अंग
63
सिरी राग
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मनमुखु जाणै आपणे धीआ पूत संजोगु ॥
मनमुखु जाणै आपणे धीआ पूत संजोगु ॥
नारी देखि विगासीअहि नाले हरखु सु सोगु ॥
गुरमुखि सबदि रंगावले अहिनिसि हरि रसु भोगु ॥3॥
चितु चलै वितु जावणो साकत डोलि डोलाइ ॥
बाहरि ढूंढि विगुचीऐ घर महि वसतु सुथाइ ॥
मनमुखि हउमै करि मुसी गुरमुखि पलै पाइ ॥4॥
साकत निरगुणिआरिआ आपणा मूलु पछाणु ॥
रकतु बिंदु का इहु तनो अगनी पासि पिराणु ॥
पवणै कै वसि देहुरी मसतकि सचु नीसाणु ॥5॥
बहुता जीवणु मंगीऐ मुआ न लोड़ै कोइ ॥
सुख जीवणु तिसु आखीऐ जिसु गुरमुखि वसिआ सोइ ॥
नाम विहूणे किआ गणी जिसु हरि गुर दरसु न होइ ॥6॥
जिउ सुपनै निसि भुलीऐ जब लगि निद्रा होइ ॥
इउ सरपनि कै वसि जीअड़ा अंतरि हउमै दोइ ॥
गुरमति होइ वीचारीऐ सुपना इहु जगु लोइ ॥7॥
अगनि मरै जलु पाईऐ जिउ बारिक दूधै माइ ॥
बिनु जल कमल सु ना थीऐ बिनु जल मीनु मराइ ॥
नानक गुरमुखि हरि रसि मिलै जीवा हरि गुण गाइ ॥8॥15॥
नारी देखि विगासीअहि नाले हरखु सु सोगु ॥
गुरमुखि सबदि रंगावले अहिनिसि हरि रसु भोगु ॥3॥
चितु चलै वितु जावणो साकत डोलि डोलाइ ॥
बाहरि ढूंढि विगुचीऐ घर महि वसतु सुथाइ ॥
मनमुखि हउमै करि मुसी गुरमुखि पलै पाइ ॥4॥
साकत निरगुणिआरिआ आपणा मूलु पछाणु ॥
रकतु बिंदु का इहु तनो अगनी पासि पिराणु ॥
पवणै कै वसि देहुरी मसतकि सचु नीसाणु ॥5॥
बहुता जीवणु मंगीऐ मुआ न लोड़ै कोइ ॥
सुख जीवणु तिसु आखीऐ जिसु गुरमुखि वसिआ सोइ ॥
नाम विहूणे किआ गणी जिसु हरि गुर दरसु न होइ ॥6॥
जिउ सुपनै निसि भुलीऐ जब लगि निद्रा होइ ॥
इउ सरपनि कै वसि जीअड़ा अंतरि हउमै दोइ ॥
गुरमति होइ वीचारीऐ सुपना इहु जगु लोइ ॥7॥
अगनि मरै जलु पाईऐ जिउ बारिक दूधै माइ ॥
बिनु जल कमल सु ना थीऐ बिनु जल मीनु मराइ ॥
नानक गुरमुखि हरि रसि मिलै जीवा हरि गुण गाइ ॥8॥15॥
हिन्दी अर्थ: (प्रभू की रजा मुताबिक जगत में) बेटी बेटों का मेल (आ बनता है), पर अपने मन के पीछे चलने वाला आदमी इनको अपने समझ लेता है। (मनमुख लोग अपनी अपनी) स्त्री को देख के खुश होते हैं, (देख के) खुशी भी होती है सहम भी होता है (कि कहीं ये बच्चे स्त्री मर ना जाएं)। गुरू के बताए रास्ते पर चलने वाले लोग गुरू के शबद के द्वारा आत्मिक सुख पाते हैं। परमात्मा का नाम रस दिन रात उनकी आत्मिक खुराक होता है।3। (मनुष्य धन को सुख का मूल समझता है, जब) धन जाने लगता है तो साकत का मन डोलता है। (सुख को) बाहर से ढूंढने से खुआर ही होते हैं। (साकत मनुष्य यह नहीं समझता कि सुख का मूल) परमात्मा का नाम धन घर में ही, हृदय में ही है। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव स्त्री “मैं मैं” कर के ही लुटी जाती है (अंदर से नाम धन लुटा बैठती है)। (जबकि) गुरू के मार्ग पर चलने वाली ये धन हासिल कर लेती है।4। हे गुणहीन साकत मनुष्य ! (आप गुमान करते हैं अपने शरीर का) अपना असल तो पहचान। ये शरीर माँ के लहू और पिता के वीर्य से बना है। याद रख, (आखिर इसने) आग में (जल जाना है)। हरेक जीव के माथे पे यह अटॅल हुकम है कि यह शरीर स्वासों के अधीन है (हरेक के गिने चुने श्वास हैं)।5। लम्बी लम्बी उम्र मांगी जाती है। कोई भी जल्दी मरना नहीं चाहता। पर उसी मनुष्य का जीवन सुखी कह सकते हैं, जिसके मन में, गुरू की शरण पड़ कर, परमात्मा आ बसता है। जिस मनुष्य को कभी गुरू के दर्शन नहीं हुए, कभी परमात्मा के दीदार नहीं हुए, उस प्रभू नाम से वंचित मनुष्य को मैं (जीवित) क्या समझूँ? ।