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अंग 632

अंग
632
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंति संग काहू नही दीना बिरथा आपु बंधाइआ ॥1॥
ना हरि भजिओ न गुर जनु सेविओ नह उपजिओ कछु गिआना ॥
घट ही माहि निरंजनु तेरै तै खोजत उदिआना ॥2॥
बहुतु जनम भरमत तै हारिओ असथिर मति नही पाई ॥
मानस देह पाइ पद हरि भजु नानक बात बताई ॥3॥3॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: (दुनिया के पदार्थों में से) किसी ने भी आखिर में किसी का साथ नहीं दिया।तूने व्यर्थ ही अपने आप को (माया के मोह में) जकड़ रखा है। 1। हे भाई ! (अभी तक) ना तूने परमात्मा की भक्ति की है।ना गुरू की शरण पड़ा है।ना ही आपके अंदर आत्मिक जीवन की सूझ आई है। माया से निर्लिप प्रभू आपके हृदय में बस रहा है।पर आप (बाहर) जंगलों में उसे तलाश रहा है। 2। हे भाई ! अनेकों जन्मों में भटक-भटक के तूने (मनुष्य जन्म की बाजी) हार ली है।तूने ऐसी अक्ल नहीं सीखी जिसकी बरकति से (जन्मों के चक्करों में से) आपको अडोलता हासिल हैं सके। हे नानक ! (कह, हे भाई ! गुरू ने तो ये) बात समझाई है कि मानस जन्म का (ऊँचा) दर्जा हासिल करके परमात्मा का भजन कर। 3। 3।
सोरठि महला 9 ॥
मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥
जिह सिमरत गनका सी उधरी ता को जसु उर धारो ॥1॥ रहाउ ॥
अटल भइओ ध्रूअ जा कै सिमरनि अरु निरभै पदु पाइआ ॥
दुख हरता इह बिधि को सुआमी तै काहे बिसराइआ ॥1॥
जब ही सरनि गही किरपा निधि गज गराह ते छूटा ॥
महमा नाम कहा लउ बरनउ राम कहत बंधन तिह तूटा ॥2॥
अजामलु पापी जगु जाने निमख माहि निसतारा ॥
नानक कहत चेत चिंतामनि तै भी उतरहि पारा ॥3॥4॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे मन ! परमात्मा की शरण पड़ कर उसके नाम का ध्यान धरा कर। जिस परमात्मा का सिमरन करके गनिका (विकारों में डूबने से) बच गई थी आप भी।(हे भाई !) उसकी सिफत सालाह अपने दिल में बसाए रख।रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा के सिमरन से ध्रूव सदा के लिए अटल हो गया है और उसने निर्भयता का आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया था। तूने उस परमात्मा को क्यों भुलाया हुआ है।वह तो इस तरह के दुखों का नाश करने वाला है। 1। हे भाई ! जिस वक्त ही (हाथी ने) कृपा के समुंद्र परमात्मा का आसरा लिया वह हाथी (गज) तेंदुए की पकड़ से निकल गया। मैं कहाँ तक परमात्मा के नाम की वडिआई बताऊँ।परमात्मा का नाम उचार के उस (हाथी) के बंधन टूट गए थे। 2। हे भाई ! सारा जगत जानता है कि अजामल विकारी था (परमात्मा के नामका सिमरन करके) पलक झपकने जितने समय में ही उसका पार-उतारा हो गया था। नानक कहता है, (हे भाई ! आप) सारी चितवनियां पूरी करने वाले परमात्मा का नाम सिमरा कर।आप भी (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाएगा। 3। 4।
सोरठि महला 9 ॥
प्रानी कउनु उपाउ करै ॥
जा ते भगति राम की पावै जम को त्रासु हरै ॥1॥ रहाउ ॥
कउनु करम बिदिआ कहु कैसी धरमु कउनु फुनि करई ॥
कउनु नामु गुर जा कै सिमरै भव सागर कउ तरई ॥1॥
कल मै एकु नामु किरपा निधि जाहि जपै गति पावै ॥
अउर धरम ता कै सम नाहनि इह बिधि बेदु बतावै ॥2॥
सुखु दुखु रहत सदा निरलेपी जा कउ कहत गुसाई ॥
