गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (प्रभू की रजा मुताबिक जगत में) बेटी बेटों का मेल (आ बनता है), पर अपने मन के पीछे चलने वाला आदमी इनको अपने समझ लेता है। (मनमुख लोग अपनी अपनी) स्त्री को देख के खुश होते हैं, (देख के) खुशी भी होती है सहम भी होता है (कि कहीं ये बच्चे स्त्री मर ना जाएं)। गुरू के बताए रास्ते पर चलने वाले लोग गुरू के शबद के द्वारा आत्मिक सुख पाते हैं। परमात्मा का नाम रस दिन रात उनकी आत्मिक खुराक होता है।3। (मनुष्य धन को सुख का मूल समझता है, जब) धन जाने लगता है तो साकत का मन डोलता है। (सुख को) बाहर से ढूंढने से खुआर ही होते हैं। (साकत मनुष्य यह नहीं समझता कि सुख का मूल) परमात्मा का नाम धन घर में ही, हृदय में ही है। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव स्त्री “मैं मैं” कर के ही लुटी जाती है (अंदर से नाम धन लुटा बैठती है)। (जबकि) गुरू के मार्ग पर चलने वाली ये धन हासिल कर लेती है।4। हे गुणहीन साकत मनुष्य ! (आप गुमान करता है अपने शरीर का) अपना असल तो पहचान। ये शरीर माँ के लहू और पिता के वीर्य से बना है। याद रख, (आखिर इसने) आग में (जल जाना है)। हरेक जीव के माथे पे यह अटॅल हुकम है कि यह शरीर स्वासों के अधीन है (हरेक के गिने चुने श्वास हैं)।5। लम्बी लम्बी उम्र मांगी जाती है। कोई भी जल्दी मरना नहीं चाहता। पर उसी मनुष्य का जीवन सुखी कह सकते हैं, जिसके मन में, गुरू की शरण पड़ कर, परमात्मा आ बसता है। जिस मनुष्य को कभी गुरू के दर्शन नहीं हुए, कभी परमात्मा के दीदार नहीं हुए, उस प्रभू नाम से वंचित मनुष्य को मैं (जीवित) क्या समझूँ? ।6। जैसे रात को (सोते हुए को) सुपने में (कई चीजें देख के) भुलेखा पड़ जाता है (कि जो कुछ देख रहे हैं यह सचमुच ठीक है, और यह भुलेखा तब तक टिका रहता है) जब तक नींद टिकी रहती है। इसी तरह कमजोर जीव माया नागिन के बस में (जब तक) है (तब तक) इसके अंदर अहम् और मेर तेर बनी रहती है। (और इस अहम् और मेर तेर को यह जीवन सही जीवन समझता है)। जब गुरू की मति प्राप्त हो तो यह समझ पड़ती है कि ये जगत (का मोह) यह दुनिया (वाली मेर तेर) निरा स्वपन ही है।7। जैसे बालक की आग (पेट की आग, भूख) माँ का दूध पीने से शांत होती है, वैसे ही ये तृष्णा की आग तभी बुझती है जब प्रभू के नाम का जल इस ऊपर डालते हैं। पानी के बिनां कमल काफूल नहीं रह सकता। पानी के बिना मछुली मर जाती है। वैसे ही गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (प्रभू नाम के बिना जी नहीं सकता। उसका आत्मिक जीवन तभी प्रफुल्लित होता है जब) वह परमात्मा के नाम रस में लीन होता है। हे नानक ! (प्रभू दर पे अरदास कर और कह, हे प्रभू ! मेहर कर), मैं आपके गुण गा के (आत्मिक जीवन) जीऊँ।8।15।
सिरीरागु महला 1 ॥ डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥ ऊचउ परबतु गाखड़ो ना पउड़ी तितु तासु ॥ गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥1॥ भाई रे भवजलु बिखमु डरांउ ॥ पूरा सतिगुरु रसि मिलै गुरु तारे हरि नाउ ॥1॥ रहाउ ॥ चला चला जे करी जाणा चलणहारु ॥ जो आइआ सो चलसी अमरु सु गुरु करतारु ॥ भी सचा सालाहणा सचै थानि पिआरु ॥2॥ दर घर महला सोहणे पके कोट हजार ॥ हसती घोड़े पाखरे लसकर लख अपार ॥ किस ही नालि न चलिआ खपि खपि मुए असार ॥3॥ सुइना रुपा संचीऐ मालु जालु जंजालु ॥ सभ जग महि दोही फेरीऐ बिनु नावै सिरि कालु ॥ पिंडु पड़ै जीउ खेलसी बदफैली किआ हालु ॥4॥ पुता देखि विगसीऐ नारी सेज भतार ॥ चोआ चंदनु लाईऐ कापड़ु रूपु सीगारु ॥ खेहू खेह रलाईऐ छोडि चलै घर बारु ॥5॥ महर मलूक कहाईऐ राजा राउ कि खानु ॥ चउधरी राउ सदाईऐ जलि बलीऐ अभिमान ॥ मनमुखि नामु विसारिआ जिउ डवि दधा कानु ॥6॥ हउमै करि करि जाइसी जो आइआ जग माहि ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ (एक तरफ संसार समुंदर है, दूसरी तरफ, इस में से पार लांघने के लिए गुरमुखों वाला रास्ता है। पर आत्मिक जीवन वाला वह रास्ता पहाड़ी रास्ता है। आत्मिक जीवन के शिखर पर पहुँचना, मानो एक बड़े ऊँचे डरावने पहाड़ पर चढ़ने के समान है। उस) डरावने पहाड़ को देख के पेके घर में (माँ-बाप भाई बहन आदि के मोह में ग्रसित जीव स्त्री) डर गई (कि इस पहाड़ पर चढ़ा नहीं जा सकता, जगत का मोह दूर नहीं किया जा सकता, स्वै को न्यौछावर नहीं किया जा सकता)। (आत्मिक जीवन के शिखर पे पहुँचना, मानों) बहुत ऊंचा और मुश्किल पर्वत है; उस पर्वत पर चढ़ने के लिए उस (जीव स्त्री) के पास कोई सीढ़ी भी नहीं। गुरू के सन्मुख रहने वाली जिस जीव स्त्री को गुरू ने (प्रभू चरणों में) मिला लिया, उसने अपने अंदर ही बसते प्रभू को पहिचान लिया। और, वह इस संसार समुंद्र से पार लांघ गई।1। हे भाई ! ये संसार समुंदर बड़ा डरावणा है और (तैरना) मुश्किल है। जिस मनुष्य को पूरा गुरू प्रेम से मिलता है उसको वह गुरू परमात्मा का नाम दे के (इस समुंदर में से) पार लंघा लेता है।1।रहाउ। अगर मैं सदा याद रखूं कि मैंने जगत में से जरूर चले जाना है। यदि मैं समझ लूं कि सारा जगत ही चले जाने वाला है। जगत में जो भी आया है, वह आखिर चला जाएगा। मौत-रहित एक गुरू परमात्मा ही है, तो फिर सत्संग में (प्रभू चरणों के साथ) प्यार डाल के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए (बस ! यही है संसार समुंदर के विकारों भारी लहरों से बचने का तरीका)।2। सुंदर दरवाजों वाले सुंदर घर व महल, हजारों पक्के किले, हाथी घोड़े, काठियां, लाखों तथा बेअंत लशकर- इनमें कोई भी किसी के साथ नहीं गए। बेसमझ ऐसे ही खप खप के आत्मिक मौत मरते रहे (इनकी खातिर आत्मिक जीवन गवा गए)।3। अगर सोना-चाँदी इकट्ठा करते जाएं, तो यह माल धन (जीवात्मा को मोह में फंसाने के लिए) जाल बनता है, फांसी बनता है। यदि अपनी ताकत की दुहाई सारे जगत में फिरा सकें, तो भी परमात्मा का नाम सिमरन के बिनां सिर पर मौत का डर (कायम रहता) है। जब जीवात्मा जिंदगी की खेल खेल जाती है और शरीर (मिट्टी हो के) गिर पड़ता है, तब (धन पदार्थ की खातिर) गंदे काम करने वालों का बुरा हाल होता है।4। पिता (अपने) पुत्रों को देख के खुश होता है। पति (अपनी) सेज पर स्त्री को देख कर प्रसन्न होता है। (इस शरीर को) इत्र व चंदन लगाते हैं। सुंदर कपड़ा, रूप, गहना आदि (देख के मन खुश होता है)। पर आखिर में शरीर मिट्टी हो के मिट्टी में मिल जाता है, और गुमान करने वाला जीव घर बार छोड़ के (संसार से) चला जाता है।5। सरदार, बादशाह, राजा, राव औा खान कहलवाते हैं। (अपने आप को) चौधरी, राय (साहिब आदि) बुलवाते हैं। (इस बड़प्पन के) अहंकार में जल मरते हैं (यदि कोई पूरा मान आदर ना करे)। (पर इतना कुछ होते हुए भी) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ने परमात्मा का नाम भुला दिया, और (और ऐसे बताया) जैसे जंगल की आग में जला हुआ तिनका है (बाहर से चमकदार, अंदर से काला स्याह)।6। जगत में जो भी आया है, “मैं बड़ा मैं बड़ा” कह कह के आखिर यहां से चला जाएगा।
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(प्रभू की रजा मुताबिक जगत में) बेटी बेटों का मेल (आ बनता है), पर अपने मन के पीछे चलने वाला आदमी इनको अपने समझ लेता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।