम रही है। 1। हे भाई ! अपने चित्त में ये बात समझ ले कि (ये मौत) आपको भी जल्दी ही हड़प कर लेगी। नानक (आपको) कहता है, (अब अभी वक्त है) परमात्मा का भजन कर ले।ये वक्त गुजरता जा रहा है। 2। 1।

मन की मन ही माहि रही ॥

सोरठि महला 9 ॥
मन की मन ही माहि रही ॥
ना हरि भजे न तीरथ सेवे चोटी कालि गही ॥1॥ रहाउ ॥
दारा मीत पूत रथ संपति धन पूरन सभ मही ॥
अवर सगल मिथिआ ए जानउ भजनु रामु को सही ॥1॥
फिरत फिरत बहुते जुग हारिओ मानस देह लही ॥
नानक कहत मिलन की बरीआ सिमरत कहा नही ॥2॥2॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ (हे भाई ! देखो।माया धारी के दुर्भाग्य ! उस के) मन की आस मन में ही रह गई। ना उसने परमात्मा का भजन किया।ना ही उसने संतजनों की सेवा की।और।मौत ने चोटी आ पकड़ी। 1।रहाउ। हे भाई ! स्त्री।मित्र।पुत्र।गाड़ियां।माल असबाब।धन पदार्थ। सारी ही धरती - ये सब कुछ नाशवंत समझो।परमात्मा का भजन (ही) असल (साथी) है। 1। हे भाई ! कई युग (जोनियों में) भटक-भटक के आप थक गया था।(अब) आपको मनुष्य का शरीर मिला है। नानक कहता है, (हे भाई ! परमात्मा को) मिलने की यही बारी है।अब आप सिमरन क्यों नहीं करता। 2। 2।

मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥

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सोरठि महला 9 ॥
मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥
पर दारा निंदिआ रस रचिओ राम भगति नहि कीनी ॥1॥ रहाउ ॥
मुकति पंथु जानिओ तै नाहनि धन जोरन कउ धाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे मन ! आपने कैसी कुबुद्धि ले ली है। आप पराई स्त्री।पराई निंदा के रस में मस्त रहता है।परमात्मा की भक्ति आपने (कभी) नहीं की। 1।रहाउ। हे भाई ! आपने विकारों से खलासी पाने का रास्ता (अभी तक) नहीं समझा।धन एकत्र करने के लिए आप सदा दौड़-भाग करते रहे हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी; महला ९: गुरु तेग बहादुर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६३१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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