6। जैसे रात को (सोते हुए को) सुपने में (कई चीजें देख के) भुलेखा पड़ जाता है (कि जो कुछ देख रहे हैं यह सचमुच ठीक है, और यह भुलेखा तब तक टिका रहता है) जब तक नींद टिकी रहती है। इसी तरह कमजोर जीव माया नागिन के बस में (जब तक) है (तब तक) इसके अंदर अहम् और मेर तेर बनी रहती है। (और इस अहम् और मेर तेर को यह जीवन सही जीवन समझता है)। जब गुरू की मति प्राप्त हो तो यह समझ पड़ती है कि ये जगत (का मोह) यह दुनिया (वाली मेर तेर) निरा स्वपन ही है।7। जैसे बालक की आग (पेट की आग, भूख) माँ का दूध पीने से शांत होती है, वैसे ही ये तृष्णा की आग तभी बुझती है जब प्रभू के नाम का जल इस ऊपर डालते हैं। पानी के बिनां कमल काफूल नहीं रह सकता। पानी के बिना मछुली मर जाती है। वैसे ही गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (प्रभू नाम के बिना जी नहीं सकता। उसका आत्मिक जीवन तभी प्रफुल्लित होता है जब) वह परमात्मा के नाम रस में लीन होता है। हे नानक ! (प्रभू दर पे अरदास कर और कह, हे प्रभू ! मेहर कर), मैं आपके गुण गा के (आत्मिक जीवन) जीऊँ।8।15।
डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥
सिरीरागु महला 1 ॥
डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥
ऊचउ परबतु गाखड़ो ना पउड़ी तितु तासु ॥
गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥1॥
भाई रे भवजलु बिखमु डरांउ ॥
पूरा सतिगुरु रसि मिलै गुरु तारे हरि नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
चला चला जे करी जाणा चलणहारु ॥
जो आइआ सो चलसी अमरु सु गुरु करतारु ॥
भी सचा सालाहणा सचै थानि पिआरु ॥2॥
दर घर महला सोहणे पके कोट हजार ॥
हसती घोड़े पाखरे लसकर लख अपार ॥
किस ही नालि न चलिआ खपि खपि मुए असार ॥3॥
सुइना रुपा संचीऐ मालु जालु जंजालु ॥
सभ जग महि दोही फेरीऐ बिनु नावै सिरि कालु ॥
पिंडु पड़ै जीउ खेलसी बदफैली किआ हालु ॥4॥
पुता देखि विगसीऐ नारी सेज भतार ॥
चोआ चंदनु लाईऐ कापड़ु रूपु सीगारु ॥
खेहू खेह रलाईऐ छोडि चलै घर बारु ॥5॥
महर मलूक कहाईऐ राजा राउ कि खानु ॥
चउधरी राउ सदाईऐ जलि बलीऐ अभिमान ॥
मनमुखि नामु विसारिआ जिउ डवि दधा कानु ॥6॥
हउमै करि करि जाइसी जो आइआ जग माहि ॥
डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥
ऊचउ परबतु गाखड़ो ना पउड़ी तितु तासु ॥
गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥1॥
भाई रे भवजलु बिखमु डरांउ ॥
पूरा सतिगुरु रसि मिलै गुरु तारे हरि नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
चला चला जे करी जाणा चलणहारु ॥
जो आइआ सो चलसी अमरु सु गुरु करतारु ॥
भी सचा सालाहणा सचै थानि पिआरु ॥2॥
दर घर महला सोहणे पके कोट हजार ॥
हसती घोड़े पाखरे लसकर लख अपार ॥
किस ही नालि न चलिआ खपि खपि मुए असार ॥3॥
सुइना रुपा संचीऐ मालु जालु जंजालु ॥
सभ जग महि दोही फेरीऐ बिनु नावै सिरि कालु ॥
पिंडु पड़ै जीउ खेलसी बदफैली किआ हालु ॥4॥
पुता देखि विगसीऐ नारी सेज भतार ॥
चोआ चंदनु लाईऐ कापड़ु रूपु सीगारु ॥
खेहू खेह रलाईऐ छोडि चलै घर बारु ॥5॥
महर मलूक कहाईऐ राजा राउ कि खानु ॥
चउधरी राउ सदाईऐ जलि बलीऐ अभिमान ॥
