ना हरि भजिओ न गुर जनु सेविओ नह उपजिओ कछु गिआना ॥
घट ही माहि निरंजनु तेरै तै खोजत उदिआना ॥2॥
बहुतु जनम भरमत तै हारिओ असथिर मति नही पाई ॥
मानस देह पाइ पद हरि भजु नानक बात बताई ॥3॥3॥
मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥
जिह सिमरत गनका सी उधरी ता को जसु उर धारो ॥1॥ रहाउ ॥
अटल भइओ ध्रूअ जा कै सिमरनि अरु निरभै पदु पाइआ ॥
दुख हरता इह बिधि को सुआमी तै काहे बिसराइआ ॥1॥
जब ही सरनि गही किरपा निधि गज गराह ते छूटा ॥
महमा नाम कहा लउ बरनउ राम कहत बंधन तिह तूटा ॥2॥
अजामलु पापी जगु जाने निमख माहि निसतारा ॥
नानक कहत चेत चिंतामनि तै भी उतरहि पारा ॥3॥4॥
प्रानी कउनु उपाउ करै ॥
जा ते भगति राम की पावै जम को त्रासु हरै ॥1॥ रहाउ ॥
कउनु करम बिदिआ कहु कैसी धरमु कउनु फुनि करई ॥
कउनु नामु गुर जा कै सिमरै भव सागर कउ तरई ॥1॥
कल मै एकु नामु किरपा निधि जाहि जपै गति पावै ॥
अउर धरम ता कै सम नाहनि इह बिधि बेदु बतावै ॥2॥
सुखु दुखु रहत सदा निरलेपी जा कउ कहत गुसाई ॥
सो तुम ही महि बसै निरंतरि नानक दरपनि निआई ॥3॥5॥
माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥
महा मोह अगिआनि तिमरि मो मनु रहिओ उरझाई ॥1॥ रहाउ ॥
सगल जनम भरम ही भरम खोइओ नह असथिरु मति पाई ॥
बिखिआसकत रहिओ निस बासुर नह छूटी अधमाई ॥1॥
साधसंगु कबहू नही कीना नह कीरति प्रभ गाई ॥
जन नानक मै नाहि कोऊ गुनु राखि लेहु सरनाई ॥2॥6॥
माई मनु मेरो बसि नाहि ॥
निस बासुर बिखिअन कउ धावत किहि बिधि रोकउ ताहि ॥1॥ रहाउ ॥
बेद पुरान सिम्रिति के मत सुनि निमख न हीए बसावै ॥
पर धन पर दारा सिउ रचिओ बिरथा जनमु सिरावै ॥1॥
मदि माइआ कै भइओ बावरो सूझत नह कछु गिआना ॥
घट ही भीतरि बसत निरंजनु ता को मरमु न जाना ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(दुनिया के पदार्थों में से) किसी ने भी आखिर में किसी का साथ नहीं दिया।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।