सो तुम ही महि बसै निरंतरि नानक दरपनि निआई ॥3॥5॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ (हे भाई ! बता) मनुष्य वह कौन से उपाय करे जिससे परमात्मा की भक्ति प्राप्त कर सके। और जम का डर दूर कर सके। 1।रहाउ। (हे भाई !) बता।वह कौन से (धार्मिक) कर्म हैं।वह कैसी विद्या है।वह कौन सा धर्म है (जो मनुष्य) करे; वह कौन सा गुरू का (बताया) नाम है जिसका सिमरन करने से मनुष्य संसार समुंद्र से पार लांघ सकता है। 1। (हे भाई !) कृपा के खजाने परमात्मा का नाम ही जगत में है जिसको (जो मनुष्य) जपता है (वह) उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। और किसी तरह के भी कोई कर्म उस (नाम) के बराबर नहीं हें- वेद (भी) यह युक्ति बताता है। 2। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जिसे (जगत) धरती का पति (गोसाई) कहता है वह सुखों दुखों से अलग रहता है।वह सदा (माया से) निर्लिप रहता है। वह आपके अंदर भी एक रस बस रहा है।जैसे शीशे (में अक्स बसता हैं उसका सदा सिमरन करना चाहिए)। 3। 5।
सोरठि महला 9 ॥
माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥
महा मोह अगिआनि तिमरि मो मनु रहिओ उरझाई ॥1॥ रहाउ ॥
सगल जनम भरम ही भरम खोइओ नह असथिरु मति पाई ॥
बिखिआसकत रहिओ निस बासुर नह छूटी अधमाई ॥1॥
साधसंगु कबहू नही कीना नह कीरति प्रभ गाई ॥
जन नानक मै नाहि कोऊ गुनु राखि लेहु सरनाई ॥2॥6॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे माँ ! धरती के प्रभू-पति को मैं किस तरह पहचानूँ। मेरा मन (तो) बड़े मोह भरी अग्यानता में।मोह के अँधेरे में (सदा) फसा रहता है। 1।रहाउ। बहुत जनमों में (अभी तक ऐसी) मति नहीं हासिल की (जो मुझे) अडोल रख सके। दिन-रात मैं माया में ही लिपटा रहता हूँ।मेरी ये नीचता खत्म होने को नहीं आती। 1। हे माँ ! मैंने कभी गुरमुखों की संगति नहीं की।मैंने कभी परमात्मा के सिफत सालाह का गीत नहीं गाया। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मेरे अंदर कोई गुण नहीं।मुझे अपनी शरण में रख। 2। 6।
सोरठि महला 9 ॥
माई मनु मेरो बसि नाहि ॥
निस बासुर बिखिअन कउ धावत किहि बिधि रोकउ ताहि ॥1॥ रहाउ ॥
बेद पुरान सिम्रिति के मत सुनि निमख न हीए बसावै ॥
पर धन पर दारा सिउ रचिओ बिरथा जनमु सिरावै ॥1॥
मदि माइआ कै भइओ बावरो सूझत नह कछु गिआना ॥
घट ही भीतरि बसत निरंजनु ता को मरमु न जाना ॥2॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे माँ ! मेरा मन मेरे काबू में नहीं। रात-दिन पदार्थों की खातिर दौड़ता फिरता है।मैं इसे कैसे रोकूँ। 1।रहाउ। ये जीव वेदों-पुराणों-स्मृतियों का उपदेश सुन के (भी) रक्ती भर समय के लिए भी (उस उपदेश को अपने) हृदय में नहीं बसाता। पराए धन। पराई स्त्री के मोह में मस्त रहता है।(इस तरह अपना) जनम व्यर्थ गुजारता है। 1। जीव माया के नशे में पागल हो रहा है।आत्मिक जीवन के बारे में इसे कोई सूझ नहीं आती। माया से निर्लिप प्रभू इसके दिल में ही बसता है पर ये भेद ये जीव नहीं समझता। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(दुनिया के पदार्थों में से) किसी ने भी आखिर में किसी का साथ नहीं दिया।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।