भए किरपाल पूरन प्रभ दाते जीअ होए मिहरवान ॥ रहाउ ॥
नानक जन सरनाई ॥
जिनि पूरन पैज रखाई ॥
सगले दूख मिटाई ॥
सुखु भुंचहु मेरे भाई ॥2॥28॥92॥
सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥
राखु पैज नाम अपुने की करन करावनहारे ॥1॥
प्रभ जीउ खसमाना करि पिआरे ॥
बुरे भले हम थारे ॥ रहाउ ॥
सुणी पुकार समरथ सुआमी बंधन काटि सवारे ॥
पहिरि सिरपाउ सेवक जन मेले नानक प्रगट पहारे ॥2॥29॥93॥
जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥
अंगीकारु कीओ प्रभ अपुने भव निधि पारि उतारे ॥1॥
संतन के कारज सगल सवारे ॥
दीन दइआल क्रिपाल क्रिपा निधि पूरन खसम हमारे ॥ रहाउ ॥
आउ बैठु आदरु सभ थाई ऊन न कतहूं बाता ॥
भगति सिरपाउ दीओ जन अपुने प्रतापु नानक प्रभ जाता ॥2॥30॥94॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥
स्रवन गोबिंद गुनु सुनउ अरु गाउ रसना गीति ॥1॥ रहाउ ॥
करि साधसंगति सिमरु माधो होहि पतित पुनीत ॥
कालु बिआलु जिउ परिओ डोलै मुखु पसारे मीत ॥1॥
आजु कालि फुनि तोहि ग्रसि है समझि राखउ चीति ॥
कहै नानकु रामु भजि लै जातु अउसरु बीत ॥2॥1॥
मन की मन ही माहि रही ॥
ना हरि भजे न तीरथ सेवे चोटी कालि गही ॥1॥ रहाउ ॥
दारा मीत पूत रथ संपति धन पूरन सभ मही ॥
अवर सगल मिथिआ ए जानउ भजनु रामु को सही ॥1॥
फिरत फिरत बहुते जुग हारिओ मानस देह लही ॥
नानक कहत मिलन की बरीआ सिमरत कहा नही ॥2॥2॥
मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥
पर दारा निंदिआ रस रचिओ राम भगति नहि कीनी ॥1॥ रहाउ ॥
मुकति पंथु जानिओ तै नाहनि धन जोरन कउ धाइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! मैं अपने गुरू से सदके जाता हूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।