मनमुखि नामु विसारिआ जिउ डवि दधा कानु ॥6॥
हउमै करि करि जाइसी जो आइआ जग माहि ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ (एक तरफ संसार समुंदर है, दूसरी तरफ, इस में से पार लांघने के लिए गुरमुखों वाला रास्ता है। पर आत्मिक जीवन वाला वह रास्ता पहाड़ी रास्ता है। आत्मिक जीवन के शिखर पर पहुँचना, मानो एक बड़े ऊँचे डरावने पहाड़ पर चढ़ने के समान है। उस) डरावने पहाड़ को देख के पेके घर में (माँ-बाप भाई बहन आदि के मोह में ग्रसित जीव स्त्री) डर गई (कि इस पहाड़ पर चढ़ा नहीं जा सकता, जगत का मोह दूर नहीं किया जा सकता, स्वै को न्यौछावर नहीं किया जा सकता)। (आत्मिक जीवन के शिखर पे पहुँचना, मानों) बहुत ऊंचा और मुश्किल पर्वत है; उस पर्वत पर चढ़ने के लिए उस (जीव स्त्री) के पास कोई सीढ़ी भी नहीं। गुरू के सन्मुख रहने वाली जिस जीव स्त्री को गुरू ने (प्रभू चरणों में) मिला लिया, उसने अपने अंदर ही बसते प्रभू को पहिचान लिया। और, वह इस संसार समुंद्र से पार लांघ गई।1। हे भाई ! ये संसार समुंदर बड़ा डरावणा है और (तैरना) मुश्किल है। जिस मनुष्य को पूरा गुरू प्रेम से मिलता है उसको वह गुरू परमात्मा का नाम दे के (इस समुंदर में से) पार लंघा लेता है।1।रहाउ। अगर मैं सदा याद रखूं कि मैंने जगत में से जरूर चले जाना है। यदि मैं समझ लूं कि सारा जगत ही चले जाने वाला है। जगत में जो भी आया है, वह आखिर चला जाएगा। मौत-रहित एक गुरू परमात्मा ही है, तो फिर सत्संग में (प्रभू चरणों के साथ) प्यार डाल के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए (बस ! यही है संसार समुंदर के विकारों भारी लहरों से बचने का तरीका)।2। सुंदर दरवाजों वाले सुंदर घर व महल, हजारों पक्के किले, हाथी घोड़े, काठियां, लाखों तथा बेअंत लशकर- इनमें कोई भी किसी के साथ नहीं गए। बेसमझ ऐसे ही खप खप के आत्मिक मौत मरते रहे (इनकी खातिर आत्मिक जीवन गवा गए)।3। अगर सोना-चाँदी इकट्ठा करते जाएं, तो यह माल धन (जीवात्मा को मोह में फंसाने के लिए) जाल बनता है, फांसी बनता है। यदि अपनी ताकत की दुहाई सारे जगत में फिरा सकें, तो भी परमात्मा का नाम सिमरन के बिनां सिर पर मौत का डर (कायम रहता) है। जब जीवात्मा जिंदगी की खेल खेल जाती है और शरीर (मिट्टी हो के) गिर पड़ता है, तब (धन पदार्थ की खातिर) गंदे काम करने वालों का बुरा हाल होता है।4। पिता (अपने) पुत्रों को देख के खुश होता है। पति (अपनी) सेज पर स्त्री को देख कर प्रसन्न होता है। (इस शरीर को) इत्र व चंदन लगाते हैं। सुंदर कपड़ा, रूप, गहना आदि (देख के मन खुश होता है)। पर आखिर में शरीर मिट्टी हो के मिट्टी में मिल जाता है, और गुमान करने वाला जीव घर बार छोड़ के (संसार से) चला जाता है।5। सरदार, बादशाह, राजा, राव औा खान कहलवाते हैं। (अपने आप को) चौधरी, राय (साहिब आदि) बुलवाते हैं। (इस बड़प्पन के) अहंकार में जल मरते हैं (यदि कोई पूरा मान आदर ना करे)। (पर इतना कुछ होते हुए भी) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ने परमात्मा का नाम भुला दिया, और (और ऐसे बताया) जैसे जंगल की आग में जला हुआ तिनका है (बाहर से चमकदार, अंदर से काला स्याह)।6। जगत में जो भी आया है, “मैं बड़ा मैं बड़ा” कह कह के आखिर यहां से चला जाएगा।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।